छत्रपति शाहूजी महराज- एक राजा जो लोकतंत्र चाहते थे

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“डीप्रेस्ड/सप्रेस्ड वर्ग के लोगों कोउच्च जाति के हिन्दु नेताओं के नेतृत्व पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, और न ही ऐसे किसी व्यक्ति को अपना नेता बनाना चाहिए, जिसके पास लोकतान्त्रिक उद्देश्य न हो। इन समुदाय के लोगों को अपने समुदाय में से ही नेतृत्व का चुनाव करना चाहिए।“

छत्रपति शाहूजी महाराज उक्त बात अपने समय के प्रसिद्ध समाज सुधारक जी ए गवई से 01 फरवरी 1920 को लिखे अपने एक पत्र में कह रहे हैं। शाहूजी महराज के इस कथन को यदि हम आज के परिपेक्ष में देखा जाए तो, हमारे लिए यह उनका एक अमर संदेश है, जिसको आज हम कितना अमल में ला पा रहे हैं, इस पर इस आलेख में आगे विस्तृत चर्चा की जाएगी,परंतु उक्त बात का गूढ़ मतलब समझने के लिए हमारे लिए यह जानना अतिआवश्यक है कि शाहूजी महाराज ये बातें किस परिपेक्ष में कह रहे हैं?

दरअसल अगर हम शाहुजी महराज को उनके समय काल में देखें, तो भारतीय राजनीति में उनका उदय ऐसे समय हुआ, जब महात्मा ज्योतिराव फुले का नेतृत्व नहीं रहा। शाहुजी महाराज नें कोल्हापुर राज्य की बागडोर 1894 में संभाली थी, जिसके चार वर्ष पूर्व 28 नवंबर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले का परिनिर्वाण हो गया था। महात्मा ज्योतिबा फुले के बाद उनके मनवातावादी विचारों को जनमानस में पहुँचाने की ज़िम्मेदारी छत्रपति शाहूजी महराज नें अपने मजबूत कंधों पर उठाए रखा, जब तक कि बाबासाहेब अम्बेडकर का भारतीय राजनीति में पर्दापण नहीं हो गया। शाहुजी महराज नें, ना केवल महात्मा ज्योतिराव फुले के मानवतावादी आंदोलन को अपने मजबूत कंधे पर उठाए रखा, बल्कि बाबासाहेब अम्बेडकर समेत हर उस राजनेता और समाज सुधारक की नैतिक और आर्थिक दोनों ही तरह से मददभी की जोकि उस आंदोलन को आगे ले जाने का प्रयास कर रहे थे। इससे पता चलता है कि छत्रपति शाहूजी महाराज भारत में मनवातावादी आंदोलन की ‘नीव के वह ईंट’हैं, जिनके बिना इस आंदोलन की परिकल्पना भी करना असंभव है। अतः आज केपरिपेक्ष में उनके वैचारिक व्यक्तित्व पर नजर डालने की जरूरत है। शाहुजी महाराज के समग्र व्यक्तित्व पर नजर डालने के लिए सबसे जरूरी यह है कि उनको उनके समय में हो रही परिघटनों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। 

दरअसल छत्रपति शाहुजी महाराज का उदय उस समय काल में होता है, जब स्वदेशी आन्दोलन के आड़ में बाल गंगाधर तिलक जैसे रुढिवादी नेताओं के नेतृत्व में तरह-तरह की रुढिवादी-कट्टरपंथी विचारधारा और परंपरा को बढ़ावा दिया जा रहा था। विदित हो कि अपने आपको छत्रपति शिवाजी महराज के वारिस बताने वाले बाल गंगाधर तिलक नें सरेआम डीप्रेस्ड क्लास की प्रतिनिधित्व की मांग को यह कहकर मज़ाक उड़ाया था कि ‘तेली तमोली विधान सभा में जाकर क्या सब्जी बेचेंगे’। ऐसे कठिन समय में छत्रपति शाहुजी महराज नें मनवातावादी आंदोलन की लौ को बुझने नहीं दिया। शाहूजी महराज के समय में ही प्रथम विश्वयुद्ध जैसी परिघटना हुई,जिसके परिणाम स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में ‘स्वनिर्णय का सिधान्त (self-determination)’ निकलकर आया। स्वनिर्णय के सिधान्त को ही उपयोग में लाकर बाबासाहब अम्बेडकर नें साउदबरो कमेटी के सामने अस्पृष्यों हेतु अलग निर्वाचन देने की मांग की थी। यहाँ एक और ध्यान देने योग्य तथ्य है कि शाहुजी महराज के ही निर्देश पर बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर तब के भारत मामलों के मंत्री लॉर्ड माँनटेंगु से मिले, और उनसे  अस्पृस्यों के लिए संवैधानिक अधिकारों की मांग की। उस मुलाक़ात के दौरान हुई बातचीत का जिक्र बाबासाहेब अंबेडकर 25 नवंबर 1920 को शाहूजी महराज को लिखे अपने पत्र में करते हुए बताते हैं कि ‘मोंटेङु बहुत ही अच्छे से पेश आए, हम लोगों ने एक घंटे तक ब्राह्मण और गैर ब्राह्मण के बीच की समस्याओं और विवादों पर विचार विमर्श किया। महाराज! गैर ब्राह्मणों के आंदोलन को लेकर इनको कुछ लोगों नें गुमराह किया हुआ था’।    

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ही यह सम्पूर्ण कोशिश हो रही थी कि तिलक के बाद देश, सभी तरह के आंदोलनों की कमान गांधीजी के हाथो में दे और ऐसा उनको पूरे देश का भ्रमण कराके किया भी जा रहा था। लेकिन उस दौरान छत्रपति शाहूजी महराज पूरे तन-मन-धन से इस कोशिश में लगे रहे कि सामाजिक आंदोलन का नेतृत्व किसी ऐसे कुशल व्यक्ति के नेतृत्व में दिया जाये, जोकि ‘उच्च जाति का ना हो, एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों में विश्वास करने वाला हो’।इसके अलावा शाहूजी महराज के अनुसार,‘नेता को दूरदृष्टा होना चाहिए, उसके पास भविष्य हेतु विजन होना चाहिए। जाति का सम्पूर्ण उन्मूलन जरूरी है, जाति का जिंदा रहना पाप है। जाति हम सबकी प्रगति की  राह में बाधक है, इसलिए इसको समाप्त करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। जाति विद्वेष एक पुरानी बीमारी है, जिसको समाप्त करने के लिए सबसे पहले जरूरी है कि जाति को ही समाप्त किया जाये’। नाशिक की एक सभा में दिया गया, शाहुजी महाराज का उपरोक्त बयान इस बात की तरफ इशारा करता है कि क्यों उन्होने नें 1920 में मानगांव में हुई अखिल भारतीय अश्पृस्य सभा के में यह घोषणा की कि आगे सेअब डॉ अम्बेडकर आप लोगों के नेता होंगे?नेतृत्व की जरूरत पर महाराज नें उस सभा में यह तक कहा था कि यहाँ तक कि जानवरों के पास भी अपना नेतृत्व है, लेकिन अछूतो के पास नहीं हैं। ऐसे में डॉ अम्बेडकर उनके बेहतरीन नेता हो सकते हैं। दरअसल शाहुजी महराज अश्पृस्यता के साथ-साथ जाति का भी खात्मा चाहते थे, जिसका जिक्र उन्होने नाशिक के अपने भाषण में साफ-साफ किया।   

शाहूजी महाराज के व्यापक एवं दूरद्र्ष्टि दर्शन वाले व्यतित्व कीझलक उनके इस कथन मात्र से हो जातीहै,जब वो कहते हैं कि ‘डीप्रेस्ड क्लास को ऐसा नेता चुनना चाहिए, जोकि लोकतान्त्रिक उद्देस्यों वाला हो’। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि छत्रपति शाहुजी महराज जोकि खुद कोल्हापुर राज्य के राजा थे, अपने खुद के वक्तव्यों में लोकतन्त्र के आने का समर्थन कर रहे हैं, और वह लोकतन्त्र जोकि केवल शासन प्रणाली तक सीमित ना हो, बल्कि जीवन पद्धति का हिस्सा हो, जिसको बाबासाहेब अम्बेडकरआगे चलकर सामाजिक लोकतन्त्र कहते हैं।लोकतंत्र जब जीवन पद्धति का हिस्सा बनना शुरू हो जाता है, तो समाज ‘समता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व’ के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है। शाहुजी महराज जाति और अश्पृष्यता को समाज से समाप्त करके समाज की नए सिरे से संरचना की ना केवल परिकल्पना कर रहे थे, बल्कि उसके लिए पूरी तरह से प्रयासरत भी थे।       

बाबासाहेब अम्बेडकर जब लंदन में अपनी पढ़ाई कर रहे थे, तो उन्होने शाहुजी महराज को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि वहाँ उनकी माली हालत काफी खराब है। यहाँ तक कि इंडिया वापस आने तक के लिए पैसे नहीं हैं, इसका जिक्र 04 सितंबर 1921 को बाबासाहब द्वारा शाहुजी महराज को लिखे पत्र में मिलता है,जिसमें वो लिखते हैं कि ‘मैं,मिस्टर दलवी के द्वारा निर्देशित किए जाने पर अपनी वित्तीय मुसीबत आपके सामने इस आशा के साथ रख रहा हूँ कि कुछ मदद मिलेगी। मुझे 100 पाउंड अपनी कानून की पढ़ाई की फीस के लिए और 100 पाउंड भारत वापस आने के लिए चाहिए। इस प्रकार मुझे कुल 200 पाउंड चाहिए। मैं, महराज का बहुत ही ज्यादा आभारी रहूँगा, यदि महाराज मुझे लोन के रूप में ही सही 200 डालर की व्यवस्था कर देंगे। लंदन से वापस आकार मैं, महराज का यह लोन ब्याज सहित वापस करूंगा। ऐसी विकट परिस्थिति में शाहूजी महाराज नें डॉ अम्बेडकर को ना केवल लंदन में वित्तीय मदद भेजवाई, बल्कि उनकी पत्नी रमाबाई अम्बेडकर को भी वित्तीय मदद भेजवाई, जिसका जिक्र शाहूजी महराज द्वारा 6 सितंबर 1921 को डॉ अंबेडकर को लिखवाये जवाबी खत में मिलता है, इस खत में शाहूजी महराज लिखवाते हैं कि ‘कृपया श्रीमति अम्बेडकर को यह सूचित कर दें कि किसी भी तरह की वित्तीय कठिनाई को बिना झिझक मुझे लिखें, मैं उनकी जितनी भी मदद हो सके करूंगा। आप विदेश में हैं, वहाँ भी कोई वित्तीय समस्या आने पर मैं सुलझाने की कोशिश करूंगा, आपनी समस्याओं से आप मुझे बेझिझक अवगत कराएं। आप राष्ट्रहित में विदेश गए हैं, इसलिए मेरी दिली इच्छा है कि आप पूरे मान-सम्मान और गौरव के साथ घर वापस आयें’।इसके अलावा बाबासाहेब अम्बेडकर नें अपने पहले अखबार ‘मूकनायक’ को चलाने के लिए भी शाहुजी महराज से समय-समय पर दरख्वास्त की और महराज नें हमेशा दिल खोलकर अखबार के प्रकाशन को सुचारु रूप से जारी रखने में वित्तीय मदद दी।    

अपने जीवन का सिधान्त (motto) बताते हुए शाहुजी महराज कहते हैं कि ‘जो व्यक्ति अपने उद्देष्यों की पूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं, वो कभी भी अपने प्रयास में सफलता प्राप्त नहीं करते, और जो लोग अपने आप पर विश्वास करते हैं, वो जरूर सफल होते हैं’। शाहुजी महराज के जीवन का यह आदर्श-वाक्य बताता है कि व्यक्ति की आत्म-निर्भरता पर उनको बहुत ही ज्यादा भरोसा था, क्योंकि आत्म-निर्भरता मनुष्य को आत्मबल देती है। जाति-प्रथा की सबसे बड़ी बुराई यही रही है कि इसने कुछ समुदायों को सदियों से सत्ता से पृथक करके उनका आत्मबल समाप्त कर दिया। इसलिए जाति-समस्या के समाधान के लिए सभी महापुरुषों नें यह माना कि इन जातियों का खोया हुआ आत्मविश्वास जरूरी है, और उसको संभव बनाने के लिए निर्णय लेने वाले पदों पर निचली जातियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना जरूरी है।  

आज के परिपेक्ष में यह ध्यान देने योग्य बात है कि सरकारी नौकरियों में दिये गए संविधान-सम्मत आरक्षण को अलग-अलग तरीके ईजाद करके समाप्त किया जा रहा है, उस आरक्षण की अवधारणा छत्रपति शाहूजि महाराज के राज्य कोल्हापुर से ही आई है, जब उन्होने 26 जुलाई 1902 को अपने एक आदेश से कोल्हापुर रियासत की पचास प्रतिसत सीटों को पिछड़ी जाति के लोगों के लिए आरक्षित कर दिया था। पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने के पीछे महाराज का विचार था कि इससे इन जातियों में संवृद्दि आएगी और इनका आत्मबल भी बढ़ेगा, जिसके फलस्वरूप कोल्हापुर राज्य सुख-सम्पन्न होगा।  

पिछड़ी जातियों एवं अछूतो में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में महाराज का विशेष योगदान रहा। इस कड़ी में उन्होने  फरवरी 1908 में अछूतो में शिक्षा के विस्तार के लिए एक सोसाइटी का गठन करवाया, जिसके अध्यक्ष राव बहादुर सबनीस थे, और जी. के. कदम तथा ए. बी. ओलकर सचिव थे। इस सोसाइटी नें तमाम स्कूल और कालेज खोले जिनका एक मात्र उद्देश्य था, अछूतो में शिक्षा का प्रचार प्रसार करना। इसके साथ ही महराज नें बम्बई के समकालीन गवर्नर जार्ज क्लार्क की बेटी मिस वोइलेट क्लार्क को अछूतो के हित में काम करने के लिए भी मदद किया। महाराज नें अछूतो एवं पिछड़ी जातियों के लिए तमाम शहरों मेंहास्टल खोलवाए,एवं बच्चों में जाति आधारित सामाजिक विद्वेष ना फैले, इसके लिए अछूतो के लिए अलग स्कूल के प्रावधान को समाप्त करके एक सार्वजनिक स्कूल का प्रावधान किया।

शाहुजी महाराज नें अपने राज्य में छुआछूत की समाप्ती के लिए एक तरीके से युद्ध छेड़ रखा था, उन्होने समय-समय पर राजकीय आदेश जारी करवाये कि छुआछूत कोल्हापुर रियासत में समाप्त की जाती है। 15 जनवरी 1919 के अपने एक आदेश में शाहूजि महाराज नें रियासत के सभी अधिकारियों-राजस्व, न्यायिक और आम को यह आदेश जारी किया कि कोई भी अधिकारी अगर छुआछूत करते हुए मिला तो उसे राज्य की सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा। इसी क्रम में उन्होने राज्य के डाक्टरों के लिए 18 जनवरी 1919 को एक अलग से आदेश निकाल कर ना केवल उनको व्यावसायिक कर्तव्यों की याद दिलाई बल्कि यह भी बताया कि अगर उन्होनेअछूतो का इलाज करने से मना किया तो कठोरतम सजा होगी।

शाहुजी महराज अपने राज्य को छुआछूत से बाहर निकलने का ना केवल आदेश ही दे रहे थे, बल्कि अपने व्यक्तिगत जीवन में भी उसको लागू कर रहे थे, ताकि लोग उनको देखकर ही सही, लेकिन छुआछूत की समाप्ति की दिशा में कदम बढ़ाएँ। इसक्रम में  जब भी महराज अछूतो के मोहल्ले से होकर गुजरते, तो रुकर उनसे पानी मांग कर पीते। छुआछूत उन्मूलन की दिशा में एक कदम आगे जाते हुए, शाहूजी महराज नें मडगांव कान्फरेंस में बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर के साथ समूहिक भोजन किया। इसी क्रम में डीप्रेस्ड इंडिया द्वारा नागपुर में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में ब्राह्मणों के सामने ही सार्वजनिक मंच से अछूतो के हाथ से चाय मांगा कर पी, ताकि समाज में ना केवल छुआछूत बल्कि उसकी वकालत करने वालों के खिलाफ एक व्यापक संदेश जाये।  

आजाद भारत में लंबे समय तक सामंतवाद का बोलबाला रहा, जिसमें बधुआ और बेगार मजदूरी एक बहुत बड़ी समस्या रही। इन कुरीतियों की वजह से अछूत और निचली जाति के लोग कभी भी आर्थिक प्रगति ही नहीं कर पाये। यह प्रथा आजाद भारत में तीन-चार दसक तक पूरे ठसक के साथ बदस्तूर जारी रही, जबकि इसको भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। शाहूजी महाराज नें 03 मई 1920 को ही अपने एक आदेश से कोल्हापुर राज्य में बधुआ और बेगार मजदूरी पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह प्रथा उत्तर भारत से 1980 के दसक में जाकर समाप्त हो पायी जब शाहूजी महराज की विराशत वाला बहुजन आंदोलन खड़ा हुआ। 

डॉ. अरविन्द कुमार

विजिटिंग लेक्चरर – पोलिटिकल सोशियोलॉजी, हर्टफोर्डशायर यूनिवर्सिटी

arvind.kumar@sas.ac.uk

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