प्रस्तावना: तपता भारत और मौसम की चरम स्थिति
हाल के वर्षों में भारत ने मौसम के अत्यंत असामान्य और विनाशकारी स्वरूप का अनुभव किया है। विशेष रूप से वर्ष 2026 के अप्रैल माह से देश के अनेक हिस्सों में गर्मी ने पूर्व के सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। अप्रैल के अंतिम सप्ताह और मई के प्रारंभिक दिनों में उत्तर तथा मध्य भारत के विशाल भूभाग पर ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, जिसे वैज्ञानिकों ने ‘हीट डोम’ (Heat Dome) नाम दिया है। महाराष्ट्र के अकोला जैसे शहरों में तापमान 46.9°C तक पहुँच गया, जबकि तेलंगाना और इंडो-गैंगेटिक मैदानों के कई क्षेत्रों में पारा लगातार 44°C से ऊपर बना रहा। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आँकड़ों के अनुसार, अनेक स्थानों पर तापमान सामान्य से 4°C से 8°C अधिक दर्ज किया गया। यह स्थिति इस मौसमी परिघटना की तीव्रता तथा इसके व्यापक प्रभावों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। हीट डोम के निर्माण की प्रक्रिया जटिल होने के साथ-साथ अत्यंत गंभीर भी है। यह तब विकसित होता है, जब ऊपरी वायुमंडल में उच्च दाब (High Pressure) का एक शक्तिशाली क्षेत्र स्थापित हो जाता है। यह उच्च दाब क्षेत्र एक अदृश्य ‘ढक्कन’ की भाँति कार्य करता है, जो पृथ्वी की सतह के निकट मौजूद गर्म हवा को ऊपर उठकर बाहर निकलने से रोकता है। परिणामस्वरूप, यह गर्म हवा सीमित क्षेत्र में फँस जाती है। जब यह वायु नीचे की ओर दबती है, तो उसका संपीड़न (Compression) होता है और भौतिकी के नियमों के अनुसार उसका तापमान और अधिक बढ़ जाता है। इसी कारण प्रभावित क्षेत्रों में तापमान कई दिनों तक असामान्य रूप से ऊँचा बना रहता है। हाल की घटनाओं में अनेक स्थानों पर लगातार 5 से 10 दिनों तक भीषण लू (Heatwave) की स्थिति बनी रही। सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि रात्रिकालीन तापमान भी सामान्य से 3–5°C अधिक दर्ज किया गया, जिससे लोगों को रात के समय भी गर्मी से राहत नहीं मिल सकी। इस प्रकार, हीट डोम केवल दिन के तापमान को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि मानव स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों तथा ऊर्जा आपूर्ति पर भी गंभीर प्रभाव डालता है।
अल-नीनो: गर्मी का उत्प्रेरक
हीट डोम की इस प्रचंड स्थिति को पूरी तरह समझने के लिए अल-नीनो (El Niño) की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सामान्य मौसमी परिस्थितियों में, प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग (इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के पास) का पानी अधिक गर्म रहता है, जिससे वहाँ हवा ऊपर उठती है और मानसून के अनुकूल बादल बनते हैं। इस पूरी प्रणाली को ‘वॉकर सर्कुलेशन’ (Walker Circulation) कहा जाता है। लेकिन जब ‘ट्रेड विंड्स’ (Trade Winds) कमजोर पड़ती हैं, तब अल-नीनो की स्थिति बनती है और प्रशांत महासागर का मध्य व पूर्वी भाग असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। अल-नीनो के कारण ऊर्जा का यह प्रवाह पूर्व की ओर खिसक जाता है, जिसके परिणामस्वरूप भारत के ऊपर हवा ऊपर उठने के बजाय नीचे दबने लगती है (Subsidence)। इससे बादल बनने की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है और वर्षा की संभावना कम हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल-नीनो और मानव-निर्मित जलवायु परिवर्तन का यह ‘डबल इफेक्ट’ हीट डोम जैसी घटनाओं को 2 से 3 गुना अधिक बार और पहले से कहीं अधिक तीव्र बना रहा है। उत्तर-पश्चिम भारत, विशेषकर हरियाणा और राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में इसके कारण ‘रियल फील’ तापमान (Heat Index) 50°C के ऊपर पहुँच गया है।
उत्तर प्रदेश और बिहार: भौगोलिक घेराबंदी और ‘वेट बल्ब’ का संकट
इंडो-गैंगेटिक मैदानी भाग (Indo-Gangetic Plain), जिसमें उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य शामिल हैं, अपनी विशिष्ट भौगोलिक बनावट के कारण इस हीट डोम के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। उत्तर में स्थित हिमालय की ऊँची पर्वत शृंखलाएं एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती हैं, जो उत्तर-पश्चिम से आने वाली गर्म और शुष्क हवाओं को रोक लेती हैं और उन्हें इसी मैदानी इलाके में कैद कर लेती हैं। इस ‘घाटीनुमा’ प्रभाव के कारण लखनऊ, कानपुर, वाराणसी और पटना जैसे शहरों के ऊपर गर्म हवा का एक स्थिर दबाव बन जाता है जो लंबे समय तक बना रहता है। इस क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती ‘वेट बल्ब’ (Wet Bulb) तापमान और शहरी ऊष्मा द्वीप (Urban Heat Island) का संयुक्त प्रभाव है। उत्तर प्रदेश और बिहार में नदियों की प्रचुरता के कारण जब उच्च तापमान के साथ नमी (Humidity) का स्तर बढ़ता है, तो शरीर का पसीना हवा में वाष्पित नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में मानव शरीर के लिए प्राकृतिक रूप से खुद को ठंडा रख पाना लगभग असंभव हो जाता है। यही कारण है कि तापमान चाहे 440C ही क्यों न हो, नमी के कारण वह 500C के पार जैसा महसूस होता है। इसके अतिरिक्त, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अत्यधिक वाष्पीकरण के कारण भूजल स्तर में 0.5 से 1 मीटर तक की गिरावट दर्ज की गई है, जो खेती और पशुपालन के लिए एक गंभीर संकट है।
मानवीय कारक: आपदा को आमंत्रण
प्राकृतिक भौगोलिक कारकों के अलावा, मानवीय हस्तक्षेप ने इस समस्या को एक विकराल आपदा में बदल दिया है। अनियंत्रित शहरीकरण इसका सबसे प्रमुख कारण है। शहरों में कंक्रीट की सघनता और डामर की सड़कों के कारण दिन भर सौर विकिरण (Solar Radiation) सोखा जाता है। मिट्टी और वनस्पतियों के विपरीत, कंक्रीट रात में धीरे-धीरे गर्मी छोड़ता है। चूंकि ऊपर हीट डोम का ‘ढक्कन’ लगा है, इसलिए शहरों में रात का तापमान भी सामान्य से 3–5°C अधिक रहता है। आंकड़ों के अनुसार, घने शहरी क्षेत्रों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में 2°C से 6°C तक अधिक हो सकता है। पर्यावरण के स्तर पर, हरियाली का विनाश और जलाशयों का अतिक्रमण स्थानीय शीतलन तंत्र (Cooling Mechanism) को नष्ट कर चुका है। पेड़ ‘वाष्पोत्सर्जन’ (Transpiration) के माध्यम से वातावरण को ठंडा रखते हैं। एक बड़ा पेड़ लगभग 10 घरेलू एयर कंडीशनरों (AC) के बराबर शीतलन प्रभाव पैदा करता है। जब इन पेड़ों को काटकर इमारतें खड़ी की जाती हैं, तो हम उस प्राकृतिक एयर कंडीशनर को खो देते हैं। उत्तर प्रदेश में ‘अमृत सरोवर’ जैसे प्रयासों के बावजूद कई तालाबों को पाट दिया गया है, जो न केवल भूजल रिचार्ज करते थे बल्कि हवा को ठंडा भी रखते थे। इसके साथ ही, मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न वेस्ट हीट (Waste Heat) और प्रदूषण इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं। करोड़ों एसी से निकलने वाली गर्म हवा रात के तापमान को 1°C तक बढ़ा सकती है। खेती के क्षेत्र में फसल कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ना और पराली जलाना भी मिट्टी की नमी को खत्म कर देता है, जिससे ‘लू’ (Loo) और अधिक प्रभावी हो जाती है। IPCC की रिपोर्ट के अनुसार, मानवीय हस्तक्षेप ने ऐसी चरम घटनाओं की आवृत्ति को कई गुना बढ़ा दिया है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: सबक और चेतावनी
भारत ने इतिहास में हीट डोम प्रभाव की कई विनाशकारी घटनाओं का अनुभव किया है, जिनसे हमें सीख लेने की जरूरत है। उत्तर अमेरिका (2021) का हीट डोम अब तक का सबसे चर्चित मामला है, जहाँ कनाडा जैसे ठंडे इलाकों में तापमान 49.6°C तक पहुँच गया था। इसी तरह, यूरोप (2003 और 2022) में उच्च दबाव के क्षेत्रों में हीट डोम ने हज़ारों लोगों की जान ली थी। 2022 में ब्रिटेन में पहली बार तापमान 40.3°C दर्ज किया गया था। भारत में भी 2015 और 2022 में हीट डोम की घटनाएं उल्लेखनीय है। विशेषकर 2022 का मार्च-अप्रैल के दौरान तकनीकी रूप से एक विशाल हीट डोम विकसित हुआ था, जब देश ने 122 वर्षों का सबसे गर्म मार्च का महीना अनुभव किया था। हालाँकि, तुलनात्मक रूप से 2026 का वर्तमान हीट डोम अधिक खतरनाक है क्योंकि इसमें रातें भी रिकॉर्ड रूप से बहुत गर्म दर्ज की जा रही हैं, जिससे बिजली की मांग में भारी बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है और लोगों को गर्मी से मिलने वाली वह ‘रात की राहत’ भी छिन गई है जो पहले सामान्य हुआ करती थी।
निष्कर्ष और भविष्य की रणनीति
आने वाले मौसम को देखते हुए विशेषज्ञों का अनुमान है कि उत्तर भारत में हीटवेव की स्थिति अभी और बनी रह सकती है। ऐसे में सावधानी और पूर्व-तैयारी ही बचाव का एकमात्र रास्ता है। दोपहर 12 से 4 बजे के बीच अनावश्यक बाहर निकलने से बचना, पर्याप्त पानी पीना और हल्के सूती कपड़े पहनना अनिवार्य है। किसानों को मौसम विभाग की चेतावनियों के अनुसार सिंचाई और बुवाई का समय समायोजित करना चाहिए ताकि कपास और मूंग जैसी फसलों का नुकसान कम किया जा सके। अंततः, हीट डोम केवल एक स्थानीय मौसम घटना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक जलवायु परिवर्तन का एक गंभीर संकेत है। इससे निपटने के लिए दीर्घकालिक नीतिगत बदलावों की आवश्यकता है। ग्रीन कवर को बढ़ाना, जल संरक्षण को प्राथमिकता देना और प्रभावी ‘हीट एक्शन प्लान’ लागू करना अब समय की सबसे बड़ी मांग है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का जो परिणाम आज हम हीट डोम के रूप में देख रहे हैं, उसे सुधारने के लिए हमें पारिस्थितिक संतुलन को फिर से बहाल करने की दिशा में कदम उठाने होंगे।

डॉ. हेमंत कुमार
डीन अकादमिक्स, आर.पी.एस. डिग्रीकॉलेज, महेन्द्रगढ़, हरियाणा
kumarhemant.jnu@gmail.com




