मन की चौबीस खिड़कियाँ

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एक संगीतकार डॉक्टर के कमरे से बाहर निकल रहा है। वह अपनी बीवी की तरफ़ हाथ बढ़ाता है। इसके बजाए कि वह बीवी का हाथ अपने हाथ में ले। वह अपनी बीवी को उठा कर अपने सर पर रखने की कोशिश करता है, टोपी समझ कर। यह कोई चुटकुला नहीं! यह एक वास्तविक घटना है। एक मरीज़ की कहानी है। यह कहानी इसलिए बताई जा रही है कि दिमाग़ जब किसी एक जगह से टूट जाता है, तो इंसान की पूरी दुनिया, चेहरे, चीज़ें, शरीर, उसका अतीत सब कुछ ग़ायब हो सकता है। इंसान फिर भी जीता रहता है, कोई नया रास्ता ढूंढ लेता है, कोई नई दुनिया बना लेता है। लेकिन, इतना तय है कि वह अब पहले जैसा नहीं रहता।

      प्रख्यात न्यूरोलॉजिस्ट डॉ ओलिवर सैक्स ने 1985 ई. में एक किताब ‘द मैन हू मिस्टूक हिज़ वाइफ़ फ़ॉर ए हैट’ लिखी। यह दुनिया की सबसे लोकप्रिय और चर्चित पुस्तकों में से एक है। इस किताब में चौबीस मरीज़ों की कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ मन और मस्तिष्क की जटिल गुत्थियों को टटोलती हैं। वे हमें दिमाग़ के उन चौबीस दरवाज़ों तक ले जाती हैं, जो उसकी अथाह गहराइयों में खुलते हैं– ऐसी जगहों तक, जहाँ हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कभी नहीं पहुँचते, न ही जिन पर ठहरकर विचार करते हैं।

     न्यूयॉर्क टाइम्स ने डॉ ओलिवर सैक्स को ‘द पोएट लॉरिएट ऑफ़ मेडिसिन’ यानी ‘चिकित्सा का कवि’ कहा है। उनकी यह किताब पढ़ते हुए समझ में आता है कि यह उपाधि उन्हें यूँ ही नहीं मिली। ओलिवर के लिए उनका मरीज़ महज़ एक ‘केस’ नहीं होता था। वे हर मरीज़ में एक इंसान को देखते थे। ऐसा इंसान, जो अपनी दुनिया बिखर जाने के बाद भी जीने का कोई अर्थ, कोई रास्ता और कोई नई दुनिया तलाशता रहता है।

       ओलिवर सैक्स का जन्म 1933 ई. में लंदन में एक ऐसे परिवार में हुआ, जहाँ माता और पिता दोनों ही डॉक्टर थे। उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड से 1958 ई. में मेडिकल डिग्री हासिल किया । इसके बाद वे अमेरिका चले गए। वहाँ उन्होंने पहले सैन फ़्रांसिस्को के माउंट ज़ायन अस्पताल में और फिर कोलंबिया विश्वविद्यालय में न्यूरोलॉजी और न्यूरो-पैथोलॉजी में अपनी रेज़िडेंसी पूरी की।

       ओलिवर सैक्स केवल एक मनोचिकित्सक ही नहीं, बल्कि एक विलक्षण लेखक भी थे। उनका विश्वास था कि विज्ञान, विशेषकर मानसिक चिकित्सा की, जटिल खोजों को कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इससे वे आम लोगों के लिए अधिक सहज, समझने योग्य और लोकप्रिय बन सकेंगी। उनका मानना था कि विज्ञान की सच्चाइयों को यदि रोचक ढंग से लोगों तक पहुँचाया जाए, तो समाज में वैज्ञानिक दृष्टि विकसित होगी।

      उनका काम करने का तरीक़ा भी परंपरा से हटकर था। जहाँ दूसरे डॉक्टर मरीज़ की फ़ाइल पढ़ते थे, वहीं ओलिवर मरीज़ की ज़िंदगी पढ़ते थे। वे घंटों उनसे बातचीत करते, उनके घर जाते, उनके साथ संगीत सुनते और उनकी कलाकृतियाँ देखते। उनके लिए बीमारी महज़ शरीर या मस्तिष्क की कोई ख़राबी नहीं थी। वह एक ऐसा आईना था, जो यह दिखाता है कि जब दिमाग़ का कोई हिस्सा काम करना बंद कर देता है, तो शेष मस्तिष्क उस कमी की भरपाई कैसे करता है। यही प्रश्न उनकी इस पुस्तक की आत्मा है।

      यह किताब चार भागों में विभाजित है। हर भाग मस्तिष्क की एक विशिष्ट अवस्था और उसके अनुभवों को सामने लाता है। पहला भाग ‘लॉसेस’ है। इसमें ऐसी कहानियाँ हैं, जो दिखाती हैं कि जब दिमाग़ का कोई हिस्सा काम करना बंद कर देता है तो क्या होता है। इंसान की दुनिया किस तरह बदल जाती है। दूसरा भाग ‘इक्सेज़’ यानी ज़्यादतियाँ है। इसकी कहानियाँ उन स्थितियों को सामने लाती हैं, जब मस्तिष्क की क्षमता असामान्य रूप से बढ़ जाती है। और उसका असर व्यक्ति के व्यवहार तथा अनुभवों पर पड़ता है। तीसरा भाग ‘ट्रांसपोर्ट्स’ यानी सफ़र। यह उन अनुभवों का संसार है, जब मस्तिष्क व्यक्ति को ऐसी दुनिया में ले जाता है, जो बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद होती है। चौथा और अंतिम भाग ‘द वर्ल्ड ऑफ़ द सिंपल’ है। इसमें उन लोगों की कहानियाँ हैं, जिन्हें समाज अक्सर ‘कमअक़्ल’ या ‘बौड़म’ समझ लेता है। लेकिन ओलिवर दिखाते हैं कि इन्हीं लोगों के भीतर असाधारण प्रतिभाएँ और मानवीय संवेदनाएँ छिपी हो सकती हैं। आइए, अब इन चारों भागों की कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण और चौंका देने वाली कहानियों पर नज़र डालते हैं।

      किताब के पहले भाग की पहली कहानी डॉ. ‘पी’ की है। यह वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी को टोपी समझ लिया था। डॉ. पी एक प्रसिद्ध संगीतकार, कुशल संगीत शिक्षक और अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति थे। लेकिन धीरे-धीरे उनके साथ एक विचित्र समस्या होने लगी। वे चीज़ों को पहचानने की क्षमता खोने लगे। कभी  फूल को वे ‘लाल रंग की गोल चीज़’ कहकर वर्णित करते। तो कभी अपने शागिर्दों के चेहरे पहचानने के बजाय उनका ध्यान केवल बालों, कानों या किसी एक विशेष अंग पर टिक जाता। जब डॉ. ओलिवर सैक्स ने उनका परीक्षण किया, तो एक हैरान करने वाली बात सामने आई। डॉ. पी वस्तुओं के अलग-अलग गुण और विवरण तो देख सकते थे, लेकिन पूरी चीज़ को समग्रता में नहीं पहचान सकते थे। मानो उनकी दृष्टि पूरी तस्वीर के बजाय उसके बिखरे हुए टुकड़ों तक ही सीमित रह गई हो। वस्तुओं को समग्रता में ग्रहण करने की उनकी क्षमता समाप्त हो चुकी थी। इस अवस्था को ‘विश्ज़ुअल एग्नोसिया’ कहा जाता है। इसमें मस्तिष्क का वह हिस्सा, जो आँखों से प्राप्त सूचनाओं को जोड़कर एक अर्थपूर्ण और संपूर्ण छवि बनाता है, ठीक से काम नहीं करता। परिणामस्वरूप व्यक्ति देख तो सकता है, लेकिन जो देख रहा है, उसे पहचान नहीं पाता।

      ज़ाहिर तौर पर देखने से ऐसा लगता था कि डॉ. पी पूरी तरह सामान्य हैं। वे संगीत का आनंद लेते, गाते-बजाते और लोगों से सहजता से बातचीत करते थे। लेकिन उनके लिए चेहरों की दुनिया जैसे ग़ायब हो चुकी थी। जिस दिन वे कमरे से बाहर निकलते हुए अपनी पत्नी के हाथ को टोपी समझ बैठे, वह घटना न्यूरोलॉजी के इतिहास की सबसे विचित्र और चौंका देने वाली घटनाओं में से एक बन गयी। डॉ. ओलिवर के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि ऐसी स्थिति में डॉ. पी अपना जीवन कैसे जी पा रहे थे। इसका उत्तर था– संगीत। वे लगभग हर काम गुनगुनाते हुए करते थे। कपड़े पहनते समय भी गाते, भोजन की मेज़ तक भी गीतों की लय के सहारे पहुँचते। संगीत उनका जीपीएस बन गया था। जब आँख नाकाम हो गई तो कान ने ज़िंदगी संभाल ली। दिमाग़ टूटता है तो बाक़ी दिमाग़ नए रास्ते ढूँढ लेता है। यही दिमाग़ की सबसे बड़ी ताक़त है। अनुकूलन और पुनर्संगठन की यही क्षमता मानव मस्तिष्क की सबसे बड़ी शक्ति है।

     दूसरी कहानी उस आदमी की है, जिसकी याददाश्त मानो 1945 ई. पर आकर ठहर गई थी। जिमी जी सन् 1945 में अमेरिकी नौसेना के एक युवा नाविक थे। वे खुशमिज़ाज, बुद्धिमान और मिलनसार इंसान थे। ओलिवर ने उन्हें 1975 ई. में देखा। उस समय जिमी उनचास वर्ष के थे, लेकिन वे स्वयं को अब भी उन्नीस साल का ही समझते थे। उनके लिए समय सन् 1945 के बाद जैसे आगे बढ़ा ही नहीं था। उन्हें लगता था कि द्वितीय विश्वयुद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है, राष्ट्रपति अब भी रूज़वेल्ट हैं और वे नौसेना में अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। उनके मन में वर्तमान का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं था। जब ओलिवर ने उन्हें आईना दिखाया तो जिमी ‘यह मैं नहीं!’ कहकर चीख़ उठे। क्योंकि उसमें उन्होंने एक उन्नीस वर्षीय युवक के बजाय अधेड़ उम्र के व्यक्ति का चेहरा देखा। लेकिन सबसे विचित्र बात यह थी कि कुछ ही क्षणों बाद वे यह भी भूल गए कि उन्होंने कभी आईना देखा था।

     जिमी ‘कॉर्साकॉफ़ सिंड्रोम’ से पीड़ित थे। इस बीमारी में दिमाग़ नई यादें बनाना लगभग बंद कर देता है। हर लम्हा नया लम्हा, हर मुलाक़ात पहली मुलाक़ात होती है। जिमी हर रोज़ ओलिवर से ऐसे मिलते, मानो उनसे पहली बार मिल रहे हों। फिर भी एक ऐसी जगह थी, जहाँ जिमी बिखरते नहीं थे– वह थी चर्च की प्रार्थना। जब वे प्रार्थना में शामिल होते, तो उनके चेहरे पर एक गहरा सुकून उतर आता। उन क्षणों में वे विचलित या भटके हुए नहीं लगते थे। ओलिवर ने लिखा है– ‘जिमी ऐसे क्षणों में कोई और ही होते थे। न अतीत में, न भविष्य में, बस उसी वर्तमान क्षण में।’ रूहानियत ने वह किया जो दवाई नहीं कर सकी। आध्यात्मिकता ने जिमी को अपना बना लिया। प्रार्थना के उन क्षणों में उन्हें एक ऐसी स्थिरता और आत्मीयता मिलती थी, जो उनकी बीमारी भी उनसे छीन नहीं सकी।

     किताब की इक्कीसवीं कहानी उस लड़की की है, जिसे दुनिया ने बेकार मान लिया था। रेबेका उन्नीस साल की थी। उसका आईक्यू स्तर बहुत कम था। वह साधारण काम भी नहीं कर पाती थी– जूते के फीते बाँधना, चाबी से ताला खोलना या रास्ता पहचानना उसके लिए कठिन था। जब ओलिवर ने उसे पहली बार देखा, तो उन्हें भी लगा कि उसकी सीमाएँ बहुत स्पष्ट हैं। लेकिन एक दिन उन्होंने उसे बाग़ में देखा। बसंत का मौसम था, फूल खिले हुए थे। रेबेका एक दरख़्त के नीचे बैठी, कुछ देख रही थी। कुछ महसूस कर रही थी। उसके चेहरे पर एक ऐसा सुकून था, जो किसी आईक्यू टेस्ट की परिभाषाओं में नहीं समाता।

      जब ओलिवर ने उससे बात की, तो रेबेका ने कहा– ‘मैं जानती हूँ कि मुझमें ‘ख़राबी’ है। मैं एक बेकार ‘चीज़’ हूँ। लेकिन जब मैं कहानियाँ पढ़ती हूँ, जब मैं प्रकृति को देखती हूँ, तो मैं पूरी हो जाती हूँ।’ ओलिवर का नतीजा था कि लोगों ने रेबेका को उसकी कमज़ोरियों से जाना। लेकिन, उसकी ताक़त वहाँ थी, जहाँ कोई आईक्यू टेस्ट पहुँच ही नहीं सकता। वह एक ऐसे अनुभव की दुनिया में जी सकती थी, जो मापी नहीं जा सकती। रेबेका ने ओलिवर से मिलने के बाद, थियेटर ग्रुप ज्वाइन किया, स्टेज पर उसने बेहतरीन परफॉर्मेंस दिया। वह रोज़मर्रा की ज़िंदगी के कुछ साधारण काम भले ही नहीं कर पाती थी, लेकिन अभिव्यक्ति और अभिनय की दुनिया में उसने वह कर दिखाया, जो उससे कोई उम्मीद नहीं करता था।

      पुस्तक की दसवीं कहानी एक ऐसे संगीतकार की है, जो ‘टौरेट सिंड्रोम’ के साथ जीता है और उसे पूरी तरह मिटाना नहीं चाहता। टिकी रे एक प्रतिभाशाली ड्रमर था, लेकिन उसके जीवन में टौरेट सिंड्रोम भी शामिल था। कभी-कभी उसका शरीर अचानक झटके लेने लगता, और उसके मुँह से अनचाहे, अनैच्छिक शब्द और आवाज़ें निकल पड़तीं– ऐसे शब्द भी, जिन्हें वह कहना नहीं चाहता था। डॉ. ओलिवर ने उसे दवाएँ दीं, जिससे टौरेट के लक्षण काफ़ी हद तक नियंत्रित हो गए। लगभग नौ वर्षों तक टिकी रे सामान्य जीवन जीता रहा। लेकिन फिर वह वापस आया और बोला कि वह दवाएँ छोड़ना चाहता है। कारण सुनकर ओलिवर भी चकित रह गए। टिकी रे ने कहा- ‘टौरेट के साथ मेरा ड्रम बजाना अलग होता है। उसमें एक सहजता है, जो दवाओं के साथ नहीं आती। इन झटकों में एक ऊर्जा है, एक रचनात्मकता है, जो दवाएँ ले लेने पर खो जाती है।’ टिकी रे ने एक अजीब फ़ैसला लिया– सप्ताह में पाँच दिन दवाई लेगा, सप्ताहांत बग़ैर दवाई के गुज़ारेगा। काम के दिनों में वह ‘सामान्य’ टिकी रे रहता, जबकि संगीत के दिनों में वह अपने टौरेट के साथ पूरी तरह जुड़ जाता।

      डॉ. ओलिवर सैक्स ने यहाँ वह सवाल उठाया, जो पूरी किताब का बुनियादी विचार या मुख्य तर्क है– क्या बिमारी हमेशा बुराई है? या अक्सर वह चीज़ जिसे हम ‘ख़राबी’ कहते हैं, उसमें कोई छिपी हुई ताक़त होती है? टिकी रे का जवाब सीधा था– उसकी बीमारी उससे अलग नहीं थी, वह उसका ही हिस्सा थी। और उसे पूरी तरह मिटा देने का मतलब शायद उसे, उसकी पूरी रचनात्मकता सहित, मिटा देना होता।

     पुस्तक के तेईसवें अध्याय में जुड़वाँ भाइयों की कहानी है। मार्टिन और माइकल जुड़वाँ थे, जिन्हें दुनिया ने ‘ऑटिस्टिक’, ‘साइकोटिक’ और ‘गंभीर रूप से मानसिक विकलांग’ माना था। वे रोज़मर्रा के आसान काम नहीं कर पाते थे, बहुत कम बोलते थे और सामाजिक जीवन में घुलमिल नहीं पाते थे। लेकिन एक दिन ओलिवर ने एक अजीब दृश्य देखा। दोनों भाई धीरे-धीरे संख्याएँ गिन रहे थे और फिर एक-दूसरे को बहुत बड़ी संख्याएँ सुनाकर मुस्कुरा रहे थे। ध्यान देने पर पता चला कि ये साधारण संख्याएँ नहीं थीं, बल्कि अभाज्य संख्याएँ थीं। ओलिवर ने एक पुस्तक मँगवाई और एक छह-अंकों की अभाज्य संख्या ज़ोर से बोली। दोनों भाई कुछ क्षण शांत रहे, फिर मुस्कुराए और उससे भी बड़ी अभाज्य संख्याएँ बोलने लगे। यह कोई सामान्य बातचीत नहीं थी– यह उनका खेल था, उनकी भाषा थी, और किसी अर्थ में उनका संगीत भी। यह अनुभव दिखाता है कि मस्तिष्क की एक सीमा, दूसरी असाधारण क्षमताओं को जन्म दे सकती है। जहाँ एक ओर दुनिया उन्हें ‘अक्षम’ मानती थी, वहीं दूसरी ओर वे ऐसी गणनाएँ कर रहे थे, जो सामान्य बुद्धि या किसी कैलकुलेटर की भी पहुँच से परे थीं।

     ये पाँचों कहानियाँ और किताब की बाकी उन्नीस कहानियाँ एक ही बात की ओर इशारा करती हैं। दिमाग़ महज़ एक मशीन नहीं, जिसका एक पुर्ज़ा निकाल लो और बाक़ी पहले जैसी चलती रहे। यह एक जीवित और जटिल व्यवस्था है। जब इसमें कोई बाधा आती है, तो यह केवल टूटता नहीं, बल्कि नए रास्ते भी गढ़ता है। जहाँ कुछ क्षमताएँ खो जाती हैं, वहाँ दूसरी क्षमताएँ विकसित हो सकती हैं; जहाँ कुछ कमज़ोर पड़ता है, वहाँ कुछ और मज़बूत हो सकता है। यह संतुलन लगातार बदलता रहता है। और इस पूरी प्रक्रिया में वह शख़्स जिसका यह दिमाग़ है, अपनी पूरी शख़्सियत के साथ मौजूद रहता है। बदलते हुए भी, टूटते हुए भी, और फिर भी किसी न किसी रूप में पूर्णता की तलाश करता हुआ।

      ओलिवर की अपने पेशे से सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि न्यूरोलॉजी अक्सर ‘ख़राबी’ को देखने तक सीमित रह जाती है। उनका कहना था– ‘हमें सिर्फ़ यह नहीं देखना चाहिए कि क्या टूट गया है, बल्कि यह भी कि क्या बचा है, क्या बढ़ गया है और क्या नया विकसित हुआ है।’ उनकी प्रस्तुत कहानियों में यह दृष्टि लगातार दिखाई देती है। डॉ. पी संगीत के सहारे जीवित रहे। जिमी जी ने प्रार्थना के अनुभव में स्थिरता पाई। रेबेका कहानियों और रंगमंच में स्वयं को पूर्ण करती हैं। टिकी रे ने अपनी बीमारी को रचनात्मक ऊर्जा में बदल लिया। जुड़वाँ भाइयों ने संख्याओं को अपनी भाषा और अपने खेल में ढाल लिया। इन सभी उदाहरणों के माध्यम से ओलिवर सैक्स यह संदेश देते हैं कि मानसिक भिन्नताओं या विकारों को केवल कमी या असामान्यता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। समाज अक्सर ऐसी स्थितियों को शर्म, कलंक और अलगाव के रूप में देखता है। उन्हें छिपाने या नकारने की प्रवृत्ति अपनाता है। ओलिवर कहते हैं– “जब आप किसी को सिर्फ़ उसकी बीमारी से पहचानते हैं, तो आप उसे एक इंसान के रूप में देखना बंद कर देते हैं। और जब इंसान को देखना बंद कर दिया जाए, तो इलाज भी मुमकिन नहीं रहता। बीमारी एक कमी नहीं। कभी-कभी दिमाग़ का एक रास्ता बंद हो तो दूसरा खुल जाता है। वह रास्ता जो पहले कभी नहीं खुला था।” वही नया रास्ता व्यक्ति की एक अलग क्षमता, एक अलग पहचान को जन्म दे सकता है।

      जब हम किसी को ‘विकलांग’ कहकर अलग कर देते हैं, तो हम अक्सर उसकी छिपी हुई क्षमताओं को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं। दिमाग़ वह नहीं है, जैसा हम आमतौर पर सोचते हैं। हम इसे एक कंप्यूटर या मशीन की तरह समझ लेते हैं कि एक पुर्जा ख़राब हुआ तो पूरा सिस्टम बंद! लेकिन ओलिवर ने दिखाया कि दिमाग़ एक जटिल इकोसिस्टम है, जहाँ हर हिस्सा दूसरे हिस्से से गहराई से जुड़ा हुआ है। डॉ. पी के मामले में आँखें पूरी तरह ठीक थीं, लेकिन दिमाग़ में देखने और पहचानने के बीच का संबंध टूट गया था। यानी समस्या आँखों में नहीं थी, बल्कि उस जगह थी जहाँ दृश्य जानकारी को अर्थ और पहचान में बदला जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कई बार ‘ख़राबी’ वहाँ नहीं होती, जहाँ वह दिखाई देती है। असल गड़बड़ी दिमाग़ के उन सूक्ष्म संबंधों में होती है, जो हमें दुनिया को एक साथ जोड़कर समझने में मदद करते हैं।      आख़िर में डॉक्टर ओलिवर सैक्स कहते हैं- ‘हर मरीज़ एक दास्तान है। उस इंसान की, जो अपनी बीमारी से गुज़रते हुए किसी न किसी रूप में आगे बढ़ने और स्वयं को पुनः खोजने की कोशिश कर रहा है।’ ओलिवर की कहानियों ने उन लोगों को आवाज़ दी है, जिन्हें समाज अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है। उन्होंने यह दिखाया कि हर ‘केस’ के पीछे एक पूरा इंसान होता है। उसकी स्मृतियाँ, उसका अनुभव और उसकी अपनी अनोखी दुनिया। डॉ. ओलिवर सैक्स की लेखनी ने मनोचिकित्सा को अधिक मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण से देखने की दिशा में गहरा प्रभाव डाला है।

आतिफ रब्बानी

csrdian@gmail.com

असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ. भीमराव अम्बेडकर बिहार यूनिवर्सिटी, मुजफ्फरपुर

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