युद्ध, पर्यावरण और सिनेमा

Date:

आज के युद्ध में मरने वाला और सब कुछ खोने वाला इन्सान कहाँ है? क्या युद्ध एक मनोरंजक खेल है जिसमें उड़ते हुए ड्रोन, मिसाइले और लड़ाकू विमानों से गिरते बम रील के माध्यम से सोशल मीडिया में भरे पड़े हैं? क्या यह पता लगाना संभव है कि युद्ध के कितने दृश्य सत्य हैं और कितने एआई निर्मित हैं? इस युद्ध में ये पता लगाना संभव है कि दोनों पक्षों के कितने सैनिक हताहत हुए और कितने नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी? क्या जो देश युद्ध में शामिल नहीं है उनके नागरिकों को युद्ध से प्रभावित लोगों स्त्रियों,भूखे बच्चों के प्रति कोई संवेदना है या नहीं? प्रसिद्ध लेखक ब्रांड लेग्ग ने अपनी पुस्तक कोसेगा शॉक (Cosega Shock) में युद्ध के बारे में बहुत ही सटीक एवं प्रासंगिक टिप्पणी की है- “युद्ध में लड़ने गए युवा सैनिक केवल अपनी जान ही जोखिम में नहीं डालते बल्कि उन्हें अपने घर वालों और प्रेमिका की याद में विरही हो जाते हैं. अमेरिकन गायक रे चार्ल्स ने ऐसे ही सैनिकों के लिए एक गीत रचा था,

“मुझे आश्चर्य है कि अब उसे कौन चूम रहा होगा?

कौन अब उसे सिखा रहा होगा?

कौन उसकी आँखों में देख रहा होगा?

आहें भरते हुए उससे झूठी बातें कौन कर रहा होगा?”

 इस गीत को मशहूर हॉलीवुड अभिनेता अल पसीनो ने अपनी आत्मकथा में विशेष रूप से याद किया है जिसे वे और उनके दोस्त बचपन में गाया करते थे (पसीनो 2024:6). स्पेन की नेता प्रतिपक्ष ने इस युद्ध का विरोध करते हुए ठीक ही कहा था जिसे युद्ध लड़ना है वे सबसे पहले अपने बेटों को जंग में भेजें. सैनिकों नागरिकों और और उनके परिजनों को तबाह करके अपने खूनी इरादों को पूरा करने के लिए युद्ध करना और करवाना न केवल गलत है बल्कि घोर निंदनीय है.

यहूदी समुदाय अपने मूल स्थान से उत्पीडन युद्ध और निर्वासन के कारण दुनिया भर में बिखरा रहा और जब 1948 में उनका देश इजरायल बना तब से यहूदियों की घर वापसी शुरू हुई. तब से लेकर अनेक युद्ध लड़े जाते रहे हैं. डायस्पोरा मैगज़ीन के सम्पादक विलियम सैफरोन (1991) ने डायस्पोरा को परिभाषित करते हुए लिखा है, “इसमें ऐसे मानदंड शामिल थे कि समूह अपने मातृभूमि के बारे में एक मिथक या सामूहिक स्मृति बनाए रखता है; वे अपने पैतृक देश को अपना वास्तविक घर मानते हैं, जहाँ वे अंततः लौटने की आकांक्षा रखते हैं; वे उस मातृभूमि के पुनर्स्थापन या संरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं; और वे उससे “व्यक्तिगत या परोक्ष” रूप से इस हद तक जुड़े रहते हैं कि वह उनकी पहचान को आकार देता है।“

सैफरोन ने यह मानदंड भी जोड़ा कि ऐसे समूहों को प्रायः राजनीतिक या आर्थिक कारणों से निर्वासन के लिए विवश किया गया होता है, जिसके बाद वे लंबे समय तक किसी नए मेज़बान समाज में बस जाते हैं. डायस्पोरा की परिभाषा को यहूदियों के बिखराव और उनके अपने वतन लौटने की प्रक्रियाओं से जोड़कर परिभाषित किया गया है. वे लौटे तो लेकिन अपने पड़ोसियों से लगातार युद्ध ठानकर, दूसरों का घर उजाड़कर बसना चाहते हैं. वे फलस्तीन को तबाह करके आगे बढ़ना चाहते हैं जो मानवीय दृष्टि से सही नहीं है.

युद्ध और तबाही

दूसरे शब्दों में कहें तो युद्ध एक ऐसा बहाना है जिसके माध्यम से धूर्त एवं तानाशाह प्रवृत्ति के अलोकप्रिय शासक अपने देश के संसाधनों को युद्ध में झोंककर उग्र राष्ट्रवाद का छलावा परोसकर अपने एवं अपने दुश्मन देश के आम नागरिकों का जीवन संकट में डाल देते हैं. मानवीय एवं प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी करते हुए हजारों टन जहरीला बारूद जलाकर हवा जमीन और पानी को प्रदूषित करके मानव, पेड़ पौधों और पशु पक्षियों का जीवन कई वर्षों/पीढ़ियों के लिए संकट में डाल देते हैं. भारत ने पाकिस्तान और चीन के साथ कई बार युद्ध झेला है. जे. पी. दत्ता निर्देशित फिल्म बॉर्डर (1997) में जावेद अख्तर साहब ने बड़ा मार्मिक गीत लिखा था जो जंग के दुष्प्रभावों को बयान करती है:

“जंग जो चंद रोज होती है जिंदगी बरसों तलक रोती है

सन्नाटे की गहरी छाँव खामोशी से जलते पाँव

ये नदियों पर टूटे हुए पुल धरती घायल है व्याकुल

ये खेत बमों से झुलसे हुए ये खाली रस्ते सहमें हुए

ये मातम करता सारा समां ये जलते घर ये काला धुआं…

बारूद से बोझिल सारी फ़िज़ा है मौत की बू फैलती हवा..

गेहूं की जगह चावल की जगह बंदूकें क्यों बोते हैं

जब दोनों ही की गलियों में कुछ भूखे बच्चे रोते हैं”.

फलस्तीन में हजारों बच्चों के भूखे मरने की खबरे आती रहीं, आज भी वहां भोजन और दवाओं की पर्याप्त आपूर्ति नहीं है. वहां की अर्थव्यवस्था के आधार ओलिव/जैतून के हरे पेड़ों पर बम गिराकर तबाह किया जा चुका है. इजराइल, ईरान, यमन, लेबनान,सीरिया में हालात वर्तमान में चल रहे युद्ध के कारण बदतर हो गये हैं. प्रवास, भूख और अनिश्चित भविष्य ही युद्धग्रस्त लोगों के जीवन के हिस्से में आता है जो कई वर्षों और पीढ़ियों तक दर्द देता रहता है.

मध्य एशिया और युद्ध आधारित फ़िल्में

द विंड एंड द लायन (1975), द हीरोज ऑफ़ डेजर्ट स्टॉर्म (1991), लेसंस ऑफ़ डार्कनेस (1992), थ्री किंग्स (1999),लाइव फ्रॉम बगदाद (2002),पैराडाइज नाउ (2005), म्युनिक (2005), जारहेड (2005),एम फॉर मदर (2006), अंडर द बोम्ब्स (2007), जीरो डार्क थर्टी, पेरसेपोलिस (2007), ब्यूफोर्ट (2007),द हर्टलाकर(2008),अजामी (2009). नो वन नोज अबाउट पर्शियन कैट्स (2009), लेबनान (2009), एर्गो (2012) अ सेपरेशन (2011), ट्रैक 143 (2013), चे (2014),फौदा (2015), अंडर द शैडो (2016),विला डवेलर्स (2017) बेरूत (2018). द लास्ट स्ट्रेट(2018), सेंटीपेडे(2018), वालनट ट्री (2020),गज़ा मोन अमौर (2020),द सिचुएशन ऑफ़ मेहदी (2022).

युद्ध पर अमेरिकन फ़िल्में

Black Hawk Down (2001), Behind Enemy Lines (2001), Lone Survivor (2013),The Covenant(2023), The Tears of the Sun (2003), Onthe beach (1959), Threads (1984), Ferngully: the last Rainforest (1992), Nausicaa of the Valley of the Wind (1984)

युद्ध, पर्यावरण और सिनेमा

रूस और यूक्रेन पिछले चार साल से अधिक समय से युद्धरत हैं (24 फरवरी 2022 से अब तक) जिसमें यूक्रेन बुरी तरह तहस-नहस हो चुका है लेकिन उसके समाप्त होने की कोई संभावना नहीं दिख रही है. हजारों लोग मारे जा चुके हैं, बेघर और बेरोजगार हुए हैं. वहां का पर्यावरण बर्बाद हो चुका है लेकिन उन्हें उकसाने और लड़ाने वाला अमेरिका वहां से गायब है.ईरान इजराइल युद्ध के तीन हफ्ते बीतने के बाद ट्रम्प यह कहने लगे कि अमेरिका खाड़ी क्षेत्र से दो-तीन हफ़्तों में (1 अप्रैल 2026 का प्रेस कांफ्रेंस) निकल जाएगा जैसे अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना (30 अगस्त 2021) को वापस चली गयी थी और सत्ता पर तालिबानियों का कब्जा हो गया था. अमेरिका-इजरायल-इरान युद्ध के प्रभाव और तीव्रता में दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध को भूल गयी हैं. पिछले एक साल में कई देशों के बीच युद्ध हुए हैं.अप्रैल 2025 में पहलगाम, कश्मीर में हुए कायराना हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर (6-7 मई 2025) चलाया था और पाक अधिकृत कश्मीर के आतंकी अड्डों को नष्ट किया गया था. अमेरिकी राष्ट्रपति ने उस युद्ध को रुकवाने का कई बार श्रेय लिया था. ट्रम्प रोज नया शिगूफा देते हैं उदाहरण के लिए,“ईरान मुझे अपना सुप्रीम लीडर बनाना चाहता था लेकिन मैंने मना कर दिया, अमेरिका के पास अपने लिए पर्याप्त मात्रा में तेल और गैस है बाकि देश उनसे खरीद सकते हैं, होर्मुज जलडमरूमध्य से अपने जहाज गुजरने के लिए सभी देश ईरान से खुद बात करें इत्यादि, इत्यादि”. अप्रैल 8, 2026 को अस्थाई युद्ध विराम की घोषणा की गयी और ईरान की तरफ से वार्ता हेतु 10 शर्तें रखी गयी हैं लेकिन पाकिस्तान की मध्यस्थता में यह वार्ता बेनतीजा खत्म हो गयी.

वर्तमान युद्ध दो सनकी बूढों ट्रम्प (80 साल) और नेतन्याहू (76 साल) के बेतुका निर्णयों और दुनिया में अपनी दादागिरी स्थापित करने के कुत्सित प्रयास का नतीजा हैं. तेल उत्पादन और मार्केटिंग पर कब्जे को लेकर यह युद्ध आरम्भ हुआ था. ईरान, इजरायल और अमेरिका युद्ध के सभी पक्ष खाड़ी देशों में स्थित तेल उत्पादन संयंत्रों पर जमकर बमबारी कर रहे हैं जिसके कारण आग और जहरीला धुंआ इस क्षेत्र की आबोहवा को खराब कर रहे हैं. लगातार होते युद्धों के कारण दुनिया भर में औसत तापमान में तेजी से वृद्धि हो रही है. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानव के मानसिक स्वास्थ्य के साथ प्राकृतिक तंत्र पर जो प्रतिकूल प्रभाव पड़े उसे कई फिल्मों ने अपना विषय वस्तु बनाया. युद्धों पर केन्द्रित जो फ़िल्में आरम्भ में बनी उनमें देशभक्ति और त्याग को मुख्य मुद्दा बनाया गया लेकिन बाद में बर्बाद होते शहर, जल जंगल और जमीन को भी चित्रित किया जाने लगा. सन 2023 से इजरायल और हमास के बीच चल रहे युद्ध में इजरायली सेना ने फलस्तीन की अर्थव्यवस्था के आधार 1 मिलियन ऑलिव के पेड़ों को तबाह करने का काम किया. सन 1967 से अब तक लगभग 8 लाख से अधिक पेड़ों को उखाड़कर फलस्तीनी लोगों को उनकी जमीन से उजाड़ा जा चुका है. यह विशुद्ध रूप से पर्यावरण का विनाश है. वर्तमान इरान इजराइल युद्ध में आयल रिफायनरी, केमिकल प्लांट्स, को दोनों पक्षों द्वारा निशाना बनाकर बम बरसाए गए. आग लगने और डीजल, पेट्रोल के जलने तथा बमों से निकले सल्फर मिश्रित जहरीले धुएं से पर्यावरण को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया. इस प्रदूषण से मिटटी, हवा और पानी को गंभीर रूप से प्रभावित किया है. समुद्री जीवन, कोरल रीफ, मैंगरुव इत्यादि को तेल के रिसाव को भी इस युद्ध ने भारी नुक्सान पहुँचाया है. द वायर (11 फरवरी 2026)में कलिग लॉन्ग ने अपने रिपोर्ट में लिखा है कि,“ईरान युद्ध के कारण एशियाई चीता को बचाने के प्रयासों को झटका लगा है फरवरी 2026 में ईरान के उत्तरी खोरासान में एक मादा चीता अपने 5 बच्चों के साथ देखी गयी थी. यह एक विलुप्तप्राय जीव है. युद्ध के कारण इस जीव के बचने की संभावनाएं अति क्षीण हो गयी हैं”. पार्थ जोशी ने ‘द ट्रिब्यून’ अखबार में प्रवासी पक्षियों के सदियों पुराने मार्ग के प्रभावित होने के बारे में लिखा है किभयानक युद्ध के समय प्रवासी पक्षियों को मजबूर होकर अपना मार्ग बदलना पडा है, रास्ते के आराम स्थलों को भी बदलना पडा है. इन पक्षियों के जीन में अनगिनत पीढ़ियों से अपने उड़ान मार्ग का नक्शा फिट है लेकिन आसमान में मिसाइल और लड़ाकू विमानों के शोर के कारण उन्हें वैकल्पिक मार्ग चुनना पडा है, युद्ध के कारण अंतरमहाद्वीपीय नाजुक पारिस्थिकीय संतुलन बिगड़ रहा है.  

अंततः

नरसंहार, महिलाओं और बच्चों की तबाही, घरों और दफ्तरों की तबाही, गरीबी और भुखमरी, विस्थापन, पर्यावरण प्रदूषण (जापानी और इटालियन सिनेमा में युद्ध के दुष्प्रभावों को इकोक्रिटिसिज्मके नजरिये से दिखाया गया है). निर्दोष नागरिकों की भयानक हत्या के दृश्य सैनिकों के मन पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं वे इंसोमेनिया और असामाजिकता के शिकार हो जाते हैं (PTSD, Depression, anxiety, moral injury and severe emotional numbness). सेविंग प्राइवेट रयान (1991), औरSchindlerlist जैसी फ़िल्में ऐसे सैनिकों के जीवन को दर्शाती हैं. अलग-अलग देशों का सिनेमा युद्ध के बारे में अलग परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है. ग्रेव ऑफ़ फायरफ्लाईज (जापान), कम एंड सी (रूस) जैसी फ़िल्में नागरिकों और बच्चों पर युद्ध के भयानक प्रभावों का चित्रण करती हैं. प्रोपेगंडा सिनेमायुद्ध के समय शासक वर्ग नागरिकों में देशभक्ति और राष्ट्रवाद का भाव जगाकर युद्ध का समर्थन प्राप्त करने की कोशिश करते हैं. हमने फिल्मों के प्रभाव में उत्तेजित होकर निर्णय लेने से बचना होता है. वर्ष 2026 में ईरान-इजरायल और अमेरिका के युद्ध ने पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया है. गोला बारूद ने हवा को जहरीला कर दिया है. मार्च 20226 में ईरान में हुई बारिश हवा में भारी मात्रा में हाइड्रोकार्बन और अन्य जहरीले रसायनों की मौजूदगी में हुई बारिश का रंग काला था जिसे‘ब्लैक रेन’ कहा गया. वह बारिश तैलीय, एसिडयुक्त थी जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ने की चेतावनी दी गयी और लोगों को अपने घरों में रहने की सलाह दी गयी. लेसनस इन डार्कनेस (1992) फिल्म में निदेशक वेर्नर हर्जोग ने खाड़ी युद्ध के समय पर्यावरणीय और उर्जा सुरक्षा के मुश्किल हालातों का चित्रण किया है.ऊर्जा संयंत्रों पर किये गए हवाई हमलों के कारण बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन हुआ है जो ईरान और इजरायल के पर्यावरण को लम्बे समय तक नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा.

शिवानी राकेश

फ़िल्म लिटरेचर विशेषज्ञ 

shivani.nirajnan@gmail.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

जब खेत बने औषधालय: खेती से आरोग्य तक भारत की नई दिशा

आज का समय एक गहरे विरोधाभास को सामने रखता...

धर्म और जाति के गुंजलक में क्रांतिकारी चेतना

विगत लम्बे समय से मैं इस बात को लेकर...

मुस्लिम नेतृत्व की तीसरी फसल – उम्मीदें और विडंबनायें

आज़ादी के बाद राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के नाम...

विखंडित विश्व में प्राइस-टेकर : भारत की ऊर्जा दुविधा का विश्लेषण

एक सरल किंतु असहज आंकड़ों पर विचार कीजिए. वर्ष...