समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कूटनीति अब केवल संवाद और सहयोग का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह शक्ति, संसाधनों और नैरेटिव के नियंत्रण का एक जटिल उपकरण बन चुकी है. विशेष रूप से ऊर्जा संसाधनों और मानवाधिकारों के प्रश्न पर पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका की नीतियाँ एक द्वैध स्वरूप प्रस्तुत करती हैं, जहाँ आदर्श और हितों के बीच स्पष्ट तनाव दिखाई देता है. अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया और वेनेजुएला जैसे देशों में “लोकतंत्र स्थापना” के नाम पर पश्चिमी हस्तक्षेपों की सिरीज अंततः ईरान तक पहुँचती हुई प्रतीत होती है. इन सभी मामलों में आरोप लगभग समान रहे हैं- महिलाओं के अधिकारों का हनन, नागरिकों की हत्या और अधिनायकवादी शासन. किंतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या यह चिंता सार्वभौमिक है या चयनात्मक? पश्चिमी मीडिया और लोकतंत्र समर्थक समूह प्रायः उन्हीं देशों में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की कमी को रेखांकित करते हैं, जिनका अमेरिका के साथ ऐतिहासिक रूप से तनावपूर्ण संबंध रहा है।
लोकतंत्र की मूल अवधारणा “जन-इच्छा की सर्वोच्चता” पर आधारित है, जिसे भारतीय संदर्भ में “जनता जनार्दन” कहा जाता है. किंतु जब किसी संप्रभु राष्ट्र में बाहरी शक्तियाँ नेतृत्व परिवर्तन की बात करती हैं, तो यह प्रश्न अनिवार्य रूप से उठता है कि क्या यह वास्तव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया है या बाहरी हस्तक्षेप. उदाहरण के लिए, हालिया ईरान संकट में युद्ध के दौरान अमेरिकी नेतृत्व द्वारा शासन परिवर्तन की खुली बात करना और फिर संभावित नए नेतृत्व पर प्रभाव की इच्छा व्यक्त करना इस द्वंद्व को उजागर करता है. यदि नेतृत्व चयन बाहरी ताकत पर निर्भर हो, तो यह लोकतंत्र की अवधारणा के विपरीत होता है. इसी प्रकार वेनेजुएला का उदाहरण भी इस विरोधाभास को स्पष्ट करता है. निकोलस मादुरो पर चुनावी धांधली और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए गए, जबकि विपक्षी नेतृत्व को वैधता प्रदान की गई. परंतु जब सत्ता परिवर्तन की स्थिति आई, तो अंततः उसी शासन व्यवस्था से जुड़े नेताओं को आगे बढ़ाया गया. यह स्थिति यह संकेत देती है कि लोकतंत्र के आदर्शों से अधिक महत्व राजनीतिक अनुकूलता (political alignment) को दिया जाता है।
मध्य-पूर्व की वर्तमान स्थिति इस दोमुहापन को और अधिक स्पष्ट करती है. पश्चिमी विमर्श में महिलाओं के अधिकारों की चिंता प्रमुख रूप से उन देशों में दिखाई देती है जो पश्चिमी नीतियों के अनुरूप नहीं हैं, जबकि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे सहयोगी देशों में समान मुद्दों पर अपेक्षाकृत मौन देखा जाता है. इन देशों में शासन संरचना अब भी मुख्यतः राजशाही पर आधारित है, फिर भी वे वैश्विक आलोचना से काफी हद तक मुक्त रहते हैं. इसके विपरीत, ईरान जो एक धर्म-तांत्रिक राज्य है, में चुनावी प्रक्रियाएँ मौजूद होने के बावजूद उसे अधिक आलोचना का सामना करना पड़ता है. अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के तहत महिलाओं की स्थिति भी अंतरराष्ट्रीय विमर्श में अपेक्षित स्थान नहीं प्राप्त कर पाती, जो इस चयनात्मकता को और रेखांकित करता है. यह भी देखा गया है कि मीडिया केवल घटनाओं को प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि कई बार वह एक विशेष नैरेटिव के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाता है, जिससे वैश्विक जनमत प्रभावित होता है. गज़ा में चल रहा संघर्ष इस विमर्श का सबसे संवेदनशील उदाहरण है. व्यापक विनाश, नागरिक हताहतों और मानवीय संकट के बावजूद, इन घटनाओं की व्याख्या और शब्दावली पर भी वैश्विक स्तर पर मतभेद हैं. इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या मानवीय मूल्यों का आकलन भी राजनीतिक संदर्भों के आधार पर किया जा रहा है।
ऊर्जा राजनीति के संदर्भ में यह द्वैधता और भी स्पष्ट हो जाती है. वैश्विक तेल भंडार और उनके नियंत्रण का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय संबंधों का केंद्रीय तत्व है. अमेरिका और उसके सहयोगियों का प्रभाव मध्य-पूर्व, लैटिन अमेरिका और अन्य ऊर्जा-संपन्न क्षेत्रों में व्यापक रूप से देखा जाता है. ऐसे में ईरान, जिसके पास विश्व के प्रमुख तेल भंडारों में से एक है, केवल एक राजनीतिक चुनौती ही नहीं बल्कि एक रणनीतिक ऊर्जा चुनौती भी प्रस्तुत करता है. इस परिप्रेक्ष्य में यह समझना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप केवल वैचारिक या नैतिक आधार पर नहीं होते, बल्कि वे व्यापक भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों से भी संचालित होते हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि मानवाधिकारों के प्रश्न महत्वहीन हैं, बल्कि यह कि उनका प्रयोग कभी-कभी रणनीतिक औजार के रूप में भी किया जाता है।
ऊर्जा राजनीति, गैस अर्थव्यवस्था और ईरान प्रश्न
ईरान विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा-संपन्न देशों में से एक है. यह प्राकृतिक गैस के भंडार में विश्व में दूसरे स्थान पर तथा तेल भंडार में तीसरे स्थान पर आता है. इसके अतिरिक्त, इसके पास वैश्विक गैर-जीवाश्म खनिज संसाधनों का लगभग 7 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि इसकी जनसंख्या वैश्विक आबादी का लगभग 1 प्रतिशत ही है. यह असमानता ही ईरान को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा-राजनीति का केंद्र बनाती है. ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरता है कि अमेरिका जैसी महाशक्ति को, जिसके पास पहले से ही व्यापक आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव है, उसे ईरान जैसे देश के साथ टकराव की आवश्यकता क्यों महसूस होती है।
इस प्रश्न का उत्तर केवल तेल तक सीमित नहीं है. लंबे समय तक वैश्विक ऊर्जा विमर्श तेल-केंद्रित रहा है, किंतु वर्तमान में ऊर्जा अर्थव्यवस्था का केंद्र धीरे-धीरे गैस की ओर स्थानांतरित हो रहा है. प्राकृतिक गैस को “ब्रिज फ्यूल” (bridge fuel) के रूप में देखा जाता है, क्योंकि यह कोयले की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत कम और तेल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करती है, साथ ही सल्फर डाइऑक्साइड, पारा और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषकों का उत्सर्जन भी बहुत कम करती है. हरित ऊर्जा की ओर संक्रमण के इस चरण में गैस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है. भारत जैसे देशों में, जहाँ परिवहन क्षेत्र तेजी से CNG की ओर बढ़ रहा है और गाँवों तक गैस आधारित ईंधन उपलब्ध हो रहा है, यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. वैश्विक गैस भंडार की दृष्टि से रूस,ईरान और कतर शीर्ष तीन देशों में आते हैं. इनमें से केवल क़तर ही अमेरिका के साथ स्थिर और सकारात्मक संबंध बनाए हुआ था, अब तो कतर भी अमेरिका से दूरी बना रहा है. यूरोप की ऊर्जा निर्भरता इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है. वर्ष 2021 तक यूरोप अपनी गैस आवश्यकताओं का लगभग 45 प्रतिशत रूस से आयात करता था, जबकि वर्तमान में यह निर्भरता काफी हद तक अमेरिका की ओर स्थानांतरित हो चुकी है. फिर भी, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) यूरोप की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा पूरा करती है, और इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का वैश्विक प्रभाव पड़ता है।
यदि ईरान में अमेरिका-समर्थक शासन स्थापित होता है, तो यह रूस के प्रभाव को संतुलित करने के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम होगा. इसका संकेत हाल की घटनाओं में भी देखा जा सकता है, जब ईरान के दक्षिण पार्स (South Pars) गैस क्षेत्र जो विश्व का सबसे बड़ा गैस क्षेत्र है पर इजराइल ने हमला किया और उसके प्रत्युत्तर में ईरान ने क़तर के रास लाफान मे LNG निर्यात केंद्र को निशाना बनाया. इस प्रकार की घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि ऊर्जा अवसंरचना पर हमला केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करने वाला कदम भी है. ऐसे किसी भी व्यवधान का प्रभाव अमेरिका के सहयोगी देशों, विशेषकर यूरोप पर अधिक पड़ता है, जो भौगोलिक रूप से इस क्षेत्र के निकट हैं और ऊर्जा तथा शरणार्थी संकट दोनों का सामना करते हैं।
भारत के संदर्भ में स्थिति कुछ भिन्न है. यहाँ वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती तेल संकट नहीं, बल्कि गैस की संभावित कमी है. भारत की एलपीजी आवश्यकता का लगभग 60 प्रतिशत आपूर्ति करने वाले खाड़ी क्षेत्र के देश संयुक्त अरब अमीरात और क़तर है. होरमुज़ स्ट्रेट में व्यवधान के कारण गैस आपूर्ति पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, जिससे घरेलू स्तर पर एलपीजी की उपलब्धता प्रभावित होती है. इसके विपरीत, तेल के क्षेत्र में भारत ने विविधीकरण के माध्यम से कुछ हद तक संतुलन स्थापित किया है, यद्यपि रूस की हिस्सेदारी में हाल के समय में कमी देखी गई है. यह स्थिति इस बात को रेखांकित करती है कि भारत के एलपीजी की आपूर्ति वर्तमान समय में तेल से अधिक संवेदनशील मुद्दा बन चुकी है. घरेलू उत्पादन केवल लगभग 40 प्रतिशत मांग को पूरा कर पाता है, जबकि शेष आयात पर निर्भर है. ऐसे में किसी भी भू-राजनीतिक संकट का सीधा प्रभाव आम नागरिकों के जीवन पर पड़ता है. तो ऊर्जा संसाधनों का नियंत्रण केवल आर्थिक शक्ति का प्रश्न नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीतिक संरचना को प्रभावित करने का माध्यम भी है. यदि कोई शक्ति वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को नियंत्रित करती है, तो वह उभरती अर्थव्यवस्थाओं विशेष रूप से चीन और भारत पर अप्रत्यक्ष दबाव बना सकती है. ऊर्जा राजनीति के माध्यम से वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है।
यह कहा जा सकता है कि आधुनिक विश्व में ऊर्जा विशेषकर गैस के बढ़ते महत्व ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति को बदल दिया है. तेल से गैस की ओर यह संक्रमण केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि एक गहन भू-राजनीतिक पुनर्संरचना (geopolitical reconfiguration) का संकेत है, जिसमें ईरान, रूस, क़तर और अमेरिका जैसे देश केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।

अर्पित नायक
JNU नई दिल्ली के प्राचीन इतिहास विभाग मे Ph. D स्कालर है।




