जंगल और अन्य कवितायें 

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कुछ बचा रहे… 

कितना भ्रम पैदा करता है 

यह सवाल 

कि जंगल बचाना है 

पहाड़ बचाना है 

नदियाँ बचाना है 

संस्कृति / परम्परा बचाना है 

व्यवस्था का गाना है 

जो सिर्फ गाया जाना है ।

कुछ लोग 

जो करते थे 

कहते नहीं थे 

उस मुहिम में 

मैं भी शामिल हुआ 

और जाना 

कि क्या-क्या है 

जो अपने स्वयं को बचाने में व्यस्त है ।

नदियाँ 

अपनी निर्मलता 

पवित्रता को बचाने में व्यस्त है 

धरती व्यस्त है 

अपनी हरियाली 

और उपजाऊपन बचाने में ।

सागर अपनी विशालता 

और 

गुणों को बचाने में  व्यस्त है ।

आसमान 

परीक्षणों से लगातार जूझ रहा है 

दूषित हवाएं उसके सीने में लदी हैं 

अपने नीलेपन को बचाने में 

आसमान लाल-पीला हुआ जा रहा है ।

पहाड़ 

अपनी चुप्पी 

सख्त मिजाज 

और खुरदुरापन को बचाने में व्यस्त है ।

बकरी के  झुण्ड 

ढूंढ आये हैं 

कुछ ठीये पत्तों के 

जो अपनी ताजगी 

और हरेपन के साथ मौजूद है 

अपने कल को बचाने के लिए ।

विनती है ईश्वर

कि बचा रहे 

थोड़ा सा शुध्द जल 

किसी कुएँ

तालाब 

पोखर में ।

बचा रहे 

हमारे बुढ़ापे के समय में 

घुटनों में पानी ।

नौजवानों में बचा रहे 

आँखों में पानी ।

हवा इतनी भी बची रहे 

कि रंग-बिरंगे पतंग उड़ सके 

आकाश में ।

इतनी उमंग बच्चों के मन में बची रहे 

कि तितली के पीछे दौड़ सकें 

उड़ते पंछी को निहारे ।

इतनी सदाशयता 

अपनापन बचा रहे 

कि बचे हुए समय में 

किसी की स्मृति बची रहे ।

बची रहे कोशिश 

इतनी भी 

कि कुछ भी जो अपने न होने के कगार पर हो 

उसे बचाया जा सके ।

जंगल

हम मनुष्य सुनने को उतने आतुर नहीं हैं

जितनी आतुरता से,जंगल अपनी बात हमसे कहना 

चाहते हैं

वे हमारी प्रतीक्षा कर रहें हैं हमारीऔर हम

अनसुना कर रहें हैं ।

मैं लगातार सड़क किनारे फैले जंगल की देह के साथ

कदमताल मिलाकर चलता हूँ

चिल्फी-घाटी के सर्पाकार सड़क तक फैले,जंगल की देह को

गौर से निहारता हूँ

मुझे लगता है जैसे वे मुझसे संवाद करना चाहते हैं

उसकी विशाल देह के भीतर घुसते ही, मैं उसके सौंदर्य में

गुम हो जाता हूँ

उसके सन्नाटे की उपस्थिति इतनी अधिक है कि व्यक्ति

अपना पता-ठिकाना भूल जाए

भूल जाए कि शहर में कोलाहल की भागमभाग भी है।

वृक्ष के गोलाकार तने में हाथ रखते ही लगता है

कि वृक्ष मेरी उंगलियों से होकर, मेरी नसों में दौड़ना 

चाह रहा है।

पहाड़ की ऊँचाई से उतरते सूखे पत्ते जिन्हें हवा

अपना साथी बनाकर, गले में बाँहे डाले घूमती रहती है

आवारा हवा के प्रेम में, पत्ते भी आवारा बन जाते हैं।

दीमकों के घर देखते ही ,उससे साक्षात्कार करने का

मन होता है

उसकी बुनावट मन मोह लेती है।

जंगल के बीच से, उसके सीने को चीरकर गुजरती सड़क

सर्पाकार हो जाती है-बार बार 

अचानक रास्ता रोककर एक चट्टान पूछती है ” इतने हजारों बरस बाद तुम क्यों चले आये,मेरे सन्नाटे भरे जीवन में आवाजों और कोलाहल को भरने “

मैंने जंगल से कहा “तुम्हारे पास तो इतनी शान्ति है

मुझे ,मेरे शहर के लिए थोड़ी सी दे दो “

जंगल ने अनसुना कर दिया

न सुनना हम से ही सीखा है -जंगल ने।

जंगल के वृक्ष, चट्टानें और सूखे पत्ते, दिन-रात सन्नाटे बुनते

रहते हैं

सन्नाटों में झींगुरों का संगीत स्पष्ट सुनायी देता है रात में

उसके सन्नाटों को चीरती है, जंगली जानवरों की डरावनी 

आवाजें और चीखें।

मैं जंगल के भूगोल में ढूंढता हूँ

जंगली फूल और मधुमक्खी के छत्ते

शहद की मिठास सा मीठा, दुनिया में और कुछ भी नहीं।

जंगल का मौन सौंदर्य इतना कुछ बयान करता है

कि आप दर्ज नहीं कर पायेंगे।

जंगल की देह में पसरे चट्टानों में जंगल

अपनी कलाकृति उकेरता है

उकेरता है ,वृक्ष टूटकर गिरे सूखे पत्तों में

कलाकृति देखकर लगता है कि जंगल के पास

जंगलीपन के अतिरिक्त एक स्वस्थ हृदय भी है 

सुधीर सोनी

रायपुर

ankitalittlecraft@gmail.com

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