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मन की चौबीस खिड़कियाँ

एक संगीतकार डॉक्टर के कमरे से बाहर निकल रहा है। वह अपनी बीवी की तरफ़ हाथ बढ़ाता है। इसके बजाए कि वह बीवी का...

स्त्री जीवन की अंतहीन व्यथा और जिजीविषा का काव्य-बिंब— ‘मैं भी हूँ’

चन्द्रिका राम का सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह 'मैं भी हूँ' समकालीन हिन्दी कविता के परिदृश्य में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यह संग्रह न केवल कवि...

पिता की वह ऐतिहासिक भूल, जो एक बेटे के लिए महत्वपूर्ण अवसर है

राजीव गांधी इस समय तक प्रधानमंत्री नहीं थे। वे लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मंडल आयोग की सिफारिशों पर बहस में शामिल हुए और 6 सितंबर 1990 को लोकसभा में उन्होंने मंडल रिपोर्ट पर लंबा भाषण दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने मंडल आयोग के आंकड़ों, उसकी कार्यप्रणाली और सिफारिशों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। यही वह राजनीतिक क्षण था, जब कांग्रेस और पिछड़े वर्गों के बीच पहले से मौजूद दूरी और स्पष्ट दिखाई देने लगी। राजनीतिक रूप से इसे केवल एक भाषण या एक निर्णय की समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। समस्या इससे कहीं बड़ी थी।

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