अमेरिका ईरान में सीधे दखल देने मे असफल क्यों?

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ईरान में सीधे अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप की संभावना , आज के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सबसे अहम रणनीतिक दुविधाओं में से एक बनी हुई है. अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, वेनेजुएला में पिछले अमेरिकी हस्तक्षेपों, या ISIS और अल-कायदा के खिलाफ आतंकवाद-रोधी अभियानों के विपरीत, ईरान डटकर खड़ा है. ईरान कोई बिखरा हुआ विद्रोह, कोई उग्रवादी आंदोलन, या कोई ढहता हुआ देश नहीं है, बल्कि यह एक संप्रभु क्षेत्रीय शक्ति है जिसने तीन दशकों से भी ज़्यादा समय, ‘फॉरवर्ड डिफेंस’ (आगे बढ़कर बचाव), रणनीतिक मजबूती  और ‘प्रॉक्सी-आधारित प्रतिरोध’ के सिद्धांत को संस्थागत रूप दिया है. अमेरिका ऐतिहासिक रूप से दूर-दराज के इलाकों में युद्ध (expeditionary warfare), सटीक हमले, नौसैनिक वर्चस्व, हवाई श्रेष्ठता और आतंकवाद-रोधी अभियानों में माहिर रहा है.  ईरान की सैन्य स्किल  पूरी तरह से एक अलग दिशा में विकसित हुई है. तेहरान का सुरक्षा सिद्धांत सहनशक्ति, अस्वीकार्यता (deniability), रणनीतिक धैर्य, कई स्तरों पर जवाबी कार्रवाई और पारस्परिक संघर्ष को देश के बाहर ले जाने पर आधारित है. बेहतर सैन्य शक्ति वाले विरोधियों का आमने-सामने के युद्ध में मुकाबला करने के बजाय, ईरान ने एक ऐसा तंत्र विकसित किया है जो टकराव को कई क्षेत्रीय मोर्चों पर फैला देता है. अमेरिका की हिचकिचाहट का मुख्य कारण यह है कि ईरान ने 35 वर्षों के क्षेत्रीय संघर्ष को प्रतिरोध के एक मज़बूत तंत्र में बदल दिया है. इराक, सीरिया, लेबनान, यमन, गाजा, होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर, ये सभी मिलकर ईरान की रणनीतिक योजना में आपस में जुड़े हुए मोर्चों के रूप में काम करते हैं. नतीजतन, ईरान में सीधे हस्तक्षेप निश्चित रूप से एक द्विपक्षीय संघर्ष तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध बन जाएगा।

ईरान के सुरक्षा सिद्धांत का ऐतिहासिक विकास

ईरान की आज की रणनीतिक स्थिति,  वर्ष 1980-1988 के ईरान-इराक युद्ध से मिले सबक मे निहित है. उस संघर्ष ने तेहरान की सैन्य सोच को बहुत गहराई से प्रभावित किया, क्योंकि इसने पारंपरिक कमज़ोरियों, कूटनीतिक अलगाव और तकनीकी रूप से पीछे होने के खतरों को उजागर किया था. ईरान धीरे-धीरे एक ऐसे सिद्धांत की ओर बढ़ा जो ‘अ-सममित लचीलेपन’ (asymmetric resilience) पर केंद्रित था. इस बदलाव की संस्थागत रीढ़ के रूप में IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) उभरा. पारंपरिक सशस्त्र बलों के विपरीत, IRGC को न केवल देश की सीमाओं की रक्षा का काम सौंपा गया था, बल्कि उसे वैचारिक सुरक्षा, बाहरी प्रभाव वाले अभियानों और क्रांतिकारी रणनीतिक नेटवर्क के विस्तार का काम भी सौंपा गया था. समय के साथ  ‘कुद्स फोर्स’ वह मुख्य माध्यम बन गई जिसके ज़रिये  ईरान विदेशों में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता था. इस विकास से कई रणनीतिक फ्रंटों का उदय हुआ: प्रॉक्सी युद्ध, मिसाइल-आधारित प्रतिरोध, साइबर सुरक्षा, समुद्री गतिविधियों में बाधा डालना और कमज़ोर देशों के भीतर राजनीतिक प्रभाव जमाना. ये फ्रन्ट अब ईरान की व्यापक क्षेत्रीय रणनीति को परिभाषित करते हैं, कि क्यों यह अमेरिका के पिछले सैन्य प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में एक मजबूत चुनौती प्रस्तुत करता है।

इराक: ईरानी रणनीतिक गहराई का आधारभूत मंच

अमेरिका के नेतृत्व में सन 2003 मे इराक पर हुए आक्रमण ने ही ईरान के क्षेत्रीय विस्तार के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवसर पैदा कर दिया. अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाकर ईरान के मुख्य अरब प्रतिद्वंद्वी को खत्म कर दिया और इराक की उस संस्थागत व्यवस्था को तोड़ दिया, जिसने ऐतिहासिक रूप से ईरानी प्रभाव को संतुलित रखा था. ईरान ने इराक के शिया राजनीतिक अभिजात्य वर्ग, धार्मिक संस्थानों, मिलिशिया नेताओं और उभरती अर्धसैनिक संरचनाओं के साथ गहरे संबंध बनाने के लिए तेजी से कदम बढ़ाए. ये संबंध समय के साथ एक सुगठित राजनीतिक-सुरक्षा तंत्र में विकसित हो गए, जिसमें चुनावी संस्थानों, सशस्त्र संगठनों और इराक की राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना के विभिन्न हिस्सों में ईरानी प्रभाव गहराई तक जम गया. इराक, ईरान के लिये मिलिशिया एकीकरण, राज्य में पैठ बनाने, हाइब्रिड युद्ध और राजनीतिक इंजीनियरिंग का दीर्घकालिक अनुभव प्रदान करने वाला साबित हुआ. अब ईरान संप्रभु राज्यों को औपचारिक रूप से अपने कब्जे में लिए बिना ही उन पर प्रभाव डालने का एक मॉडल विकसित करने का अवसर भी दिया. संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए  इराक लंबे समय तक चलने वाले विद्रोह-विरोधी अभियानों और राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियों का पर्याय बन गया, वहीं ईरान के लिए यह एक रणनीतिक प्रयोगशाला बन गया

सीरिया और थल-गलियारे की सुरक्षा

सीरियाई गृहयुद्ध ने ईरान की क्षेत्रीय सैन्य शिक्षा और अनुभव में एक निर्णायक मोड़ का काम किया. सीरिया की असद सरकार, तेहरान की रणनीतिक निरंतरता के केंद्र में थी, जो ईरान से शुरू होकर इराक और सीरिया के रास्ते लेबनान तक फैली हुई थी. सीरिया में ईरान के हस्तक्षेप में सैन्य परामर्श, रसद (लॉजिस्टिक्स), मिलिशिया लामबंदी, खुफिया जानकारी का एकीकरण, और हिजबुल्लाह तथा रूस दोनों के साथ गठबंधन प्रबंधन जैसे तत्व शामिल थे. यह केवल एक ‘प्रॉक्सी’ (छद्म) अभियान मात्र नहीं था बल्कि यह  सैन्य दबाव के बावजूद अपने सहयोगी असद के शासन को बचाये रखने का एक ठोस प्रयास था. सीरियाई युद्ध ने शहरी युद्ध, सीमा-पार मिलिशिया समन्वय, प्रतिबंधों के बावजूद रसद प्रबंधन, सहयोगी सेनाओं के साथ हवाई-जमीनी समन्वय, और दीर्घकालिक गठबंधन युद्ध-कौशल के क्षेत्र में ईरान की विशेषज्ञता को और बढ़ाया. इसने तेहरान की उस क्षमता को भी सुदृढ़ किया, जिसके बल पर वह भूमध्य सागर तक जाने वाले अपने निरंतर रणनीतिक गलियारे को सुरक्षित बनाए रख सके. यह ‘थल-सेतु’ (लैंड ब्रिज) उन सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक है जिसकी वजह से अमेरिका को ईरान के साथ किसी भी संभावित टकराव के क्षेत्रीय दुष्परिणामों पर गंभीरता से विचार करना पड़ता है।

लेबनान और हिज़्बुल्लाह का सरंक्षण

ईरान का सबसे सफल बाह्य रणनीतिक मॉडल लेबनान ही रहा है. हिज़्बुल्लाह गैर-राज्यीय संगठन जो राज्य के शासन और सुरक्षा परिवेश में समाहित एक गहन संस्थागत राजनीतिक-सैन्य संगठन के रूप में विकसित हुआ. हिज़्बुल्लाह के माध्यम से, ईरान ने इज़राइल के विरुद्ध एक स्थायी निवारक मोर्चा, लेवांट  में खुफिया पहुँच, मिसाइल तैनाती की व्यापकता और क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच प्रतीकात्मक वैधता प्राप्त की. हिज़्बुल्लाह ने इज़राइल के साथ बार-बार होने वाले संघर्षों के दौरान ईरान के रणनीतिक स्थायित्व के सिद्धांत की उपयोगिता को भी प्रदर्शित किया. लेबनानी मॉडल ने साबित किया कि तेहरान न केवल सशस्त्र सहयोगी बना सकता है, बल्कि टिकाऊ दीर्घकालिक संस्थाएयें भी बना सकता है जो सैन्य दबाव, राजनीतिक संकट और आर्थिक झटकों का सामना करने में सक्षम हों।

यमन और समुद्री युद्ध का भू-आर्थिक पहलू

यमन ने ईरान के रणनीतिक सिद्धांत का समुद्री और भू-आर्थिक क्षेत्रों में विस्तार किया. हौथी आंदोलन को समर्थन दिया था. हौथी आंदोलन यमन का एक शिया जैदी विद्रोही समूह है, जो 1990 के दशक से सक्रिय है और अब उत्तरी यमन पर नियंत्रण रखता है. यह धार्मिक, राजनीतिक और सैन्य संघर्ष का केंद्र है.  तेहरान ने हौथी के समर्थन से बाब अल-मंडेब चोकपॉइंट के पास प्रभाव हासिल किया और लाल सागर में जहाजरानी पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डाला. यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संघर्ष के तर्क में आर्थिक दबाव को शामिल करता है. जहाजरानी मार्गों में  बीमा प्रीमियम, व्यापार के मार्ग परिवर्तन, तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को तेजी से प्रभावित कर सकता है।

अतः अमेरिका-ईरान युद्ध का न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा पर बल्कि वैश्विक व्यापार पर भी तत्काल प्रभाव पड़ेगा. यह समुद्री परत तनाव बढ़ने की लागत को काफी बढ़ा देती है।

गाजा और राजनयिक युद्धक्षेत्र का विस्तार

गाजा में ईरान के द्वारा समर्थित नेटवर्क इजरायल-फिलिस्तीनी क्षेत्र में अग्रिम रक्षा दल के रूप मे काम करता रहा है. गाजा का महत्व केवल सैन्य टकराव में ही नहीं, बल्कि अरब-इजरायल सामान्यीकरण की राजनयिक दिशा को प्रभावित करने की उसकी क्षमता में भी निहित है. गाजा से जुड़े तनाव अक्सर खाड़ी सरकारों पर घरेलू और क्षेत्रीय राजनीतिक दबाव डालते हैं, जिससे अमेरिका समर्थित गतिविधियों की गति धीमी हो जाती है. इस लिहाज से ईरान की गाजा रणनीति सैन्य दबाव और कूटनीतिक व्यवधान दोनों के रूप में काम करती है. यह तेहरान के क्षेत्रीय युद्ध सिद्धांत की बहुआयामी प्रकृति को दर्शाता है, जहां युद्धक्षेत्र की घटनाओं का उपयोग कूटनीतिक गठबंधनों को नया रूप देने के लिए किया जाता है।

खाड़ी, होर्मुज स्ट्रेट और ऊर्जा प्रतिरोध

होर्मुज स्ट्रेट ईरान के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभप्रद ठिकानों में से एक बना हुआ है. वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इस संकरे मार्ग से होकर गुजरता है, जिससे तेहरान को अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव प्राप्त होता है. खाड़ी में ईरान की नौसैनिक रणनीति झुंड में हमला करने की रणनीति, तीव्र आक्रमणकारी नौकाओं, मिसाइल नौकाओं, नौसैनिक खदानों, ड्रोनों और तटीय जहाज-रोधी मिसाइल प्रणालियों पर केंद्रित है. यह समुद्री रणनीति विशेष रूप से अमेरिकी नौसैनिक प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए बनाई गई है. वाशिंगटन के लिए, इसका अर्थ है कि ईरान में हस्तक्षेप वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता से अलग नहीं किया जा सकता है. यहां तक कि अस्थायी व्यवधान भी महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक और आर्थिक परिणाम उत्पन्न करेंगे।

ईरान के मिसाइल शहर, भूमिगत अवसंरचना और रणनीतिक अस्तित्व

ईरान के अन्य अमेरिकी विरोधी देशों से अलग होने का एक प्रमुख कारण इसकी गहराई से विकेंद्रीकृत और मजबूत सैन्य अवसंरचना है. भूमिगत मिसाइल शहर, पर्वत-आधारित प्रक्षेपण प्रणालियाँ, मोबाइल प्लेटफॉर्म और विकेंद्रीकृत कमांड नोड प्रथम-हमले की रणनीति के विरुद्ध लचीलापन प्रदान करते हैं. यह संरचना निरंतर हवाई और मिसाइल बमबारी के तहत अस्तित्व के लिए दशकों की तैयारी को दर्शाती है. हालांकि अमेरिका ईरान की प्रक्षेपण क्षमता को कम कर सकता है, लेकिन पूर्ण उन्मूलन पूर्व के संघर्षों की तुलना में कहीं अधिक कठिन होगा. यह लचीलापन जवाबी कार्रवाई की निरंतरता सुनिश्चित करके निवारण में प्रत्यक्ष रूप से योगदान देता है।

साइबर युद्ध और सूचना अभियान

ईरान के सुरक्षा सिद्धांत में ऐसी साइबर क्षमताएँ भी शामिल हैं जिन्हें व्यवधान डालने, जासूसी करने, बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाने और रणनीतिक संकेत देने के लिए डिज़ाइन किया गया है. पिछले एक दशक में, ईरानी साइबर इकाइयों ने अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे और सूचना प्रणालियों तक अपनी पहुँच का विस्तार किया है।

सीधे टकराव की स्थिति में, साइबर युद्ध के साथ-साथ मिसाइल और प्रॉक्सी (छद्म) युद्ध में भी तेज़ी आने की संभावना है, जिससे संघर्ष का दायरा वित्तीय प्रणालियों, ऊर्जा ग्रिड, संचार बुनियादी ढाँचे और डिजिटल सार्वजनिक कूटनीति तक फैल जाएगा।

अमेरिका और ईरान की सैन्य शिक्षा की तुलना

अमेरिका के पास पारंपरिक सैन्य शक्ति प्रदर्शन, नौसैनिक विमानन, खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही कुशलता, रसद और सटीक हमले की क्षमताओं में वैश्विक स्तर पर ज़बरदस्त बढ़त हासिल है. हालाँकि ईरान की ताकत क्षेत्र-विशेष के अनुसार लंबे समय तक चलने वाला युद्ध मे निहित है. अमेरिकी अनुभव मुख्य रूप से अभियानगत हस्तक्षेप, विद्रोह-विरोधी अभियानों और गठबंधन संचालन में सबसे मज़बूत है. इसके विपरीत, ईरान की विशेषज्ञता मिलिशिया प्रणालियों, सांप्रदायिक संतुलन, अस्वीकार्य वृद्धि प्रतिबंधों का सामना करने की क्षमता और मध्य पूर्व के भीतर थका देने वाले संघर्षों पर केंद्रित है. इस प्रकार, जहाँ अमेरिका की श्रेष्ठता वैश्विक स्तर पर निर्विवाद बनी हुई है, वहीं यह तर्क दिया जा सकता है कि ईरान को लेवांत, मेसोपोटामिया, खाड़ी के तटीय क्षेत्रों और लाल सागर में संघर्ष बढ़ने की प्रणालियों के राजनीतिक-सैन्य परिदृश्य की कहीं अधिक गहरी समझ है। ईरान का सामना करने में सबसे बड़ा रणनीतिक खतरा ‘क्षैतिज विस्तार’ (horizontal escalation) की अनिवार्यता में निहित है. तेहरान पर दबाव पड़ने से इराक, लेबनान, सीरिया, यमन, गाज़ा और समुद्री जलमार्गों (चोकपॉइंट्स) पर मौजूद अन्य मोर्चे तेज़ी से सक्रिय हो सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भौगोलिक रूप से एक ही स्थान तक सीमित नहीं रहेगा. इसके बजाय, यह एक ऐसा क्षेत्रीय संघर्ष पैदा करेगा जो एक के बाद एक फैलता जाएगा, और जिसमें सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे आपस में गुंथे हुए होंगे. इसलिए, अमेरिका को न केवल ईरान पर हमला करने की लागत का आकलन करना चाहिए, बल्कि कई सहयोगी क्षेत्रों में एक साथ उत्पन्न होने वाले संकटों को संभालने की लागत का भी हिसाब लगाना चाहिए।

रणनीतिक धैर्य का राजनीतिक मनोविज्ञान

ईरानी प्रशासन की एक प्रमुख विशेषता इसका  ‘रणनीतिक धैर्य’ है. तेहरान का यह सिद्धांत युद्ध के मैदान में तुरंत जीत हासिल करने पर आधारित नहीं है, बल्कि लंबे समय तक दबाव बनाए रखने, विरोधियों को धीरे-धीरे कमज़ोर करने और संघर्ष के दौरान टिके रहने पर केंद्रित है. यह राजनीतिक मनोविज्ञान अमेरिकी राजनीतिक प्रणालियों के बिल्कुल विपरीत है, जहाँ लंबे समय तक चलने वाले युद्धों के कारण अक्सर देश के भीतर ही थकान और चुनावी बाधाओं का सामना करना पड़ता है. ईरान की नेतृत्व संरचना संस्थागत रूप से लंबे समय तक टिके रहने के लिए बेहतर स्थिति में है. राजनीतिक समय-सीमाओं में मौजूद यह विषमता ईरान की प्रतिरोधक क्षमता (deterrence posture) को काफी हद तक मज़बूत करती है. अमेरिका की वृहद रणनीति पर प्रभाव ईरान में हस्तक्षेप से अमेरिका की खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा स्थिरता, इज़राइल की सुरक्षा, लाल सागर में जहाज़रानी, ​​इराक में अमेरिकी सेना की स्थिति, और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संसाधनों का आवंटन कई प्राथमिकताएँ एक साथ खतरे में पड़ सकती हैं. मध्य-पूर्व में एक बड़े युद्ध से सैन्य संसाधन, कूटनीतिक बढ़त और वित्तीय संसाधन क्रमबद्ध  प्रतिस्पर्धा से हटकर विशेष रूप से चीन के साथ प्रतिस्पर्धा से की तरफ मुड़  जायेंगे . यह व्यापक भू-राजनीतिक समीकरण अमेरिका की चौतरफा घेरेबंदी को स्पष्ट करता है.

क्या ईरान के पास मध्य-पूर्व-विशिष्ट युद्ध का अधिक अनुभव है?

इस लेख का मुख्य तर्क है कि  मध्य-पूर्व के प्रॉक्सी युद्ध (अप्रत्यक्ष युद्ध) के विशिष्ट परिवेश के भीतर ईरान के पास वास्तव में अमेरिका की तुलना में उस क्षेत्र-विशेष से जुड़ा गहरा अनुभव हो सकता है. इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि ईरान के पास समग्र सैन्य श्रेष्ठता है, बल्कि इस प्रकार के युद्धों में तेहरान की तुलनात्मक बढ़त को उजागर करता है, जिनके किसी क्षेत्रीय टकराव को परिभाषित करने की सबसे अधिक संभावना होती है: प्रॉक्सी ताकतों को सक्रिय करना, मिलिशिया और राज्य का एकीकरण, प्रतिबंधों को झेलने की क्षमता, वैचारिक लामबंदी, और संघर्ष का प्रसार।

निष्कर्ष

अमेरिका ईरान में सीधे तौर पर दखल देने से पहले हिचकिचाता रहा है, क्योंकि ईरान ने पिछले 35 सालों में एक ऐसा युद्ध-ढांचा तैयार किया है जिसे खास तौर पर संघर्ष को क्षेत्रीय स्तर तक सीमित रखने और अपनी बेहतर पारंपरिक सैन्य शक्ति को कमज़ोर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. इसकी रणनीतिक ताकत सिर्फ़ मिसाइलों, प्रॉक्सी ताकतों या समुद्री बाधाओं में अलग-अलग तौर पर नहीं है, बल्कि उस एकीकृत इकोसिस्टम में है जो इराक, सीरिया, लेबनान, यमन, गाज़ा, होर्मुज़ जलडमरूमध्य और साइबर स्पेस को एक एकीकृत प्रतिरोधक ढांचे में जोड़ता है. स्पष्ट है ईरान पर कोई भी सीधा हमला, संभवतः एक बड़े मध्य-पूर्वी युद्ध में बदल जाएगा, जो लंबे समय तक चलता रहेगा.

डा. शाजाद अहमद

असिस्टेंट प्रोफेसर, ज्याग्रफी विभाग – जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली

shazadahmad92@gmail.com 

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