अयोध्या : एक राजनैतिक यात्रा

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‘राम-राम, जै रामजी की, जै सिया-राम।’ हिन्दी हार्टलैंड का एक ग्रामीण या कस्बाई हिन्दू एक-दूसरे से भेंट-मुलाकात होने पर इन्हीं में से एक का अभिवादन करते हैं। हिन्दू जीवन-पद्धति में जन्म से मरण तक की यात्रा में राम समाए हुए हैं। राम से आपका परिचय बचपन में ही हो जाता है। रामचरितमानस, राम-लीला या रामायण, टीवी सीरियल ने राम और उनके व्यक्तित्व को और भी मजबूत करता है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में ‘जै श्री राम’ एक ताकतवर अभिवादन के रूप में सामने आया। तभी देश की राजनीति के केंद्र में राम के साथ-साथ अयोध्या आ जाती है। वही अयोध्या जहाँ श्री राम की जन्मभूमि है, जो कभी बौद्ध–जैन संस्कृति का केंद्र रहा, हिन्दुओं की आस्था का केंद्र रहा है। राम के साथ उनकी जन्मभूमि अयोध्या का जब भी जिक्र हुआ तो ‘विवादित स्थल’ के रूप में पढ़ा गया या सुना गया और यह विवाद पाँच सौ वर्षों तक चला। जिसका पटाक्षेप 21वीं सदी में हुआ। अब वहाँ भव्य मंदिर का निर्माण हो गया है। वर्ष 2024 के आम चुनाव के ठीक पहले 22 जनवरी को श्रीराम की प्राण-प्रतिष्ठा भी हो गयी है। लेकिन आम चुनाव में भाजपा को अयोध्या में हार मिली। अब अयोध्या एक बार फिर से चर्चा में है। अयोध्या राममन्दिर ट्रस्ट के रामधन, चंदे और ट्रस्ट के नाम पर ऊँचे दाम पर जमीनों की खरीद पर भ्रष्टाचार उजागर हुआ है। ट्रस्ट के पदाधिकारियों के खिलाफ जाँच हो रही है। ट्रस्ट से जुड़े कई कर्मचारी गिरफ्तार हो चुके हैं। राममंदिर ट्रस्ट पर हुए करोड़ों रुपये के गबन से पूरा देश स्तब्ध है। वस्तुतः अयोध्या को जानना देश की धार्मिक-राजनतिक और सांस्कृतिक यात्रा करना जैसे है। यहाँ अयोध्या की राजनैतिक यात्रा को समझते है।

     श्री रामचरितमानस के अयोध्या कांड की एक चौपाई से श्री राम और अयोध्या का संबंध स्थापित होता है।

अवध तहाँ जहँ राम निवासू / तहँईं दिवस जहाँ भानु प्रकासू |

जौ पै सीय रामु बन जाहीं / अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं ||

अर्थात् ‘जहाँ श्री रामजी का निवास हो वहीं अयोध्या है। जहाँ सूर्य का प्रकाश हो वहीं दिन है। यदि निश्चय ही सीताराम को जाते हैं, तो अयोध्या में तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है।’ चौपाई में स्पष्ट है श्री राम का जन्म अयोध्या में हुआ, राम के बिना अयोध्या का अस्तित्व ही नहीं।

      अयोध्या का इतिहास त्रेता युग से भी पुराना है, इसका उल्लेख वेद-स्मृतियों में है। अयोध्या की बसावट का श्रेय श्री राम के पूर्वज ईक्षवाकू वंश के राजाओ को जाता है। कोशल प्रदेश के राजा रघु सबसे प्रतापी राजा हुए। राजा रघु के समय अयोध्या की कीर्ति-पताका चहुँ ओर फैली, अयोध्या उस समय राजनीति, व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा है। राजा रघु के बाद दशरथ-पुत्र श्रीराम के समय अयोध्या न सिर्फ राजधानी रही, बल्कि एक पवित्र जीवन-पद्धति का केंद्र भी बन गयी। राजा राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया और उनका व्यक्तित्व आम जीवन में आदर्श माना गया। राजा राम के बाद अयोध्या का अवसान होना शुरू हुआ। राजा राम के पुत्र व कौशांबी नरेश कुश ने अयोध्या को सवारने का भरसक प्रयास किया।

     अयोध्या मौर्य काल एवं गुप्त काल में फिर से प्रमुख राजनैतिक-सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभरा। बौद्ध दर्शन एवं जैन दर्शन का केंद्र भी रहा। जैन ग्रंथों के अनुसार तीर्थंकर ऋषभदेव ने अयोध्या को फिर से बसाया। वहीं साकेत के नाम से प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में विकसित हुआ। चीनी यात्री फह्यान और व्हेनसांग ने अयोध्या में कई बौद्ध मठों के बारे में बताया है, जिनमें लगभग तीन हजार बौद्ध भिक्षु रहते थे। पुरातात्विक सर्वे से पता चलता है कि अयोध्या कई गुप्तकालीन राजाओं की राजधानी रही है। तत्पश्चात् शुंग वंश के पुष्यमित्र शुंग ने अयोध्या पर कब्जा किया और राजा राम की उपाधि धारण किया। इसी समय से अयोध्या में बौद्ध मठों का अवसान आरंभ हुआ। 11वीं सदी में कन्नौज के राजा जयचंद ने अयोध्या में कुछ मंदिरों का निर्माण किया और महाराज विक्रमादित्य के समय के शिलालेखों से विक्रमादित्य का नाम हटाकर अपना नाम लिखा दिया। 15वीं सदी तक अयोध्या के प्रति आकर्षण और श्रद्धा दोनों बनी रही। ऐसी मान्यता रही कि अयोध्या में मंदिर­-महल बनवाने से उनके यश-गान होते रहेंगे, क्योंकि राम अमर हैं और अयोध्या भी।

      इतिहासकारों के अनुसार लोदी वंश के शासक सिकंदर लोदी के समय तक मंदिर मौजूद रहा। विदेशी आक्रान्ताओं के आने का असर अयोध्या पर भी पड़ा। जब बाबर गंगा नदी के मैदानी भागों में कब्जा-अभियान में था, तब उसे अयोध्या के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के बारे में पता चला। बाबर अयोध्या को एक इस्लामिक केंद्र बनाने के प्रति आकर्षित हुआ। सन् 1528 में मुगलों द्वारा राममंदिर को तोड़कर वहाँ मस्जिद बना दिया। भारत में मुगलों का वर्चस्व हुआ तो इस्लाम का प्रभुत्व भी बढ़ा। मुगल शासकों अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ द्वारा अयोध्या में कोई विशेष हस्तक्षेप नहीं हुआ। औरंगजेब ने वहाँ भव्य मस्जिद बनवाई यद्यपि अयोध्या के हिन्दू वहाँ बने चबूतरे पर पूजा-अर्चना करना नहीं छोड़ा।

      अंग्रेजों के शासन के चलते मुगलिया सल्तनत ख़ाक हो रही थी। अब हिन्दू भक्त भी मस्जिद को लेकर आंदोलित हो रहे थे। बाबरी मस्जिद और मंदिर को लेकर सांप्रदायिक संघर्ष की शुरुआत सन् 1853 में हुई। विवाद ज्यादा बढ़ते देख अंग्रेज प्रशासन ने मस्जिद में मुसलमानों का और हिन्दुओं का राम चबूतरे पर पूजा करने का अधिकार स्वीकार किया। लेकिन दोनों धर्मों के अनुयायियों के बीच छिटपुट संघर्ष चलते रहे और छोटे-मोटे सांप्रदायिक दंगे होते रहे। हिन्दू संतों द्वारा मस्जिद की जगह राममंदिर बनाने के लिए अदालतों में कई बार अपील दायर की गई। सन् 1944 में जब सुन्नी वक्फ ने इस आधार पर बाबरी मस्जिद की जमीन को सुन्नी प्रॉपर्टी घोषित किया कि बाबर एक सुन्नी मुसलमान था। इस समय कई हिन्दू मठों के साधु-संतों ने रामजन्म भूमि की मुक्ति के लिए आंदोलन को तेज कर दिया।

     द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के बाद अंग्रेजी साम्राज्य का सूरज अस्त होने लगा था। अंग्रेज अब अपना घर ब्रिटेन को बचाने के लिए प्रयासरत थे। इधर भारत में कांग्रेस के नेतृत्व में आजादी का आंदोलन और तेज हो गया। अंग्रेजों ने जाने से पहले मुस्लिम लीग के नेताओं की अलग देश पाकिस्तान की माँग का समर्थन करके देश के विभाजन का सूत्रपात किया। भारत को आजादी मिली तो अयोध्या में भी रामजन्म भूमि की आजादी के लिए आंदोलन तेज हो गया और हिन्दुओं का जुटान बढ़ गया था। 

      द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब देश को आजादी मिली तो कांग्रेस से जवाहरलाल नेहरू प्रथम प्रधानमंत्री बने। नेहरू की पहचान अंतर्राष्ट्रीय विचारक, सेकुलर और लोकतान्त्रिक-समाजवादी नेता के रूप में थी। देश विभाजन की त्रासदी झेल रहा था, साथ ही पाकिस्तान बन जाने से हिन्दू नेताओं और संतों द्वारा अपने धार्मिक स्थानों को पुनर्स्थापना हेतु जुटान शुरू हुआ। रामजन्म भूमि की मुक्ति की मुहिम में अयोध्या इससे अछूती न रही। नेहरू की धर्मनिरपेक्षता की पहली परीक्षा सोमनाथ के मंदिर से शुरू हुई। नेहरू सरकार के समय सोमनाथ  मंदिर के पुनरुद्धार में प्रथम उप-प्रधानमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद की प्रमुख भूमिका रही। यद्यपि नेहरू ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को मंदिर के शिलान्यास में न जाने के लिए पत्र भी लिखा लेकिन राजेन्द्र जी वहाँ गये। यहीं से हिन्दू संतों और नेताओं को अन्य मंदिरों पर रिक्लेम करने का बल मिला।

     आजादी के समय हिन्दुओं का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन ‘हिन्दू महासभा’ था। जिसका नेतृत्व सवर्ण हिन्दुओं के हाथ में था। हिन्दू महासभा ने अगस्त, 1949 को अपने संयुक्त प्रांत के अधिवेशन में राम मंदिर बनाने का प्रस्ताव पारित किया। साथ ही कांग्रेस सरकार से अयोध्या, काशी और मथुरा को सोमनाथ मंदिर को रिक्लेम किया। उसके बाद ही बाबरी मस्जिद के अंदर अचानक श्रीराम की प्रतिमा प्रकट हुई। अयोध्या के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट के. के. नय्यर और सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह ने मस्जिद के अंदर प्रकट हुई मूर्ति को हटाने से इनकार कर दिया। नेहरू ने संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को अयोध्या भी भेजा, लेकिन वे फैसला बदल न सके।

     हिन्दू महासभा और करपात्री महाराज की राम-राज्य परिषद् अयोध्या में प्रमुख रूप से सक्रिय थे। करपात्री महाराज कांग्रेस द्वारा प्रस्तावित हिन्दू कोड बिल के खिलाफ जगह-जगह प्रचार किया। यहाँ तक कि 1952 ई. के लोकसभा चुनाव में नेहरू के खिलाफ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के रूप में अपना उम्मीदवार लड़ाया। जिसे 50 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। करपात्री जी बाद में अपनी राम-राज्य परिषद् को भारतीय जनसंघ में विलय कर दिया था। सन् 1950 से 1960 के दशक तक रामजन्म भूमि का मसला कानूनी दांव-पेच में उलझ रहा, राजनीति की मुख्य धारा से राममंदिर का का मुद्दा गौण ही रहा। इसी समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख गुरु गोलवलकर ने विश्व हिन्दू परिषद् (विहिप) की स्थापना की।

     राममन्दिर आंदोलन का उभार इमरजेंसी के बाद शुरू हुआ। जे.पी. के कांग्रेस हटाओ की मुहिम में भारतीय जनसंघ, हिन्दू महासभा ने शिरकत की। आम चुनाव में पहली बार गैर-कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार बनी। इंदिरा गाँधी ने तब हिन्दू संगठनों की ताकत को पहचाना। इस समय इंदिरा गाँधी ने अपनी हिन्दू पहचान को मजबूत किया और विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यक्रमों को मौन समर्थन देना शुरू किया। हिन्दू नेताओं के बीच इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी से ज्यादा लोकप्रिय थीं। विहिप ने दिल्ली में अप्रैल 1984 को धर्म संसद का आयोजन किया। जिसमें राममंदिर की भूमि को मुक्त कराने हेतु आंदोलन का सूत्रपात किया। भाजपा की तब राममंदिर से दूरी बनी रही। जबकि कांग्रेस के गुलजारीलाल नंदा ने विहिप की मुहिम का समर्थन किया था। यहाँ तक की अयोध्या में रामजन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति के संयोजक भी एक कांग्रेसी ही बने। इसी समय विहिप में अशोक सिंघल सक्रिय हुए थे। इंदिरा गाँधी की जब हत्या हुई, तो जितना दुखी कांग्रेसी थे उससे कम विहिप नेता नहीं थे।

     सन् 1984 के चुनाव में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला। भाजपा को मात्र दो लोकसभा सीट मिली। भाजपा के प्रमुख नेता अटल बिहारी वाजपेयी तब हिन्दुत्व से ज्यादा गाँधीवादी समाजवाद के पैरोकार थे। राजीव गांधी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। इसी बीच शहबानों केस में राजीव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के विरुद्ध जाकर मुसलमानों के पर्सनल लॉ के पक्ष में कानून बना दिया। जिससे कांग्रेस की मुस्लिम परस्त छवि मजबूत होने लगी और तुष्टीकरण का आरोप लगा। उधर रामजन्म भूमि के मसले पर 1986 ई. में अयोध्या के जिला जज ने विवादित ढांचे का ताला खोलने का आदेश दिया, जहाँ हिन्दू अब पूजा भी कर सकते थे। राजीव सरकार ने इसे हिन्दू संगठनों से जुड़ने के अवसर के रूप में देखा। अगस्त 1989 को राजीव सरकार विहिप को विवादित भूमि के पास ही राममंदिर शिलान्यास की इजाजत दे दी। इसका लाइव प्रसारण पूरे देश में भी हुआ था, हालांकि कांग्रेस ने खुलकर इसका क्रेडिट नहीं लिया। राममंदिर आंदोलन की बागडोर आर.एस.एस. और भाजपा के हाथ में हस्तांतरित होने लगी। 

     पिंगले पहले नेता थे, जिन्होंने आर.एस.एस. और विहिप को राममंदिर आंदोलन को लीड करने के लिए प्रेरित किया। पिंगले के समर्थन से और विहिप की अगुवाई में बजरंग दल और उसके संस्थापक विनय कटियार का कद बढ़ता गया। बजरंग दल ने अयोध्या आंदोलन में एक प्रभावी भूमिका निभायी। जबकि राममंदिर आंदोलन से भाजपा का आधिकारिक जुड़ाव सन् 1989 में हुआ। पार्टी के पालमपुर अधिवेशन में लालकृष्ण आडवाणी ने राममंदिर आंदोलन में शामिल होने का निश्चय किया, जबकि अटल जी और जसवंत सिंह ने अपनी असहमति दर्ज करवाई थी। इसका फायदा 1989 के चुनाव में भाजपा को मिला और उसे 86 सीटें मिली। लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन के लिये सोमनाथ से अयोध्या के लिए रामरथ यात्रा शुरू किया।

     अयोध्या की यात्रा में सन् 1990 का दशक बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। सन् 1989 में देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में भाजपा के समर्थन से संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी, जिसमें जनता दल के कई घटक और समाजवादी धड़े शामिल थे। इस सरकार में शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, देवीलाल, राम विलास पासवान, नीतीश कुमार जैसे पिछड़े वर्ग के नेताओं का काफी प्रभुत्व था, जिसके चलते विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लंबे समय से अटके मण्डल कमीशन को लागू कर दिया। देश में पिछड़े वर्ग की राजनीति का नया उभार हुआ। मण्डल आंदोलन के बढ़ने से भाजपा की हिंदूवादी राजनीति को झटका लगा। राम लहर के बावजूद उत्तर प्रदेश में  भाजपा की सरकार नहीं बनी। वहाँ सपा और बसपा के गठबंधन की सरकार बनी, मुलायम  सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। चुनाव के समय एक नारा बड़ा लोकप्रिय हुआ-“मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गये जयश्री राम।” भाजपा ने इन चुनौतियों से पार पाने के लिए राममंदिर हेतु रामरथ यात्रा सितंबर 1990 में शुरू किया। यात्रा के दिल्ली पहुचने पर अभूतपूर्व समर्थन मिला, जिससे भाजपा मंदिर आंदोलन के लिए और अधिक आश्वस्त हुई, और वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस लेने को सोचने लगी थी। इधर वीपी सिंह को भी आभास हो गया था। अक्टूबर 1990 को लालू सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार किया, इसकी प्रतिक्रिया पूरे देश में हिन्दू संगठनों ने किया और भाजपा का फैलाव ग्रामीण स्तर पर बढ़ गया। 

     आडवाणी की गिरफ़्तारी के बाद भाजपा और राममंदिर आंदोलन एकमय हो गया। भाजपा और आर.एस.एस. ने पूरे देश से हिन्दुओं के जुटने का आह्वान किया। इधर उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण तालाबंदी कर दिया। 30 अक्टूबर 1990 को विहिप के नेतृत्व में अयोध्या में जुटान हुआ। पुलिस की सख्त पहरेदारी के बावजूद कारसेवक मस्जिद की तरफ बढ़े, पुलिस और कारसेवकों से बीच झड़पें बढ़ीं। बाबरी मस्जिद के ऊपर झण्डा फहराया गया। कई कारसेवक मारे गए। भाजपा ने वी.पी. सिंह सरकर से अपना समर्थन वापस ले लिया।

    1991 ई. के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, लेकिन भाजपा ने भी 100 का आंकड़ा पार किया। कांग्रेस के पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। अयोध्या में भाजपा तथा आर.एस.एस. के संगठनों का जुटान बढ़ता ही जा रहा था। अयोध्या में देश भर से 2.86 लाख शिलाएँ पहुंची। श्री रामजन्म स्थली में पहली शिला को विहिप के एक दलित पदाधिकारी कामेश्वर चौपाल से रखवाया गया, इससे राममंदिर आंदोलन के अगुओं ने अन्य हिन्दुओं को भी एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की। 6 दिसंबर को भाजपा, आर.एस.एस. और विहिप ने अयोध्या में लगभग डेढ़ लाख लोगों का जुटान किया। लोगों की भीड़ बढ़ती चली गई और बाबरी मस्जिद के ढांचे को ढहा दिया गया। संयोग ही है कि 6 दिसंबर को दलितों के सबसे बड़े आइकान बाबा साहब आंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस भी मनाया जाता है। सन् 1528 में बनी बाबरी मस्जिद की बुनियाद को मटियामेट कर दी गई, लोगों ने मस्जिद के ढांचे पर कुल्हाड़ियों और हथौड़े से चोट की। बदलती अयोध्या ने पूरे देश को प्रभावित किया। देश में सांप्रदायिक दंगे शुरू हुए, दंगों में लगभग 2000 लोग मारे गए। सन् 1993 के मार्च महीने में मुंबई में सीरियल बम-धमाके हुए। जिनमें 350 से ज्यादा लोग मारे गए।

     प्रधानमंत्री राव पर ये आरोप लगते हैं कि उन्होंने समय रहते एक्शन नहीं लिया, जबकि राव खुद अयोध्या में मंदिर चाहते थे। उनका विचार अयोध्या को केंद्र शासित इकाई में बदलने का था और मंदिर बनने के लिए उन्होंने एक ट्रस्ट भी गठित किया था। जिससे दुबारा सरकार बनने पर राममंदिर बनायेंगे। इंदिरा गांधी से लेकर पी.वी. नरसिम्हाराव तक सभी अयोध्या में राममंदिर चाहते थे, लेकिन चुपके-चुपके।

     बाबरी मस्जिद के ढहने पर राव सरकार ने विवादित जगह पर ‘यथास्थिति’ बनाए रखने के लिये न्यायालय की शरण लिया। इसके बाद अयोध्या की लड़ाई कोर्ट में ही चलती रही।  जिसका पटाक्षेप वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के साथ हुआ। सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने बाबरी मस्जिद के ढहने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। कोर्ट ने सम्पूर्ण विवादित भूमि पर राममंदिर बनाने को कहा और केंद्र सरकार को इसके लिए 3 महीने में एक ट्रस्ट गठित करने को कहा। मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन आवंटित करने का आदेश दिया। केंद्र की मोदी सरकार ने अयोध्या पर आए इस फैसले को तुरंत लागू किया। राममंदिर हेतु ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण तेजी से शुरू हुआ। हालांकि मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हुआ। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई में 22 जनवरी 2024 को राममंदिर में श्री राम की प्राण-प्रतिष्ठा का आयोजन  सम्पन्न हुआ, जो एक राष्ट्रीय पर्व बन गया।  

     केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार ने पूरे देश को अयोध्यामय करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पहली बार स्टेट (धर्मनिरपेक्ष राज्य) और गवर्नमेंट के फासले मिटते दिखे। जहाँ नेहरू, इंदिरा, राजीव और पी.वी. नरसिम्हाराव ने धार्मिक मामलों पर कभी फ्रंट-फुट में नहीं खेला, वहीं अब की मोदी सरकार को इस बात का गर्व है कि मंदिर निर्माण उनके कार्यकाल में हुआ है। एक तरफ कांग्रेस में दिग्विजय सिंह जैसे कुछ नेता रामजन्म भूमि का ताला खुलवाने का श्रेय भी लेते रहे हैं, लेकिन प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को भाजपा की राजनैतिक परियोजना करार दिया। जबकि 1991 में आम चुनाव राममंदिर का मुद्दा कांग्रेस के घोषणा पत्र में था। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि भाजपा उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक सीटें जीतेगी।

    पिछले आम चुनाव में भाजपा ने ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा दिया। लेकिन भाजपा मात्र 240 सीटें पाकर बहुमत के आँकड़े से भी दूर रही। भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान उत्तर प्रदेश में हुआ। यहाँ भाजपा 62 सीटों से घटकर 33 पर आ गयी। भाजपा अयोध्या भी हार गयी, साथ ही रामायण धारावाहिक में श्री राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल मेरठ में बहुत मामूली अंतर से जीते। ऐसे में भाजपा को राममंदिर को पूर्ण करने पर राजनैतिक लाभ नहीं मिला और अयोध्या भी गवां बैठे।

     हाल ही में अयोध्या राममंदिर के लिये भूमि-खरीद और दान-गबन विवाद को लेकर पूरे देश में फिर से चर्चा में रहा। इन दोनों घटनाओं से पूरा देश स्तब्ध है, साथ ही भाजपा पर भी एक बड़ा राजनतिक दबाव है। 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद 5 फरवरी 2020 को केंद्र सरकार ने ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ का गठन किया। ट्रस्ट को मंदिर निर्माण, भूमि अधिग्रहण, दान प्रबंधन और परिसर के विकास की जिम्मेदारी दी गयी। 22 जनवरी 2024 को मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद श्रद्धालुओं की संख्या और दान, दोनों में तेजी से वृद्धि हुई। इसी दौरान वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर प्रश्न उठने लगे। वर्ष 2021 में विपक्षी दलों खासकर समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी सहित सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि मंदिर परिसर के विस्तार के लिए खरीदी गई कुछ जमीनें पहले कम कीमत पर खरीदी गईं, फिर थोड़े समय बाद ट्रस्ट को कई गुना अधिक कीमत पर बेची गईं। कुछ रजिस्ट्रियों में समान गवाहों की उपस्थिति ने संदेह पैदा किया। सबसे चर्चित उदाहरण लगभग ₹2 करोड़ में खरीदी गई भूमि का कुछ समय बाद लगभग ₹18.5 करोड़ में ट्रस्ट को बेचे जाने का था। हालांकि ट्रस्ट ने जवाब में कहा कि सभी खरीद कानूनी प्रक्रिया के अनुसार हुई है। भूमि का मूल्य, स्थान, भविष्य की परियोजनाओं और बाज़ार परिस्थितियों के अनुसार तय किया गया और किसी प्रकार का वित्तीय घोटाला नहीं हुआ।

      अयोध्या में दूसरा विवाद तब शुरू हुआ, जब जून 2026 में मंदिर की दान-गणना प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दान के मामले में हुई गड़बड़ी को लेकर बयान दिया। तब ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा उक्त ग़बन के आरोप से घिर गये। अयोध्या के राम मंदिर पर दान-गबन का मामला जनमानस के बीच पहुँच गया। अब उत्तर प्रदेश सरकार ने एक विशेष जाँच दल (SIT) गठित किया। प्रारंभिक जाँच में सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार लगभग 70 कथित चोरी की घटनाओं का उल्लेख है। कई अवसरों पर कर्मचारियों द्वारा नकदी निकालने के आरोप लगे, CCTV निगरानी और तलाशी व्यवस्था में गंभीर कमियाँ और दान कक्ष में सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन न होना आदि खामियाँ सामने आयी हैं। अब तक 8 लोगों की पुलिस गिरफ़्तारी हुई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रशासनिक लापरवाही की जाँच में कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों की भूमिका पर भी प्रश्न उठे। इसके बाद ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने पद छोड़ दिये। इसे लेकर अयोध्या के स्थानीय वकीलों ने चंपत राय और अनिल मिश्रा को अयोध्या छोड़ने के लिये एक बड़ा प्रदर्शन किया है। राममन्दिर आंदोलन से जुड़े भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विनय कटियार ने कहा है कि इस मामले में चपत राय की गिरफ़्तारी भी हो सकती है।

      अयोध्या और श्री राम अब किसको ‘राजनैतिक आशीर्वाद’ देंगे, यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन अयोध्या की परिक्रमा अब सभी राजनीतिक दलों को करनी पड़ रही है। राममंदिर अब अयोध्या को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।

डॉ. अनूप पटेल

सह-संपादक–करेंट एजेंडा, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक न्याय विमर्श के एक्सपर्ट

Email-: anoops.patel@gmail.com

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