मेरी माँ मेरी गैंग्स्टर या कुछ और

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एक ऐसी अनोखी किताब जिसका अगला पाठ पिछले पाठ के और पिछला पाठ अगले पाठ के होड़ में एक दूसरे से बेहतर होने की नुमायंदगी पेश करता है। दो महिलाओं की आपस में  प्यार, नफरत, विद्रोह, संघर्ष , जिद आदि के नमूनों से गुत्थी हुई बेहतरीन किताब ‘मेरी मां मेरी गैंगस्टर:अरुंधति रॉय’ । किताब के बारे में निखिल कृष्णा ‘द टेलीग्राफ'( यूके ) लिखते हैं कि मदर मैरी की परवरिश के बाद, कोई और होता तो शायद उसे थेरेपी की जरूरत पड़ती राय ने लिखना चुना। अरुंधति  ‘मिसेज राय’ के बारे में लिखती है कि बचपन में मैंने उन्हें बिना शर्त प्यार किया । बेबस खौफ़जदा और पूरे समर्पण के साथ जैसा कि बच्चे करते हैं । बालिग होने के बाद मैंने शांत भाव से सोच समझकर और सुरक्षित दूरी से उन्हें प्यार करने की कोशिश की । कोई बेटी मां के बारे में ऐसा सोचे तो उनके बीच कितनी दूरी रही होगी। अरुंधति कहती है कि मैं अक्सर नाकाम रही कभी-कभी तो बहुत बुरी तरह से। अपनी किताबों में मैंने ऐसे किरदार गढ़े, जो उनका रूपांतरण थे । मगर वह रूपांतरण भर  ही थे।  मिसेज राॅय अपने तरह की अनोखी महिला थी। उनकी तुलना किसी शेर या किसी अन्य पुरुष या महिला से करना राॅय  के साथ जयादति होगी। अपने आप में अपनी तरह की मैसेज राॅय ही हो सकती है।

 मेरी मां किसी गैंगस्टर की तरह दबंगई से पेश आती थी। मैंने उनको अपने शख्सियत की सारी क्षमताओं अपनी मेधा, अपने सनक, अपनी सच्ची हमदर्दी, अपने जुझारू,अपनी बेरहम, अपनी दरिया -दिली अपने सितम, अपनी दोस्त कारोबार की अपनी समझ और अपने बेलगाम और मनमौजी मिजाज, ईसाई समाज पर बेखटके बढ़ते हुए देखा। जो अपने तालीम और निस्बतन, खुशहाली की वजह से देश के बाकी हिस्सों की अराजकता और गरीबी से अछूता था।.. वह मेरा आसरा थी और तूफान भी। मिसेज राय अरुंधति  के साथ दुश्मनी तक के हद तक चली जाती थी। अरुंधति रॉय को देखकर मिसेज राय का खून खोल जाता था। “वह किस बात पर गुस्सा हो जाएगी और किस बात पर खुश यह अंदाजा लगाना मेरे लिए असंभव हो गया। बारूदी सुरंग वाले इस इलाके से गुजरने के लिए मुझे नक्शे के बिना ही अपना रास्ता खोजना पड़ता था। अक्सर मेरे पांव और उंगलियां और कभी-कभी तो मेरी खोपड़ी भी उड़ जाती मगर कुछ देर हवा में तैरते रहने के बाद जादुई तरीके से वह फिर अपने जगह लौट आते।”

 हैरानी की बात यह है थी कि मिसेज राय ऐसी भयानक बातें अपने बेटे से भी बोल देती थी। जिस देश में महिलाएं बेटों को पूजती हैं वहां मैसेज राय अपने बेटे को आत्महत्या तक का चैलेंज दे देती है। अरुंधति बताती है कि जब वह (भाई) किशोर  था तो एक बार उन्होंने उससे कहा तुम बदशक्ल और बेवकूफ हो। तुम्हारी जगह अगर मैं होती तो “खुदकुशी” कर लेती ।

 मिसेज राॅय अक्सर बाहर के लोगों का ग़ुस्सा हम दोनों भाई बहनों पर निकलती थी। एक बार की घटना बताती है जब अरुंधति रॉय और उसके भाई के स्कूल से रिपोर्ट कार्ड आया था। जिसमें अरुंधति राय को अच्छे मार्क्स मिले थे जबकि उनके भाई को बहुत कम मार्क्स मिले थे। तब मिसेज राय अपने बेटे को दूसरे कमरे में ले जाकर लाठी से इतना पीटती है कि लाठी ही टूट जाती है। मिसेज राय के साथ-साथ अरुंधति के व्यक्तित्व का भी निर्माण होता चला जाता है। वह अपनी मां से क्रोध, नफरत , संघर्ष करते हुए उनसे संवाद बराबर करती है। मिसेज राय ने अपने दम पर संघर्ष करते हुए एक स्कूल का निर्माण किया। अरुंधति बताती है कि मेरी मां के तीन बच्चे थे। एक मैं दूसरा मेरे भाई तीसरा स्कूल। मिसेज राय लड़कों की पैदाइशी हक वाले गलतफहमियां खत्म करने को अपना मकसद बना लिया। उन्होंने उनको ऐसा हमदर्द और तहजीब वाला इंसान बनाया जैसे शहर में शायद ही कभी देखे गए हो। एक तरह से उन्होंने उनको भी मुक्ति दिलाई। उन्होंने मर्दानगी को लेकर समाज के रूढ़िवादी सोच के बोझ से उनको आजाद किया । बच्चों को पढ़ाने समझाने का अनौखा तरीका था। राय के स्कूल के शुरुआती दिनों में जब उनको पता चला की हॉस्टल के लड़के, लड़कियों को उनके स्तन और  ब्रा के बारे में चिढ़ाते हैं तो उन्होंने खास असेंबली बुलाई। उन्होंने दो सबसे खुराफाती लड़कों को अपनी अलमारी से एक ब्रा निकाल कर लाने के लिए भेजा। दोनों लड़कों को अपने हाथ में  ब्रा लेकर खड़े होने के लिए कहा- “यह ब्रा है ; सारी औरतें पहनती है ; तुम्हारी मां पहनती है । जल्दी ही तुम्हारी बहने भी पहनेगी। यह  अगर तुमको इतना ही उत्तेजित करती है तो तुम मेरी ब्रा अपने पास रख सकते हो । यह अशालीन था; हां !  मगर यह उन क्षणों में से एक था जिसने स्कूल के लड़के और लड़कियों के बीच शक्ति संतुलन हमेशा के लिए बदल दिया।”

“मेरी मां मेरी गैंगस्टर” में अरुंधति राय ने एक विस्तृत फलक पर चर्चा की है। उसमें अपने पढ़ाई के दौर, प्रेम संबंध, फिल्म निर्माण में जाने का किस्सा से लेकर, लेखक बनने की यात्रा तक का जिक्र करती हैं। लेखिका अपने समय के राजनीतिक, सामाजिक दृष्टियों पर गहरी पकड़ रखती हैं। उन्होंने वर्ष 2002 के गुजरात गोधरा कांड में हुए मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार का संवेदनात्मक वर्णन किया है। लालकृष्ण आडवाणी की 1990 में रथ यात्रा का वर्णन करती हैं । जिसमें लाखों कारसेवकों के अंदर हिंदुत्व का जहर बोया गया था। जिसका परिणाम वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद के धराशाई करने के रूप में सामने आया और उसकी आग धीरे-धीरे वर्तमान तक फैल गई।

यहां तक कि कांग्रेस के समय में हुए देंगे पर भी पैनी निगाह से चीरफाड़ की है। ऑपरेशन ब्लू-स्टार का बदला लेने के लिए इंदिरा गांधी की साल 1984 में उनके ही सिक्योरिटी गार्ड एक सिख ने हत्या कर दी गई थी। जिसके कारण दिल्ली में सिखों को लेकर कत्लेआम शुरू हो गया। “मिसेज गांधी के  बड़े बेटे राजीव गांधी ने यह कहते हुए कत्ल ए आम को खारिज कर दिया: जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।”

 अरुंधति ने ‘द ग्रेट इंडियन रेप ट्रिक’ के पार्ट में फूलन देवी पर फिल्माई गई फिल्म का जिक्र किया है जिसमें उन्होंने बताया है कि फिल्म निर्माण के समय फिल्म निर्माता ने फूलन देवी के विरोध करने पर भी उनके बलात्कार के चित्रण को फिल्माया गया था। लेकिन अरुंधति की एक बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता है । जहां उन्होंने फूलन देवी के जीवन के एक हिस्से को मिथक कहा है जैसे वह लिखती है कि “एक मिथक यह था कि दुश्मन गिरोह के सवर्णों ने उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया और इसका बदला लेने के लिए उन्होंने उसमें से 22 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी थी ।”वह फूलन देवी के पुलिस से न पकडे जाने पर उसको मायावी की किवदंती बताती हैं कि “यकीन नहीं होता बरसों तक पुलिस उन्हें पकड़ने में नाकाम रही थी वह मायावी किवदंती थी। एक पहेली।” हालांकि अरुंधति फिल्म  दर्शाया जाने वाला बलात्कार के दृश्य का विरोध करती है। स्त्री के बिना सहमति के  उसके बलात्कार को फिल्माया जाना महिला को दोहरी पीड़ा देता है। उन्होंने विरोध भी किया। इस विरोध का नुकसान भी झेलना पड़ा। चैनल-4 जिसने अरुंधति को पिछली फिल्मों में सहायता राशि दी थी। आने वाली फिल्म के लिए सहायता राशि देने को इनकार कर दिया और उनकी स्क्रिप्ट भी लौटा दी । अरुंधति को फूलन देवी की सबसे ज्यादा प्रभावित उनका आत्मविश्वास करता है। “फूलन देवी न किसी की धौंस में आने वाली थी और न ही उनमें कोई बेचारापन था। वह अपनी आंखों से सुनती थी और पूरी तरह अपनी सूझबूझ से काम लेती थी” एक जगह अरुंधति लिखती है फूलन देवी ने फिल्म के विरोध में जो कोर्ट में फाइल दर्ज की थी उसको वापस ले लिया था। उनका कहना है कि अरुंधति ने कोर्ट के बाहर अन्य महिलाओं के बारे में न सोचते हुए फिल्म निर्माता से समझौता कर लिया था। “फिल्म पर पाबंदी की कोशिश में फूलन देवी अदालत चली गई । उनका मुकदमा इंदिरा जयसिंह लड़ रही थी । जैसा कि भारत की अदालत में होता है, इस मामले में भी अदालत ने अपना समय लिया । इस बीच फिल्म खचाखच भरे सिनेमाघर में दिखाई जाने लगी। जिससे फूलन देवी का मुकदमा कुछ हद तक बेमानी हो गया। सिवाय इस उम्मीद के कि उनके हक में आया फैसला दूसरी औरतों के लिए कानूनी नजीर बन सकेगा मगर फूलन देवी को समाज सेवा में कोई दिलचस्पी नहीं थी। आखिरकार वह अदालत के बाहर निपटारा करने के लिए राजी हो गई। जिसकी वजह से उन्हें और ज्यादा बेइज्जती और अदावत झेलनी पड़ी ।” फूलन देवी से संबंधित उनके कई कथनों से असहमति होते हुए भी उन्होंने कई मुद्दों पर बिना किसी की परवाह किए अपनी बात को रखा है ।

किताब में अरुंधति चीजों  को स्त्री दृष्टिकोण से देखने की भी कोशिश करती है । वह एक यात्रा का वर्णन करते हुए बताती है कि देहरादून के आखिरी दो घंटे के सफर में एक नेशनल पार्क से होकर गुजरना पड़ता था । उनमें से एक यात्रा मुझे अब तक याद है। वह एक साफ खूबसूरत रात थी। हम एक भैंसा गाड़ी के करीब से गुजरे, जिसके पीछे बंधी एक लालटेन टिमटिमा रही थी। इत्मीनान से लेटा गाड़ीवान  तारों को निहारता हुआ गा रहा था । उसे भरोसा था कि उसकी भैंसा उसे घर ले जाएगा। उससे ईर्ष्या महसूस करने की याद मुझे है। मुझे याद है कि मैं सोच रही थी कि हम चाहे कितनी ही लंबी और सख्त लड़ाई क्यों न लड़ लें । भारत में किसी भी धर्म, वर्ग, जाति,बिरादरी की कोई भी औरत खुद को कभी इतना महफूज महसूस नहीं करेगी कि किसी सुनसान हाईवे पर सितारों को अपना गीत सुनाते हुए गुजर सके और उसकी भैंसा उसे घर लिए जा रहा हो ।

खासकर मुझे सबसे प्रभावित करने वाली बात किताब में लगी कि अरुंधती अपने किसी भी पात्र को सरनेम या जाति से नहीं बुलाती है। वह सीधा उसका नाम जैसे प्रदीप, संजय, अंजुम, गोलक, जेसी, आदि से पुकारती है।  यहां तक कि अपने पिता को मिकी राय और माता को मिसेज राय से बुलाती है । पूरी किताब को पढ़ जाइए पाठक को कहीं भी जाति, धर्म, वर्ण आदि सरनेम  वाले पात्र रूपी विष्णु नहीं मिलेंगे। अरुंधति की यह छवि निर्मित करने में मिसेज राय का ही हाथ है। मिसेज राय ने अरुंधति को सशक्त, आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर, दृढ़ निश्चय व स्वतंत्र विचार वाली महिला के रूप में निर्मित किया ।

 अरुंधति ने अपनी पुस्तक द गाॅड ऑफ़ स्माल थिंग्स, वॉकिंग विद द कॉमरेड, द मिनिस्ट्री ऑफ़ ऑलमोस्ट हैप्पीनेस  किताबों के लेखन प्रक्रिया का जिक्र भी किया है।

अरुंधति राय अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना पसंद करते हैं। यहां तक कि जब उनकी माता मिसेज राय से झगड़ा हो जाता है। मिसेज राय का बार-बार एक वाक्य दोहराना “निकल जाओ मेरे घर से” एक दिन अरुंधति मात्र 17 साल की उम्र में केरल से  रेलगाड़ी द्वारा तीन दिन और दो रात का सफर करके दिल्ली पहुंचती है। अपने आर्किटेक्ट की पढ़ाई का खर्चा स्वयं उठाती है। अपने खिल्ली उड़ाते हुए अरुंधति “मैं बचपन में ही सीख लिया था की सबसे सुरक्षित जगह सबसे खतरनाक हो सकती है और अगर ऐसा ना भी हो तो मैं उसे ऐसा बना डालती हूं।”

अरुंधति की भाषा शैली बहुत शानदार है। पाठक को अपने साथ बनाए रखने में कामयाब हो जाती हैं।  वह जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को मज़े और व्यंग्य के साथ प्रस्तुत करतेहैं। वे अपनी आंटी कुरुसम्माल के नहलाने के तरीके का जिक्र करते हुए बताती है कि “वह हमें खौलते हुए पानी में नहलाती थी और नहलाने से पहले ही हमारे बालों में कंघी करके जूॅं निकलती और उसे मारना सिखाती । जूॅं मारना मुझे बहुत अच्छा लगता था । अंगूठे के नाखून से उन्हें कुचलते वक्त जो आवाज होती थी वह बहुत तसल्ली देती थी।”

अरुंधति रॉय साहित्य ने नए-नए प्रतीकों का प्रयोग  किया हैं जिन प्रतीकों के लिए अज्ञेय कहते हैं कि यह उपमान मैले हो गए हैं देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूंच। अरुंधति अपनी मां के गुस्से के बारे में लिखते हुए अपनी हालात को बताने के लिए नये प्रतीक का प्रयोग करती हैं  कि मेरी मां ने गुस्से से तमक कर मेरी और देखा और मेरी नकल करने लगी। मुझे महसूस हुआ कि अपनी ही देह के  भीतर सिकुड़ कर, मैं बहती जा रही हूं। किसी सिंक में चक्कर खाकर बहते हुए पानी की तरह, जब तक की पूरी तरह गायब नहीं हो गई। अमूमन पूर्णिमा के चांद को सुंदरता के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता है अरुंधति ने अपनी मां के बढ़ते हुए वजन के कारण फूले हुए चेहरे पर कमेंट करते हुए लिखते हैं “उनका चेहरा फुल कर पूर्णिमा के चांद की तरह गोल हो गया था।” इसके प्रतिरोध में उनकी मां बोलती है कि जब तुम मेरी उम्र की हो जाओगे तो तुमको दो टिकट लेनी पड़ेगी यानी दो सीटों की जगह चाहिए होगी । जिसको अरुंधति रोचक शैली में लिखती हैं – “दोगुना प्यार को अगर मेरी तीन गुना  काया से भाग देकर फ्री टिकट से गुना करें और फिर लापरवाह शब्दों से भाग कर दे; तो हासिल क्या होगा एक दहशतज़दा दिल का एक सर्द रोएंदार पतंगा।  वह पतंगा मेरा वफादार साथी था ।” पूरी किताब में मैसेज राय अपना व्यक्तित्व का निर्माण स्वयं करती हैं और समाज में अपना रुतबा बनाती हैं।

अरुंधति रॉय ईसाई धर्म के एक कुप्रथा  का भी जिक्र करते हैं जहां उनके मामा की मौत होती है तो उनको कब्रिस्तान में आसानी से जगह मिल जाती है जो कि विदुर थे लेकिन मिसेज राय जिसने वहां के समाज के बच्चों को अच्छी तालीम दी, ईसाई महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबर का हक दिलाया उसकी जब मौत होती है उसकी लाश को कब्रिस्तान में जगह नहीं दी जाती है क्योंकि वह तलाक शुदा स्त्री थी।

 अरुंधति के लेखन को लेकर हिंदी समाज में खलबली मची रहती है। पुराने वटवृक्ष हो चुके हिंदी साहित्यकारों को ज्यादा दिक्कत है क्योंकि उनका लेखन ब्राह्मणवादी परंपरा को तोड़कर हाशिए के लोगों के साथ खड़ा होता है। आज के युवा जेन-जी की पसंदीदा लेखिका है जो सांप्रदायिकता, लिंगभेद, वर्ग भेद, जाति भेद का खंडन करती हैं।

मोनिका

शोधार्थी, हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लखनऊ यूनिवर्सिटी

monikakundanpura@gmail.com

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