साहित्य जब केवल शब्दों का विन्यास न रहकर समय, समाज और संवेदना का साक्ष्य बन जाता है, तब वह कालजयी कृति की श्रेणी में आता है। सैनिक श्रवण यादव द्वारा विरचित काव्य-संग्रह “पुलवामा के पन्ने” इसी परंपरा की एक सशक्त कड़ी है, जहाँ काव्य सौंदर्य, राष्ट्रबोध, प्रेमानुभूति और दर्शन एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। यह संग्रह 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में शहीद हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 40 वीर सपूतों के अमर बलिदान को समर्पित है।
इस संग्रह की आत्मा राष्ट्रवाद है, लेकिन यहाँ राष्ट्रवाद मात्र एक उद्घोष नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है। ‘कफन तिरंगे का’ जैसी कविताएँ तिरंगे को एक प्रतीक से ऊपर उठाकर संवाद का माध्यम बनाती हैं। कवि ने स्पष्ट किया है कि सैनिक के लिए रणभूमि में माँ का कर्ज चुकाना और अपनी पीठ न दिखाना ही सबसे बड़ा नैतिक अनुबंध है। पुलवामा हमले के घाव आज भी हृदय में पलते हैं, जिसे कवि ने “इतिहास के भीगे पन्नों पर जलते अक्षर” के रूप में चित्रित किया है।
इस संग्रह की एक विशिष्टता यह है कि यहाँ प्रेम केवल निजी अनुभूति नहीं है, बल्कि वह कर्तव्य-बोध का विस्तार है। “प्रेम पंथ के हम पंथी हैं, प्रेम सदा ही गाते हैं…” यह पंक्ति संग्रह की आत्मा को दर्शाती है। यहाँ प्रेम दुर्बलता नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो अंगारों पर चलना सिखाती है और वर्दी के भीतर धड़कते संवेदनशील हृदय को राष्ट्र के लिए प्राणोत्सर्ग हेतु प्रेरित करती है। ‘तुम्हारे आने के बाद’ और ‘प्रेम के मोती’ जैसी रचनाओं में प्रेम देह से आगे बढ़कर सहचर्य और समर्पण का संस्कार बनता है।

इस सद्य प्रकाशित कृति में केवल ओज ही नहीं, बल्कि करुणा का भी अथाह सागर है। ‘हमें युद्ध नहीं, बुद्ध चाहिए’ और ‘युद्ध के विरुद्ध’ जैसी रचनाएँ वैश्विक उत्तरदायित्व और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना करती हैं। कवि निर्भीक होकर आधुनिक सभ्यता और विज्ञान से प्रश्न करता है कि क्या विनाश ही अंतिम उपलब्धि है? बुद्ध की वाणी और पंचशील के सिद्धांतों को यहाँ किसी धार्मिक आग्रह के रूप में नहीं, बल्कि विश्व शांति के एकमात्र मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इस संग्रह में ‘आदिवासी’, ‘स्त्री’ और ‘दूब की घास’ जैसी कविताएँ कवि की व्यापक दृष्टि का प्रमाण हैं। स्त्री-विमर्श पर लिखते हुए कवि उसे ‘देवी’ या ‘अबला’ के खाँचे से निकालकर एक स्वतंत्र ‘इंसान’ के रूप में देखने और अपनी बेड़ियाँ खुद तोड़ने का आह्वान करता है। वहीं, ‘रोटी कपड़ा मकान और मेरा पसीना’ जैसी रचनाएँ श्रमिक वर्ग के उस संघर्ष को स्वर देती हैं, जहाँ उसका श्रम नींव की ईंट की तरह अदृश्य रहता है।
‘बाँसुरी’, ‘रात’ और ‘तितलियाँ’ जैसी कविताओं में प्रकृति केवल दृश्य नहीं, बल्कि एक संवादिनी सत्ता है। बाँसुरी का सूखा तना जब स्वर पाता है, तो वह त्याग और रिक्तता के दर्शन को उद्घाटित करता है। इसी प्रकार ‘दूब की घास’ यह संदेश देती है कि जीवन केवल ऊपरी पत्तों में नहीं, बल्कि गहरी जड़ों में होता है।
भाषाई दृष्टि से यह संग्रह संस्कृतनिष्ठ, तत्सम शब्दावली से युक्त और ओजस्वी है। कवि ने छंद और मुक्त छंद दोनों का संतुलित प्रयोग किया है। बिंबात्मकता और भाव-प्रवाह इसे एक उच्चकोटि का साहित्यिक दस्तावेज बनाते हैं। यह कविताएँ केवल कागज की श्वेतता पर नहीं, बल्कि कर्तव्य की अग्नि में तपकर रची गई हैं।
निष्कर्षतः, “पुलवामा के पन्ने” प्रेम, राष्ट्र और मनुष्यता के त्रिवेणी-संगम का काव्यात्मक प्रतिफल है। डॉ. सुशील द्विवेदी के शब्दों में, यह संग्रह पाठक से केवल पढ़े जाने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि उसे अंतःकरण में उतार लेने का आग्रह करता है। श्रवण यादव का यह प्रयास साहित्य के उस दायित्व को पूर्ण करता है जहाँ साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि चेतना का निर्माण और समाज की व्याधियों के लिए औषधि बनता है।

डॉ. संतोष पटेल
कवि, आलोचक, भोजपुरी भाषा आंदोलन की प्रमुख आवाज




