इंटरव्यू : नेहरू से लेकर मोदी तक: कितना बदला भारत?

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प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे लम्बे समय तक वर्तमान में प्रधानमंत्री हैं। नेहरू राष्ट्र निर्माण की नींव रखने वालों के अगुवा रहे है। उनकी विरासत की छाप सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक, तकनीकी और सिनेमा हर जगह है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इन सभी क्षेत्रों पर असर डाला है। देश में क्या बदलाव हुआ, देश  और  लोगों को क्या हासिल हुआ, इसी पर करेंट एजेंडा मैगजीन के सह-संपादक डॉ. अनूप पटेल ने  प्रोफेसर संजय कुमार से बात-चीत किया है। प्रो. संजय वर्तमान में लखीमपुर खीरी के YDPG College में राजनीति विभाग मे फ़ैकल्टी में मेंबर हैंऔर एक महत्त्वपूर्ण शोध संस्थान CSSP (Center for the Study of Society and Politics) के नैशनल  कॉन्वेनर  हैं।

सवाल : भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले दो नेताओं-पंडित जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की शैली, राजनीतिक दृष्टि और शासन मॉडल में सबसे बड़ा अंतर क्या है?

     जवाब :  नेहरू और नरेंद्र मोदी की नेतृत्व शैली, राजनीतिक दृष्टि और शासन मॉडल में मूलभूत अंतर दिखाई देता है। नेहरू का दृष्टिकोण उदार, संस्थागत और वैश्विक था। वे भारत को एक लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और आधुनिक राष्ट्र के रूप में विकसित करना चाहते थे तथा विश्व राजनीति में गुटनिरपेक्षता के माध्यम से भारत की स्वतंत्र पहचान स्थापित करने के पक्षधर थे। उनकी ऐतिहासिक समझ, संसदीय परंपराओं में विश्वास और संस्थाओं के निर्माण पर विशेष बल था। इसके विपरीत, नरेंद्र मोदी का नेतृत्व अधिक व्यक्तित्व-केंद्रित और केंद्रीकृत दिखाई देता है। उनका प्रमुख लक्ष्य भारत को वैश्विक शक्ति और ‘विश्वगुरु’ के रूप में प्रस्तुत करना रहा है, किंतु शासन के अनेक पहलुओं में प्रचार और इवेंट-आधारित राजनीति का प्रभाव भी बढ़ा है।

वर्ष 2014 से 2019 तक मोदी सरकार के प्रति व्यापक उम्मीदें थीं कि वे शासन और विकास के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन लाएँगे, लेकिन बाद के वर्षों में उनकी राजनीति वैचारिक और सांस्कृतिक मुद्दों की ओर ज्यादा झुकती हुई दिखाई दी। विदेश नीति, लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व जैसे विषयों पर भी आलोचनाएँ बढ़ी हैं। इस दृष्टि से नेहरू का मॉडल संस्थागत लोकतंत्र और समावेशी राष्ट्र-निर्माण पर आधारित था, जबकि वर्तमान शासन मॉडल अधिक केंद्रीकृत नेतृत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित माना जा रहा है।

सवाल : नेहरू के संसदीय लोकतंत्र और संस्थागत राजनीति से आगे बढ़कर मोदी के दौर में अधिक केंद्रीकृत नेतृत्व और व्यक्तित्व-आधारित राजनीति हो गई है? इसका भविष्य क्या है?

जवाब : नेहरू संसदीय लोकतंत्र और संस्थागत राजनीति के प्रबल समर्थक थे। संविधान निर्माण की पूरी प्रक्रिया व्यापक बहस, विमर्श और सहमति के आधार पर आगे बढ़ी। संसद, न्यायपालिका तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं को लोकतंत्र की आधारशिला माना गया और उन्हें पर्याप्त स्वायत्तता प्रदान की गई। स्वतंत्र भारत में पंचवर्षीय योजनाओं, सार्वजनिक संस्थानों तथा वैज्ञानिक और शैक्षणिक संस्थाओं के निर्माण ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत आधार दिया।

इसके विपरीत, वर्तमान दौर में सत्ता का केंद्रीकरण और व्यक्तित्व-आधारित राजनीति अधिक प्रभावी होती दिखाई देती है। छोटे राजनीतिक दलों का प्रभाव घटा है, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर प्रश्न उठे हैं और विपक्ष की भूमिका भी अपेक्षाकृत कमजोर हुई है। यदि यही प्रवृत्ति आगे बढ़ती है, तो लोकतंत्र में शक्ति-संतुलन और नागरिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा होगी।

सवाल : नेहरू के धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) राष्ट्र की अवधारणा और मोदी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बीच मूलभूत वैचारिक अंतर क्या हैं? क्या भारत एक नए राजनीतिक-सांस्कृतिक दौर में प्रवेश कर चुका है?

जवाब : नेहरू की राष्ट्र-कल्पना धर्मनिरपेक्षता, बहुलतावाद और विविधता पर आधारित थी। उनका मानना था कि भारत अनेक धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों का साझा देश है, इसलिए राष्ट्र की पहचान सभी नागरिकों की समान भागीदारी से बनेगी। इसके विपरीत, वर्तमान समय में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा अधिक प्रमुख हुई है, जिसमें साझा भारतीय पहचान की अपेक्षा हिंदू सांस्कृतिक पहचान को अधिक महत्व दिए जाने का प्रयास दिखाई देता है।

पिछले एक दशक में शिक्षा, इतिहास-लेखन, नागरिकता, सांस्कृतिक प्रतीकों और सार्वजनिक विमर्श में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिले हैं। आलोचकों का मानना है कि इससे भारत की पारंपरिक बहुलतावादी पहचान प्रभावित हुई है और समाज में विविधता की जगह एकरूपता स्थापित करने का प्रयास हुआ है। दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत के पुनर्जागरण की प्रक्रिया है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारत निश्चित रूप से एक नए राजनीतिक-सांस्कृतिक दौर से गुजर रहा है, जिसके दीर्घकालिक परिणामों का आकलन अभी शेष है।

सवाल : क्या भारतीय राजनीति में विकास, कल्याण और आर्थिक नीतियों से अधिक ‘हिंदू पहचान’ और सांस्कृतिक मुद्दे चुनावी राजनीति का केंद्र बन चुके हैं?

जवाब : पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति के विमर्श में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। पहले चुनावी राजनीति में विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक नीतियाँ प्रमुख मुद्दे हुआ करती थीं, जबकि अब हिंदू पहचान, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, धार्मिक प्रतीक और ऐतिहासिक विमर्श अधिक प्रभावशाली दिखाई देते हैं। पिछले तीन आम चुनावों में सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों ने चुनावी रणनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। हालांकि वर्ष 2024 के चुनाव में केवल इन मुद्दों के आधार पर अपेक्षित सफलता नहीं मिली, फिर भी यह स्पष्ट है कि हिंदू पहचान वर्तमान राजनीति का केंद्रीय तत्व बन चुकी है।

इस परिवर्तन का प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, इतिहास, सांस्कृतिक प्रतीकों और सार्वजनिक विमर्श में भी दिखाई देता है। इससे विकास और सामाजिक कल्याण जैसे प्रश्न अपेक्षाकृत पीछे चले गए हैं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह भारत की सांस्कृतिक अस्मिता के पुनर्स्थापन का प्रयास है। इसलिए कहा जा सकता है कि आज चुनावी राजनीति में सांस्कृतिक पहचान और वैचारिक मुद्दों का महत्व पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है।

सवाल : नेहरू के समय में राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र पर बल था, जबकि मोदी काल में निजीकरण और कॉर्पोरेट क्षेत्र की भूमिका बढ़ी है। क्या इससे लोकतंत्र और नीति-निर्माण पर कॉर्पोरेट प्रभाव भी बढ़ा है?

जवाब : नेहरू के आर्थिक मॉडल का आधार मिश्रित अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक क्षेत्र और राज्य की सक्रिय भूमिका थी। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से भारी उद्योगों, सार्वजनिक उपक्रमों, वैज्ञानिक संस्थानों तथा शिक्षा के क्षेत्र में बड़े निवेश किए गए। भिलाई, भेल, सेल, आईआईटी और आईआईएम जैसी संस्थाओं ने भारत के औद्योगिक और वैज्ञानिक विकास की मजबूत नींव रखी। इस मॉडल का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और संस्थागत क्षमता का निर्माण भी था।

इसके विपरीत, वर्तमान दौर में निजी निवेश, विनिवेश और कॉर्पोरेट क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ी है। इससे नीति-निर्माण पर बड़े कॉर्पोरेट समूहों का प्रभाव भी बढ़ा है तथा सार्वजनिक क्षेत्र अपेक्षाकृत कमजोर हुआ है। यदि आर्थिक नीतियों में कॉर्पोरेट हितों का प्रभाव अधिक होगा, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही और समान अवसरों की अवधारणा प्रभावित हो सकती है। यह बहस आज भारतीय अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण बनी हुई है।

सवाल : दलित और पिछड़े वर्गों की राजनीति नेहरू काल से लेकर मोदी काल तक किस प्रकार बदली है? क्या सामाजिक न्याय की राजनीति कमजोर हुई है, या उसने नया स्वरूप ग्रहण किया है?

जवाब : नेहरू काल में सामाजिक न्याय का प्रश्न मुख्यतः संवैधानिक समानता, आरक्षण और कल्याणकारी नीतियों के माध्यम से आगे बढ़ा। बाद में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद पिछड़े वर्गों की राजनीति राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गयी और सामाजिक न्याय भारतीय लोकतंत्र का प्रमुख विमर्श बन गया। इससे दलितों और पिछड़े वर्गों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा सत्ता में भागीदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी।

     वर्तमान समय में सामाजिक न्याय की राजनीति का स्वरूप बदलता दिखाई देता है। आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे पहले की अपेक्षा कम प्रमुख हो गए हैं तथा उनकी जगह हिंदू पहचान और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने ले ली है। साथ ही, दलित और पिछड़े वर्गों को व्यापक हिंदू पहचान के अंतर्गत संगठित करने की राजनीतिक रणनीति अपनाई गई है। अब विपक्षी दलों के लिये ‘सामाजिक न्याय’ एक घृणित शब्द जैसा बन गया है। अब योजनाओं और लाभदायक राजनीति के माध्यम से ‘सामाजिक न्याय’ को नया रूप दिया गया है।

सवाल : मंडल राजनीति के दौर से निकलकर आज ‘हिंदू एकता’ की राजनीति किस तरह प्रमुख हुई है? क्या सामाजिक न्याय पर धार्मिक पहचान भारी पड़ गई है?

जवाब : 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय, आरक्षण और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए थे। क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ और जाति-आधारित राजनीतिक लामबंदी ने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल दी। लेकिन पिछले एक दशक में यह विमर्श धीरे-धीरे हिंदू पहचान और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति के सामने कमजोर पड़ता दिखाई देता है। इससे सामाजिक न्याय, आरक्षण और प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्न राजनीतिक एजेंडे में पीछे चले गए हैं। शिक्षा, इतिहास, सांस्कृतिक प्रतीकों और सार्वजनिक विमर्श में भी हिंदू पुनर्जागरण की अवधारणा को अधिक महत्व दिया गया है। वर्तमान दौर में धार्मिक पहचान ने सामाजिक न्याय की राजनीति को काफी हद तक पीछे धकेल दिया है और भारतीय राजनीति की वैचारिक दिशा बदल दी है।

सवाल : स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों की तुलना में आज भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी, प्रतिनिधित्व और भूमिका में क्या परिवर्तन आया है? क्या उनकी राजनीतिक स्थिति पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हुई है?

जवाब : स्वतंत्रता के बाद भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे में सभी समुदायों की समान भागीदारी और प्रतिनिधित्व पर बल दिया गया था। नेहरू के नेतृत्व में धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा के अंतर्गत मुसलमानों सहित सभी अल्पसंख्यकों को राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का समान भागीदार माना गया। समय के साथ उनकी राजनीतिक भागीदारी विभिन्न दलों के माध्यम से बनी रही, यद्यपि प्रतिनिधित्व में उतार-चढ़ाव भी आते रहे।

     वर्तमान समय में संसद और विधानसभाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व घटा है तथा प्रमुख राजनीतिक दलों, विशेषकर सत्तारूढ़ दल, में उनकी भागीदारी सीमित दिखाई देती है। साथ ही, नागरिकता, पहचान और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से जुड़े मुद्दों ने उनकी राजनीतिक स्थिति को अधिक जटिल बनाया है। सरकार का कहना है कि उसकी कल्याणकारी योजनाएँ धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू होती हैं। स्पष्ट है कि भारतीय मुसलमानों की राजनीतिक स्थिति आज पहले की तुलना में अधिक कमजोर हुई है।

सवाल : नेहरू के समय विपक्ष अपेक्षाकृत कमजोर था, लेकिन संस्थाएँ मजबूत मानी जाती थीं। आज विपक्ष अधिक संगठित होने की कोशिश कर रहा है, फिर भी उसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं। भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका कितनी बदल गई है?

जवाब : नेहरू के दौर में कांग्रेस का राजनीतिक प्रभुत्व था और विपक्ष अपेक्षाकृत कमजोर था, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और संसदीय परंपराओं को व्यापक सम्मान प्राप्त था। संसद में बहस, असहमति और संस्थागत निर्णय-प्रक्रिया लोकतंत्र की शक्ति मानी जाती थी। न्यायपालिका, चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर अपेक्षाकृत कम प्रश्न उठते थे।

     वर्तमान समय में विपक्ष पहले की तुलना में अधिक संगठित होने का प्रयास कर रहा है, लेकिन उसके प्रभाव को लेकर लगातार प्रश्न उठते हैं। सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ने से विपक्ष की भूमिका सीमित हुई है तथा संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी बहस तेज हुई है। इसलिए आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती सत्ता और विपक्ष के बीच स्वस्थ लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखना है।

सवाल : यदि नेहरू का भारत ‘राष्ट्र-निर्माण’ का भारत था और मोदी का भारत ‘न्यू इंडिया’ का दावा करता है, तो इन दोनों परियोजनाओं में लोकतंत्र, संविधान, नागरिक अधिकार, सामाजिक समावेशन और भारत की वैश्विक भूमिका के संदर्भ में सबसे बड़ा अंतर क्या दिखाई देता है?

जवाब : नेहरू की राष्ट्र-निर्माण परियोजना का आधार लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक समावेशन, वैज्ञानिक सोच और संस्थाओं का निर्माण था। उनका उद्देश्य एक ऐसे आधुनिक भारत का निर्माण करना था जहाँ विविधता को राष्ट्रीय शक्ति माना जाए और सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त हों। विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता के माध्यम से भारत ने विश्व मंच पर स्वतंत्र पहचान बनाई।

      इसके विपरीत, “न्यू इंडिया” की अवधारणा में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, मजबूत नेतृत्व, तेज़ निर्णय क्षमता पर अधिक बल दिया गया है। इस प्रक्रिया में लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों के सामने नई चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं तथा बहुलतावादी राष्ट्र की अवधारणा पर भी बहस तेज हुई है। यही दोनों परियोजनाओं के बीच सबसे बड़ा वैचारिक और राजनीतिक अंतर दिखाई देता है।

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