विगत लम्बे समय से मैं इस बात को लेकर चिन्तित हूं कि देश के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी नायकों को उनकी जाति और धर्म के खाने में बेशर्मी से ढकेला रहा है. शहीदों और विप्लवियों के पैरोकार कहे जाने वाले लोगों ने जानबूझ कर ऐसा करना शुरू कर दिया है. यह आपराधिक कृत्य है. इन दिनों क्रांतिकारी नायकों की जातियां खोज-खोजकर तलाश की जा रही हैं और उन्हें अपनी-अपनी जाति के सिरमौर के तौर पर स्थापित करने की अक्षम्य कोशिशो का रंग इधर बहुत चटख हो गया है।
वर्ष 2008 में शहीदे-आज़म भगतसिंह की जन्मशती आते-आते उनके सिर पर सिख धर्म की पगड़ी रख दी गई. मैंने बठिंडा और तलवंडी साबो की सभा में खुलेआम कहा कि आप चाहे जितने प्रयत्न कर लें लेकिन पंजाब के उस साढ़े तेईस साल के क्रांतिकारी नौजवान का सिर इतना बड़ा हो चुका है कि अब उस पर किसी धर्म की पगड़ी फिट नहीं हो सकती. भगतसिंह के सिर्फ चार चित्र उपलब्ध हैं. पहला जिसमें वह लगभग दसेक वर्ष के बालक सरीखे कुर्सी पर बैठे दिख रहे हैं, दूसरे में नेशनल कालेज लाहौर में किन्हीं अध्यापकों और नाटक की टीम के साथ पीछे खड़े उनके सिर पर पगड़ी दिखाई पड़ रही है. उनकी तीसरी तस्वीर दशहरा बम केस में उनकी गिरफ्तारी के समय की है जिसमें लाहौर के किले में चारपाई पर बैठे हैं जबकि उनके सामने दूसरी ओर डीएसपी गोपालसिंह पन्नू एक कुर्सी पर बैठे उनसे कुछ पूछताछ कर रहे हैं. और चौथे चित्र को 8 अपै्रल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली बम और पर्चे फेंकने से ठीक पहले उन्होंने और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं खिंचवाया था. भगतसिंह की इस तस्वीर में उनके सिर पर हैट है और वे लम्बे कॉलर की कमीज पहने हैं. भगतसिंह की यही सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय तस्वीर है. उनकी इस छवि के पीछे उनका अपना क्रांतिकारी धर्मनिरपेक्ष चिन्तन है. धर्मनिरपेक्ष होने और दिखने के लिए उन्होंने अपने शरीर से सिखी का एक-एक निशान मिटा दिया था. ऐसा उनका स्वयं का कथन भी है और यह कार्य उन्होंने साण्डर्स के वध के बाद सम्पन्न कर लिया था. वे जाति और धर्म के बेशऊर घेरे से प्रारम्भ से ही बाहर आ गए थे और अपनी इसी सोच के चलते वे अंतिम दिनों में जेल के भीतर ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ जैसा वैज्ञानिक चेतना से युक्त पर्चा लिख सके जिसमें जरिए ही उनके क्रांतिकारी अभियान और लक्ष्यों को ठीक से समझा-आंका जा सकता है जिसमें उनका संघर्ष पूर्णतया धर्म और जातिविहीन समाज के निर्माण के लिए समर्पित था।
लेकिन देखिए यह कि अब सब जगहों भगत सिंह की पगड़ीधारी तस्वीर बहुतायत से प्रचलन में ला दी गई है. इसके पीछे यह है कि उन्हें ‘सिख’ और ‘जाट’ बनाकर उनकी विप्लवी क्रांतिकारी चेतना को ढांका-दबाया जा सके. सत्ताओं के लिए ऐसा किया जाना बेहद मुफीद है. दिल्ली और पंजाब में ‘आम आदमी पार्टी’ और उनकी सरकार ने खुलेआम भगतसिंह को पीली पगड़ीधारी बना दिया है. कहना न होगा कि इस मामले में वाम कही जाने वाली पार्टियां और लोग भी पीछे नहीं हैं. पिछले दिनों भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की 24वीं कांफ्रेंस में ‘कामरेड वृजलाल भादू मंच’ पर पीली पगड़ी वाले भगतसिंह का चित्र लगाया गया था जिसमें वृंदा करात भी शामिल हुई थीं. इस मामले में भगतसिंह के परिवारीजन भी किसी से दो कदम आगे ही हैं. वे न केवल इसके प्रतिरोध में खड़े नहीं होते बल्कि उनके परिवार के एक सदस्य यादवेन्द्र सिंह सन्धू ने तो खुद पीली पगड़ी पहनकर स्वयंभू तरीके ‘शहीद भगतसिंह ब्रिगेड’ का गठन कर लिया और उसके ‘लोगो’ पर भी पीली पगड़ी धारण किए भगत सिंह चस्पां कर दिए. यह यादवेन्द्र वही हैं जिन्हें भाजपा वाले कुछ समय पहले अपने मंचों पर लिये घूमते रहे जहां वे कहते थे कि भगतसिंह की जेल डायरी में लिखे एक शेर में ‘परवरदिगार’ शब्द आया है इसलिए वह नास्तिक नहीं थे. अब बताओ कि ऐसी कूढ़मगजी का हम क्या करें. यह भगतसिंह के विचारों को पीछे करना ही नहीं, अपितु उनका अपमान है.
मुझे याद है कि काफी समय पहले प्रगतिशील विचारों की पत्रिका ‘उद्भावना’ ने अपनी जारी की गई एक पुस्तिका पर पगड़ी वाले भगतसिंह का चित्र लगाया था जिसमें उन्होंने शहीदे-आज़म की पगड़ी का रंग लाल कर दिया था. मैंने तब ही पगड़ी वाले इस चित्र पर आपत्ति की जिसके चलते उसके लेखक मुझसे नाराज हो गए. लेकिन मुझे शरमिन्दगी तब झेलनी पड़ी जब राजकमल प्रकाशन से छपी मेरी सम्पादित पुस्तक ‘भगतसिंह: क्रांति का साक्ष्य’ के दूसरे पेपरबैक संस्करण को अशोक माहेश्वरी ने मुझसे बिना पूछे छाप कर उसके कवर पर भगतसिंह की पगड़ी वाली तस्वीर लगा दी. इस पर उनसे काफी विवाद हुआ, मैंने नोटिस जारी किया तब उस व्ययवसायिक प्रकाशन ने मेरी पुस्तक के तीसरे पेपरबैक संस्करण में ही हैट वाले भगतसिंह को स्थापित किया.
मैंने स्वयं देखा कि आसनसोल में एक गोल चैराहे पर खड़े शहीद भगतसिंह के आदमकद बुत को नीली पगड़ी पहनाकर उसके ऊपर निहंग सिखों के सारे निशान पहना दिए गए हैं. हद तो तब हो गई जब कुछ वर्ष पहले छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में एक चौराहे पर स्थापित हैट वाले वाले भगतसिंह की प्रतिमा का सिर काटकर वहां पगड़ी वाले भगतसिंह खड़े किए गए और ऐसी घटना पर सब ओर सन्नाटा बना रहा. मामला अब बहुत आगे बढ़ चुका है. भगतसिंह को ‘सिख’ और ‘जाट’ कहने वाले बहुत आगे जा पहुंच चुके हैं. शाहजहांपुर जिले की पुवायां तहसील, वहां के बण्डा और खुटार कस्बे तथा पीलीभीत के पूरनपुर व बिलसण्डा में बड़ी संख्या में सिख आकर बस गए. यह सुखद है कि उन्होंने कृषि के मामले में इस इलाके को ‘मिनी पंजाब’ सरीखा उन्नत क्षेत्र बना दिया है. उत्तर प्रदेश सरकार ने यहां रहने लग गए सिखों को खुश करने के लिए ‘सरदार भगतसिंह राजकीय संगठक डिग्री कालेज’ खोला जिसके नाम में ‘शहीद’ शब्द हटाकर ‘सरदार’ सम्बोधन को जोड़ा जाना उनकी नितान्त ओछी मानसिकता का प्रमाण है।
अब तो लाहौर केस के शहीद सुखदेव के साथ ‘थापर’ लिखने वाले भी कम नहीं हैं. विगत दिनों फेसबुक से लेकर व्हाट्सएप और यूट्यूब पर शहीद चन्द्रषेखर आज़ाद पर लिखी एक कविता खूब प्रसारित हुई ‘जिओ तिवारी जनेऊधारी’. ऐसा करना ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ के सेनापति आज़ाद के क्रांतिकारी कद को छोटा और अपमानित करना है जिसके चलते आज़ाद और रामप्रसाद बिस्मिल ब्राह्मण तथा विवेकानन्द, सुभाषचन्द्र बोस कायस्थ. दरअसल हमारी इतिहास-चेतना इतनी लूली और लंगड़ी है कि कोई भी उसे विकृत कर आगे बढ़ने लग जाए तो हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं होती. काकोरी शहीद रोशनसिंह को जाति के खाने में ढकेल कर शाहजहांपुर जिले में उनके जन्मस्थान नवादा को ठाकुर राजनीति का केन्द्र बिन्दु बना दिया गया है. इन कोशिशों में पहले राजनाथ सिंह, लेकिन इसके बाद इस कृत्य में योगी आदित्यनाथ और बहुचर्चित स्वामी चिन्मयानन्द संलिप्त हैं. इन तीनों की जाति ठाकुर है लेकिन ‘योगी’ और ‘संन्यासी’ हो जाने के बाद भी लोगों की जाति समाप्त नहीं होती, यह विचारणीय प्रश्न है.
बात उन दिनों की है जब मैं शाहजहांपुर रहते हुए प्रायः कवि मित्र वीरेन डंगवाल से मिलने बरेली जाया करता है. वहां रास्ते में सर्किट हाउस चैराहे पर अक्सर दूर से एक प्रतिमा पर नज़र पड़ जाती रही. एक दिन पास जाकर देखा तो वह 1942 की क्रांति में शहीद होने वाले सिन्ध के हेमू कालाणी की थी. मन में प्रष्न उठा कि शहीद कालाणी का जन्म तो सुक्कुर में हुआ था और वहीं की जेल में उन्हें अंग्रेजी शासन ने 21 जून, 1943 को फांसी पर लटका दिया था लेकिन इस शहर में उनकी प्रतिमा क्यों लगायी गयी ? बाद को पता लगा इस शहर के सिन्धी समाज ने उसकी स्थापना की है. तो इस तरह एक राश्ट्रीय शहीद को जाति के खाने में ढकेल कर उसे बौना कर दिया गया.
और पिछले दिनों तो हैरत हो गयी. ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे डॉक्टर गयाप्रसाद जिन्हें काला पानी की सजा देकर अंडमान भेजा गया था. मैं डॉक्टर साहब से दो बार मिला और कानपुर के गांव जगदीशपुर में उनके घर भी गया. इसी मामले के क्रांतिकारी जयदेव कपूर बताया करते थे कि जेल में सबसे ज्यादा मार झेलने वाले गयाप्रसाद ही थे. लाहौर वाले मुकदमे की कार्यवाही से लेकर अंडमान तक उनका नाम ‘डा. गयाप्रसाद’ ही अंकित है लेकिन उनके पुत्र क्रांति कुमार ने अपने नाम के साथ ‘कटियार’ शब्द जोड़कर गयाप्रसाद जी के नाम मे भी जातिसूचक ‘कटियार’ को संलग्न कर लिया. मैंने इस पर कई बार आपत्ति की. मुझे आश्चर्य हुआ कि बरेली जिले के एक गांव कनमन में कई वर्ष पहले डॉक्टर गयाप्रसाद की स्मृति में होने वाले कार्यक्रम में उनकी पत्नी ने भी हिस्सेदारी की. वहां जो पर्चा बांटा गया उसका शीर्षक था ‘पटेल डॉक्टर गयाप्रसाद कटियार’. मेरे विरोध करने पर उस पर्चे से ‘पटेल’ शब्द को फाड़कर बांटा गया लेकिन अगले वर्ष फिर वही कारनामा. आयोजकों के ऐसा लिखने के पीछे यह जताने के पीछे यह घृणित मकसद था जिससे लोगों को यह पता लग सके कि डॉक्टर गयाप्रसाद कुर्मी जाति के थे. बरेली, पीलीभीत और बीसलपुर के इलाके के कुर्मी समुदाय के लोग देर-सवेर ‘गंगवार’ लिखने लग गए लेकिन सरदार पटेल के नाम पर राजनीति के इस दौर में वे सब तेजी से ‘पटेल’ में तब्दील हो चुके हैं. मैंने कनमन के कार्यक्रम में पर्चे में लिखी गयी इस इबारत का कड़ा विरोध किया, लेकिन अगले वर्ष फिर वही बेशर्मी. और अब तो हद हो गई कि शहीदे-आज़म भगतसिंह के साथी डॉक्टर गयाप्रसाद की प्रतिमा को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित ‘कुर्मी भवन’ में लगाने के लिए सूबे के उपमुख्यमंत्री ने वहां की ‘अखिल भारतीय कुर्मिय क्षत्रिय सभा’ को एक लाख 21 हजार रुपये का चेक जारी किया जिस पर गयाप्रसाद जी के पुत्र क्रांतिकुमार प्रसन्न होकर फेसबुक पर हर रोज लहालोट हो रहे हैं. प्रश्न यह है कि कोइ्र्र ‘कुर्मी भवन’ उस अजेय क्रांतिकारी की जगह कैसे हो सकती है? मैंने स्वयं धनबाद में रहते हुए देखा कि वहां कायस्थ सभाएं शहीद खुदीराम बोस और उपन्यास-सम्राट कहे जाने वाले प्रेमचन्द को अपनी ‘जाति का गौरव’ बता कर आयोजन कर रही हैं.
आज हमें यह खोज-खोजकर बताया जाने लगा है कि ‘बनारस षड्यंत्र केस’ से मुक्तियुद्ध के अंतिम सोपान तक निरन्तर संघर्षरत रहने वाले क्रांतिकारी दामोदर स्वरूप सेठ ‘खत्री’ जाति के और ‘खत्री गौरव’ थे. समाजवादी आचार्य नरेन्द्र देव ‘खत्री रत्न’ थे और डॉक्टर राममनोहर लोहिया ‘बनिये’ समुदाय के. भगतसिंह से पहले ‘धर्म और ईश्वर’ तथा ‘ईश्वर का बहिष्कार’ जैसे वैज्ञानिक चेतना से सम्पन्न आलेख लिखने वाले क्रांतिकारियों के प्रेरक राधामोहन गोकुल को ‘अग्रवाल’ बना दिया गया है. यह बताने में मुझे अत्यन्त लज्जा का बोध होता है कि एक समय ‘जात-पात तोड़क’ मंडल के ऐतिहासिक अभियान का नेतृत्व करने वाले लेखक संतराम बी.ए. की जाति तलाश कर उन्हें ‘कुम्हार’ यानी ‘प्रजापति’ के गौरव के रूप में स्थापित कर दिया जाने लगा है और इस मुहिम में इस ‘जाति’ के अनेक हिन्दी के कलमजीवी शामिल हैं. संतराम बी.ए. के नाम ‘संतराम बी.ए. प्रजापति छात्रवास’ की स्थापना किसी को लज्जित भी नहीं करती।

सुधीर विद्यार्थी
भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास के सजग अध्येता और विश्लेषक




