The President’s Cake : इराकी सिनेमा का नायाब तोहफा

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इराकी फिल्मकार हसन हादी ने अपनी फिल्म द प्रेसिडेंट’स केक में सद्दाम हुसैन के तानाशाही शासन काल में मेसोपोटामिया क्षेत्र में रहने वाले एक छोटे से परिवार में रहने वाले दादी-पोती के आपसी भावनात्मक समबन्धों का प्रभावी चित्रण किया है. फ़िल्मकार ने यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि तानशाही शासन में किस तरह सरकारी अधिकारी और कर्मचारी आम जनता का शोषण करने के नए नए तरीके इस्तेमाल करते हैं. तानाशाहों के बेसिर पैर के शौकों और आदेशों को पूरा करने में लगे हुए वेतनभोगी ब्यूरोक्रेटस  दुनिया के किसी कोने में, इतिहास के किसी भी काल खंड में नौकरी करते हों, अपने आकाओं को खुश करने के लिए  आपस में होड़ लगाकर काम करते हैं और उसी बीच अपनी  निजी लाभ के भी नए-नए तरीके ईजाद करते रहते हैं. साल 2022 मे मेरी एक महीने तबीयत खराब रहने पर चीकू के दादा दादी साथ रहने आये. चार साल के चीकू को अपने हाथ से खिलाती हुई दादी के चित्र  फेसबुक पर देखकर लोगों ने सुखद टिप्पणियाँ की थीं कि “मूलधन से ज्यादा प्यारा ब्याज होता है”. दादी और पोते, दादा और पोते के रिश्तों पर साहित्य और सिनेमा दोनों उपलब्ध है. इस लेख में हम एक इराकी फिल्म में चित्रित बूढी दादी और उसकी नौ साल की पोती के भावनात्मक सम्बन्धों के बारे में बात करेंगे.

दादा पोते, दादी पोती के रिश्तों पर बनी फ़िल्में

दादी माँ (1966), कल आज और कल (राज कपूर 1971), मालगुडी डेज धारावाहिक (1986), ईदगाह (तहरीर प्रेमचन्द की 2004), सरदार का ग्रैंडसन  (2021), प्रेसिडेंट्स केक  (हसन हादी 2025), मैं वापस आऊंगा (2026).

Boundaries 2018, don’t be afraid 2010, 15 years and one day 201, the Etruscan smile 2018, someone you love 2014, my summer in Provence 2013, Newcastle 2018, out of the woods 2005, being Flynn 2012, the war with grandpa 2020, White Bird: A Wonder Story (2024).  

इराकी सिनेमा का इतिहास

इराक में पहली बार सिनेमा सन 1909 में प्रदर्शित किया गया परन्तु मनोरंजन के साधन और एक सांस्कृतिक गतिविधि के रूप में उसे सन 1920 तक नहीं समझा गया. बग़दाद के अल रशीद स्ट्रीट में मुख्यतः अमेरिकन साइलेंट फ़िल्में दिखाई जाती रहीं. 1940 के दशक में किंग फैसल द्वितीय के शासन काल में वास्तविक अर्थों में इराक़ी सिनेमा का आरम्भ हुआ. ब्रिटिश और फ्रांस की फिल्म कम्पनियों ने इस कार्य में सहयोग किया. सन 1948 में ‘द बगदाद’ स्टूडियो की विधिवत शुरुआत हुई. उस दौर की फिल्मों में नाच गाना और रोमांस खूब होता था. सन 1959 में किंग फैसल के सत्ता से हटने के बाद सिनेमा और थियेटर को सत्तारूढ़ शासकों की राजनितिक इच्छापूर्ति और प्रोपेगंडा का माध्यम बनाना आरम्भ हुआ. उदाहरण के तौर पर सन 1969 के अल मघिसी प्रोजेक्ट डाक्यूमेंट्री में सरकार की सिंचाई अभियान तथा 1967 में अ वेडिंग हेवन में एयर फ़ोर्स और उनके हथियारों को प्रदर्शित कर गर्व भावना को अभिव्यक्त किया गया (ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी ऑफ़ फिल्म स्टडीज Kuhn & Westwell 2012: 33-34).

बाथ पार्टी शासन और सिनेमा  

सन 1968 की क्रान्ति के बाद बाथ पार्टी शासन में आई और उसके बाद फिल्मों की विषयवस्तु और निर्माण पर पार्टी का नियंत्रण बढ़ गया. फिल्मकारों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया कि वे सत्तारूढ़ शासक की नीतियों का सपोर्ट करें. उस दौर में इराक सरकार की मंशा को पूर्ण करने का काम “General Organization for Cinema and Theatre” नामक संस्था ने किया और उसकी देख रेख में कई महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्माण हुआ. सन 1979 में जब सद्दाम हुसैन गद्दीनशीं हुए तो इराकी सिनेमा एक अलग ही दिशा में मुड गया. इरान-इराक युद्ध के कारण देश के संसाधन युद्ध में बर्बाद होने लगे और फ़िल्में बनाना मुश्किल हो गया. कुछ काल्पनिक फ़िल्में सद्दाम हुसैन के शासन की चापलूसी करने के लिए जरुर बनाई गयीं. कुछ छिट-पुट फिल्मों के अलावा उस दौर में कोई उल्लेखनीय फ़िल्में नहीं बनी. सन 1980 के दशक में सद्दाम हुसैन ने अपने निजी जीवन को मिथक और आत्मकथा के सम्मिश्रण के माध्यम से 6 घंटे लंबा द लॉन्ग डेज (al-Ayyam al-tawila) नाम से फिल्म बनवाई जिसमें उसके जीवन को बढा चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया था. सन 1991 के पूर्व इराक में 300 सिनेमा घर थे लेकिन खाड़ी युद्ध के बाद फिल्म निर्माण रुक सा गया.  सन 1993 में एक फिल्म बनी किंग ग़ाज़ी जो इराक के पूर्व शासक के जीवनी पर केन्द्रित थी.

इक्कीसवीं सदी में इराकी सिनेमा

‘द इराकी इंडिपेंडेंट फिल्म सेण्टर’ की स्थापना सन 2003 में की गयी थी. सन 2014 में इराकी संस्कृति विभाग ने फिल्म निर्माण के लिए करोड़ों रूपये की व्यवस्था की परन्तु अब तक केवल एक प्रोजेक्ट के लिए ही मदद की है. हसन हादी की फिल्म द प्रेसिडेंट’स केक को इस संस्था से मदद मिली है या नहीं इसके बारे में अभी ज्ञात नहीं है. द प्रेसिडेंट’स केक (The president’s cake 2025)  इराकी निदेशक हसन हादी द्वारा लिखित और निर्देशित अरबी भाषा की एक फिल्म है जिसमें खाड़ी युद्ध के दौरान ग्रामीण इराक के मेसोपोटामिया क्षेत्र में एक नौ वर्षीय लड़की लामिया (बनीन अहमद नायेफ) और उसकी बूढी दादी की कहानी कही गयी है. यह फिल्म राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के कड़े प्रतिबंधों वाले शासन के दौरान, खाड़ी युद्ध और अमेरिका द्वारा की जाने वाली हवाई बमबारी के समय (1990 का दशक) ग्रामीण इराक में घटित होती है । सद्दाम हुसैन की तानाशाही शासन में इराक के लोग गरीबी, बेरोजगारी एवं तबाही का जीवन जी रहे थे. दुनिया के पश्चिमी देशों ने ईराक के ऊपर जो प्रतिबंध लगाए थे उसके कारण वहां का जनजीवन और भी कठिन हो चुका था. जो सरकारी कर्मचारी और अधिकारी थे उनके वेतन भी बहुत कम हो गए थे, आम आदमी के मुश्किलों का तो कहना ही क्या. इन्हीं वास्तविक परिस्थितियों के बीच सन 90 के दशक के ईरान के एक कस्बे मेसोपोटामिया में बसे लामिया और उसकी दादी और उसके पालतू मुर्गी हिंदी की कहानी इस फिल्म में कही गई है जो अपनी रोजमर्रा की मुश्किलों से उलझते हुए किसी तरह अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं.

तानाशाहों को पसंद होता है कि उनके बनाए हुए नियम कानून को हर इंसान जो उनके देश में रहता है बिना सवाल पूछे मानता रहे और उनके बताए रास्तों पर चलता रहे. हसन हादी सन 90 के दशक में एक छोटे बच्चे थे और सद्दाम हुसैन के शासनकाल में बड़े हो रहे थे. उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि 14 साल की उम्र तक उन्होंने कभी कोई केक नहीं खाया था और जब वह बेकरी की दुकान की तरफ से गुजरते थे तो उसके सामने खड़े होकर शीशे के अंदर रख केक को देखा करते थे. यह फिल्म सभ्यता का पालन कहे जाने वाले मेसोपोटामिया के दलदली और जल जमाव वाले क्षेत्र में रहने वाले लोगों की कहानी है. मात्र 9 वर्ष की लामिया एक स्कूल में पढ़ती है जहां उसकी कक्षा में उसे एक अनलकी लड़की के रूप में जाना जाता है. तत्कालीन तानाशाह सद्दाम हुसैन के जन्मदिन को एक राष्ट्रीय पर्व की तरह से मनाया जाता था. लामिया के स्कूल का टीचर लॉटरी से पर्ची निकाल कर क्लास के अलग-अलग बच्चों को अलग-अलग काम देता है और उस दिन लामिया के नाम जो पर्ची निकलती है उसे एक सौभाग्यशाली बच्ची बताते हुए राष्ट्रपति के जन्मदिन पर केक बनाने का और स्कूल में लाने का आदेश दिया जाता है.

लामिया घर लौटकर अपनी दादी से प्रेसिडेंट के जन्मदिन पर केक बनाने और स्कूल में ले जाने की बात बताती है और जिद करती है. उसकी बूढी गरीब दादी जो बड़े मुश्किल से मजदूरी करके अपना और अपनी पोती का जीवन यापन कर रही है वह घर के पुराने रेडियो और घड़ी को समेट कर रखती है ताकि बगल के शहर बगदाद जाकर वह उसे बेचकर केक बनाने के लिए जरूरी सामान खरीद सकें. इन झंझटों से बचने के लिए लामिया की दादी उसे एक अनाथालय में भी सौंपने के बारे में सोचती है लेकिन लामिया वहां से अपने मुर्गी हिंदी के साथ फरार हो जाती है और अपने दोस्त सईद  के साथ बगदाद शहर में कई मुश्किलों और शहर के कई अच्छे बुरे अनुभवों को फेस करते हैं लेकिन उन्हें किसी भी तरह केक बनाने के समान चीनी और अन्य चीज खरीदनी होती है इसके लिए वह मजबूरी भी करते हैं एक गोदाम से अनाज की चोरी भी करने का प्रयास करते हैं और इसी क्रम में एक मस्जिद से नमाज पढ़ने के दौरान उनका मुर्गा चोरी हो जाता है उसे मुर्गे को खोजते हुए लामिया एक मुर्गी का मीट बेचने वाले दुकान में पहुंचती है जहां का दुकानदार एक बूढ़ा आदमी है वह मुर्गे को वापस तो कर देता है लेकिन उसे इस्लामिया को बहलाकर सिनेमा घर की तरफ ले जाता है जिसमें ब्लू फिल्में दिखाई जा रही होती हैं. लामिया अपने सिक्स्थ सेंस से उस आदमी के मन में छुपी दूसरा को पहचान लेती है और वहां से फरार हो जाती है. उसे  अपनी कार में बैठाकर शहर लाने वाला नेक इंसान किसी तरह लामिया को पुलिस के माध्यम से खोज कर उसकी दादी तक पहुंचता  है जो थक हार कर अस्पताल में भर्ती है लेकिन दुख की बात यह है कि लामिया के अस्पताल पहुंचने के पहले ही उसकी दादी का इंतकाल हो जाता है और वह लौटकर अपने गांव में दादी का  अंतिम संस्कार करती है.

लेकिन लामिया इतनी समझदार और समर्पित बच्ची है कि वह अपने दोस्त सईद  की मां की मदद से केक बना कर प्रेसिडेंट के जन्मदिन पर लेकर स्कूल जाती है.  स्कूल का टीचर उस केक को खाकर उसके बारे में कुछ कहने वाला होता है उसी  समय आसमान से बमबारी होने की घटना होती है शोर होता है और सब कुछ धुआं धुआं हो जाता है. फिल्म के निर्देशक हादी याद करते हैं कि उस दौर में स्कूल में प्रेसिडेंट के जन्मदिन पर केक बना कर ले जाना होता था लेकिन बच्चों को वह केक खाने को नहीं मिलता था. स्कूल का अध्यापक केक अपने घर ले जाता था और बच्चों को कुछ नहीं मिलता था. हसन हादी कहते हैं कि वह दौर ऐसा था जैसे सद्दाम हुसैन हर जगह मौजूद हो और वह आप पर नजर रखे हुए हो. शहर के हर दीवार पर सद्दाम हुसैन की मुस्कुराती हुई अलग-अलग पोज में फोटो लगे रहते थे. ऐसा लगता था कि आप हर पल तानाशाह की पैनी नज़र के साए में जी रहे हों. तानाशाहों को पसंद होती हैं दीवारों पर चिपकी हुई अपनी मुस्कुराती तस्वीरें. हालांकि वे होते हैं हत्यारे. जार्ज ओरवेल ने अपनी किताब ‘1984’ में ऐसे ही तानाशाहों के लिए लिखा है, “द बिग ब्रदर इज वाचिंग” जब उनकी तस्वीर हर दीवार, हर घर में मौजूद होती है तो वह भले ही आपको ना देख रहे हो लेकिन आपके मन में एक खौफ भर जाता है कि कोई एक खतरनाक सा बंदा लगातार आपकी हर हरकत पर नजर रखे हुए हैं और आपके दिलों दिमाग में वही चेहरा बस जाता है. एक अनजान डर के वशीभूत हो आप उसके हर ऊलजुलूल हुकुम को मानने के लिए खुद को तैयार कर लेते हैं. आपकी मेंटल कंडीशनिंग ऐसी हो जाती है कि क्रूर तानाशाह का विरोध करने का साहस नहीं कर पाते। जो लोग तानाशाह और उनके आदेशों का विरोध करने का साहस करते हैं उन्हें मौत के घाट तक उतार दिया जाता है और गंभीर यातनाएं दी जाती हैं चाहे वह छोटे बच्चे ही क्यों ना हो. सद्दाम हुसैन के शासनकाल के इराक में भी ऐसा ही होता था. हसन हादी अपने एक इंटरव्यू में कहते हैं “हसन हादी के पिता सद्दाम के शासन का विरोध करते थे. वह अपने बचपन की एक घटना याद करते हुए कहते हैं कि एक दिन सद्दाम की पुलिस उनके घर पर अचानक से रेड डालती है और उनके पिताजी के बारे में पूछताछ करती है वह घर पर नहीं थे जब पुलिस वालों ने उनकी दादी से पूछा कि आपका नाम क्या है तो मारे डर के वे अपना नाम भूल गई और अपनी बेटियों से पूछने लगीं कि उनका क्या नाम है. शक्तिहीनता और लाचारी में इंसान परेशान हाल था.  कैथ क्लार्क ने इस फिल्म के बारे में लिखा है “the president’s cake is warm funny and sometimes heart breakingly sad it perfectly captures the innocence of childhood the setting is early 1990 Iraq: Saddam’s brutal rule and the hardship of sanctions are seen through the eyes of a 9 years old girl called Lamiya played by Baneen Ahmed” (Cath Clarke 2 Feb 2026 The Guardian). फिल्म में लामिया और उसके दोस्त सईद की सारी जद्दोजहद केक के लिए जरूरी सामान जुटाने की है लेकिन जैसे ही वे इसके नजदीक पहुंचते हैं कोई न कोई बाधा आ पहुंचती है, जेम्स मर्फी लिखते हैं, “the film s moves like a parable with teeth. Each time lamia and her friend said get closer to the ingredients another tackle arrives corrupt official predatory adults in different systems. The cake becomes a classic not because it matters but because power has decided it must” (James Murphy 22 january 2026).  आज दुनिया में हर तरफ युद्ध और लड़ाईयां मची हुई हैं और राष्ट्रवाद के नाम पर तानाशाह प्रवृत्ति के लोग कई देशों की सत्ता पर काबिज होकर अपनी मनमानियां आम जनता पर थोपने पर आमादा हैं ऐसे समय में हसन हादी की यह फिल्म केक जैसी छोटी से वस्तु के माध्यम से हमें आसन्न खतरों के प्रत्ति आगाह करती है.   

लामिया जब अपनी दादी का साथ छोड़कर बगदाद शहर में अपने दोस्त सईद और उसके पिता की तलाश में भाग जाती है ताकि उसे दादी से अलग किसी अनाथालय में भर्ती न होना पड़े तो उसकी दादी पुलिस से उसका स्केच बनाते समय बताती है कि उसकी बड़ी-बड़ी आंखें हैं. नौ साल की बच्ची की बड़ी-बड़ी आँखों के माध्यम से दर्शक उसे दौर के इराक और इराकी सामाजिक-राजनीतिक वातावरण और वहां की रोजमर्रा की जिंदगी में घटित होने वाली घटनाओं को स्पष्ट देख लेते हैं क्योंकि लामिया की बड़ी-बड़ी आंखें उसे दौर की सारी सच्चाइयों को अपनी खुली आंखों से देखती हैं जिसके बारे में जेम्स मर्फी लिखते हैं, “those eyes carry the film. They absorb hunger, fear, comedy and white resolve. Nayyef’s performance has the break out for shop Slumdog millionaire’s child leaves expressive without sentimentality though without losing wonder… There are flashes of The Death of Stalin style absurdity where bureaucracy becomes grotesque theatre. Police are uninterested in missing children but deeply invested in birthday logistics. Adults barter leer, threaten, shrug”

दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि ब्यूरोक्रेसी तानाशाहों के बैंड पर खुशी से नाचने वाली जमात होती है। जो नाचने से मना करे उसे दंडित करके अपने आकाओं की खुशामद करने में उसे असीम आनंद मिलता है. हर तरफ लूट और नैतिक मूल्यों का पतन एक सामान्य घटना की तरह देश और समाज में पसर जाता है. तानाशाह कीई पूजा और उसके आदेशों का अंध अनुसरण ही अंतिम सत्य बन जाता है. यह फिल्म इन्ही बातों के विषय में हमारा ध्यान आकर्षित करती है.  

शहर से लुट पिटकर अपनी दादी  की मृत देह लेकर लौटने वाली लामिया अंतिम संस्कार के बाद अपन दोस्त  सईद की मां की मदद से बची हुई सामग्री से लामिया को केक बनाने में मदद करती है, लेकिन लामिया वहीं पर रात बिताने के प्रस्ताव को ठुकरा देती है। अगले दिन, स्कूल में राष्ट्रपति का जन्मदिन मनाया जाता है, लेकिन शोक में डूबी लामिया इसमें शामिल होने से इनकार कर देती है। कक्षा के अंदर, लामिया की टीचर केक चखता है और खुश होता है लेकिन हवाई हमले के सायरन की आवाज़ से उनकी प्रार्थना बाधित हो जाती है। बाहर हो रहे बमों के विस्फोट से बचने के लिए, लामिया और सईद, दोनों रोते और डरे हुए, एक-दूसरे को घूरते हैं ताकि वे तबाही के दृश्य को नज़रअंदाज़ कर सकें। स्क्रीन अचानक काली हो जाती है क्योंकि युद्धग्रस्त इराक में इन बच्चों का भविष्य भी अंधकार में होता है. फिल्म के अंत में तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के जन्मदिन के जश्न में टेलीविजन पर ‘हैप्पी बर्थडे टू यू’ का अरबी संस्करण बज रहा होता है। वर्ष 2026 में रीलिज हुई इम्तियाज़ अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ में भी दादा और पोते के बीच के भावनात्मक रिश्ते को चित्रित किया गया है. साहित्य, सिनेमा और समाजविज्ञानों में प्रायः पीढ़ी अंतराल (Generation gap) पर अध्ययन होते हैं लेकिन दोनों के बीच प्यार और भावनात्मक रिश्तों पर अच्छी कहानियां सामने आ रही हैं जो एक अच्छा संकेत है.

प्रेसिडेंट्स केक और ईदगाह और दादीपोती/पोते का प्रेम

उपर हमने इराकी फिल्म में चित्रित नौ वर्षीय लामिया और उसकी दादी के बीच के रिश्ते पर आधारित फिल्म पर चर्चा की. प्रेमचन्द की कहानी ईदगाह में हामिद और उसकी दादी के आपसी सम्बन्धों की कहानी कही गयी है जो अपने उम्दा कथानक के कारण बहु-प्रशंसित है. मोहन महतो ने अपने शोध लेख में प्रेमचन्द की कहानी ईदगाह में हामिद और उनकी दादी के बीच के वात्सल्य और पारस्परिक देखभाल की भावना का विश्लेष्ण किया है. वे लिखते हैं,प्रेमचंद की कहानी ईदगाह प्रायः बाल-मन, दादी-पोते के संबंध और करुणा के प्रतीक रूप में पढ़ी जाती रही है, किंतु इसका गहरा प्रतीकात्मक पाठ उपनिवेशकालीन भारत के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संघर्षों की परतें खोलता है। हामिद का चिमटा केवल घरेलू उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि स्वदेशी चेतना, मातृ-संवेदना और उपयोगितावादी विचारधारा का सूक्ष्म, लेकिन प्रभावशाली प्रतीक बन जाता है। “अम्मी के हाथ जलते हैं, तो मुझे क्या खुशी होगी?”(प्रेमचंद, ईदगाह 33) यह कथन स्वदेशी आंदोलन के उस मूल भाव से जुड़ा है जिसमें परायापन और अपनेपन के बीच आत्म-निर्णय को सर्वोच्च स्थान दिया गया। यह निर्णय निजी संवेदना को सार्वजनिक नैतिकता में बदलने का रूप है  और यही एक स्वदेशी नायक की बुनियादी विशेषता है। चिमटा भारतीय स्वराज की प्रतीक वस्तु के रूप में प्रस्तुत हुआ है| हामिद जिन वस्तुओं को नकारता है – जैसे खिलौने, मिठाई, झूले – वे सभी उपनिवेशी संस्कृति की आकर्षक उपभोक्तावादी संरचना के प्रतीक हैं। उनके विपरीत हामिद का चयनित चिमटा एक स्वदेशी, श्रम-केंद्रित, उपयोगी वस्तु है। इस चयन को केवल ममता से नहीं, स्वावलंबन और मातृरक्षा की नैतिक राजनीति से जोड़ा जाना चाहिए। इस सन्दर्भ में रामविलास शर्मा प्रेमचंद को भारतीय यथार्थवाद का जनक मानते हुए कहते हैं: “प्रेमचंद का नायक भारतीय समाज के गहरे सवालों से जूझता है, वह अकेला नहीं, अपने परिवेश से जुड़ा हुआ है।”(प्रेमचंद और भारतीय समाज, 1978,56). भारत हो, ईराक हो या दुनिया का कोई और देश, वहां का साहित्य हो या सिनेमा उसमें मानवीय संबंधो का भावनात्मक चित्रण मिलता है. अच्छे साहित्य और सिनेमा से हम बेहतर और संवेदनशील मनुष्य बनते हैं. ये हमें इतिहास में की गयी गलतियों को दुहराने से भी बचाते हैं.    

संदर्भ

महतो, मोहन (2025) चिमटे में छिपा संसार : ईदगाह की एक नई परत https://www.apnimaati.com/2025/09/blog-post_21.html, 30 सितम्बर 2025.  

Clarke, Cath (2026) ‘yes they would execute a child’ : the film about a girl who has to bake a birthday cake for Saddam Hussein, on 2 February 2026, on https://www.theguardian.com

Murphy, James (2026) Film Review: The President’s cake is a Tender Portrait of Fear & Survival on 22 january 2026, on https://thescoop.au.

Kuhn, Anette & Westwell Guy (2012) Oxford Dictionary of Film Studies, OUP, London.

शिवानी राकेश

shivani.nirajnan@gmail.com

फिल्म लिटरेचर विशेषज्ञ

शिवानी राकेश की दो चर्चित कृतियाँ सिनेमा को पढ़ते हुयेऔर सिनेमा के मुद्देमुद्दों का सिनेमाप्रकाशित हो चुकी है.

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