इतिहास और साहित्य के संबंध पर विचार करते हुए सबसे पहले एक सामान्य-सी लगने वाली, परंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात स्वीकार करनी चाहिए—इतिहास अतीत नहीं है। अतीत उससे कहीं अधिक विराट, जटिल और बहुस्तरीय है जिसे कोई इतिहासकार अपनी पुस्तक में समेट सकता है। इतिहास अतीत का चयनित प्रतिनिधित्व है। इतिहासकार उपलब्ध स्रोतों, अपनी पद्धति, अपने प्रश्नों और अपने समय की बौद्धिक चिंताओं के सहारे अतीत के कुछ हिस्सों को हमारे सामने लाता है। जो दिखाई देता है वह असत्य नहीं है, किंतु वह संपूर्ण भी नहीं है।
इसे कैमरे के एक साधारण रूपक से समझा जा सकता है। कोई व्यक्ति एक कमरे में बैठकर कैमरे के सामने बोल रहा है। स्क्रीन पर उसका चेहरा दिखाई देता है, शायद पीछे की दीवार का कुछ हिस्सा भी दिखता है, लेकिन कमरे में रखी अनेक दूसरी वस्तुएँ स्क्रीन पर नहीं आतीं। वे अनुपस्थित नहीं हैं; वे केवल कैमरे के फ्रेम के बाहर हैं। इतिहास के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है। इतिहासकार अतीत की ओर अपना कैमरा करता है, किसी हिस्से पर फोकस करता है और हमें वही दिखाता है जो उसके स्रोत, प्रश्न और पद्धति के फ्रेम में आ सका है। फ्रेम के बाहर भी अतीत मौजूद रहता है। इसका अर्थ यह नहीं कि इतिहासकार जान-बूझकर अतीत को विकृत करता है। चयन इतिहास-लेखन की अनिवार्यता है। अतीत इतना विशाल है कि किसी भी इतिहास में उसका संपूर्ण पुनरुत्पादन असंभव है। समस्या चयन में नहीं है; समस्या तब शुरू होती है जब चयनित अतीत को ही संपूर्ण अतीत समझ लिया जाता है। इसलिए इतिहास की पद्धति के भीतर ही एक आत्म-सजगता आवश्यक है—हम जो देख रहे हैं उसके साथ-साथ यह प्रश्न भी बना रहना चाहिए कि हम क्या नहीं देख पा रहे हैं? यहीं से साहित्य इतिहासकार के लिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अतीत में क्या हुआ और अतीत को जीना कैसा था इतिहासकार सामान्यतः इस प्रश्न का उत्तर खोजता है कि अतीत में क्या हुआ। कौन-सी घटना कब घटी, उसके कारण क्या थे, उसमें कौन-से व्यक्ति और संस्थाएँ सक्रिय थीं, उसका सामाजिक या राजनीतिक परिणाम क्या हुआ—ये इतिहास के आवश्यक प्रश्न हैं। इनके बिना इतिहास नहीं लिखा जा सकता। लेकिन मनुष्य का अतीत केवल घटनाओं से नहीं बनता। किसी युग में रहने वाले लोग डरते भी थे, उम्मीद करते थे, प्रेम करते थे, अपमानित होते थे, भविष्य की कल्पना करते थे, पुरानी दुनिया को याद करते थे, अफवाहों से प्रभावित होते थे, प्रतीकों से जुड़ते थे और अपने समय को अनेक परस्पर विरोधी अर्थों में समझते थे। उनके लिए कोई राजनीतिक घटना केवल राजनीतिक घटना नहीं थी; वह उनके परिवार, जाति, मोहल्ले, जीविका, धर्म और निजी आशंकाओं के भीतर प्रवेश करती थी। इसलिए “क्या हुआ?” के साथ एक दूसरा प्रश्न भी होना चाहिए—“उस समय जीना कैसा था?” पहले प्रश्न के लिए हमारे पास अभिलेखागार हैं। दूसरे प्रश्न तक पहुँचने में साहित्य विशेष सहायता कर सकता है। सरकारी रिपोर्ट हमें बता सकती है कि किसी जिले में किसान आंदोलन हुआ। वह यह भी बता सकती है कि कितने लोगों को गिरफ्तार किया गया और प्रशासन ने स्थिति का आकलन किस तरह किया। लेकिन किसान आंदोलन में शामिल या उससे प्रभावित व्यक्ति के भीतर कैसी उम्मीद थी, गांव में पुलिस के आने की खबर किस तरह फैलती थी, लोग क्रांतिकारी, कांग्रेसी या समाजवादी कार्यकर्ताओं के बारे में क्या सोचते थे, परिवार के भीतर राजनीतिक भागीदारी को लेकर क्या तनाव पैदा होते थे—इन बातों को सरकारी रिपोर्ट हमेशा दर्ज नहीं करती। इतिहास में तथ्य आवश्यक हैं, पर मनुष्य केवल तथ्य नहीं है। यहीं साहित्य मनुष्य को इतिहास में वापस लाता है। स्रोत भी इतिहास के उत्पाद हैं इतिहासकार जिस स्रोत का इस्तेमाल करता है वह अपने आप हमारे पास नहीं पहुँच गया है। स्रोतों का भी इतिहास होता है। अतीत में असंख्य पत्र लिखे गए होंगे, असंख्य वार्ताएँ हुई होंगी, अफवाहें फैली होंगी, निजी डायरी लिखी गई होंगी, पर्चे छपे होंगे, लोकगीत गाए गए होंगे; उनमें से बहुत कम हमारे पास बचे हैं। इसलिए स्रोतों के संबंध में कम से कम तीन प्रश्न हमेशा पूछे जाने चाहिए—क्या लिखा गया, उसमें से क्या सुरक्षित रखा गया और सुरक्षित सामग्री में से इतिहासकार ने क्या चुना? संरक्षण स्वयं निष्पक्ष प्रक्रिया नहीं है। राजसत्ता अपनी आवश्यकताओं के दस्तावेज सुरक्षित रखती है। राजनीतिक संगठन अपने प्रस्तावों, बैठकों और अधिकृत वक्तव्यों को बचाकर रखते हैं। प्रतिष्ठित परिवारों के कागजात बच जाते हैं, गरीब परिवारों की स्मृतियाँ कई बार उनके साथ समाप्त हो जाती हैं। राज्य की निगाह में जो महत्त्वपूर्ण है वह अभिलेखागार में पहुँच सकता है; लेकिन गांव की किसी स्त्री के भय, किसी मज़दूर की उम्मीद या किसी नौजवान की राजनीतिक बेचैनी के लिए कोई सरकारी फाइल बनना आवश्यक नहीं है। इस अर्थ में अभिलेखागार स्वयं एक प्रकार का ऐतिहासिक चयन है। और तब इतिहासकार उस पहले से चयनित सामग्री में से फिर चयन करता है। इसलिए जब हम इतिहास की पुस्तक पढ़ते हैं तो हमें अतीत का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब नहीं मिलता। हमारे सामने कई स्तरों से छनकर आया हुआ अतीत होता है। यह बात इतिहास को अविश्वसनीय नहीं बनाती; बल्कि इतिहासकार की जिम्मेदारी बढ़ाती है। दस्तावेज भी बोलते हुए बदल जाते हैं
राजनीतिक इतिहास पर काम करते हुए मुझे कई बार अनुभव हुआ है कि किसी नेता ने जनता के सामने जो कहा और बाद में उसका जो अधिकृत रूप सुरक्षित हुआ, दोनों में पर्याप्त अंतर हो सकता है। स्थानीय अखबार में प्रकाशित भाषण, श्रोताओं की स्मृति और संगठन की अधिकृत कार्यवाही एक ही वक्तव्य के तीन अलग रूप प्रस्तुत कर सकते हैं। मान लीजिए किसी नेता ने हिंदी या हिंदुस्तानी में बोलते हुए धार्मिक प्रतीकों, स्थानीय कहावतों और जन-संस्कृति से लिए गए रूपकों का प्रयोग किया। उपस्थित जनता ने उसी रूप में उसका अर्थ ग्रहण किया। बाद में संगठन की रिपोर्ट तैयार हुई और भाषण का अंग्रेजी सारांश प्रकाशित किया गया। उसमें वही बातें अधिक संयत और प्रशासनिक भाषा में आ सकती हैं। इतिहासकार यदि केवल अधिकृत अंग्रेजी संस्करण पढ़ता है तो उसे एक प्रकार का नेता दिखाई देगा; जनता ने जिस नेता को सुना था वह कुछ दूसरा भी हो सकता है। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा संस्करण “झूठा” है। प्रश्न यह है कि एक ही ऐतिहासिक क्षण के कई जीवन होते हैं। गांधी को पढ़ने और गांधी को सुनने के अनुभव में भी यही अंतर महसूस किया जा सकता है। Collected Works में दर्ज वक्तव्य सुव्यवस्थित लिखित पाठ है। लेकिन गांधी की आवाज में उसी तरह के वक्तव्य को सुनते हुए उनके ठहराव, श्रोताओं से बातचीत, आग्रह और कभी-कभी उनकी असहायता तक का अनुभव किया जा सकता है। शब्द वही हो सकते हैं, लेकिन उनका ऐतिहासिक अर्थ बदल जाता है। इसलिए भाषा केवल सूचना का वाहन नहीं है; वह स्वयं इतिहास का हिस्सा है। अनुवाद भी इस समस्या को और बढ़ाता है। किसी सांस्कृतिक संकल्पना का अंग्रेजी अनुवाद उसके अर्थ का केवल एक हिस्सा पकड़ सकता है। “हनुमान” को केवल “monkey god” कह देने से पहचान तो हो सकती है, लेकिन हनुमान से जुड़ा भारतीय सांस्कृतिक, धार्मिक और भावात्मक संसार उस अनुवाद में नहीं आ सकता। इसी तरह अनेक राजनीतिक और सामाजिक अवधारणाएँ अंग्रेजी प्रशासनिक भाषा में प्रवेश करते ही अपने स्थानीय अर्थ का कुछ हिस्सा खो देती हैं। इसलिए स्रोत को पढ़ते समय यह पूछना भी आवश्यक है कि किसने कहा, किस भाषा में कहा, किसके सामने कहा और किसने उसे बाद में दर्ज किया। साहित्य और ‘structures of feeling’ रेमंड विलियम्स की प्रसिद्ध अवधारणा “structures of feeling” साहित्य और इतिहास के इस संबंध को समझने में विशेष रूप से उपयोगी है। प्रत्येक ऐतिहासिक समय की कुछ ऐसी अनुभवगत और भावात्मक संरचनाएँ होती हैं जिन्हें औपचारिक विचारधारा या राजनीतिक घोषणापत्र से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। वे अभी इतनी व्यवस्थित नहीं होतीं कि सिद्धांत बन जाएँ, लेकिन समाज के भीतर अनेक लोग उन्हें अनुभव कर रहे होते हैं। कोई युग आशावादी हो सकता है और साथ ही भयाक्रांत भी। स्वतंत्रता की आकांक्षा के भीतर सांप्रदायिक असुरक्षा मौजूद हो सकती है। आधुनिकता के आकर्षण के साथ अपनी परंपरागत दुनिया के खो जाने का भय जुड़ा हो सकता है। जाति-विरोधी राजनीतिक भाषा के साथ रोजमर्रा के जीवन में जाति की गहरी मौजूदगी बनी रह सकती है। इन विरोधाभासों को सरकारी रिपोर्ट की स्पष्ट श्रेणियों में रखना कठिन है। साहित्य इन्हें साथ-साथ रहने देता है।
इसीलिए किसी युग का श्रेष्ठ उपन्यास केवल कहानी नहीं होता। उसमें उस युग के लोग बोलते हैं, झगड़ते हैं, उम्मीद करते हैं, निराश होते हैं और अनेक बार ऐसी बातें कहते हैं जिन्हें कोई राजनीतिक प्रस्ताव अपने भीतर नहीं रख सकता। साहित्यिक पात्र वास्तविक मनुष्य नहीं हैं, लेकिन जिस समाज में उनकी कल्पना संभव हुई वह वास्तविक है। इतिहासकार के लिए यही बात महत्त्वपूर्ण है। मैला आँचल : “क्या हुआ” से “क्या चल रहा था” तक फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आँचल इस पद्धतिगत संभावना का अत्यंत उपयोगी उदाहरण है। उत्तर बिहार के ग्रामीण समाज की वह दुनिया हमें उस समय की अनेक परतों तक ले जाती है—जाति, बीमारी, चिकित्सा, प्रशासन, पुलिस, कांग्रेस, समाजवादी कार्यकर्ता, ग्रामीण अभिजात वर्ग, स्थानीय संघर्ष, उम्मीद और निराशा। यदि हम केवल 1940 के दशक के प्रशासनिक दस्तावेज देखें तो हमें पता चलेगा कि किसी जिले में राजनीतिक गतिविधि कितनी थी, कौन गिरफ्तार हुआ, कौन-सा संगठन सक्रिय था और राज्य किसी घटना को किस रूप में देख रहा था। ये जानकारियाँ आवश्यक हैं। लेकिन मैला आँचल दूसरा प्रश्न हमारे सामने रखता है—उस समय क्या चल रहा था?
यह “क्या चल रहा था” इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण श्रेणी हो सकती है। इसका मतलब केवल घटना नहीं है। इसका मतलब है समय का सामाजिक वातावरण। लोग किस भाषा में राजनीति को समझ रहे थे? राज्य उनके सामने किस रूप में उपस्थित था? राष्ट्र गांव में पहुँचकर किन अर्थों में बदल रहा था? समाजवाद का शब्द स्थानीय जीवन में किस रूप में प्रवेश करता था? जाति और नई राजनीति का परस्पर संबंध कैसा था? उपन्यास इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर नहीं देता, लेकिन इतिहासकार को वे प्रश्न देखने में सहायता करता है जिन्हें अभिलेखीय दस्तावेज अकेले शायद सामने न लाएँ। इसलिए साहित्य को घटना के प्रमाण की तरह पढ़ना और सामाजिक अनुभव के प्रमाण की तरह पढ़ना दो अलग बातें हैं। यदि मैला आँचल में किसी विशेष दिन कोई राजनीतिक घटना दिखाई जाती है, तो उसकी तारीख और तथ्य की पुष्टि हमें दूसरे स्रोतों से करनी होगी। लेकिन उपन्यास में व्यक्त भय, उम्मीद, राजनीतिक भाषा और सामाजिक संबंध उस युग की “structure of feeling” को समझने का माध्यम बन सकते हैं। यही साहित्य के इतिहास-स्रोत बनने की वास्तविक जगह है। एकवचन इतिहास और साहित्य की बहुवचन दुनिया इतिहासकार को अंततः कोई तर्क देना होता है। वह सामग्री को व्यवस्थित करता है और एक narrative निर्मित करता है। चाहे उसका इतिहास कितना भी जटिल हो, उसके भीतर कोई न कोई केंद्रीय तर्क रहता है। श्रेष्ठ साहित्य की एक बड़ी शक्ति इसके विपरीत है। वह परस्पर विरोधी आवाजों को एक ही रचना में साथ रहने देता है।
यशपाल का झूठा सच इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। विभाजन और स्वतंत्रता के संक्रमण को पढ़ते हुए वहाँ हमें एक अकेली राजनीतिक आवाज नहीं मिलती। कांग्रेस समर्थक, कम्युनिस्ट, हिंदू सामुदायिक, पाकिस्तान समर्थक, संशयग्रस्त, अवसरवादी—अनेक तरह के पात्र अपने-अपने अनुभवों और तर्कों के साथ उपस्थित हैं। साथ ही स्त्रियों का अनुभव है, परिवार का विघटन है, विस्थापन है, निजी जीवन में राजनीति के प्रवेश का अनुभव है। उपन्यासकार को किसी एक आवाज को अंतिम सत्य घोषित करना आवश्यक नहीं। यही साहित्य की बहुस्वरता—polyphony—इतिहासकार के लिए अत्यंत मूल्यवान है। इतिहास की बड़ी कथा कई बार गांधी के साथ चलने वालों को केंद्र में रखती है और दूसरे राजनीतिक प्रवाहों को उसके आसपास रखती है। पाकिस्तान में वही संरचना जिन्ना को केंद्र में रखकर बन सकती है। बांग्लादेश में 1971 एक ऐसी केंद्रीय धुरी बन सकता है जिसके आधार पर उससे पहले और बाद के अतीत का महत्व निर्धारित होने लगे। राष्ट्रीय इतिहास स्वभावतः अपने केंद्र निर्मित करता है। साहित्य उस केंद्र को अस्थिर कर सकता है, क्योंकि साहित्य में वे पात्र भी बोल सकते हैं जो विजयी राष्ट्रीय आख्यान के बाहर रह गए। इतिहास की किताब से बाहर भी इतिहास रहता है यहीं सामाजिक स्मृति का प्रश्न आता है। कोई व्यक्ति या घटना इतिहास की मुख्यधारा की पुस्तकों से गायब हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि समाज ने उसे पूरी तरह भुला दिया। स्मृति केवल इतिहासकारों द्वारा निर्मित नहीं होती। परिवार अपनी स्मृति बनाते हैं, जातियाँ अपनी स्मृति बनाती हैं, धार्मिक समुदाय अपनी स्मृति बनाते हैं, क्षेत्र अपनी स्मृति बनाते हैं। गीत, कथाएँ, उत्सव, स्मारक और साहित्य इन स्मृतियों को आगे ले जाते हैं। इसलिए एक historian-approved past हो सकता है और उसके समानांतर एक remembered past भी। दोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते। 1857 इसका एक बड़ा उदाहरण है। औपनिवेशिक इतिहास में लंबे समय तक वह “mutiny” या असफल विद्रोह के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था, लेकिन लोकस्मृति और साहित्य में रानी लक्ष्मीबाई का दूसरा जीवन चलता रहा। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ने उस remembered past को एक ऐसी सार्वजनिक शक्ति प्रदान की जिसके बाद झाँसी की रानी केवल अभिलेखीय चरित्र नहीं रह गईं।
“बुंदेले हरबोलों” का उल्लेख स्वयं यह याद दिलाता है कि इतिहास केवल लिखित अभिलेखों में संरक्षित नहीं होता। वह लोगों के बोलने में भी जीवित रहता है। इसी भाव को वी. शांताराम की नवरंग के गीत “ये माटी सभी की कहानी कहेगी” में भी देखा जा सकता है। सत्ता किसी घटना को एक नाम दे सकती है; समाज उसे किसी दूसरे अर्थ में याद रख सकता है। इतिहास का “dustbin” इसलिए अंतिम स्थान नहीं है। जिसे एक समय अप्रासंगिक मानकर बाहर किया गया हो वह नए राजनीतिक, सामाजिक अथवा बौद्धिक संदर्भ में लौट सकता है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे व्यक्तित्वों के सार्वजनिक स्मृति में पुनरागमन को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। किसी समय मुख्यधारा के इतिहास-लेखन में सीमित दिखाई देने वाला व्यक्तित्व बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में अचानक स्मारकों, पुस्तकों और बहसों के केंद्र में आ सकता है। इससे इतिहास का एक बुनियादी सत्य सामने आता है—इतिहास से बाहर किया जाना और अतीत से मिट जाना एक ही बात नहीं है। History from Below और स्रोतों का विस्तार बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सामाजिक इतिहास के विकास ने इतिहासकारों को स्रोतों और विषयों के इस विस्तार की ओर पहले ही संकेत किया था। ई. पी. थॉम्पसन और “history from below” की व्यापक परंपरा ने इस धारणा को चुनौती दी कि इतिहास केवल सत्ता, राज्य, संस्था और महान व्यक्तियों के माध्यम से समझा जा सकता है। साधारण मनुष्य भी इतिहास बनाता है। लेकिन साधारण मनुष्य सामान्यतः अपना विशाल अभिलेखागार छोड़कर नहीं जाता। यहीं इतिहासकार की कठिनाई शुरू होती है। यदि हमें किसान, मजदूर, स्त्री, निम्न जाति, छोटे कस्बे, विस्थापित समुदाय अथवा राजनीतिक रूप से पराजित समूहों का इतिहास लिखना है तो परंपरागत स्रोत पर्याप्त नहीं होंगे। हमें संस्मरण, आत्मकथा, मौखिक इतिहास, लोकगीत, पर्चे, छोटी पत्रिकाएँ, व्यंग्य, नाटक, फिल्म, कहानी और उपन्यास की ओर जाना पड़ेगा। यह पद्धति इतिहासकार को प्रमाण के अनुशासन से मुक्त नहीं करती। उलटे उससे अधिक सावधानी की अपेक्षा करती है। उपन्यास को जनगणना की तरह नहीं पढ़ा जा सकता। कविता को सरकारी रिपोर्ट की तरह उद्धृत नहीं किया जा सकता। साहित्यिक पात्र को किसी सामाजिक वर्ग का सांख्यिकीय प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। लेकिन यही बात सरकारी रिपोर्ट पर भी लागू होती है। पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट भी “सत्य स्वयं” नहीं है। वह भी किसी दृष्टि से लिखा गया दस्तावेज है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि कौन-सा स्रोत निष्पक्ष है। कोई भी स्रोत पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होता। प्रश्न यह है कि हम प्रत्येक स्रोत से कौन-सा प्रश्न पूछ रहे हैं। साहित्य तथ्य का विकल्प नहीं, तथ्य से नए प्रश्न पूछने का माध्यम है साहित्य को ऐतिहासिक स्रोत मानने का सबसे सुरक्षित और उत्पादक तरीका यही है कि उसे तथ्य का विकल्प न बनाया जाए।
यदि कोई उपन्यास कहता है कि किसी स्थान पर किसी दिन दंगा हुआ था, तो उसकी पुष्टि दूसरे ऐतिहासिक स्रोतों से की जानी चाहिए। लेकिन वही उपन्यास यह दिखा सकता है कि दंगे से पहले पड़ोसियों के बीच कैसी आशंका पैदा हुई, अफवाहें कैसे फैलती थीं, लोग अपने परिचितों को अचानक धार्मिक पहचान में कैसे देखने लगे, स्त्री की सुरक्षा को लेकर परिवार में कैसी प्रतिक्रिया हुई या विस्थापन के बाद “घर” का अर्थ किस तरह बदल गया। दंगे की तारीख archive देगा। दंगे का भय साहित्य दे सकता है। और सामाजिक इतिहास के लिए दोनों आवश्यक हैं। इसलिए साहित्य हमें प्रमाण की जगह कल्पना नहीं देता; वह हमें प्रमाण से पूछे जाने वाले नए प्रश्न देता है। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। एक ही अतीत की अनेक व्याख्याएँ यहाँ से इतिहास-लेखन की एक और समस्या सामने आती है। आधुनिक भारत को देखने की अनेक स्थापित दृष्टियाँ विकसित हुई हैं और उनमें से प्रत्येक ने हमारे ज्ञान को समृद्ध किया है। राष्ट्रवादी दृष्टि ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीय राजनीतिक समुदाय के निर्माण पर बल दिया। मार्क्सवादी और वर्गीय दृष्टि ने उत्पादन संबंधों, वर्ग-संघर्ष और आर्थिक संरचनाओं को सामने रखा। राज्य और औपनिवेशिक आधुनिकता को केंद्र में रखने वाली दृष्टि ने शासन, संस्था, कानून और ज्ञान की शक्ति की ओर ध्यान खींचा। समुदाय-आधारित इतिहास ने हिंदू-मुस्लिम संबंध, सामुदायिक राजनीतिक दावे और धार्मिक पहचानों की ऐतिहासिक शक्ति को रेखांकित किया। क्षेत्रीय इतिहास ने दिखाया कि बंगाल, पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र या दक्षिण भारत का अनुभव किसी एक अखिल भारतीय कथा में पूरी तरह समाहित नहीं किया जा सकता। जाति और सामाजिक न्याय की दृष्टि ने एक ऐसे भारतीय समाज को सामने रखा जिसे पहले का इतिहास पर्याप्त गंभीरता से नहीं देखता था। इनके अतिरिक्त स्त्री और जेंडर की दृष्टि ने इतिहास की लगभग सभी पुरानी श्रेणियों को नए ढंग से पढ़ना सिखाया। इनमें से किसी दृष्टि को हटाने से हमारा इतिहास गरीब होगा। लेकिन इनमें से किसी एक को ही संपूर्ण इतिहास मान लेने से भी हमारा इतिहास गरीब हो जाएगा।
यहीं मैं इतिहास की एक सातवीं दृष्टि की संभावना देखता हूँ। सातवीं दृष्टि : दूसरे आख्यान को पराजित करना नहीं, अनेक अनुभवों को साथ पढ़ना सातवीं दृष्टि कोई नया वैचारिक शिविर नहीं हो सकती। यदि वह केवल छह पुराने आख्यानों के विरुद्ध सातवाँ आख्यान बनकर खड़ी हो जाए तो हम वहीं लौट आएँगे जहाँ से चले थे। एक दृष्टि दूसरी को विस्थापित करेगी, फिर तीसरी आएगी और उसे चुनौती देगी। सातवीं दृष्टि का आधार अलग होना चाहिए। वह राष्ट्र, वर्ग, समुदाय, जाति, क्षेत्र और राज्य को प्रतिस्पर्धी तथा परस्पर बहिष्कृत श्रेणियाँ न माने। वह यह देखे कि वास्तविक ऐतिहासिक मनुष्य इन सभी संरचनाओं के बीच एक साथ जीता है। एक किसान केवल किसान नहीं होता। उसकी जाति होती है, उसका धार्मिक समुदाय होता है, उसका क्षेत्र होता है, वह औपनिवेशिक राज्य के अधीन होता है, उसके भीतर राष्ट्र की कोई कल्पना हो सकती है और वह किसी वर्गीय संबंध का भी हिस्सा होता है। वास्तविक जीवन में ये पहचानें अलग-अलग खानों में नहीं रहतीं। वे आपस में टकराती हैं, एक-दूसरे को बदलती हैं और कई बार एक-दूसरे को सहारा भी देती हैं। इसलिए सातवीं दृष्टि का काम इतिहास को सरल बनाना नहीं, उसकी वास्तविक जटिलता स्वीकार करना है। वह किसी आवाज को केवल इसलिए इतिहास के बाहर नहीं करेगी कि वह हमारी वर्तमान वैचारिक पसंद के अनुकूल नहीं है। राष्ट्रवादी बोलेगा, कम्युनिस्ट बोलेगा, समाजवादी बोलेगा, दलित बोलेगा, क्षेत्रीय आवाज बोलेगी, हिंदू और मुस्लिम सामुदायिक राजनीति की आवाजें भी दर्ज होंगी। स्त्री बोलेगी, किसान बोलेगा, अभिजात बोलेगा और संभव सीमा तक वह व्यक्ति भी बोलेगा जो किसी तैयार राजनीतिक श्रेणी में नहीं आता। इतिहासकार फिर निर्णय करेगा। लेकिन निर्णय से पहले आवाजों को सुनना आवश्यक है।
इतिहासकार को मूल्यांकन का अधिकार छोड़ना नहीं चाहिए; उसे पूर्व-निर्धारित बहिष्कार का अधिकार छोड़ना चाहिए। यहीं साहित्य सातवीं दृष्टि के लिए विशेष रूप से आवश्यक हो जाता है। साहित्य और सातवीं दृष्टि राजनीतिक विचारधाराएँ मनुष्य को श्रेणियों में व्यवस्थित करती हैं। साहित्य उसे उसकी असंगति के साथ हमारे सामने लाता है। एक व्यक्ति राष्ट्रवादी और धार्मिक दोनों हो सकता है; जाति के प्रश्न पर रूढ़िवादी और आर्थिक प्रश्न पर समाजवादी हो सकता है; सार्वजनिक जीवन में आधुनिक और घरेलू जीवन में परंपरावादी हो सकता है। मनुष्य की वास्तविकता विचारधारा की शुद्धता से अधिक जटिल होती है। साहित्य उस अशुद्धता को मिटाता नहीं। यही उसकी ताकत है। यशपाल, रेणु, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, गुरुदत्त, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन अथवा भारतीय भाषाओं के दूसरे महत्वपूर्ण रचनाकारों को पढ़ते हुए हमें केवल राजनीतिक विचार नहीं मिलते। हमें समाज के भीतर विचारों की यात्रा दिखाई देती है। कोई विचार पार्टी के प्रस्ताव से निकलकर चाय की दुकान तक पहुँचता है तो उसका अर्थ बदल जाता है। राष्ट्र गांव में पहुँचकर कुछ और हो जाता है। समाजवाद जाति के साथ टकराता है। धार्मिक पहचान रोजमर्रा की मित्रता के साथ सह-अस्तित्व में रहती है और किसी संकट में अचानक राजनीतिक बन जाती है। साहित्य इन्हीं संक्रमणों का archive है। इस अर्थ में सातवीं दृष्टि का इतिहास केवल अधिक तथ्य जोड़ देने से नहीं बनेगा। वह अलग-अलग प्रकार के अनुभवों को परस्पर संवाद में रखकर बनेगा। और साहित्य इस संवाद का शायद सबसे समृद्ध क्षेत्र है। भारतीय भाषाओं के बीच संवाद भारतीय इतिहास लिखने की एक अतिरिक्त समस्या यह है कि हमने अनेक बार अंग्रेजी स्रोतों को अखिल भारतीय माना और भारतीय भाषाओं के साहित्य को क्षेत्रीय स्रोत समझकर पढ़ा। इस विभाजन पर पुनर्विचार आवश्यक है। हिंदी का उपन्यास केवल हिंदी प्रदेश का दस्तावेज नहीं है। बंगला साहित्य केवल बंगाल का इतिहास नहीं बताता। उर्दू साहित्य को केवल मुस्लिम सामाजिक अनुभव में सीमित करना भी गलत होगा। भोजपुरी, मैथिली, पंजाबी, मराठी, तमिल, मलयालम, तेलुगु और दूसरी भाषाओं के साहित्य को परस्पर संवाद में पढ़ने पर भारतीय आधुनिकता का बहुत अधिक जटिल मानचित्र सामने आता है।
राष्ट्रीय अनुभव केवल संसद, कांग्रेस अधिवेशन और सरकारी दस्तावेजों में निर्मित नहीं हुआ। वह गीतों, कविताओं, उपन्यासों, यात्रा-वृत्तांतों, जेल-संस्मरणों और लोकभाषाओं में भी बना। भारतीय भाषाओं के बीच यह संवाद सातवीं दृष्टि के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि “भारत” केवल ऊपर से दिया गया राजनीतिक विचार नहीं था; वह अलग-अलग भाषायी समाजों में अलग रूपों में अनुभव किया गया था। एक साझा इतिहास का अर्थ अनुभवों की एकरूपता नहीं है। वास्तव में साझा इतिहास का अर्थ भिन्न अनुभवों के बीच ऐतिहासिक संबंध स्थापित करना है। इतिहास का dustbin समाप्त नहीं होता ई. एच. कार ने इतिहास के तथ्यों के चयन की समस्या की ओर ध्यान दिलाया था। प्रत्येक इतिहासकार कुछ तथ्यों को महत्त्व देता है और असंख्य तथ्यों को छोड़ देता है। इस चयन से बचा नहीं जा सकता। लेकिन इतिहास का जिसे हम रूपक में “dustbin” कह सकते हैं, वह घर के सामान्य कूड़ेदान की तरह नहीं है जिसे खाली करके सामग्री हमेशा के लिए नष्ट कर दी जाए। इतिहास में छोड़ी गई चीजें दूसरे रूपों में बची रह सकती हैं। वे स्मृति में रह सकती हैं। साहित्य में रह सकती हैं। लोकगीत में रह सकती हैं। किसी समुदाय के भीतर रह सकती हैं। किसी क्षेत्रीय परंपरा में रह सकती हैं। राजनीतिक परिस्थिति बदलने पर वे फिर सामने आ सकती हैं। इसलिए आज जिस चीज को irrelevant कहकर इतिहास से बाहर कर दिया गया है, संभव है अगली पीढ़ी उसी को ऐतिहासिक प्रश्न का केंद्र बना दे। इतिहास-लेखन का इतिहास स्वयं ऐसे पुनरागमन से भरा पड़ा है। कभी किसान इतिहास के किनारे थे; फिर वे केंद्र में आए। कभी स्त्रियों का अनुभव लगभग अदृश्य था; आज उसके बिना सामाजिक इतिहास की कल्पना अधूरी है। कभी जाति को आधुनिक राजनीतिक इतिहास का गौण प्रश्न समझा जाता था; अब हम जानते हैं कि आधुनिक भारत को उसके बिना समझा ही नहीं जा सकता। इसलिए इतिहासकार की विनम्रता यह जानने में है कि उसका वर्तमान फ्रेम अंतिम फ्रेम नहीं है। साहित्य से अतीत का पता पूछना इतिहासकार को इसलिए साहित्य की ओर केवल सजावटी उद्धरण के लिए नहीं जाना चाहिए। इतिहास की पुस्तक में प्रेमचंद की दो पंक्तियाँ जोड़ देने से साहित्य और इतिहास का संवाद स्थापित नहीं होता।
साहित्य को एक गंभीर historical interlocutor की तरह पढ़ना होगा। प्रेमचंद से पूछा जा सकता है कि औपनिवेशिक ग्रामीण समाज के भीतर नैतिकता, जाति, गरीबी और सम्मान किस तरह जुड़े हुए थे। राहुल सांकृत्यायन से यह पूछा जा सकता है कि बीसवीं सदी के भारतीय बुद्धिजीवी के लिए यात्रा, ज्ञान, बौद्ध धर्म, मार्क्सवाद और भारतीय समाज के परिवर्तन का आपसी संबंध क्या था। यशपाल से विभाजन, राष्ट्रवाद और समाजवाद के रोजमर्रा के अनुभव के बारे में पूछा जा सकता है। रेणु से ग्रामीण राजनीतिक आधुनिकता की भाषा के बारे में पूछा जा सकता है। अमृतलाल नागर से शहर, लोक-संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन के संबंध पर बात की जा सकती है। यहाँ साहित्यकार से पूछा गया प्रश्न इतिहासकार का प्रश्न है। उत्तर साहित्य अपनी भाषा में देता है। फिर इतिहासकार उसे दूसरे स्रोतों के साथ संवाद में रखता है। यही पद्धति साहित्य को इतिहास का सहयोगी बना सकती है। अतीत की अधिक मानवीय समझ इतिहास की सबसे बड़ी शक्ति उसका प्रमाण-अनुशासन है। इसे किसी भी हालत में कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। तथ्य और कल्पना के बीच अंतर बना रहना चाहिए। लेकिन इतिहास की एक दूसरी जिम्मेदारी भी है—अतीत के मनुष्य को केवल संख्या, संस्था, वर्ग अथवा राजनीतिक पहचान में सीमित न करना। इतिहास को मनुष्य तक लौटना चाहिए। साहित्य इस वापसी में उसकी सहायता कर सकता है। क्योंकि साहित्य हमें वह दिखाता है जो कई बार आधिकारिक इतिहास में अदृश्य रह जाता है—घर की बातचीत, निजी डर, अपमान, उम्मीद, प्रेम, नैतिक संकट, स्मृति, अफवाह, भाषा और वह पूरा everyday life जिसके भीतर बड़ी राजनीतिक घटनाएँ अपना वास्तविक अर्थ ग्रहण करती हैं। सातवीं दृष्टि की खोज भी अंततः इसी अधिक व्यापक इतिहास की खोज है। उसका उद्देश्य किसी पुराने इतिहास को नष्ट करके उसकी जगह नया अधिकृत इतिहास स्थापित करना नहीं है। उसका उद्देश्य इतिहास के दरवाजे कुछ और खोलना है। राष्ट्र को भी देखें, वर्ग को भी। जाति को भी देखें, समुदाय को भी। क्षेत्र और राज्य को भी देखें। स्त्री और हाशिये के अनुभव को भी। विजय की स्मृति के साथ पराजय की स्मृति को भी सुनें। अभिलेखागार के साथ remembered past को भी रखें। और फिर उनके बीच संवाद से इतिहास की रचना करें। शायद तभी हमारा इतिहास अतीत का पूर्ण रूप तो नहीं—क्योंकि वह कभी संभव नहीं—लेकिन उसका अधिक विस्तृत, अधिक मानवीय और अधिक ईमानदार प्रतिनिधित्व बन सकेगा। इतिहास हमें बताता है कि अतीत में क्या हुआ। साहित्य हमें उस कठिनतर प्रश्न के निकट ले जा सकता है कि उस अतीत में मनुष्य होना कैसा था। और शायद एक अधिक समावेशी भारतीय इतिहास की सातवीं दृष्टि की शुरुआत भी यहीं से होती है। ( इलाहाबाद के मित्रों का आभार जिन्होंने शताधिक शिक्षकों के सामने मुझे अपने चल रहे काम पर अपनी बातें साझा करने का मौक़ा दिया )

हितेन्द्र पटेल
hitenjee@gmail.com
Senior Historian




