आज पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती है। राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल मे भारत को बीसवीं सदी के अंतिम दशक की नई तकनीकी और प्रशासनिक दुनिया के लिए तैयार करने की कोशिश की। कंप्यूटर और सूचना-प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, शिक्षा, साक्षरता, पंचायती राज और ग्रामीण प्रतिभाओं के विकास से जुड़ी उनकी कई पहलों ने आगे चलकर भारत की विकास-यात्रा को प्रभावित किया।
राजीव गांधी और आधुनिक भारत की बुनियाद
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल को अक्सर कंप्यूटर और आधुनिक तकनीक के विस्तार के संदर्भ में याद किया जाता है। यह वह दौर था जब भारत में कंप्यूटरीकरण को लेकर तीखा राजनीतिक और सामाजिक विरोध भी था। अटल बिहारी वाजपेयी बैलगाडी मे चढ़कर विरोध कर रहे थे राजीव गांधी जानते थे कि भारत नई तकनीकी दुनिया से दूर रहकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे नहीं बढ़ सकता। दूरसंचार के क्षेत्र में C-DOT की स्थापना 1984 एक महत्वपूर्ण कदम थी। इसका उद्देश्य भारत की परिस्थितियों के अनुरूप स्वदेशी दूरसंचार तकनीक विकसित करना और छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों तक संचार सुविधाओं का विस्तार करना था। इसी दौर में MTNL की स्थापना 1986 हुई, जिसने दिल्ली और मुंबई में दूरसंचार सेवाओं के विस्तार और आधुनिकीकरण में भूमिका निभाई।
राजीव गांधी सरकार की टेक्नोलॉजी मिशन ने पेयजल, साक्षरता, टीकाकरण, दूरसंचार, तेल-बीज और डेयरी जैसे क्षेत्रों में तकनीक आधारित समाधान पर जोर दिया। शिक्षा के क्षेत्र में भी 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति महत्वपूर्ण थी। इसमें शिक्षा के विस्तार, वयस्क शिक्षा, महिला शिक्षा, तकनीकी शिक्षा तथा शैक्षणिक असमानताओं को कम करने पर जोर दिया गया। इसी व्यापक कार्यक्रम के अंतर्गत ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड जैसी पहल सामने आईं।
लेकिन मंडल कमीशन ने कांग्रेस और पिछड़े वर्गों के बीच दूरी पैदा कर दी। मंडल आयोग की सिफारिशें राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते लागू नहीं हुई थीं। 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने केंद्र की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा की। लेकिन राजीव गांधी इस समय तक प्रधानमंत्री नहीं थे। वे लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मंडल आयोग की सिफारिशों पर बहस में शामिल हुए और 6 सितंबर 1990 को लोकसभा में उन्होंने मंडल रिपोर्ट पर लंबा भाषण दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने मंडल आयोग के आंकड़ों, उसकी कार्यप्रणाली और सिफारिशों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। यही वह राजनीतिक क्षण था, जब कांग्रेस और पिछड़े वर्गों के बीच पहले से मौजूद दूरी और स्पष्ट दिखाई देने लगी। राजनीतिक रूप से इसे केवल एक भाषण या एक निर्णय की समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। समस्या इससे कहीं बड़ी थी। कांग्रेस लंबे समय तक सामाजिक न्याय के प्रश्न को मुख्यतः दलितों, अल्पसंख्यकों और गरीबों के संदर्भ में देखती रही, जबकि मंडल के बाद भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्ग स्वयं एक स्वतंत्र और निर्णायक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर चुके थे। मंडल ने भारतीय लोकतंत्र की सामाजिक संरचना बदल दी।
जवाहर नवोदय विद्यालय योजना राजीव गांधी युग की सबसे महत्वपूर्ण शैक्षणिक पहलों में से एक मानी जा सकती है। इसका मूल विचार था कि ग्रामीण भारत के प्रतिभाशाली बच्चों को गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। आज देश-विदेश में विभिन्न क्षेत्रों में नवोदय विद्यालयों के पूर्व छात्र जिस तरह अपनी पहचान बना रहे हैं, वह इस प्रयोग की दीर्घकालिक सफलता को दिखाता है।
राजीव गांधी सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किया। 64वें और 65वें संविधान संशोधन विधेयकों के माध्यम से पंचायतों और नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा देने का प्रयास हुआ, हालांकि ये विधेयक उस समय पारित नहीं हो सके।
बाद में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से पंचायतों और नगर निकायों को संवैधानिक आधार मिला।
मंडल के बाद बदली भारतीय राजनीति
मंडल के बाद पिछड़े वर्गों के बीच राजनीतिक चेतना तेजी से बढ़ी। उत्तर भारत में समाजवादी राजनीति को नई ऊर्जा मिली। वी.पी. सिंह, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार और बाद में अनेक क्षेत्रीय नेताओं ने पिछड़े वर्गों की राजनीतिक आकांक्षाओं को संगठित किया। दूसरी ओर भाजपा ने भी इस बदलती सामाजिक संरचना को बहुत तेजी से समझा। कमंडल की राजनीति के साथ भाजपा ने पिछड़े वर्गों के अनेक नेताओं को अपने सामाजिक विस्तार का हिस्सा बनाया। कल्याण सिंह, उमा भारती और विनय कटियार जैसे नेता इस व्यापक राजनीतिक पुनर्संयोजन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए।
इसके बाद भाजपा ने धीरे-धीरे यह समझ लिया कि केवल पारंपरिक उच्च जातीय समर्थन के आधार पर उत्तर भारत की राजनीति में स्थायी बहुमत हासिल करना संभव नहीं है। उसने OBC और विशेष रूप से अत्यंत पिछड़ा वर्ग (MBCs) तक अपना विस्तार किया। यहीं से उत्तर भारत की राजनीति में एक नया सामाजिक समीकरण बनने लगा। कांग्रेस इस परिवर्तन को उतनी तेजी से नहीं समझ सकी।
कांग्रेस की दूसरी कोशिश- मंडल-II
हालांकि कांग्रेस ने बाद के वर्षों में इस दूरी को कम करने की कोशिश की। UPA-I के दौरान केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह के नेतृत्व में केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में OBC आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। यह मंडल की राजनीति का दूसरा बड़ा चरण था। इसे सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया, लेकिन राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस और OBC समाज के बीच वह विश्वास पूरी तरह वापस नहीं आ सका जो मंडल के बाद उससे दूर हो गया था। अर्जुन सिंह को इस पूरी प्रक्रिया में भारी राजनीतिक विरोध का सामना भी करना पड़ा। एक तरह से उनके राजनैतिक जीवन का अंत हो गया।
स्पष्ट है सामाजिक न्याय की राजनीति केवल कानून बनाने से नहीं चलती; उसके लिए राजनीतिक विश्वास और लगातार संवाद भी जरूरी है।
SECC-2011: आंकड़ों का अधूरा अध्याय
इसके बाद 2011 में Socio-Economic and Caste Census (SECC) का आयोजन हुआ। यह एक महत्वपूर्ण प्रयास था, क्योंकि लंबे समय से भारत में पिछड़े वर्गों की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बारे में व्यापक और अद्यतन आंकड़ों का अभाव रहा है।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार SECC-2011 के जाति संबंधी आंकड़ों में बड़ी संख्या में प्रविष्टियों में विसंगतियां सामने आई थीं और सुधार की प्रक्रिया भी चली। सरकार ने संसद में बताया था कि लगभग 1.44 करोड़ व्यक्तियों से संबंधित जाति-जानकारी में विसंगतियां चिन्हित हुई थीं। लेकिन समस्या यह रही कि SECC-2011 का जातिगत डेटा सार्वजनिक नीति के लिए उस रूप में उपलब्ध नहीं हो सका, जिसकी अपेक्षा सामाजिक न्याय की राजनीति कर रही थी। इससे पिछड़े वर्गों के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि सरकारें जाति के आंकड़े तो एकत्र करती हैं, लेकिन उन्हें सार्वजनिक नीति के निर्णायक आधार में बदलने से बचती हैं। इस गड़बड़झाले के आरोप पी चिदंबरम और प्रणब मुख़र्जी पर लगते है.
मोदी युग और OBC राजनीति
2014 के बाद भाजपा ने OBC राजनीति को एक नए स्तर पर पहुंचाया। नरेंद्र मोदी स्वयं OBC पृष्ठभूमि से आने वाले प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत हुए और भाजपा ने केंद्र तथा राज्यों में OBC नेतृत्व का विस्तार किया। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा ने केवल प्रभावशाली OBC समूहों पर निर्भर रहने के बजाय अति पिछड़े और छोटे सामाजिक समूहों के बीच अपना आधार मजबूत किया। पटेल,निषाद, राजभर, मौर्य, प्रजापति, सैनी और अनेक अन्य समुदायों के बीच भाजपा ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कल्याणकारी योजनाओं और गठबंधन राजनीति के माध्यम से अपनी पैठ बनाई।
इसका परिणाम यह हुआ कि जो OBC राजनीति कभी कांग्रेस और फिर समाजवादी राजनीति की ताकत थी, उसका एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ चला गया। लेकिन अब परिस्थितियां फिर बदल रही हैं।
2026: बदलते राजनीतिक समीकरण
जेन-जी प्रोटेस्ट, परीक्षा व्यवस्था और NEET और यूजीसी रेगुलेशन 2026 विवाद ने केंद्र सरकार को गंभीर राजनीतिक दबाव में डाला। इन घटनाक्रमों के बीच तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई 2026 को इस्तीफा दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उनका इस्तीफा मुख्यतः NEET परीक्षा में अनियमितताओं और उसके बाद हुए व्यापक छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि में आया। इसलिए इसे केवल UGC Regulations 2026 का परिणाम बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक संदेश महत्वपूर्ण है: युवा, शिक्षा, रोजगार, परीक्षा और अवसर का प्रश्न अब सत्ता की सामाजिक स्वीकार्यता को प्रभावित करने लगा है। यही वह समय है जब सामाजिक न्याय का प्रश्न भी नई ऊर्जा के साथ वापस आया है।
अब जातिगत जनगणना निर्णायक मुद्दा बन सकती है
14 अगस्त 2026 को सरकार ने Census 2027 के population enumeration phase के लिए 40 प्रश्नों वाला प्रारूप अधिसूचित किया। इसमें पहली बार व्यापक रूप से caste की जानकारी दर्ज करने का प्रावधान किया गया है। जाति के लिए अलग-अलग OBC श्रेणी का पूर्व-निर्धारित विकल्प न होने और self-declaration आधारित प्रारूप को लेकर कांग्रेस सहित विपक्ष ने सवाल उठाए हैं।
असल राजनीतिक सवाल इससे बड़ा है। जाति की जानकारी किस तरीके से एकत्र होगी, उसका वर्गीकरण कैसे होगा, उसकी विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित होगी और अंततः उस डेटा को सामाजिक न्याय की नीतियों में कैसे इस्तेमाल किया जाएगा? यही वह मोड़ है जहाँ सरकार की नीयत, प्रक्रिया और पारदर्शिता पर बहस जरूरी हो जाती है। 2011 के अनुभव के बाद OBC समुदाय स्वाभाविक रूप से यह जानना चाहता है कि इस बार एकत्र किए गए आंकड़ों का क्या होगा। क्या वे सार्वजनिक होंगे? क्या स्वतंत्र विशेषज्ञों को उनका विश्लेषण करने दिया जाएगा? क्या जातिगत आंकड़ों को सामाजिक-आर्थिक सूचकांकों के साथ जोड़ा जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण क्या जाति की गणना केवल आंकड़ा संग्रह बनकर रह जाएगी या वह सामाजिक न्याय की नई नीति का आधार बनेगी?
राहुल गांधी के सामने ऐतिहासिक अवसर
यहीं से कहानी राजीव गांधी से राहुल गांधी तक पहुंचती है। राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों से लगातार जातिगत जनगणना और सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठा रहे हैं। बिहार और अन्य राज्यों की राजनीति में कांग्रेस ने भी जातिगत जनगणना को प्रमुख मुद्दा बनाया है। राजनीतिक परिणाम कांग्रेस के पक्ष में नहीं रहे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मुद्दा समाप्त हो गया। बल्कि इसके विपरीत जातिगत जनगणना अब भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व, संसाधनों और अवसरों के पुनर्वितरण की बहस का केंद्रीय प्रश्न बन चुकी है। राहुल गांधी के सामने इसलिए केवल चुनाव जीतने का अवसर नहीं है। उनके सामने कांग्रेस की सामाजिक राजनीति को पुनर्परिभाषित करने का अवसर है।
यदि राजीव गांधी के दौर में कांग्रेस मंडल की राजनीतिक भाषा और सामाजिक परिवर्तन को पूरी तरह नहीं समझ सकी थी, तो राहुल गांधी उस ऐतिहासिक दूरी को कम कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए केवल भाषण पर्याप्त नहीं होगा। राहुल गांधी को तीन स्पष्ट मांगों पर टिकना होगा: पहला- विश्वसनीय और पारदर्शी जातिगत आंकड़े की मांग; दूसरा- OBC के भीतर सामाजिक और आर्थिक असमानताओं का वैज्ञानिक अध्ययन; और तीसरा-इन आंकड़ों को प्रतिनिधित्व, शिक्षा, रोजगार और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण से जोड़ने की ठोस नीति। तभी जातिगत जनगणना केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बनेगी।
मंडल आयोग ने 1931 की जनगणना सहित उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर भारत की पिछड़ी जातियों की आबादी लगभग 52 प्रतिशत आंकी थी और इसी पृष्ठभूमि में 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी लेकिन आज 52 प्रतिशत को वर्तमान आबादी का प्रमाणित आंकड़ा मान लेना उचित नहीं होगा। यही तो जातिगत जनगणना की आवश्यकता का सबसे बड़ा कारण है। अगर आंकड़े ही उपलब्ध नहीं हैं, तो नीति किस आधार पर बनेगी? और अगर आंकड़े उपलब्ध हो जाते हैं, तो फिर राजनीति को उस सामाजिक वास्तविकता का सामना करना ही पड़ेगा।
पिता की भूल, बेटे का अवसर
राजीव गांधी की आधुनिक भारत की परिकल्पना में कंप्यूटर, दूरसंचार, शिक्षा और विकेंद्रीकरण महत्वपूर्ण थे। लेकिन सामाजिक न्याय और मंडल के प्रश्न पर कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति ने पिछड़े वर्गों के एक बड़े हिस्से को उससे दूर कर दिया। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि केवल एक व्यक्ति या एक भाषण ने OBC समुदाय को कांग्रेस से दूर कर दिया। यह दूरी कई दशकों की राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक प्रक्रियाओं का परिणाम थी। लेकिन यह भी सच है कि मंडल के बाद कांग्रेस उस सामाजिक परिवर्तन के साथ स्वयं को उतनी मजबूती से नहीं जोड़ सकी, जितनी उसे जोड़ना चाहिए था। आज राहुल गांधी के सामने उस ऐतिहासिक दूरी को कम करने का अवसर है। जातिगत जनगणना इस अवसर का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। लेकिन राहुल गांधी को यह समझना होगा कि OBC समाज केवल “गिनती” नहीं चाहता। वह हिस्सेदारी चाहता है।वह केवल आरक्षण की घोषणा नहीं चाहता। वह शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, राजनीति और आर्थिक संसाधनों में न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व चाहता है। जिसे डिलीवर करने मे नरेन्द्र मोदी असफल साबित हुये है.
इसलिए राहुल गांधी यदि ऐसा कर पाते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए केवल एक चुनावी रणनीति नहीं होगी। यह उसके सामाजिक आधार के पुनर्निर्माण की शुरुआत हो सकती है। और तब राजीव गांधी की जिस ऐतिहासिक राजनीतिक भूल ने कांग्रेस और पिछड़े वर्गों के बीच दूरी पैदा की थी, उसे सुधारने का श्रेय राहुल गांधी को मिल सकता है। इतिहास कभी-कभी दूसरी पीढ़ी को पहली पीढ़ी की गलतियों को सुधारने का अवसर देता है। आज राहुल गांधी के सामने ऐसा ही एक अवसर खड़ा है। क्या राहुल गांधी इस अवसर को इतिहास में बदल पाएंगे?




