आज़ादी के बाद राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के नाम पर मुख्यतः पुराने रसूखदार लोग होते थे. उस समय कांग्रेस का एकछत्र राज था. जो ज़मींदारों, नवाबों और रईसों को टिकट देती और नेता बनाती थी. ये नीतिगत के बजाए नेताओं से व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर राजनीति करते थे. तत्कालीन हिंदू समाज में इनके रसूख का सम्मान भी इनकी जीत की वजह होती थी. विचारधारा के नाम पर उनका पाकिस्तान न जाने का निर्णय उन्हें ‘राष्ट्रवादी’ की श्रेणी में रखता था. इस तबक़े के मौजूदा उत्तराधिकारियों के घरों की दीवारों पर उस दौर के हर बड़े नेता के साथ ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें मिलती हैं. इनके पास इन नेताओं से व्यक्तिगत संबंधों की कहानियाँ भी ख़ूब होती हैं. ये बंटवारे से पहले के मुस्लिम एलीट तबक़े की निरन्तरता को बनाये रखने वाली पीढ़ी थी. यह तबक़ा पिछली सदी के आठवें दशक तक मज़बूत स्थिति में रहा. इसके अधिकतर उत्तराधिकारी राजनीति को शौक़िया लेते थे. इसलिए मुसलमानों के मुद्दों पर सार्थक आवाज़ नहीं उठा पाते थे.
सन 1980 के उत्तरार्ध में बाबरी मस्जिद का ताला खुलने और मंडल परिघटना के बाद कांग्रेस से मुसलमानों की नाराज़गी और हिंदू पिछड़ी जातियों के राजनीतिक उभार ने इन नेताओं को हाशिये पर धकेल दिया. इनकी जगह एक नए राजनीतिक मध्यम वर्गीय मुस्लिम तबके का उदय होना शुरू हुआ. यह कांग्रेस से नाराज़ और चिढ़ा हुआ तबका था. इस तबके के मुस्लिम नेताओं की यह लगभग पूरी तरह पहली पीढ़ी थी. व्यवहारिक तौर पर मुसलमानों में भाजपा का बढ़ता डर इसे भाजपा हराओ समीकरण के इर्द गिर्द ले गई. हिंदू पिछड़ों की राजनीतिक उभार भी नयी परिघटना थी, इसलिए उसके अधिकतर नेता भी नयी पीढ़ी के थे. लेकिन हिंदुओं की यह नई पीढ़ी सकारात्मक ऊर्जा के साथ सत्ता पर दावेदारी कर रही थी वहीं मुसलमानों का मनोबल गिर रहा था. इस लिहाज़ से यह दो विरोधाभासी मनः स्थिति वाले तबकों का अस्वाभाविक गठजोड़ था. जिसे ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर चलाया गया.
इसी दौर में सेक्युलरिज्म की परिभाषा भी बदलने लगी. सन 1970 के दशक तक पूरे देश के लिए जो सेक्युलरिज्म एक बुनियादी सार्वभौमिक मूल्य था अब उसकी एक नयी अवधारणा विकसित हो रही थी जिसके मुताबिक़ वो हिंदुओं की अगड़ी और पिछड़ी जातियों के आंतरिक संघर्षों के बीच पनपने वाली कोई जगह थी- जिसमें मुसलमान अपनी पहचान के साथ सुरक्षित रह सकते थे.
आबादी में बहुत ज़्यादा होने के बावजूद मुसलमान अपनी आबादी से बहुत कम वालों के पीछे खड़ा होने लगा. इस पीढ़ी के मुसलमान अब किसी को जिताने के बजाए किसी को हराने के मकसद से वोट करके अपने को निगेटिव वोटर में तब्दील कर रहे थे. यही वो दौर भी था जब मुसलमान पिछड़े हिंदुओं के साथ दिखने के कारण अगड़े हिंदुओं के विरोधी खेमे में गिने जाने लगे.
इस दूसरी पीढ़ी के मुस्लिम नेतृत्व ने हार जीत का समीकरण, स्ट्रेटजी और विचारधारा यानी राजनीति के सारे अहम पहलुओं को पिछड़े और दलित हिंदू नेताओं को सौंप दिया और अपनी भूमिका अपनी बिरादरी के बीच मुशायरे, अफतार और इन नेताओं के स्वागत तक सीमित कर लिया.
इससे मुसलमानों के राजनीतिक व्यवहार में बदलाव आना शुरू हुआ. जहां बाक़ी जातियों की भीड़ अपने मुद्दों पर इकट्ठी होती थी. जिसने उन्हें राजनीतिक तौर पर चेतनशील बनाया. तो मुसलमान मुद्दों और विचारधारा के बजाए व्यक्ति आधारित राजनीतिक आकर्षण में उलझता गया. इस व्यक्ति आधारित एप्रोच ने छोटे-बड़े मुस्लिम नेताओं को प्रशासन के बिचौलियों में तब्दील करना शुरू कर दिया. इससे राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने के बजाए ‘काम’ करा देने वाले ‘नेता’ उभरने लगे. इस धारणा को कितनी स्वीकृति प्राप्त थी इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि लखनऊ के एक चर्चित मौलाना ने मुझसे निजी बातचीत में शिकायत की कि मुसलमानों को नेताओं से थाने से अपनी बाइक छुड़ाने के अलावा कोई काम तो पड़ता नहीं है. लेकिन सेक्युलर पार्टियों के नेता यह काम भी नहीं करते.
इस एप्रोच ने विचारहीन, अवसरवादी, बिचौलिए, दब्बू और अपराधी प्रवृत्तियों के छोटे- बड़े मुस्लिम नेताओं को पैदा किया. जिन्होंने अपने इर्द गिर्द ऐसी ही भीड़ जमा की. मुसलमानों के राज्य प्रायोजित उत्पीड़न के मुद्दों को उठाए जाने को यह तबका रणनीतिक तौर पर सही नहीं मानता था.
उस दौर में, जो बहुत पहले नहीं बीता है, हर मुस्लिम क़स्बे और गांव में ऐसे युवाओं की भरमार थी जो भाजपा की विरोधी पार्टियों के कार्यक्रमों के स्टार संचालक हुआ करते थे. जिनके शायरी मिश्रित भाषणों में अतीत के चर्चित गंगा जमुनी तहज़ीब के मुहाफ़िज़ के बतौर उस दल के नेताओं को शुमार किया जाता था. इन सबके बीच एक तबका ऐसा भी था जिसकी राजनीतिक सक्रियता अफ़्तार और दावत केंद्रित थी. जहाँ बड़े हिंदू नेताओं को बुला लेना उपलब्धि मानी जाती थी. पिछले अफ़्तार में आए बड़े हिंदू नेता का ज़िक्र अगले रोज़े तक चलता और इस बार किसे बुलाकर ‘दिखाना’ है इसपर चर्चा होती. उत्तर बाबरी और उत्तर मंडल राजनीति के अवसान के चौराहे पर खड़े मुसलमान इलीट की यह बेबस और शर्मनाक तस्वीर थी.
यह दूसरी सियासी पीढ़ी साल 2017 तक सक्रिय रही लेकिन उसमें ऊर्जा की कमी आ चुकी थी. क्योंकि अब वो इन दलों और उनके हिंदू नेताओं की चुनिंदा एप्रोच और मुसलमानों के मुद्दों पर उनकी चुप्पी, उनके जातिगत समर्थक आधारों का मुस्लिम विरोधी नैरेटिव के साथ भाजपा की तरफ जाने को लेकर वो चौकन्ना हो रहा था. इसका दबाव उसके मुस्लिम नेताओं पर भी था जो कोई भी स्टैंड ले पाने की स्थिति में नहीं थे. 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा के सत्ता में आने के बाद इस विचारहीन और प्रशासन में ‘काम’ कराने की क्षमता की बदौलत ‘नेता’ माने जाने वाले लोग परिदृश्य से स्वतः ग़ायब हो गए या कर दिए गए.
मुस्लिम वोटों के बल पर भाजपा को हराने के फार्मूले के कमज़ोर पड़ने के साथ ही मुस्लिम वोटबैंक की प्रासंगिकता कम होती गई. उसके वोट पर टिकी पार्टियाँ जिन्हें सामान्य शब्दावली में सेक्युलर भी कहा जाता था, उनसे सार्वजनिक दूरी बनाने लगीं. क्योंकि उन्हें वोट तो उनका चाहिए था लेकिन सार्वजनिक तौर पर उनके साथ दिखना नहीं था. अब मुस्लिम नेताओं की दूसरी खेप ख़त्म हो चुकी है और समाज में उभर रहे नए आंतरिक नैरेटिव को अभिव्यक्ति देने के लिए तीसरी खेप के आने का समय है.
इस तीसरी खेप की मानसिक बनावट की शुरुआत सन 2005 के आसपास आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुसलमानों को फँसाने की घटनाओं से हुई. फ़र्ज़ी मुठभेड़ों और गिरफ़्तारियों ने सुरक्षा के सवाल को केंद्रीय सवाल बना दिया. इसके ठीक समानांतर भारतीय राज्य के एक हिंदुत्ववादी सिक्योरिटी स्टेट में बदलने की प्रक्रिया भी तेज़ हो चली थी. राजनैतिक मोर्चे पर यह सवाल भी विमर्श में आने लगा था कि जब हिंदू पिछड़ों और दलितों के राजनीतिक गोलबंदी को भारतीय लोकतंत्र स्वीकार कर सकता है तो मुसलमानों के राजनीतिक गोलबंदी को क्यों नहीं? तीसरी घटना थी बाबरी मस्जिद मुकदमें में तथ्यों के बजाए आस्था के आधार पर राजनीतिक फैसला. जिसने न्याय के समक्ष बराबर शहरी होने के उनके भ्रम को तोड़ दिया.
इस तीसरी नसल का अहम हिस्सा विश्वविद्यालयों से आया. लेकिन वो परंपरागत छात्र राजनीति – किसी पार्टी के छात्र संगठन और छात्रसंघों, की चुनावी राजनीति से नहीं था. वो कैंपसों में अपने समाज के वजूद से जुड़े राजनैतिक मुद्दों पर सीधे-सीधे केंद्र सरकार की मुस्लिम विरोधी नीतियों से लड़ रहा था. यह एक नया बदलाव था. क्योंकि इससे पहले जिसे मुस्लिम ‘पढ़ा-लिखा’ वर्ग कहते हैं वो कैंपसों में एक वर्ग के बतौर किसी राजनीतिक सक्रियता में नहीं ‘ पड़ता ‘ था. उनका उद्देश्य नौकरी पाने तक था. जो उस दौर के मुस्लिम मनोविज्ञान के राजनीति से उदासीनता के कारण था. कैंपसों में आकार लेता यह मुस्लिम नेतृत्व पिछली दोनों पीढ़ियों से अलग मानसिक बुनावट का था. उसके पास अपने स्पष्ट सवाल थे और वो चुनौती के बतौर उन सवालों को दागता था.
इन सवालों पर परंपरागत तौर पर मुस्लिम वोट पाने वाली पार्टियों की चुप्पी या अवसरवादी स्टैंड युवा मुस्लिम मन को मथने लगा. सीएए-एनआरसी, जामिया, एसआईआर जैसे मुद्दों ने नयी सियासी सोच पैदा की. यह सोच मुसलमानों की पहले की दोनों पीढ़ियों की सामूहिक सोच के मुक़ाबले ज़्यादा प्रगतिशील, राजनैतिक, स्पष्ट, और नागरिक अधिकार आधारित है.
इस नये विचार और तेवर वाले अनेकों युवा जेलों में हैं. मुस्लिम समाज उनके बारे में सोचता है लेकिन वो जिन पार्टियों को वोट देता है, वो उनके इन युवा नायकों के बारे में नहीं सोचते. जिसकी वजह या तो उनकी वैचारिक बेईमानी है या हिंदुत्ववादी डर. या फिर उनके असहज सवालों का जवाब न होना. लेकिन बिना इस तीसरी फसल के साथ एकता बनाये किसी का भला नहीं होगा. न देश का, न लोकतंत्र का न मुसलमानों का.

शाहनवाज आलम
युवा चिंतक एवं लेखक, राष्ट्रीय सचिव-काँग्रेस
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