28 फरवरी 2026 को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक वीडियो संदेश में घोषणा की कि उनकी सेनाओं ने ईरान के खिलाफ एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया है. यह उन लोगों के लिए कोई हैरानी की बात नहीं थी जो इस क्षेत्र की राजनीति पर नज़र रखे हुये थे. अमेरिका और इज़राइल ने जून 2025 में भी ऐसा ही किया था, जब दोनों पक्ष (अमेरिका और ईरान) दशकों पुराने संकट को सुलझाने के लिए व्यापक बातचीत कर रहे थे, जिसमें मुख्य रूप से ईरानी परमाणु कार्यक्रम और कई अन्य मुद्दे शामिल थे. इस बार भी ठीक वैसा ही हुआ. जून के 12-दिवसीय युद्ध के बाद, अमेरिका और इज़राइल दोनों ने दावा किया था कि ईरान की परमाणु क्षमता के साथ-साथ उसके मिसाइल जखीरे को भी पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है. राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान की जनता से भी आह्वान किया था कि दमनकारी और क्रूर शासन से उनकी मुक्ति का क्षण आ गया है।
हमले के पहले ही दिन, ईरान के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता अली हुसैन खामेनेई (ईरानी इस्लामी गणराज्य के संस्थापक, अयातुल्ला रूहुल्लाह खुमैनी के उत्तराधिकारी) अपने परिवार के कई सदस्यों के साथ मारे गए और जल्द ही अली लारीजानी सहित ईरानी सुरक्षा तंत्र के अन्य प्रमुख सदस्य भी मार दिये गये. ईरान ने जवाबी कार्रवाई में कतर, UAE, सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत और निश्चित रूप से इज़राइल मे हवाई और मिसाइल हमले शुरू कर दिए. ईरान ने इन खाड़ी देशों पर यह कहकर हमला किया कि इन देशों ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को पनाह दे रखी थी, जिनका इस्तेमाल ईरान पर हमला करने के लिए किया जा रहा था।
जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा, वैश्विक मीडिया संस्थानों से रिपोर्टें और विभिन्न रणनीतिक थिंक-टैंक से यह विश्लेषण सामने आने लगे कि यह अमेरिका का अपना युद्ध नहीं था, बल्कि यह इज़राइली सैन्य अभियान में सहायता करने के लिए चलाया गया एक ऑपरेशन था. दोनों ने दावा किया कि इस ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य मौजूदा शासन को हटाना और उसकी परमाणु तथा मिसाइल क्षमताओं को नष्ट करना था. लेकिन लगभग चालीस दिनों के भीषण सैन्य हमले और हर तरह की मौखिक धमकियों जिनमें वर्तमान नेतृत्व को खत्म करने से लेकर एक सभ्यता के रूप में ईरान को पूरी तरह मिटा देने तक की धमकियाँ शामिल थीं, के बावजूद वह शासन अभी भी कायम है; और अब अमेरिका और ईरान दोनों का एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल कई मुद्दों पर इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में सीधी बातचीत किया. ईरान ने बातचीत मे ये शर्त रखी कि वो होर्मुज़ स्ट्रेट तभी खोलेगा जब इजराइल लेबनान पर हमले बंद कर देगा. ईरान ने कुछ समय के लिये होर्मुज़ स्ट्रेट खोला भी, लेकिन इजराइल द्वारा लेबनान पर लगातार हमले जारी होने से ईरान ने फिर से होर्मुज़ को बंद कर दिया है. होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण संकरा समुद्री मार्ग (जलडमरूमध्य) है. यह ईरान, ओमान और यूएई की सीमाओं के बीच स्थित है और वैश्विक तेल आपूर्ति का मुख्य जरिया है, जहां से दुनिया का लगभग 30% तेल गुजरता है।
ये तो तय है कि यह युद्ध विश्व-राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करेगा, क्षेत्रीय भू-राजनीतिक व्यवस्था को नया रूप देगा. इज़राइल के ‘अजेय’ होने के मिथक को पहले ही तोड़ चुका है. यह युद्ध देशों के बीच दशकों पुराने कई गठबंधनों को कमजोर कर दिया है, विभिन्न पारंपरिक साझेदारों के बीच भरोसे की कमी भी पैदा कर दी है.
इस युद्ध का सबसे चौंकाने वाला ऊर्जा संकट के रूप मे आया है, जिसने लगभग पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को बंद करने और उसके बाद ईरानी सैन्य बलों द्वारा खाड़ी देशों में गैस और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने के कारण तेल और गैस की आपूर्ति में आई रुकावट, वर्ष 1973 की एक याद दिलाती है; जब तेल उत्पादक देशों ने योम किप्पुर (इज़राइल-मिस्र) युद्ध के बाद इज़राइल और उसके सहयोगियों को दंडित करने के लिए तेल को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था. होर्मुज़ का लगभग पूरी तरह से बंद होना वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए एक अभूतपूर्व झटका है, क्योंकि यह तेल और गैस के प्रवाह के लिए दुनिया की सबसे बड़ी धमनी (मुख्य मार्ग) को बाधित करता है. ईरान के इस कदम ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बढ़ती लागत और आपूर्ति की कमी के दुष्चक्र में फंसा दिया है. युद्ध के शुरुआती दिनों में, जहाज़ों की आवाजाही पर नज़र रखने वाले डेटा से पता चला कि स्ट्रेट से गुज़रने वाले जहाज़ों की दैनिक संख्या लगभग 100 से घटकर केवल 2 रह गई थी, और स्ट्रेट के दोनों ओर हज़ारों जहाज़ सुरक्षित आवाजाही फिर से शुरू होने का इंतज़ार करते देखे गए. स्ट्रेट के बंद होने से एक साथ दोनो पक्ष प्रभावित हुए हैं. एक ओर वे खाड़ी देश जो प्राकृतिक तेल और गैस से होने वाली आय पर अत्यधिक निर्भर हैं, और दूसरी ओर वे देश (विशेष रूप से एशिया) जो इस क्षेत्र से होने वाले ऊर्जा आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं. स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के बंद होने के तुरंत बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ी से उछाल आया. जिस दिन युद्ध शुरू हुआ था, उस दिन कच्चे तेल की कीमत 72.48 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन अब यह बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई है, यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है।
एशियाई देशों को सबसे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा भारत, चीन, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों द्वारा उपभोग किया जाता है. स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से गुज़रने वाले तेल और गैस के लगभग 80% खेप चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया के लिए ही होते हैं. खाड़ी क्षेत्र के तेल और गैस के सभी प्रमुख उपभोक्ताओं में, दक्षिण कोरिया एक ऐसा देश है जो अपनी LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) की आपूर्ति के लिए 90% तक कतर पर निर्भर है. इसी तरह, चीन और भारत पर भी होर्मुज़ बंद होने के कारण भारी दबाव है और चूंकि ये दोनों देश तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएँ हैं, इसलिए अपनी अर्थव्यवस्था के पहिये को लगातार चलाने के लिए उन्हें हाइड्रोकार्बन की भारी और निरंतर आपूर्ति की आवश्यकता होती है. होर्मुज़ से माल की आवाजाही पर यह प्रतिबंध जितने लंबे समय तक बना रहेगा, इसके परिणाम उतने ही गंभीर और व्यापक होते जाएँगे. होर्मुज़ के बंद होने से पैदा हुआ यह संकट इराक, कुवैत, सऊदी अरब और UAE जैसे तेल-निर्यात करने वाले देशों को भी समान रूप से प्रभावित कर रहा है, जो अपनी आय के लिए तेल पर निर्भर हैं. इन देशों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, क्योंकि बड़ी संख्या में उत्पादन इकाइयाँ प्रभावित हुई हैं, और कुछ ने तो अपना उत्पादन कम करने का फैसला किया है।
यह ऊर्जा संकट केवल होर्मुज़ के बंद होने के कारण ही पैदा नहीं हुआ है जो दुनिया के विभिन्न हिस्सों, विशेष रूप से एशिया मे वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से के लिए एक प्रवेश द्वार का काम करता है. बल्कि स्थिति तब और भी बदतर हो गई जब मिसाइलों की बौछार ने कई देशों जिनमें विशेष रूप से कतर, सऊदी अरब और कुवैत शामिल हैं, में स्थित कई तेल और गैस प्रतिष्ठानों, उत्पादन इकाइयों और रिफाइनरियों को निशाना बनाया. सिर्फ़ सऊदी अरब में ही, देश के ज़रूरी एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर कई हमले हुए हैं. इन हमलों में रियाद और यानबू इंडस्ट्रियल सिटी में तेल और गैस उत्पादन, ट्रांसपोर्टेशन, रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल्स और बिजली सेक्टर की सुविधाओं को निशाना बनाया गया. इन हमलों की वजह से उत्पादन में लगभग 700,000 बैरल प्रति दिन की कमी आई है. अमेरिका के साथ सीज़फ़ायर बातचीत के बीच ही, ईरान ने सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को निशाना बनाया. यह पाइपलाइन एक इमरजेंसी प्लान है जिस पर सऊदी अरब बहुत ज़्यादा निर्भर करता है. यह पाइपलाइन इसलिए बनाई गई थी ताकि आज दुनिया जिस तरह के संकट का सामना कर रही है, वैसे हालात में तेल को होर्मुज़ जलडमरूमध्य से दूर ले जाया जा सके. सऊदी अरब के खुराइस तेल सुविधा पर भी हमला किया गया. सिर्फ़ इस एक घटना की वजह से इसका उत्पादन 300,000 बैरल प्रति दिन कम हो गया. जु’यमाह (सऊदी अरब) में प्रोसेसिंग सुविधाओं में भी आग लग गई, जिससे पूरे इलाके में लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) और नेचुरल गैस लिक्विड्स (NGL) के एक्सपोर्ट में रुकावट आई. बहरीन में BAPCO द्वारा संचालित सिट्रा तेल रिफाइनरी पर एक ईरानी मिसाइल से हमला हुआ, जिससे आग लग गई जिसे बाद में काबू कर लिया गया. लेकिन कंपनी ने दो तेल प्रोसेसिंग यूनिट्स को बंद करने की घोषणा की, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 173,000 बैरल प्रति दिन थी।
18 मार्च 2026 को ईरान के साउथ पार्स हमले के बदले में कतर के रास लाफ़ान (दुनिया की सबसे बड़ी LNG एक्सपोर्ट सुविधा) पर किया गया हमला, कतर की LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) सप्लाई सुविधा के लिए एक बड़ा झटका था. इन हमलों से इसकी उत्पादन क्षमता का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ है. LNG सप्लाई को बहाल करके पहले जैसा संतुलन हासिल करने में कई साल लग सकते हैं, क्योंकि कतर के अधिकारियों ने खुद घोषणा की है कि उनकी रास लाफ़ान LNG सुविधा को अपनी पिछली उत्पादन क्षमता हासिल करने में पाँच साल लग सकते हैं. अकेले रास लाफ़ान दुनिया के कुल LNG उत्पादन का लगभग 6 प्रतिशत उत्पादन करती है और कतर दुनिया में गैस का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है. चीन अपने तेल का लगभग 13% हिस्सा ईरान से और अपनी LNG की ज़रूरतों का लगभग 25% हिस्सा कतर से आयात करता है, जो फिलहाल रुक गया है. इराक ने भी युद्ध के शुरुआती दौर में अपने तेल उत्पादन में कटौती करने का फैसला किया है, क्योंकि होर्मुज के बंद होने के कारण तेल पंप करने के काम को पहले की गति से जारी रखना असंभव हो गया था. इससे इराकी खजाने के राजस्व के मुख्य स्रोत पर खतरा मंडरा रहा है. खाड़ी क्षेत्र की कई रिफाइनरियों को सीधे तौर पर हुए नुकसान और उसके बाद उनके बंद होने के अलावा, उन रिफाइनरियों तक पहुँचने वाले कच्चे तेल की मात्रा में भी कमी आई है जो अभी भी चालू हैं और तेल को प्रोसेस करने में सक्षम हैं. नतीजा यह हुआ है कि उपभोक्ता उत्पादों से गैसोलीन और उससे भी कहीं ज़्यादा, डीज़ल और जेट ईंधन की कमी हो गई है।
इसका असर सिर्फ़ उपभोक्ताओं को रोज़ाना चुकाने वाले ईंधन के खर्च या एयरलाइंस द्वारा टिकटों पर लगाए जाने वाले अतिरिक्त शुल्कों तक ही सीमित नहीं है. ऊर्जा संकट के लगातार बने रहने की एक मानवीय कीमत भी चुकानी पड़ रही है. इसने तेल की खेप के लिए बीमा प्रीमियम बढ़ा दिया है, जिससे गैसोलीन तथा बिजली जैसे ऊर्जा से जुड़े उत्पादों की कीमतों में भारी उछाल आ गया है. पूरे एशिया में पाकिस्तान और बांग्लादेश से लेकर दक्षिण कोरिया तक ऊर्जा संकट के कारण स्कूल बंद करने पड़े हैं और काम के हफ़्ते छोटे करने पड़े हैं. इसके अलावा, दुनिया भर में सबसे ज़्यादा कमज़ोर तबके के लोगों के लिए खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें ऊँची बनी रहने की उम्मीद है; खासकर उन देशों में जो अनाज के आयात पर निर्भर हैं जैसे कि खाड़ी और अरब देशों में से ज़्यादातर देश. ये वही देश हैं जो पहले से ही रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. मार्च और अप्रैल के महीनों में जो कुछ भी नुकसान हुआ है- चाहे वह कच्चे तेल के उत्पादन, रिफाइनिंग और निर्यात के मामले में हो, या फिर संशोधित उत्पादों, उर्वरक बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों और पेट्रोकेमिकल्स के मामले में, इससे कुछ चीज़ों की कीमतें, जिनमें डीज़ल (जो ट्रकों और ट्रैक्टरों को चलाता है), जेट ईंधन (जो दुनिया भर में यात्रियों और माल को ढोता है), और उर्वरक (जो खाद्य उत्पादन की नींव हैं) शामिल हैं, कम से कम इस साल के दूसरे छमाही तक बढ़ती ही रहेंगी।
लंदन स्थित कंसल्टेंसी ‘एनर्जी एस्पेक्ट्स‘ कीरिफाइंड प्रोडक्ट्स स्पेशलिस्ट नतालिया लोसाडा ने एक बयान में कहा कि सबसे अच्छे हालात में भी वैश्विक ऊर्जा प्रवाह साल के आखिर तक ही सामान्य होना शुरू होगा. किसी भी स्थिति में, अमेरिका और ईरान के बीच हुआ दो हफ़्ते का सीज़फ़ायर (युद्धविराम) होर्मुज़ से होने वाले प्रवाह को पूरी तरह से बहाल करने के लिए काफ़ी नहीं होगा. पिछले तीन हफ़्तों में तेल की आपूर्ति में जो कमी आई है, उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।
इस समुद्री गलियारे के भविष्य को लेकर अमेरिका और ईरान की क्या सोच है, इस बारे में स्थिति अभी भी साफ़ नहीं है. ईरान होर्मुज़ का प्रशासन अपने हाथ में रखेगा और इसे अपने निजी टोलगेट की तरह इस्तेमाल करेगा, भले ही इसे ‘समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (UNCLOS) द्वारा शासित एक अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया हो. हाल के प्रस्तावों में क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान की जाने वाली ट्रांज़िट फ़ीस लगाने का सुझाव दिया गया है. इसके विपरीत, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका के प्रबंधन के लिए ईरान के साथ एक संयुक्त उद्यम (joint venture) बना सकता है. हालाँकि, तेहरान ने बाद में घोषणा की कि वह इस जलमार्ग को तब तक नहीं खोलेगा जब तक इज़राइल लेबनान पर अपने हमले बंद नहीं कर देता, यह एक ऐसी शर्त है जिसके बारे में ईरान और पाकिस्तान दोनों का दावा है कि यह सीज़फ़ायर समझौते का एक अभिन्न अंग थी, हालाँकि अमेरिका और इज़राइल इस बात से इनकार करते हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों से इस सच्चाई को स्वीकार करने का संकेत मिला है, भले ही इसके खास विवरण अभी भी स्पष्ट न हों. भारत और पाकिस्तान से लेकर दक्षिण कोरिया तक, ऊर्जा संकट के कारण स्कूल बंद हो गए हैं और काम के दिन कम कर दिए गए हैं. फिलीपींस ने तो ऊर्जा क्षेत्र में आपातकाल की घोषणा भी कर दी है. गैस आपूर्ति में रुकावटों के बाद, जापान ने घोषणा की है कि वह बिजली बनाने के लिए कोयले से चलने वाले पावर प्लांट का इस्तेमाल करेगा. मिस्र के प्रधानमंत्री मुस्तफा मदबौली ने शनिवार को घोषणा की कि सरकार बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स को लागू करने की गति धीमी कर देगी खास तौर पर उन प्रोजेक्ट्स को जिनमें ईंधन और डीजल की ज़्यादा खपत होती है; साथ ही उन्होंने सभी सरकारी गाड़ियों के लिए ईंधन के कोटे में 30% की कटौती की घोषणा भी की. रूसी सरकार मौजूदा संकट और ऊर्जा बाज़ार में उतार-चढ़ाव को देखते हुए गैसोलीन के निर्यात पर रोक लगाने वाला एक आदेश लाने की योजना बना रही है।
कई यूरोपीय देशों ने पहले ही एहतियाती कदम उठा लिए हैं और वे परिष्कृत तेल उत्पादों के अपने कमर्शियल स्टॉक का इस्तेमाल लगातार जारी रखे हुए हैं, ताकि उन टैंकरों के न पहुँचने से पैदा हुई आपूर्ति की कमी को पूरा किया जा सके जो अपनी मंज़िल तक नहीं पहुँच पाए. इस बीच, यूरोप अब तक अपने रिज़र्व का इस्तेमाल करके ही काम चलाता रहा है, लेकिन ईरान अब ज़्यादा मुश्किल दौर की दहलीज़ पर खड़ा है भले ही युद्धविराम कायम रहे. युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद, यूरोप में तेल और गैस बाज़ार में 50 प्रतिशत की तेज़ी आई और कीमतें बढ़कर 55 यूरो से 62 यूरो प्रति मेगावाट-घंटा के बीच पहुँच गईं. यूक्रेन के राष्ट्रपति ने भी सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे डीजल का इस्तेमाल कम करें, क्योंकि मौजूदा हालात को देखते हुए युद्ध के जल्द खत्म होने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही है. इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने, अमेरिका और इज़राइल के बीच चल रहे युद्ध के दौरान, इटली को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति की सुरक्षा को मज़बूत करने के प्रयास में अल्जीरिया का दौरा किया; वहीं पोलैंड ने खुदरा ईंधन की कीमतों पर रोज़ाना की एक सीमा (कैप) तय कर दी है।
हॉर्मुज़ के बंद होने और खाड़ी देशों में कई उत्पादन इकाइयों के ठप होने से टैंकरों के लिए शिपिंग और समुद्री बीमा की लागत में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है. साथ ही, वैश्विक तेल की कीमतों में ‘भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम’ (geopolitical risk premium) के नाम से जानी जाने वाली लागत में भी इज़ाफ़ा हुआ है. गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि यह प्रीमियम फ़िलहाल $13 से $18 प्रति बैरल के बीच है, जिसका मतलब है कि एक अकेले तेल टैंकर के बीमा की लागत में लगभग $7.5 मिलियन की बढ़ोतरी हुई है।
जैसे ही अमेरिका और ईरान के बीच हुए संघर्ष-विराम समझौते की घोषणा हुई, वैश्विक तेल बाज़ार मे तेल की कीमतें मौजूदा $110-115 प्रति बैरल (जो 2022 के बाद से सबसे ज़्यादा थीं) से गिरकर $100 प्रति बैरल पर आ गईं, लेकिन इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं है कि यह संघर्ष-विराम कितना प्रभावी और टिकाऊ साबित होगा, क्योंकि अतीत के उदाहरण कुछ और ही संकेत देते हैं. दुनिया ने देखा है कि कैसे गज़ा और लेबनान में संघर्ष-विराम के कई समझौतों का उल्लंघन किया गया, यहाँ तक कि ईरान को भी बातचीत के दौर के बीच ही, एक साल से भी कम समय में दो बार सैन्य हमलों का निशाना बनाया गया।
अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की भारी कमी है, और इज़राइल का आक्रामक रवैया तथा बातचीत या शांति के प्रति उसकी चालाकियाँ जगज़ाहिर है फिर भी ऊर्जा बाज़ारों को अपनी सामान्य स्थिति में लौटने में कई महीने लग जाएँगे. हॉर्मुज़ के प्रबंधन के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय समूह (कंसोर्टियम) बनाने की ख़बरें तो हैं, लेकिन हालात के फिर से पहले जैसे होने की संभावना बहुत ही कम नज़र आती है. ऐसी भी ख़बरें हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए संघर्ष-विराम समझौते के बाद, जब ईरान ने जलडमरूमध्य में आवाजाही फिर से शुरू करने की अनुमति दे दी थी, तो अब उसने इसे फिर से बंद कर दिया है. ईरान ने लेबनान में संघर्ष-विराम समझौते के उल्लंघन का हवाला देते हुए यह कदम उठाया; दरअसल, संघर्ष-विराम समझौते की एक प्रमुख शर्त यह थी कि इज़राइल दक्षिणी लेबनान में अपने सैन्य अभियान रोक देगा, लेकिन उसने बमबारी जारी रखी. यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो अधिकांश देशों को या तो अपने रणनीतिक तेल भंडार (strategic reserves) का इस्तेमाल करना पड़ेगा, या फिर ‘स्पॉट मार्केट’ (खुले बाज़ार) से काफ़ी बढ़ी हुई कीमतों पर तेल और गैस खरीदना पड़ेगा. ये विकल्प कई देशों के व्यापार संतुलन पर काफ़ी दबाव डालेंगे और विनिर्माण लागतों में वृद्धि करेंगे, जिससे अंततः वैश्विक बाज़ार में उथल-पुथल मच जाएगी।

डा. एफ आर सिद्दीकी
रिसर्च फ़ेलो- इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स, नई दिल्ली
fazzur@gmail.com




