जलवायु परिवर्तन: पर्यावरणीय ही नहीं, सामाजिक और आर्थिक न्याय का भी प्रश्न

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जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की समस्या नहीं बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। इसके दुष्परिणाम अब पूरे भारत में बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, लंबे समय तक चलने वाले सूखे, अचानक आने वाली बाढ़, पिघलते ग्लेशियरों, घटती कृषि उत्पादकता और मानव जीवन की गुणवत्ता पर पड़ते गंभीर प्रतिकूल प्रभावों के रूप में दिखाई दे रहे हैं। इन परिवर्तनों का बोझ सभी पर समान रूप से नहीं पड़ता। गरीब और कमज़ोर समुदाय—विशेष रूप से किसान, भूमिहीन मज़दूर, मछुआरे, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग, महिलाएँ और आदिवासी आबादी सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि उनके पास जलवायु जनित आपदाओं और संकटों का सामना करने के लिए पर्याप्त संसाधन, सुविधाएँ और अनुकूलन क्षमता उपलब्ध नहीं होती।
पूरे भारत में किसान पहले से ही बदलती जलवायु परिस्थितियों के परिणामों का अनुभव कर रहे हैं। मानसून में देरी, बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और लंबे समय तक सूखा पड़ना अब आम बात हो गई है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना में, बार-बार पड़ने वाले सूखे ने वर्षा-आधारित कृषि को तबाह कर दिया है और छोटे किसानों पर कर्ज़ का बोझ बढ़ा दिया है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में, बढ़ते तापमान के कारण सेब की खेती वाले क्षेत्र अब अधिक ऊँचाई वाले इलाकों की ओर खिसक रहे हैं। पंजाब और हरियाणा में, भूजल की कमी और बढ़ती गर्मी का मेल गहन कृषि की निरंतरता के लिए खतरा बन गया है। शहरों में आने वाली बाढ़ भी अब एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है। मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में अक्सर भयंकर बाढ़ आ जाती है, क्योंकि तेज़ बारिश की वजह से वहाँ की खराब ड्रेनेज व्यवस्था और अतिक्रमण की शिकार वेटलैंड्स (जलभराव वाली ज़मीनें) पानी को संभाल नहीं पातीं।
उत्तराखंड में बढ़ती जंगल की आग हमें यह चेतावनी देती है कि यदि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षरण को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र भविष्य में और बड़े संकटों का सामना कर सकते हैं। उत्तराखंड में पिछले तीन महीनों के दौरान जंगल की आग की 375 घटनाएँ दर्ज होना केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी पर गहराते जलवायु संकट का गंभीर संकेत है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, चमोली सबसे अधिक प्रभावित जिला रहा, जहाँ 133 घटनाओं में लगभग 200 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। इसके अतिरिक्त पौड़ी गढ़वाल, देहरादून, टिहरी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी और नैनीताल जैसे जिलों में भी आग की अनेक घटनाएँ सामने आईं। हिमालयी क्षेत्रों में जंगल की आग पहले भी होती रही है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं। इसके पीछे बढ़ता तापमान, कम होती नमी, अनियमित वर्षा और लंबे शुष्क काल प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियों में पर्याप्त वर्षा और बर्फबारी नहीं हो रही, जिससे जंगलों की सतह अधिक शुष्क हो जाती है और आग तेजी से फैलती है। चीड़ के जंगलों में जमा सूखी पत्तियाँ आग को और अधिक भड़काने का काम करती हैं। जंगल की आग केवल पेड़ों को नहीं जलाती, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती है। इससे जैव विविधता को भारी नुकसान पहुँचता है, वन्यजीवों का आवास नष्ट होता है और मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। आग के बाद पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी का कटाव बढ़ जाता है, जिससे भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का खतरा भी बढ़ता है। इसके अलावा बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और धुआँ वातावरण में पहुँचता है, जो जलवायु परिवर्तन को और गंभीर बनाता है।
भारत में जलवायु परिवर्तन के दस प्रमुख स्थानीय प्रमाण
1) उत्तर और मध्य भारत में बढ़ती हीट वेव (लू): दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, जयपुर और नागपुर जैसे शहरों में पिछले कुछ वर्षों में अत्यधिक गर्मी और लू की घटनाएँ तेजी से बढ़ी हैं। कई स्थानों पर तापमान 48°C से ऊपर पहुँच रहा है। लंबे समय तक रहने वाली गर्मी से मजदूरों, किसानों, रिक्शा चालकों और निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। रात का तापमान भी अधिक रहने लगा है, जिससे लोगों को राहत नहीं मिलती।
2) मानसून का अनियमित और अस्थिर होना: भारत में मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कहीं बारिश देर से आती है, तो कहीं बहुत कम समय में अत्यधिक वर्षा हो जाती है। बीच-बीच में लंबे शुष्क काल भी देखने को मिलते हैं। इससे किसानों के लिए बुवाई और खेती की पारंपरिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है और फसलें नष्ट हो रही हैं।
3) हिमालयी राज्यों में फ्लैश फ्लड और भूस्खलन: उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ी हैं। 2013 की केदारनाथ त्रासदी इसका बड़ा उदाहरण है। अत्यधिक वर्षा, बादल फटना और ग्लेशियर झीलों का टूटना इन आपदाओं को और गंभीर बना रहा है।
4) एक ही समय में बाढ़ और सूखा: एक ओर बिहार और असम जैसे राज्य हर वर्ष विनाशकारी बाढ़ झेलते हैं, वहीं बुंदेलखंड, मराठवाड़ा और राजस्थान के कई क्षेत्र लगातार सूखे और जल संकट का सामना कर रहे हैं। कई बार एक ही राज्य के कुछ जिलों में बाढ़ और अन्य जिलों में सूखे की स्थिति बन जाती है। यह वर्षा के असमान वितरण का परिणाम है।
5) भूजल स्तर में गिरावट और छोटी नदियों का सूखना: उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। छोटी नदियाँ, तालाब और आर्द्रभूमियाँ सूख रही हैं। बढ़ते तापमान और कम भूजल पुनर्भरण के कारण जल संकट गंभीर होता जा रहा है।
6) हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना: वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि गंगोत्री सहित अनेक हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। इससे गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के प्रवाह पर प्रभाव पड़ रहा है। प्रारंभ में इससे बाढ़ का खतरा बढ़ता है, लेकिन लंबे समय में जल उपलब्धता कम हो सकती है।
7) कृषि उत्पादन में गिरावट: उत्तर भारत में गेहूँ की पैदावार बढ़ते तापमान के कारण प्रभावित हो रही है। फसल पकने के समय अत्यधिक गर्मी उत्पादन कम कर देती है। अनियमित वर्षा, ओलावृष्टि और कीटों के बढ़ते प्रकोप से किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा दोनों प्रभावित हो रही हैं।
8) महानगरों में शहरी बाढ़: मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम जैसे शहरों में थोड़ी देर की भारी बारिश से भी गंभीर जलभराव होने लगा है। अत्यधिक वर्षा, नालों का अतिक्रमण और आर्द्रभूमियों के नष्ट होने से शहरी बाढ़ की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
9) फसलों और पारिस्थितिक तंत्र में बदलाव: हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सेब की खेती अब अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रही है क्योंकि निचले क्षेत्रों का तापमान बढ़ गया है। इसी प्रकार वनस्पतियों के फूल आने का समय, पक्षियों का प्रवास और जैव विविधता के स्वरूप में भी परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं।
10) चक्रवातों की तीव्रता में वृद्धि: अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवात अधिक शक्तिशाली होते जा रहे हैं। अम्फान, ताउते, फानी और बिपरजॉय जैसे चक्रवातों ने भारी तबाही मचाई। समुद्र के तापमान में वृद्धि इन चक्रवातों की तीव्रता बढ़ाने का एक प्रमुख कारण मानी जा रही है।
आज हम जैसे ही घरों से बाहर निकलते हैं, शरीर पसीने से तर हो जाता है, क्योंकि तापमान के साथ-साथ वातावरण में आर्द्रता (ह्यूमिडिटी) भी लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि हमें जो तापमान महसूस हो रहा है, जिसे “फील लाइक टेम्परेचर” कहा जाता है वह सामान्य अनुभव से कई डिग्री अधिक है। उदाहरण के लिए, कल लखनऊ का वास्तविक तापमान भले ही 44 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया हो, लेकिन अत्यधिक आर्द्रता के कारण वह लगभग 48 डिग्री सेल्सियस जैसा महसूस हो रहा था। तापमान और नमी का यह संयुक्त प्रभाव मानव शरीर तथा अन्य जीव-जंतुओं पर अत्यंत गंभीर दबाव डालता है। ऐसी परिस्थितियों में शरीर की प्राकृतिक शीतलन प्रणाली प्रभावित होती है, जिससे हीट स्ट्रेस, निर्जलीकरण और अनेक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। दरअसल ये गर्मी कई कारणों से बढ़ रही है। उसमें सबसे प्रमुख है ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ना। जैसे कि कार्बन डाईआक्साइड या मीथेन। ये इस तरह की गैसें हैं, जो ऊष्मा को अवशोषित करके नीचे के वातावरण में वापस भेज देती है। जैसे आप कार के अंदर हैं और शीशा बंद है। इसमें सूरज की रोशनी आ तो रही है लेकिन जाने के लिए वह बंद है। अंदर हीटिंग हो रही है, कूलिंग नहीं हो पा रही है। हम सब इसी तरह की कार के अंदर बंद हैं, जहां हीटिंग हो रही है परंतु कूलिंग नहीं हो पा रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम सब एक जाल के अंदर फंसे हैं। इसके पीछे केवल आज का उत्सर्जन नहीं है, बल्कि इसमें लंबा समय लगा है।
औद्योगिक क्रांति के बाद निरंतर कारखाने बनते गए। इसके अलावा सड़कों पर भारी संख्या में चल रहे वाहन, निर्माण उद्योग, आवास और बिजली सेक्टर ऐसे सेक्टर हैं, जिनमें निरंतर ऊर्जा की खपत हो रही लेकिन मांग बढ़ती ही जा रही है। उसकी वजह से वातावरण में ग्रीन हाउस गैस का कंसन्ट्रेशन बढ़ता जा रहा है। ग्रीनहाउस गैसों में से अगर मैं कार्बन डाईआक्साइड की बात करूं तो 1975 में यह 330 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) था। जो अब 2025 में बढ़कर 420 पीपीएम हो गया। 5000 साल पहले भी कार्बन डाईआक्साइड बढ़ा था लेकिन वह दौर ज्वालामुखी फटने का था लेकिन आज का दौर मानवजनित ग्रीनहाउस गैस का है। ग्रीनहाउस गैस का जो सिंक है अर्थात जहां वह रुकेगी, जहां उसके कन्स्ट्रेशन में कमी आएगी, उसके शोषक वृक्ष हैं या जो प्रकाश संश्लेषण से कार्बन डाईआक्साइड को लेकर आक्सीजन बनाते हैं और बायोमास में कन्वर्ट करते हैं। वुड अर्थात लकड़ी, जो कार्बन डाईआक्साइड को फिक्स करके ही बनती है। पत्ते बनाता ही। मतलब आपने कार्बन डाइआक्साइड को फिक्स कर लिया। कुछ फिक्सिंग समुद्र से भी होती है। इसको कार्बन सिक्युएंटेशन कहते हैं। समुद्र भी बड़ा सिंक है कार्बन डाईआक्साइड का । लेकिन समुद्र भी इसको कितना सोखेगा ? चूंकि समुद्र के अंदर भी कार्बन डाईआक्साइड का कन्स्ट्रेशन बढ़ता जा रहा है, जिसकी वजह से उसकी एसिडिटी बढ़ रही है। जिसकी वजह से कोरल-ब्लीचिंग (मूंगों के कमजोर होने की क्रिया) हो रही है। जिसकी वजह से डायटम्स एंड एल्गी (जो बहुत जरूरी समुद्री जीव हैं। जिस पर समुद्र का पूरा तंत्र बायोलोजिकल सिस्टम निर्भर करता है।) भी खत्म हो रहे हैं। ये भी बहुत बड़े सिंक का काम करते हैं। यहां कार्बन डाईआक्साइड का स्तर बढ़ रहा है। अब सवाल है कि इसको रोकने के क्या उपाय हैं?
कुछ उपाय :
जो उपाय हैं, वे सामूहिक तौर पर ही हो सकते हैं। हमें न केवल कई स्तरों पर बहुत से देशों के साथ मिलकर बल्कि सेंट्रल, स्टेट गवर्नमेंट और लोकल एडमिनिस्ट्रेशन, जैसे नगर निगम, नगर पंचायत के साथ (इनकी भी जिम्मेदारी उतनी ही है, जितनी एक देश की है) के साथ मिलकर काम करना होगा। अगर मैं बात करूं कि कार्बन डाईआक्साइड के उत्सर्जन में फ्रांस का जो कंट्रीब्यूशन है, वह मुंबई के कंट्रीब्यूशन से कितना तुलना-योग्य है ? ये तुलना करने योग्य नहीं है। यहां, एक तरफ एक देश है, तो दूसरी तरफ एक शहर या महानगर है। यहां पर दरअसल दोनों ही स्तरों पर काम होना है। महानगर स्तर पर जो लोग सिटी प्लानिंग करते हैं, वे इस तरह प्लानिंग करें कि कार्बन डाईआक्साइड एनर्जी से संबंधित जो उत्सर्जन हैं (जैसे कूलिंग, हीटिंग, ट्रांसपोर्टेशन आदि),वे कम हों। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का स्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे गर्मी हो रही है। ये गर्मी बढ़ रही है, कार्बन डाईआक्साइड बढ़ रहा है। ये क्यों बढ़ रहा है? इसकी वजह हैं-फासिल फ्यूल अर्थात डीजल, पेट्रोल। एक बड़ा कारण हाउसिंग सेक्टर है, जो हीटिंग और एनर्जी, हीटिंग यानी कोल्ड कंट्रीज में जो हीटिंग चाहिए होती है (उन्हें अपने घर को गरम रखना होता है, जिसके लिए बहुत बिजली की जरूरत होती है)। दूसरी तरफ, जो ट्रापिकल कंट्रीज (उष्णकटिबंधीय देश) हैं, जैसे-भारत, वहां कूलिंग की जरूरत होती है। बहुत ज्यादा एअर कंडीशनिंग की जरूरत होती है।
दूसरी तरफ, भारत में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इन्फ्रास्ट्रक्चर अभी भी बहुत पुअर है। ट्रांसपोर्ट का जोआदर्श स्तर होना चाहिए, वह अभी कुछ ही महानगरों में है। फीडर सर्विसेज नहीं हैं, जिससे लोग ऐन्ड टू ऐन्ड ट्रांसपोर्ट यूज कर सकें। जैसे मुझे मेट्रो से कहीं जाना है, तो मुझे प्राइवेट कार से कुछ इलाका पार करके उस जगह पहुंचना पड़ेगा, जहां से मुझे मेट्रो मिलेगी। ऐसे में हमें पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर बहुत ज्यादा ध्यान देना है। हमें एनर्जी डिमांड पर ध्यान देते हुए एनर्जी फुटप्रिंट्स को कम करना है।
हमारे यहां पार्क भी इसी तरह की अव्यवस्था के शिकार हैं। अव्वल तो पार्क जितनी संख्या में होने चाहिए, हैं नहीं। जो हैं, वे बदहाल हैं। लखनऊ में करीब 2400 पार्क हैं लेकिन होना यह चाहिए कि हर एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर एक बड़ा पार्क हो। ये भी हीट को कम करने का काम करता है। इसके अलावा शहरों में जो जंगल, घने जंगल थे, जिसको डीप फारेस्ट या डेन्स फारेस्ट कहा जाता था, वे अब बचे ही नहीं हैं। उनकी जगह ओपेन फारेस्ट या प्लांटेशन फारेस्ट आ गए हैं। जैसे पहले लखनऊ में कुकरैल फारेस्ट (पांच हजार एकड़ में) था। इसके अलावा जानकीपुरम, कैंट, मूसाबाग, मलिहाबाद के मैंगो-फारेस्ट थे। लेकिन अब वे सब खंड-खंड हो गए। जैसे-जैसे हाईवे, रिंगरोड बने, सब कई हिस्सों में कटते चले गए। छोटे-छोटे नालों, तालाबों को भारी नुकसान हुआ। उनकी जगह पर हमने कंक्रीट के घर बना लिए हैं। कंक्रीट की डेन्सिटी है, उसे हम बढ़ाते जा रहे हैं। इससे हीटलेंड इफेक्ट हो रहा है। इन स्थानों पर हमें शहरी जंगल ही सही, घने जंगल बनाने पड़ेंगे।
आज नदियों को नहर की तरह बना दिया गया है। गोमती के साथ-साथ अन्य जो छोटी नदियां हैं। जैसे आमी, सई या सरायन (सीतापुर में) नदियां हों, ये छोटी-छोटी नदियां या तो सूख रही हैं या फिर उन पर अतिक्रमण हो गया है। ये सभी प्रदूषण की मार झेल रही हैं। हमें यह भलीभांति समझना होगा कि जब तक हम छोटी नदियों को पुनर्जीवित नहीं करेंगे, तब तक हम बड़ी नदियों को ठीक नहीं कर सकते। गंगा जैसी बड़ी नदियां, छोटी नदियों पर निर्भर करती हैं। गंगा में गंगोत्री का पानी हरिद्वार के बाद ही खत्म हो जाता है। अगर ये छोटी नदियां नहीं होतीं तो गंगाजी का वजूद कैसा होता? छोटी नदियों को उतनी ही महत्ता दी जाए, जितनी हम बड़ी नदियों को दे रहे हैं।
आज सबसे जरूरी है शहर में जाम से मुक्त ट्रांसपोर्ट सिस्टम बनाना। और जो प्रदूषण फैलाने वाले वाहन हैं, उन्हें हटा देना चाहिए। हम लोग जरूर स्मार्ट वाहन चला रहे हैं लेकिन लखनऊ में तमाम वाहन ऐसे हैं, जिन्हें तुरंत बाहर किए जाने की जरूरत है। लखनऊ से बाहर के क्षेत्रों में भी बहुत से खराब बसें, विक्रम वाहन ऐसे चल रहे हैं, जिनका दुष्प्रभाव दूर से भी यहां तक पड़ रहा है। अपना राजधानी को स्वच्छ हवा देने के लिए हमें ब्रीदिंग जोन बनाना पड़ेगा। इसके लिए प्लांटेशन करने पड़ेगे। सिटी फारेस्ट व सिटी पार्क बनाने पड़ेंगे। प्रदूषण फैलाने वाली इंडस्ट्रीज को बंद करना पड़ेगा। स्माल स्केल इंडस्ट्रीज में ट्रीटमेंट यूनिट्स लगाने पड़ेंगे। ईंट के भट्ठों में देखना पड़ेगा कि उनके प्रदूषण को कैसे कम किया जाए? इसके लिए कई स्तरों पर काम करना पड़ेगा। ट्रांसपोर्ट तो है ही, हमारे घरों के अंदर जो इलेक्ट्रिक अप्लायंसेज हैं, उनमें देखना पड़ेगा कि उनकी एनर्जी रेटिंग क्या है? लोगों को इन्सेंटिव देकर फाइव स्टार रेटिंग वाले अप्लायंसेज दिलवाये जाएं, जिससे प्रदूषण कम हो। सरकार इसके लिए सब्सिडी दे। इससे धीरे-धीरे शहर की हवा ठीक होगी। जब छोटे से लेकर बड़े स्तर तक काम होगा और चारों तरफ से काम होगा। ट्रांसपोर्ट कारीडोर बनेंगे। मेट्रो कारीडोर बनेंगे। रेलवे फ्रेट कारीडोर बनेंगे, तो सिटी के अंदर निर्बाधहोगा। तभी हमारी हवा साफ हो पाएगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पर्यावरण की स्थिति
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पर्यावरण की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अभी बाकू में संपन्न कॉप-29 सम्मेलन में देखा गया कि धरती को सबसे ज्यादा प्रदूषित करने वाले विकसित देश अपने रवैये में सुधार करने के लिए तैयार नहीं हैं। खास करके अमेरिका। फिर जलवायु संकट का समाधान कैसे निकलेगा ? अभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हम बहुत पीछे चले गए हैं। खास करके अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप सरकार के आने के बाद से। उधर, कॉप सम्मेलनों में कुछ अच्छी चीजें हुईं थीं। हम एक माइलस्टोन तक पहुंच पाए थे। चाहे क्लाइमेट फंड हो या अंतरराष्ट्रीय सहयोग हो या फिर पेरिस एग्रीमेंट हो, लेकिन फिर देखा जा रहा है कि जो ग्लोबल क्लाइमेट आर्किटेक्चर बनकर उभरा है, वह बहुत ही टूटा-फूटा सा है। वह संपूर्णता में नहीं है, टुकड़ों-टुकड़ों में है। इसमें अमेरिका अपने आपको एक गॉडफादर के तौर पर देख रहा है। अगर आप अमेरिका के प्रति व्यक्ति कार्बनउत्सर्जन को देखें तो वहां का उत्सर्जन भारत के उत्सर्जन से चार या पांच गुना ज्यादा है। वहां प्रति व्यक्ति वेस्ट-जनरेशन भी भारत से करीब 10 गुना ज्यादा है। ये जो विकसित देश हैं, इनके डंपिग ग्राउंड भारत, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देश बन गए हैं,। वहां का जो कूड़ा है, वह हमारे पोर्ट पर आता है। गुजरात या अन्य पोर्ट्स पर। फिर हम उसकी रीसाइकलिंग करते हैं। जो डर्टी एंडस्ट्रीज हैं, उन्हें वे हमारे देश में स्थापित करके, यहां सस्ता उत्पादन करके उसे बाहर महंगे दामों में बेच रहे हैं। दूसरे नजरिये से देखें तो जिस तरह विकसित देशों ने विकासशील देशों को अपना डंपिंग ग्राउंड बना रखा है, उससे ये सवाल एनवायरमेंटल जस्टिस और ह्यूमन राइट से जुड़ा हुआ है। अगर आप यह सोचते हैं कि विकसित देशों के लोगों का जीवन ज्यादा महत्वपूर्ण है तो यह गलत है। दूसरी तरफ, अमेरिका अब हमें यह भी बता रहा है कि हम क्या करें, क्या न करें ? अमेरिका अब कह रहा है कि भारत यह न करे, वह न करें। सड़कें न बनाए। पावर प्लांट न लगाए। उसका व्यवहार गॉड फादर जैसा है। पहले तो खुद किया, अब दूसरे से कह रहा है कि आप क्लाइमेट चेंज कर रहे हैं।
हालांकि कुछ चीजों में भारत को भी कार्बनउत्सर्जन कम करना पड़ेगा। क्योंकि हमारा पर कैपिटा भले कम हो लेकिन ओवर आल कंट्रीब्यूशन तो बहुत ज्यादा है। 20 प्रतिशत प्लास्टिक वेस्ट भारत का ही है। पर कैपिटा पापुलेशन ज्यादा है। हमारी जनसंख्या तो 1.4 बिलियन से ऊपर है न। तो सवाल है कि इसका समाधान कैसे निकलेगा ? तो इसका जवाब है कि सबसे पहले हमें ब्लेम-गेम बंद करना पड़ेगा। कौन ज्यादा उत्सर्जन कर रहा है, कौन कम कर रहा है, इसके चक्कर से निकलना होगा। हमें यह चीज गहराई से समझनी होगी कि यह मसला हम सभी के अस्तित्व का है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका में लोग गेटेड सोसाइटी में रह सकते हैं और हम लोग उससे अलग-थलग हैं। हम सब लोग एक ही नाव में सवार हैं और उस नाव में छेद हो चुका है। अब उस छेद को बंद करने के लिए सभी को आगे आना पड़ेगा, नहीं तो कोई पहले डूबेगा कोई बाद में डूबेगा। हम सबको मिलकर देखना होगा कि आज की जो कार्बन इंटेंसिटी है, हम उसको क्या कम नहीं कर सकते ? क्योंकि अगर हम आज भी कम कर लें तो टेम्परेचर को कम होने में पचास से साठ साल लगेगा। जिस सीओटू को हमने जिस लेवल पर पहुंचा दिया है, उसे स्टैबल होने में ही चार सौ साल लग जाएगा। अब तो मामला हाथ से निकल चुका है। अगर आप मुझसे पर्सनली पूछेंगे मैं इसमें यही कहूंगा कि हमारे पास समय ही नहीं है। मैं भविष्य के बारे में सोचता नहीं हूं। कई लोग मेरी बात को मेरी नेगेटिव अप्रोच समझते हैं लेकिन मैं तो समझता हूं कि आने वाले दिनों में अगर कोई इनक्रीमेंटल इन्नोवेशन नहीं हुआ तो हमारे भविष्य पर बहुत बड़ा खतरा है। हमारे बच्चों पर हमारी आने वाली जनरेशन पर खतरा है। क्योंकि हम कंफर्ट जोन से निकल चुके हैं। दुख की बात यह है कि अभी भी लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि रेवन्यू और जीडीपी को लेकर क्या करेंगे, जब हमारे सांस लेने के लिए हवा नहीं होगी। या पीने के लिए पानी नहीं होगा। पानी में जहर मिला हो और बड़ी-बड़ी बिल्डिगें बना दो लेकिन आपको शुद्ध पानी, हवा नहीं मिल रही है। खाने में पेस्टीसाइड है। ये सब क्लाइमेट चेंज से जुड़ा है। प्रोडक्शन से जुड़ा है। तो पूरे प्रोडक्शन साइकल को क्लाइमेट न्यूट्रल, क्लाइमेट फ्रेंडली, कार्बन अरबन न्यूट्रल करना पड़ेगा। कार्बन इंटेंसिटी को कम करना पड़ेगा। इसको सबको मिल-जुलकर करना पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि विकसित देशों की जिम्मेदारी खत्म हो गई है। उनकी जिम्मेदारी और बढ़ी है। उनको हमें आगे बढ़कर मदद देनी है।
जलवायु परिवर्तन इक्कीसवीं सदी में भारत के सामने आने वाली सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसके प्रमाण बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, अचानक आने वाली बाढ़, सूखे, फ़सलों के नुकसान और पानी की कमी के रूप में तेज़ी से दिखाई दे रहे हैं। हालाँकि समाज के सभी वर्ग इससे प्रभावित हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा बोझ गरीबों पर पड़ता है, क्योंकि वे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर होते हैं और उनमें परिस्थितियों के अनुसार ढलने की क्षमता सीमित होती है। इसलिए, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए न केवल तकनीकी समाधानों की आवश्यकता है, बल्कि सामाजिक न्याय, पारिस्थितिक और सतत विकास नीतियों की भी ज़रूरत है, जो लोगों और प्रकृति—दोनों की रक्षा कर सकें। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष वास्तव में मानव सभ्यता और प्रकृति के बीच संतुलन बचाने की लड़ाई है।

प्रो. वेंकटेश दत्ता

विभागाध्यक्ष, पर्यावरण विज्ञान विभाग, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ

dvenks@gmail.com

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