भारत में ऊर्जा रूपांतरण एवं ऊर्जा सुरक्षा

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डिजिटल क्रांति और सूचना युग की 21वीं सदी के तीसरे दशक में ऊर्जा केवल आर्थिक विकास का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, भू-राजनीति, जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा तथा सामाजिक न्याय से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ प्रश्न बन चुकी है। भारत विश्व की सबसे तीव्र गति से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहाँ ऊर्जा की मांग निरंतर बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार भारत विश्व में ऊर्जा मांग वृद्धि का प्रमुख केंद्र बन चुका है तथा आगामी दशकों में वैश्विक ऊर्जा खपत वृद्धि का बड़ा हिस्सा भारत में हीहोने की संभावना है।

भारत की ऊर्जा संरचना मिश्रित ऊर्जा प्रणाली है, जो अभी भी कोयला, तेल एवं प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भर है। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापवृद्धि, कार्बन उत्सर्जन में कमी तथा नेट-ज़ीरो लक्ष्यों की दिशा में वैश्विक प्रतिबद्धताएँ ऊर्जा रूपांतरण (Energy Transition) को अनिवार्य उद्देश्य बनाती हैं। ऊर्जा रूपांतरण का तात्पर्य जीवाश्म-आधारित ऊर्जा प्रणाली से स्वच्छ, नवीकरणीय एवं निम्न-कार्बन ऊर्जा प्रणाली की ओर रूपांतरण से है। भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है तथा 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। हालाँकि भारत के लिए चुनौती केवल हरित ऊर्जा अपनाने तक सीमित नहीं है; वास्तविक चुनौती “ऊर्जा रूपांतरण” और “ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security)” के बीच संतुलन स्थापित करने की है। ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ है—ऊर्जा की निरंतरता, किफायती और बजट-अनुकूल, विश्वसनीय एवं रणनीतिक रूप से सुरक्षित उपलब्धता। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, तेल मूल्य अस्थिरता तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला संकटों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की रणनीतिक स्वायत्तता का आधार है। भारत के समक्ष प्रश्न यह है कि क्या वह आर्थिक विकास, ऊर्जा मांग, जलवायु दायित्व तथा रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाते हुए एक न्यायसंगत एवं स्थाई ऊर्जा रूपांतरण सुनिश्चित कर सकता है? यही मुद्दा इस प्रस्तुत लेख का केंद्रीय विमर्श है।

भारत की वर्तमान ऊर्जा संरचना

भारत की वर्तमान ऊर्जा संरचना एक मिश्रित ऊर्जा प्रणाली पर आधारित है, जिसमें विद्युत उत्पादन में कोयले तथा परिवहन क्षेत्र में पेट्रोलियम ईंधन प्रमुख भूमिका अदा करता है। तीव्र औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि के कारण ऊर्जा मांग लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गई है। साथ ही, भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की ओर अग्रसर है। सौर एवं पवन ऊर्जा विस्तार, हरित हाइड्रोजन मिशन, एथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तथा परमाणु ऊर्जा विकास जैसी पहलों ने ऊर्जा संक्रमण को तीव्र गति दी है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा निवेशों के भारी प्रवाह के चलते भारत ने 2024 तक अपनी गैर-जीवाश्म ऊर्जा उत्पादन क्षमता me 44% तक सफलतापूर्वक बढ़ोत्तरी हासिल की है, जो स्वच्छ एवं सतत ऊर्जा भविष्य की ओर महत्वपूर्ण संकेत करता है।

ऊर्जा रूपांतरण के प्रमुख आयाम

(1) नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार: भारत ने ऊर्जा रूपांतरण की दिशा में नवीकरणीय ऊर्जा को केंद्रीय स्थान दिया है।सौर और पवन ऊर्जा क्षमता में तीव्र विस्तार ने देश को विश्व के प्रमुख स्वच्छ ऊर्जा बाजारों में के रूप में स्थापित किया है। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु बड़े सौर-पवन ऊर्जा केंद्रों के रूप में उभरे हैं। राष्ट्रीय सौर मिशन, PM-KUSUM, रूफ टॉप सोलर कार्यक्रम तथा ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (GEC) जैसी ऊर्जा पारेषण (transmission) प्रोजेक्टों ने ग्रामीण विद्युतीकरण, विकेंद्रीकृत ऊर्जा उत्पादन और स्वच्छ ऊर्जा अवसंरचना को सुदृढ़ किया है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन की औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग 24% रहने का अनुमान किया गया है, जो ऊर्जा आत्मनिर्भरता, बढ़ती बिजली मांग की पूर्ति और कार्बन उत्सर्जन में कमी को बढ़ावा प्रदान करेगी।

(2) ग्रीन हाइड्रोजन: ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य की हरित ऊर्जा अर्थव्यवस्था का आधार माना जा रहा है। भारत का “राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन 2023” उर्वरक, इस्पात एवं रिफाइनरी क्षेत्रों के डी-कार्बोनाइजेशन पर केंद्रित है। हाइड्रोजन-आधारित ग्रीन स्टील तकनीक कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाने की क्षमता रखती है। साथ ही, कार्बन क्रेडिट आधारित वित्तीय तंत्र इस क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने में बहुत सहायक सिद्ध हो रहे हैं।

(3) ऊर्जा भंडारण एवं बैटरी तकनीक: नवीक रणीय ऊर्जा की अनियमित प्रकृति के कारणऊर्जा भंडारण प्रणाली ऊर्जा रूपांतरण का एक अनिवार्य घटक बन गई है। भारत लिथियम-आयन बैटरी, पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज तथा ग्रिड-स्केल बैटरी प्रणालियों में निवेश बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। बैटरी निर्माण हेतु एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल प्रोडक्शन लिंक्डइंसेंटिव स्कीम (ACC-PLI) घरेलू विनिर्माण क्षमता और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत कर रही है।

(4) परमाणु ऊर्जा: भारत परमाणु ऊर्जा को स्वच्छ एवं स्थिर बेस लोड ऊर्जा स्रोत के रूप में विकसित कर रहा है।यह कम कार्बन उत्सर्जन के साथ निरंतर विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने में सक्षम है। IEA के अनुसार भारत 2047 तक 100 GW परमाणु क्षमता विकसित करने की दिशा में प्रगतिशील है।

(5) जैव ईंधन एवं एथेनॉल: जैव ईंधन और एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (Ethanol Blended Petrol – EBP) भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण भाग हैं। पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण लक्ष्य तेल आयात निर्भरता को कम करने, कार्बन उत्सर्जन घटाने तथा कृषि क्षेत्र को अतिरिक्त आर्थिक अवसर प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियाँ

(i) आयात निर्भरता: भारत की ऊर्जा सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती तेल एवं गैस आयात पर अत्यधिक निर्भरता है। जिसके कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर अत्यधिक दबाव बढ़ता है और वैश्विक मूल्य उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रूस-यूक्रेन युद्ध तथा पश्चिम एशियाई तनावों ने ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने के आर्थिक जोखिमों को उजागर कर चुका है।

(ii) कोयले पर निर्भरता: भारत में विद्युत उत्पादन का प्रमुख स्रोत अभी भी कोयला-आधारित तापीय ऊर्जा है। नवीकरणीय ऊर्जा के तीव्र विस्तार के बावजूद निकट भविष्य में कोयले की केंद्रीय भूमिका बनी रहने की संभावना है। इससे जलवायु प्रतिबद्धताओं और बढ़ती ऊर्जा मांग के बीच संतुलन स्थापित करने की बहुत बड़ी चुनौती उत्पन्न होती है, जिसे “ट्रांजिशन पैराडॉक्स” कहा जाता है।

(iii) DISCOMs का वित्तीय संकट: भारतीय वितरण कंपनियों (DISCOMs) की कमजोर वित्तीय स्थिति ऊर्जा क्षेत्र के विकास में गंभीर बाधा बनी हुयी है। भारी ऋण, तकनीकी हानियाँ तथा राजस्व असंतुलन नवीकरणीय ऊर्जा निवेश एवं ग्रिड आधुनिकीकरण पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

(iv) अवसंरचनात्मक चुनौतियाँ: ऊर्जा रूपांतरण के लिए मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क, स्मार्ट ग्रिड, ऊर्जा भंडारण प्रणाली तथा इलेक्ट्रिक वाहनों हेतु चार्जिंग अवसंरचना अतिआवश्यक है। वर्तमान में इन क्षेत्रों में अपर्याप्त निवेश ऊर्जा परिवर्तन की गति को बाधित कर रहा है।

(v) महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता: लिथियम, कोबाल्ट, निकेल एवं रेयर अर्थ तत्व स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए अनिवार्य हैं। भारत इन महत्वपूर्ण खनिजों के लिए विदेशों से आयात पर निर्भर करता है, जिससे भविष्य में आपूर्ति सुरक्षा एवं रणनीतिक जोखिम बढ़ सकते हैं।

नवोन्मेषी ऊर्जा मॉडल

1. गुजरात मॉडल: गुजरात भारत के ऊर्जा रूपांतरण का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है, जहाँ नवीकरणीय ऊर्जा, हरित औद्योगिकीकरण और आधुनिक ऊर्जा अवसंरचना का एकीकृत विकास हो रहा है। विशाल सौर पार्कों जैसे खावड़ा नवीकरणीय ऊर्जा पार्क (कच्छ) तथा चारंका सोलर पार्क (पाटन), तटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं तथा ग्रीन हाइड्रोजन निवेशों ने राज्य की स्वच्छ ऊर्जा क्षमता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ोतरी दर्ज  की है। कच्छ और सौराष्ट्र क्षेत्र उच्च क्षमता वाले नवीकरणीय ऊर्जा क्लस्टरों के रूप में विकसित किये जा रहे हैं। साथ ही, ग्रीन पोर्ट अवसंरचना, निर्यातोन्मुख ऊर्जा नीतियाँ तथा निवेश-अनुकूल वातावरण स्वच्छ उद्योगों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। नीति स्थिरता, निजी क्षेत्र की भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ने गुजरात को उभरते वैश्विक हरित ऊर्जा निवेश केंद्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

2. राजस्थान मॉडल: राजस्थान भारत की सौर ऊर्जा क्रांति का महत्त्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। विशाल रेगिस्तानी भूभाग, उच्च सौर विकिरण तथा भूमि उपलब्धता ने राज्य को बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल व उपयुक्त बनाया है। भड़ला सौर पार्क, जो विश्व के सबसे बड़े सौर पार्कों में सम्मिलित है, भारत की स्वच्छ ऊर्जा क्षमता का प्रतीक बनकर उभरा है। राज्य में सौर-पवन हाइब्रिड परियोजनाओं का विकास ऊर्जा उत्पादन की अनियमितता को कम करने तथा ग्रिड स्थिरता बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है। राजस्थान सरकार द्वारा ट्रांसमिशन नेटवर्क विस्तार, भूमि आवंटन प्रक्रिया में सुधार तथा निजी निवेश को प्रोत्साहन देने वाली नीतियों ने ऊर्जा क्षेत्र में तीव्र विकास सुनिश्चित किया जा रहा है।

नवोन्मेषी ऊर्जा मॉडल में गुजरात एवं राजस्थान से प्राप्त व्यावहारिक ज्ञान यह दर्शाते हैं कि नीति स्थिरता, भूमि एवं ग्रिड अवसंरचना की उपलब्धता तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी ऊर्जा रूपांतरण की सफलता के प्रमुख आधार हैं। ये मॉडल स्पष्ट करते हैं कि ऊर्जा रूपांतरण केवल पर्यावरणीय सुधार का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन तथा दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की प्रभावी रणनीति भी है।

विश्लेषण

भारत का ऊर्जा रूपांतरण आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक एवं रणनीतिक आयामों से जुड़ी एक बहुआयामी प्रगति प्रक्रिया है। आर्थिक दृष्टि से यह प्रारंभिक स्तर पर उच्च निवेश की मांग करतI है, किंतु दीर्घकाल में तेल आयात निर्भरता में घटोत्तरी, हरित रोजगार के अवसरों का सृजन, तकनीकी आत्मनिर्भरता तथा स्वास्थ्य व्यय में गिरावट जैसे लाभ प्रदान कर सकता है। IEA के अनुसार, 2024 में भारत के विद्युत क्षेत्र में कुल निवेश का लगभग 83% (करीब 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर) स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में निवेशित हुआ। यह पूंजी प्रवाह हरित अर्थव्यवस्था की ओर संरचनात्मक बदलाव, ऊर्जा संक्रमण की तीव्रता तथा दीर्घकालिक जलवायु एवं सतत विकास लक्ष्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

भू-राजनीतिक स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा विदेश नीति का महत्वपूर्ण तत्व बन चुकी है। भारत रूस से रियायती दर पर तेल आयात, पश्चिम एशिया के साथ ऊर्जा सहयोग तथा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के विकास पर बल दे रहा है। तकनीकी दृष्टि से स्मार्ट ग्रिड, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ऊर्जा प्रबंधन, ऊर्जा भंडारण, ग्रीन हाइड्रोजन तथा कार्बन कैप्चर जैसी तकनीकें ऊर्जा रूपांतरण की सफलता में निर्णायक भूमिका अवस्य निभाएँगी। सामाजिक स्तर पर झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिमी बंगाल, और मध्य प्रदेश जैसे कोयला-आधारित राज्यों में लाखों लोगों की आजीविका कोयला उद्योग से जुड़ी है। इसलिए ऊर्जा रूपांतरण “न्यायोचित परिवर्तन” सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए, जिससे पर्यावरणीय लक्ष्यों के साथ सामाजिक सुरक्षा एवं वैकल्पिक रोजगार सुनिश्चित किए जा सकें।

विचारविमर्श

भारत के ऊर्जा रूपांतरण को लेकर दो प्रमुख वैचारिक दृष्टिकोण उभरकर सामने आते हैं। पहला दृष्टिकोण तीव्र हरित ऊर्जा रूपांतरण का समर्थन करता है। इसके अनुसार जलवायु परिवर्तन वैश्विक स्तर पर गंभीर संकट का रूप ले चुका है, इसलिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को शीघ्र समाप्त करना आवश्यक है। इस विचारधारा के समर्थक मानते हैं कि सौर एवं पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय प्रौद्योगिकियाँ अब आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी, पर्यावरणीय दृष्टि से स्थाई तथा दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अतिआवश्यक एओम अधिक उपयुक्त हैं। दूसरी ओर, संतुलित एवं क्रमिक रूपांतरण के समर्थकों का तर्क है कि भारत अभी भी एक विकासशील अर्थव्यवस्था है, जहाँ औद्योगिक वृद्धि, रोजगार सृजन तथा सस्ती एवं विश्वसनीय ऊर्जा की उपलब्धता सर्वोच्च प्राथमिकता है। उनके अनुसार कोयला आधारित बिजली का त्वरित परित्याग आर्थिक एवं सामाजिक अस्थिरता उत्पन्न कर सकता है। यही कारण है कि भारत “संतुलित रूपांतरण मॉडल” को अपनाते हुए नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार, कोयले के नियंत्रित उपयोग, गैस-आधारित रूपांतरण, परमाणु ऊर्जा वृद्धि तथा ऊर्जा दक्षता सुधार को समानांतर रूप से अग्रसर हो रहा है। यह मॉडल ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास और जलवायु दायित्वों के बीच व्यावहारिक संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

भविष्य की संभावनाएँ

ऊर्जा रूपांतरण भारत को वैश्विक हरित अर्थव्यवस्था में अग्रणी स्थान दिला सकता है। सौर विनिर्माण, ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी प्रौद्योगिकी, हरित इस्पात और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे क्षेत्र ऊर्जा सुरक्षा तथा औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को सुदृढ़ कर रहे हैं। भारत का विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता और नीतिगत समर्थन के आधार पर स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख केंद्र तथा संभावित हरित ऊर्जा महाशक्ति बन सकता है।

नीतिगत सुझाव

भारत की ऊर्जा सुरक्षा एवं सतत ऊर्जा संक्रमण को सुदृढ़ करने हेतु राष्ट्रीय ऊर्जा नीति का एकीकृत ढाँचा विकसित किया जाना अतिआवश्यक है। ऊर्जा भंडारण, बैटरी प्रौद्योगिकी, ग्रीन हाइड्रोजन तथा छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) में निवेश बढ़ाने के साथ DISCOM सुधारों को प्राथमिकता दी जानी आवश्यक है। महत्वपूर्ण खनिजों के लिए वैश्विक आपूर्ति शृंखला साझेदारी, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण तथा ऊर्जा कूटनीति को मजबूत किया जाना चाहिए। साथ ही, कोयला क्षेत्रों के लिए न्यायसंगत ट्रांजिशन फंड, ग्रामीण ऊर्जा पहुँच, विकेंद्रीकृत सौर मॉडल और ऊर्जा दक्षता को प्रोत्साहित कर समावेशी एवं सतत ऊर्जा प्रणाली विकसित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

भारत का ऊर्जा रूपांतरण केवल पर्यावरणीय लक्ष्य नहीं, बल्कि आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता, औद्योगिक आधुनिकीकरण, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ा बहुआयामी परिवर्तन है। वर्तमान परिदृश्य में ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण परस्पर पूरक हैं। नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, जैव ईंधन, परमाणु ऊर्जा तथा इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में हुई प्रगति ने सतत ऊर्जा भविष्य की मजबूत आधारशिला रखी है। फिर भी ऊर्जा भंडारण, ग्रिड आधुनिकीकरण, वित्तपोषण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और ऊर्जा न्याय जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। भारत की सफलता एक ऐसी ऊर्जा प्रणाली विकसित करने में निहित होगी जो स्वच्छ, सुलभ, विश्वसनीय, किफायती, न्यायसंगत तथा समावेशी हो और संतुलित ऊर्जा संक्रमण मॉडल को प्रतिबिंबित करे।

सुशील चंद्रा

वरिष्ठ वैज्ञानिक (एस.एफ.), रिमोट सेंसिंग एप्लिकेशन्स सेंटर – उत्तर प्रदेश, लखनऊ।

schandra.77653@gov.in

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