वो लोकप्रिय धारणाएँ जिन पर हिंदुत्व ने सवारी की

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आम बोलचाल में प्रचलित धारणाओं की अपनी राजनैतिक संरचना होती है। इन धारणाओं का निर्माण प्रभुत्वशाली वर्ग ही करता है। मसलन, भारत सोने की चिड़िया था। यह किसी दलित बस्ती से निकली धारणा नहीं हो सकती। वैसे ही ‘बाकी जो बचे थे काले चोर ले गए’, यह गाना काले रंग की नानी अपने काले रंग के नाती-पोतों को तो नहीं सुनाती होंगी। लेकिन इसे वर्चस्वशाली वर्ग और रंग रूप वालों ने गढ़ा, इसलिए इन्हें आम सार्वभौमिक स्वीकृति मिल गयी।   

      राजनीतिक संदर्भ में देखा जाए तो ऐसी धारणाओं की दिशा आसानी से समझी जा सकती है। मसलन यह एक राजनीतिक सत्य है कि लोकतंत्र आने से सभी वर्गों का फ़ायदा नहीं हुआ, क्योंकि इससे कुछ लोगों को अधिकार मिले तो वहीं कुछ लोगों के जन्मगत माने जाने वाले अधिकारों से उन्हें वंचित भी किया गया, जिनका वर्चस्व कम हुआ। उन्होंने गाँधी और नेहरू के ख़िलाफ़ नैरेटिव फैलाये, गाँधी को मजबूरी का पर्याय बताया तो नेहरू को हर समस्या के लिए ज़िम्मेदार। पिछड़ों को आरक्षण देने का प्रयास हुआ तो मुंगेरीलाल कमेटी की सिफारिशों को लेकर उसे असंभव बताते हुए उसे कभी न पूरा होने वाला सपना घोषित कर दिया। इन सभी नैरेटिव्स की जननी हिंदुत्व की विचार प्रक्रिया ही रही, क्योंकि कांग्रेसी, सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट इन नेताओं के बारे में ऐसा नहीं कर सकते थे। ये सारी ही धारणाएँ भविष्य को ध्यान में रखकर निर्मित की गई थीं, जिन्हें आम स्वीकृति मिली थी।
इस लेख में हम ऐसे दो लोकप्रिय धारणाओं पर बात करेंगे, जिसने आरएसएस की विचारधारा को राजनीतिक स्वीकार्यता हासिल करने में मदद की।


पहला
      ‘राजनीति में कोई भी स्थायी दोस्त या विरोधी नहीं होता।’ विचारधारा के आधार पर भारतीय राजनीतिक दलों को मुख्य तौर पर दो स्थायी भागों में बाँटा जा सकता है। एक तरफ, जो पार्टियाँ संविधान की मूल भावना यानी समाजवाद और सेक्युलरिज्म को मानती हैं, जिसमें हम कांग्रेस, मंडलवादी, अम्बेडकरवादी, द्रविड़ आंदोलन की और साम्यवादी पार्टियों को रख सकते हैं। दूसरी तरफ हिंदू महासभा, जनसंघ और उसके बाद के अवतार भाजपा को रख सकते हैं, जो समाजवादी और सेक्युलर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के उद्देश्य के साथ गठित हुई।  ऐसे में यह देखना ज़रूरी होगा कि इस धारणा का विकास किन लोगों ने किया और वो किन दलों से संबद्ध थे, जो मानते थे कि राजनीति में कोई भी स्थायी दोस्त या विरोधी नहीं होता।     

      यदि विचारधारा के स्तर पर दलगत विभाजन स्थायी है तो फिर राजनीतिक दोस्त और विरोधी भी स्थायी ही होने चाहिए; यानी यह धारणा ही अपने आप में वैचारिक विचलन से उत्पन्न हुई है। मोटे तौर पर यह प्रमाणित है कि कांग्रेस या वामपंथी वैचारिकी से यह धारणा नहीं निकली है, क्योंकि इन दोनों दलों का कभी भी भाजपा के साथ गठबंधन नहीं रहा है और न होने की संभावना है। चुनावी राजनीति के संदर्भ में जाँचे तो इस धारणा का जनक समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया को माना जा सकता है, जिन्होंने 1967 में ग़ैर कांग्रेसवाद के नाम पर आर.एस.एस. और जनसंघ से समझौता किया और सवाल उठने पर कहा था कि अगर आर.एस.एस. राक्षस है तो भी वो कांग्रेस को हराने के लिए उस राक्षस से हाथ मिला सकते हैं। घोषित आर.एस.एस. विरोधी वैचारिक दल के इस वैचारिक विचलन के बाद ही पहली बार आर.एस.एस. या जनसंघ केंद्रीय भूमिका में आया था।

      लोहिया के शिष्य जय प्रकाश नारायण के कांग्रेस विरोधी आंदोलन में भी यह स्वर देखा जा सकता है, जिसकी सफाई देते हुए जेपी ने अपनी जेल डायरी में लिखा है कि, ‘उन्हें उम्मीद थी कि आर.एस.एस. इस आंदोलन में शामिल होने के बाद बदल जाएगा, लेकिन उन्हें आर.एस.एस. ने निराश किया।’ इस दौरान फिर एक बार ऐसा गठजोड़ बना जिसमें ग़ैर आर.एस.एस. पृष्ठभूमि के नेताओं के सहयोग से संविधान विरोधी आर.एस.एस. केंद्रीय भूमिका में आ गया था। ज़ाहिर है यह ऐसा पहला आंदोलन था, जिसमें शामिल दलों के लिए विचारधारा का सवाल धूमिल हो गया था। हालांकि यह सब ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के नाम पर हुआ लेकिन आर.एस.एस. जैसे संगठन को साथ लेकर तो कोई क्रांति नहीं हो सकती थी, सिर्फ सत्ता परिवर्तन ही हो सकता था, जो हुआ।

      इसके क़रीब पौने दो दशक तक, यानी कांग्रेस के एकछत्र शासन तक, जब भाजपा बुरी तरह कमज़ोर हो चुकी थी, यह धारणा भी कमज़ोर रही। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा जैसे ही सन् 1998 में सत्ता के क़रीब पहुँची, यह धारणा एक नए तर्क के साथ उभरी, जिसके केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी का कथित उदार चेहरा था। चूँकि 1992 ई. में भाजपा बाबरी मस्जिद का ध्वंस कर चुकी थी, इसलिए सीधे भाजपा के साथ जाना कुछ दलों के लिए आसान नहीं था, इसलिए इस धारणा के परजीवियों ने पार्टी के बजाय व्यक्ति पर फोकस करने की रणनीति बनायी। वाजपेयी के इर्द-गिर्द यह नैरेटिव गढ़ा गया कि वो ‘सही आदमी हैं जो ग़लत पार्टी में हैं’। इसलिए उनके साथ जाया जा सकता है।

     दरअसल, इस विचलन की जड़ें भी जेपी आंदोलन में ही थीं, जहाँ व्यक्तिगत तौर पर सभी ‘अच्छे’ लोगों को मिलकर ‘दलविहीन’ सरकार बनाने का विचार जेपी ने रखा था। यानी, विचारधारा के बजाए व्यक्तिगत आचरण से नेताओं का मूल्यांकन किया जाने का तर्क उन्होंने दिया। इसमें विचारधारा के स्तर पर अछूत माने जाने वाले संघियों को ‘आचरण’ के आधार पर स्वीकार्य कर लिए जाने का अवसर दिखा। विचारधारा के आधार पर गाँधी जी की हत्या के बाद सार्वजनिक जीवन से बहिष्कृत चल रहे आर.एस.एस. ने तब रणनीतिक तौर पर ‘आचरण’ पर फोकस किया हुआ था। एक आम संघी की छवि साधारण जीवन शैली, सुबह उठकर व्यायाम, संस्कृतनिष्ठ, बिना मिलावट की हिंदी, शाकाहार, अविवाहित और ब्रह्मचर्य (जिसे गाँधी जी के कारण सार्वजनिक जीवन के लोगों के लिए आदर्श मान लिया गया था) जैसे आचरण से निर्मित की जाने लगी थी। खोखले अतीत और बंधनों से मुक्ति दिलाने वाले आधुनिक राजनीतिक विचारों से अपरिचित आम लोगों, जिनमें सार्वजनिक जीवन में ‘संतों’ की तलाश रहती है, ऐसे ‘आचरण’ वाले पसंद किए जाने लगे।

     इस धारणा से एक और उपधारणा भी निकली, जिसे राजनीति में विचारधारा के प्रश्न को पीछे धकेलने के लिए इस्तेमाल किया गया; वह था गठबंधनों का विचारधारा के बजाय ‘मुद्दा’ आधारित होना। इसके तहत यह तर्क विकसित किया गया कि अगर भाजपा अपने तीन मुद्दों- राम मंदिर, कश्मीर से अनु. 370 खत्म करने और समान नागरिक संहिता को छोड़ दे तो उसके साथ ‘मुद्दा’ आधारित गठबंधन किया जाना ग़लत नहीं है। इस तर्क के आड़ में भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी सरकारों को वैधता प्रदान करने की कोशिश हुई। बहरहाल, व्यक्तिगत आचरण के इस तर्क के साथ लोहिया और जेपी के शिष्य लोगों की एक खेप भाजपा को सत्ता के शीर्ष पर लंबे समय तक टिकाए रही और ‘उदार’ वाजपेयी को किया सहयोग कब ‘कट्टर’ मोदी के समर्थन में बदल गया पता ही नहीं चला।

      इस दरम्यान कांशीराम की बसपा ने इस वैचारिक फिसलन को अवसरवादी रणनीति का नाम दिया। जिसका एक दिलचस्प उदाहरण देखिए- एक विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा के एक प्रत्याशी से जब मैंने पूछा कि आप लोग मनुवाद का विरोध करते-करते भाजपा के साथ चले जाते हैं, तो आपको क्यों वोट दिया जाये। इसपर उनका जवाब था कि बहन जी ने भाजपा के समर्थन से सरकार चलाया, लेकिन जब भाजपा के मुख्यमंत्री को समर्थन देने की बारी आई तो बसपा ने समर्थन वापस ले लिया। इस तरह बहन जी 5 हज़ार साल के इतिहास में पहली दलित नेता हैं, जिन्होंने मनुवादियों को धोखा दिया है। जो कोई मामूली उपलब्धि नहीं है, इसलिए उनको वोट देना चाहिए।

    इस धारणा की निरंतरता को हम बदले हुए रूपों में उन दलों में भी चिह्नित कर सकते हैं, जो आज भी भाजपा की विरोध में मजबूती से खड़ी हैं। मसलन, बिहार में नीतीश कुमार की जगह भाजपा के सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद राजद समर्थकों के तरफ से दो नैरेटिव चलाए गए। पहला, भाजपा के साथ जो भी क्षेत्रीय दल गठबंधन करता है, उसे भाजपा निगल जाती है। दूसरा, ‘सम्राट चौधरी लालू जी के ही स्कूल से निकले हैं’, जिसे ख़ुद तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया। पहले नैरेटिव के साथ दिक़्क़त है कि उसके लिए घोषित तौर पर सेक्युलर जदयू के पूरी तरह हिंदुत्ववादी पार्टी में समाहित हो जाना मुद्दा नहीं है, बल्कि सांगठनिक तौर पर भाजपा में समाहित हो जाना बड़ा मुद्दा है। यह तर्क इस मान्यता से निकलता है कि राजनीतिक दल के लिए विचार से ज़्यादा संगठन ज़रूरी होता है। जो विचार के बजाय व्यक्तिगत संबंधों पर टिके होने चाहिए। वहीं दूसरे नैरेटिव के साथ यह दिक़्क़त है कि उसमें सत्ता पर बैठे विरोधी दल के व्यक्ति को किसी भी तरह अपना ही व्यक्ति साबित करने की इच्छा है। विचलन भरे इन दोनों ही नैरेटिव से भाजपा जैसी वैचारिक ताक़त से नहीं लड़ा जा सकता।
     मुख्यतः मंडलवादी दलों की इस प्रवृत्ति को हम बिहार और यूपी में उनके इस कार्यशैली में भी देख सकते हैं कि भाजपा से लड़ने की तैयारी में उनके नेता लोगों से व्यक्तिगत संबंधों को मजबूत और सक्रिय करने पर ज़ोर देते हैं। जबकि भाजपा लोगों को अपने विचारधारा से जोड़ने पर ज़ोर देती है। ज़ाहिर है, जब चुनाव विचारधारा पर होगा तो भाजपा का नैरेटिव ही बीस पड़ेगा। वहीं, इस अवधारणा से यह राजनीतिक संस्कृति भी विकसित हुई कि कोई भी स्थायी दोस्त या विरोधी नहीं होता, इसलिए किसी का राजनीतिक विरोध भी ‘सीमित’ दायरे में करना चाहिए। इससे पक्ष और विपक्ष के बीच का अंतर धुंधला होता गया।  


दूसरा
     ‘कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे की विकल्प यानी ‘सब पार्टियाँ एक जैसी’ ही होती हैं। जैसा की शुरुआत में कहा गया है कि अगर संवैधानिक मूल्यों को विभाजक रेखा मान लिया जाये, तो विचारधारा के आधार पर राजनीतिक दलों में भाजपा एक तरफ है और बाकी सभी दल दूसरी तरफ। ऐसे में यह धारणा बहुत चालाकी से प्रसारित की गयी होगी कि कांग्रेस और भाजपा दोनों एक दूसरे के विकल्प हैं। ज़ाहिर है, इस नैरेटिव से भाजपा को ही फ़ायदा होना था, क्योंकि जो लोग विचारधारा के स्तर पर भाजपा को साम्प्रदायिक मानकर उसके साथ जाने से झिझकते थे, उन्हें इस तर्क के आड़ में ही भाजपा की सरकारों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया गया। दरअसल, विचारविहीनता का प्रसार और विचारधारा के प्रश्न का गौड़ किया जाना भाजपा के लिए रास्ता तैयार करने की रणनीति थी। जिसकी सबसे वीभत्स अभिव्यक्ति के बतौर आम आदमी पार्टी सामने आयी है, जिसने इसी धारणा के आधार पर समाज में जगह पायी कि अब चूँकि कांग्रेस और भाजपा भी एक दूसरे के विल्कप के बजाय एक ही जैसी हो गई हैं। इसलिए उन्हें विकल्प माना जाय। हाल के घटनाक्रम से साबित हो ही गया कि इससे भाजपा को कैसे लाभ हुआ।

      दरअसल, कांग्रेस का विकल्प वामपंथी पार्टियाँ, मंडलवादी या द्रविड़वादी पार्टियाँ तो हो सकती हैं, जो मोटे तौर पर संविधान की मौलिक भावना को मानती हैं। उसका विकल्प भाजपा कैसे हो सकती है, जो भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है। यह बिल्कुल ऐसा ही है कि कोई दवा और ज़हर को एक दूसरे का विकल्प माने। उसी तरह भाजपा का विकल्प कांग्रेस के बजाय हिंदू महासभा, सनातन संस्था या श्री राम सेना ही हो सकती है, जो भारत को अति दक्षिणपंथी दिशा में ले जाना चाहती हैं।

      ऐसी धारणाओं का एक असर यह भी पड़ा कि विपक्षी लोगों में विचारधारा आधारित सत्ता को तकनीकी आधारों पर घेरने की प्रवृत्ति विकसित हुई। मसलन, आपको ऐसे बहुत सारे नेहरू समर्थक मिल जाएंगे, जो नेहरू को आईआईटी, एम्स या बाँध बनाने का श्रेय देकर मोदी से उपलब्धियाँ पूछते हैं। यहाँ वे यह नहीं समझ पाते कि संघ और उसके प्रभाव में रहने वालों को नेहरू के एम्स और आईआईटी से दिक्कत नहीं है, उन्हें नेहरू के राजनीतिक विचार से दिक़्क़त है।

   आज जब आर.एस.एस. सत्ता पर लगभग स्थायी कब्जा पा चुका है, तब इन दोनों धारणाओं की क्या स्थिति है? अब राजग गठबंधन के कितने दल उसे इस आधार पर छोड़कर उससे अलग होने को तैयार दिखते हैं कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या विरोधी नहीं होता? या राजग के कितने दल कांग्रेस और भाजपा को एक दूसरे का विकल्प या दोनों को एक जैसा बताकर उससे अलग होने को तैयार हैं? दोनों सवालों का ज़वाब है- ‘एक भी नहीं।’
    यानी राजनीतिक धारणाओं की उम्र उपयोगिता तक ही होती है। इसे आप ख़ुद भी जाँच सकते हैं। मसलन, जब कोई यह कहे (अक्सर ऐसा संघी ही कहते हैं) कि अगर नेहरू के बजाय पटेल प्रधानमंत्री होते, तो देश बेहतर स्थिति में होता। तब आप यह कहकर देखिए कि अगर नेहरू के बजाय अंबेडकर या मौलाना आज़ाद प्रधानमंत्री रहते, तब कैसा रहता। तब वो या तो चुप हो जाएगा या कहेगा कि नेहरू ही ठीक थे।

     राष्ट्रीय जीवन के एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर जब आर.एस.एस. का वैचारिक प्रभुत्व एक सच्चाई है, विपक्ष भाजपा सरकार को सिर्फ़ विकास, महँगाई और बेरोज़गारी जैसे तकनीकी आधारों पर घेर कर अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकता। उसे विचारधारा के सवाल को ऐड्रेस करना ही होगा। उसे यह भूलने की इजाज़त नहीं दी जा सकती कि स्वतंत्रता आंदोलन, जिसके गर्भ से लोकतांत्रिक भारतीय राज्य का उदय हुआ, रोजगार, महँगाई और विकास के एजेंडे पर नहीं लड़ा गया था, क्योंकि अंग्रेज़ तो ये चीज़ें दे ही रहे थे। वो एक विशुद्ध वैचारिक परियोजना थी, जिसे ‘भारत का विचार’ कहा गया। ज़ाहिर है इस विचार की रक्षा उस विचार से दूर भाग कर नहीं की जा सकती।

(लेखक कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं)

शाहनवाज़ आलम 

emailtoshahnawazalam@gmail.com

युवा चिंतक एव लेखक राष्ट्रीय सचिव-काँग्रेस

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