नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (Municipal solid waste) (MSW) ऐसे अपशिस्ट होते हैं जो सामान्य रूप से घरों मे मिलने वाले कचरे, सड़क सफाई से उत्पन्न हुए कचरे, बाज़ार एवं खानपान से जुड़े कचरे, संस्थागत एवं वाणिज्य से निकलने वाले कचरे होते हैं। ये ठोस एवं अर्ध-ठोस कचरे के रूप मे मिलते हैं। इसमे घरों से निकलने वाले ई-वेस्ट, जैव-चिकित्सीय अपशिस्ट, औद्योगिक एवं रेडिओधर्मी अपशिष्ट को शामिल नहीं किया जाता है। विश्वभर मे लगभग 2100 टेराग्राम (teragrams)कचरा साल 2023 मे उत्पन्न हुआ। इनमे से ज्यादातर कचरे की मात्रा मध्यम-आय ओर निम्न-आय वाले देशों मे पाई गई। इन देशों मे भारतओर उसके पड़ोसी देश जैसे अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश ओर पाकिस्तान शामिल हैं। ऐसा माना गया है की साल 2050 तक विश्वभर मे उत्पन्न कचरे की मात्रा 3800 टेराग्राम (teragrams)पहुँच सकती है। अपशिष्ट पदानुक्रम (Waste Hierarchy) एक ऐसी अवधारणा है, जो अपशिष्ट प्रबंधन की रणनीतियों को निम्नलिखित क्रम में प्राथमिकता देती है:अपशिष्ट में कमी (Reduction), पुनः उपयोग (Reuse), पुनर्चक्रण (Recycling), पुनर्प्राप्ति (Recovery) तथा निस्तारण (Disposal)।यह पदानुक्रम सतत अपशिष्ट प्रबंधन के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। यह अपशिष्ट के निस्तारण से ध्यान हटाकर उसकी रोकथाम तथा संसाधन पुनर्प्राप्ति पर केंद्रित करता है। इन्ही सिद्धांतों को अपनाते हुए सरकार ने कई नियम बनाए हैं।
सरकार द्वारा किए गए प्रयास
देश मे तररक्की के साथ साथ कचरे की मात्रा भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ रही है। भारत मे साल 2020 मे लगभग 100 मिलियन टंस कचरे का उत्पादन हुआ। इतनी मात्रा मे पैदा हुए कचरे को अपर्याप्त प्रबंधन प्रणाली के कारण जलाना या लैन्ड्फिल मे फेकना ही आखिरी उपाय की तरह देखा जाता है।भारत में अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियाँ संरचनात्मक पुनर्रचना के बजाय क्रमिक नीतिगत परतों (incremental policy layering) के माध्यम से विकसित हुई हैं। प्रत्येक नया ढाँचा प्रणाली में जटिलता तो जोड़ता है, किन्तु यह हमेशा मूलभूत अक्षमताओं का समाधान नहीं कर पाता। प्रणाली का विस्तार तो होता है, परंतु वह आवश्यक रूप से परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को अनुकूलित नहीं कर पाती। भारत सरकार ने घरों मे उपले का इस्तेमाल कम करने के लिए उज्ज्वला योजना की शुरुवात की। इस योजना के लाभ से खाना बनाते समय होने वाले वायु प्रदूषण से छुटकारा मिला। सरकार ने साल 2016 मे “ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम” ओर “प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम” लागू किया। इस नियम के तहत उत्पत्ति ओर संग्रहरण, गीले ओर सूखे कचरे को अलग करना, कचरे को नई उपयोगी वस्तुओं मे बदलना तथा इन कचरों को लैन्ड्फिल या कॉमपोस्टिंग की मदद से नष्ट करना जैसे सुझाव शामिल थे। प्लास्टिक के कचरे द्वारा होने वाली समस्याओं को भी इसमे जोड़ा गया। “स्वच्छ भारत अभियान“ के माध्यम से सरकार ने लोगों मे स्वच्छता के महत्व को समझाया। “निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016” को लागू करने के बाद निर्माण से जुड़ी सारी गतिविधियों पर नजर रखी गई।
एक नई पहल
भारत सरकार ने इस वर्ष (2026) मे नए “ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम” को लागू किया है। इस नियम के तहत कचरे को जलाने एवं खुले मे फेकने जैसी गतिविधियों को कम करने पर ज़ोर दिया गया है। इसमे स्त्रोत के स्तर पर कचरे को अलग करना (segregation), पुनर्चक्रण (recycling) एवं संसाधन- पुनप्राप्ति (resource recovery) को बढ़ाना, अपशिष्ट उत्पन्न करने वालों की जवाबदेही सुनिश्चित करना और भारत को परिपत्र अर्थव्यवस्था मॉडल (circular economy model) की ओर अग्रसर करना जैसे उद्येश्यों को शामिल किया गया है।कचरे को स्त्रोत के स्तर पर घरों, संस्थाओं एवं वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों मे चार भागों मे अलग करना अनिवार्य माना गया है। इसमे मुख्यतः गीले कचरे (सब्जियों-फलों के छिलके और भोजन अवशेष) ओर सूखे कचरे (कागज़, गत्ता, धातु, कांच और प्लास्टिक) के अलावा स्वच्छता-संबंधी कचरे (डाइपर, सैनिटेरी पैड, चिकित्सीय- स्वच्छता अपशिष्ट) और विशेष -देखभाल कचरे (दवाइयाँ, बैटरी, बल्ब, ई-वेस्ट) को भी अलग करने पर ज़ोर दिया गया है। बड़े अपशिष्ट उत्पादकों के लिए सख्त नियमों को बनाया गया है। “प्रदूषक भुगतान करे” (polluter pays principle )के सिद्धांत को सख्ती से लागू करने का प्रयत्न किया गया है।कचरा फैलाने, कचरे को खुले मे जलाने, अवैध डम्पिंग ओर गलत रिपोर्टिंग जैसे कार्यों पर दंड लगाया गया है। इस नए नियम मे टेक्नॉलजी का सहारा भी लिया गया है। इसमे एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल को शुरू किया गया है, जिसमे अपशिष्ट ट्रैकिंग, पंजीकरण, अनुपालन की निगरानी और वार्षिक रेपोर्टिंग जैसे कार्यों को रखा गया है। इसके लिए शहरी स्थानीय निकायों (urban local bodies) तथा अपशिष्ट प्रसंस्करण एजेंसियों को नियमित रूप से डेटा अपलोड करना होगा। कंपोस्टिंग, पुनर्चक्रण, बायोमीथनेशन, पुनप्राप्त सामग्रियों का पुनःउपयोग एवं अपशिष्ट से ऊर्जा (waste-to-energy) संयंतरण जैसी प्रक्रियाओं पर ज़ोर दिया गया है। लोगों मे जागरूकता फैलाने के लिए सरकार को नुक्कड़-नाटक, विज्ञापन, घर-घर प्रचार ओर अभियानों के माध्यम से नियम को जीवनशैली मे अपनाने के प्रति ज़ोर देना चाहिए। लोगों को अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए इन नियमों का पालन करना पड़ेगा तभी कचरे का सही निवारण हो सकेगा।
नियमों की प्रभावशीलता
हालांकि भारत सरकार ने कई नियम बनाए हैं, परंतु अभी भी ठोस अपशिष्ट का उत्पादन कम नहीं हुआ है। अनियमित कचरे का संग्रह, बाजारों मे प्लास्टिक की थैलियों की बिक्री, खुले मे कचरे को जलाना, कचरे को कचरा-पेटी मे न फेकना अथवा इधर-उधर फेंक देना जैसे काम अभी भी देखने को मिल जाते हैं। कचरे को अलग करने जैसे काम भी सफल साबित नहीं हो पाए। सभी प्रकार के कचरों को अलग-अलग संग्रह करके सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधा (mrf) के लिए भेजना एक चुनौती है। शहरों मे उपलब्ध होने वाली सुविधाये जैसे अपशिष्ट संग्रहण, पृथक्करण, प्रसंस्करण एवं निस्तारण अभी भी अपर्याप्त हैं। अधिकारियों की “जैसे चल रहा है चलने दो” वाली मानसिकता, कार्यालयों के बीच असमन्वय, अस्पष्ट जवाबदेही और स्थानीय अक्षमताओं के कारण ये समस्या अब बड़ी बन गई है। बड़े शहरों को अधिक निवेश प्राप्त होता है, जबकि छोटे शहर पीछे रह जाते हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में असमान अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियाँ विकसित हो जाती हैं। सरकारी अपर्याप्तता और अवसंरचना के अभाव के साथ हमारी आधुनिक जीवनशैली भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभती है। लगातार चार वर्षों से इंदौर “भारत के सबसे स्वच्छ शहर” मे गिना जाता है। इसके पीछे शहर की प्रशासनिक संस्था और लोग एक प्रेरणास्त्रोत के रूप मे नजर आते हैं। सख्त शासन व्यवस्था, नागरिक अनुशासन, वैज्ञानीक अपशिष्ट प्रबंधन, निरंतर निगरानी एवं व्यवहारगत परिवर्तन कुछ प्रमुख कारण हैं।
क्यूँ जरूरी है कचरे का प्रबंधन
अनुचित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव व्यापक तथा बहुआयामी होते हैं, जो वायु, जल, मिट्टी तथा मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। ये प्रभाव अलग-अलग नहीं होते, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, जिससे संचयी जोखिम उत्पन्न होते हैं जो स्थानीय सीमाओं से परे तक फैल जाते हैं।खराब अपशिष्ट प्रबंधन के सबसे तात्कालिक पर्यावरणीय परिणामों में से एक वायु प्रदूषण है। खुले में कचरा जलाना, जो अनेक क्षेत्रों में एक सामान्य प्रथा है, विभिन्न प्रकार के हानिकारक प्रदूषकों को उत्सर्जित करता है, जिनमें कणीय पदार्थ, कार्बन मोनोऑक्साइड तथा डाइऑक्सिन और फ्यूरान जैसे विषैले यौगिक शामिल हैं। ये उत्सर्जन वायु गुणवत्ता को खराब करते हैं तथा विशेष रूप से घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करते हैं।लैंडफिल, जो अनेक क्षेत्रों में कचरा निस्तारण की प्रमुख विधि है, पर्यावरण प्रदूषण का एक अन्य बड़ा स्रोत है। लैंडफिल में जैविक अपशिष्ट के विघटन से मीथेन गैस उत्पन्न होती है, जो एक अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है और जिसकी वैश्विक तापन क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं अधिक होती है। मीथेन का अनियंत्रित उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है तथा एक गंभीर पर्यावरणीय चिंता का विषय है।मिट्टी प्रदूषण भी अनुचित अपशिष्ट निस्तारण से जुड़ी एक गंभीर समस्या है। मिट्टी में खतरनाक पदार्थों के संचय से उसकी उर्वरता प्रभावित होती है तथा पारिस्थितिक प्रक्रियाएँ बाधित होती हैं। कृषि क्षेत्रों में इसका सीधा प्रभाव खाद्य सुरक्षा एवं मानव स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी खराब अपशिष्ट प्रबंधन के प्रभाव अत्यंत गंभीर हैं। एकत्रित कचरा मच्छरों, मक्खियों तथा कृन्तकों (चूहों आदि) जैसे रोग वाहकों के लिए आदर्श प्रजनन स्थल प्रदान करता है। इससे मलेरिया एवं डेंगू जैसे वाहक जनित रोगों तथा जठरांत्र संबंधी संक्रमणों की घटनाओं में वृद्धि होती है। अपशिष्ट प्रबंधन कार्यों में लगे श्रमिक स्वास्थ्य जोखिमों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं, क्योंकि वे सीधे खतरनाक पदार्थों के संपर्क में रहते हैं। अनेक मामलों में वे पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के बिना कार्य करते हैं, जिससे चोट, संक्रमण तथा दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है।ये प्रभाव इस बात को रेखांकित करते हैं कि अपशिष्ट प्रबंधन पद्धतियों में सुधार करना तथा ऐसे सतत दृष्टिकोण अपनाना अत्यंत आवश्यक है, जो पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को न्यूनतम कर सकें।अव्यवस्थित अपशिष्ट निस्तारण किसी स्थान की सौंदर्यात्मक सुंदरता को प्रभावित करता है। सड़कों के किनारे अवैध रूप से कचरा फेंकने से किसी स्थान की सुंदरता कम हो जाती है और वह पर्यटकों के लिए कम आकर्षक गंतव्य बन जाता है। जिन क्षेत्रों की आय का प्रमुख स्रोत पर्यटन होता है, वहाँ पर्यटन में कमी के कारण भारी आर्थिक हानि हो सकती है।
कचरे को खुले में जलाना
जब हम कचरे को बिना किसी सुरक्षात्मक उपायों के जलते हैं तो इस गतिविधि को हम “कचरे को खुले में जलाना (Open Waste Burning)” कहते हैं। इसमे ना सिर्फ घरों से निकला कचरा, बल्कि खेतों मे जलायी गई पराली भी शामिल है। जब कचरा जलता है तो वो न सिर्फ वातावरण पर बल्कि हमारी सेहत पर भी असर डालता है। वैश्विक स्तर पर अनुमानित रूप से प्रतिदिन लगभग 40% अपशिष्ट को जलाया जाता है। एशिया में प्रतिवर्ष लगभग 256 मिलियन टन कचरा खुले में जलाया जाता है। खुले में कचरा जलाने के मामले में भारत, चीन के बाद दूसरा देश है।खुले में कचरा जलाने से उत्पन्न प्रदूषक के संपर्क में आने पर सिरदर्द, चक्कर आना, थकान तथा खांसी जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जिसका मुख्य कारण ऑक्सीजन की कमी तथा कार्बन मोनोऑक्साइड की बढ़ी हुई मात्रा है। लंबे समय तक ऐसे प्रदूषक के संपर्क से श्वसन एवं हृदय संबंधी रोग उत्पन्न हो सकते हैंक्योंकि कार्बन मोनोऑक्साइड रक्त में ऑक्सीजन के परिवहन को कम कर देती है जिससे सांस लेने में कठिनाई भी हो सकती हैं। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ी हुई मात्रा ग्रीनहाउस गैसों के संचय तथा जलवायु परिवर्तन में योगदान देती है। विषैला धुआँ एवं कणीय पदार्थ (Particulate Matter) वायु गुणवत्ता को खराब करते हैं तथा आसपास के पारिस्थितिक तंत्रों को नुकसान पहुँचाते हैं। आवासीय क्षेत्रों के निकट लगातार कचरा जलाने से सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिमों में वृद्धि होती है।इस दौरान जो भी वायु प्रदूषक निकलते है उनसे स्वास-संबंधित बीमारियाँ होने का खतरा बढ़ जाता है। जब ऐसे प्रदूषक हमारे शरीर मे जाते हैं तो स्ट्रोक ओर कैंसर जैसी समस्या भी हो सकती है। इन खतरों को रोकने के लिए सरकार ओर आम इंसानों को अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभानी पड़ेंगी।
हमारी जिम्मेदारी
सक्रिय भागीदारी और जिम्मेदार व्यवहार अपनाकर नागरिक खुले में कचरा जलाने को काफी हद तक कम कर सकते हैं तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार ला सकते हैं। स्रोत स्तर पर कचरे का पृथक्करण, कचरे को खुले में जलाने से बचना, गीले कचरे से कम्पोस्टिंग करना,एकल उपयोगप्लास्टिक (single use plastic ) के उपयोग को कम करना, कपड़े से बने थैलों का उपयोग करना, पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना तथा नगरपालिका के कचरा संग्रहण नियमों का पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण कदम हैं। जागरूकता कार्यक्रमों, स्वच्छता अभियानों तथा अवैध रूप से कचरा जलाने या फेंकने की शिकायत करने में सामुदायिक भागीदारी भी अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को बेहतर बनाती है। जनसहभागिता वायु प्रदूषण को कम करती है, सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार लाती है, लैंडफिल पर दबाव घटाती है तथा पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देती है। प्रभावी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए नागरिकों में जागरूकता, अनुशासन एवं व्यवहारगत परिवर्तन अत्यंत आवश्यक हैं।पुनः उपयोग किए जाने वाले उत्पादों का उपयोग, पर्यावरण-अनुकूल कार्यक्रम एवं आयोजन, कम अपशिष्ट उत्पन्न करने वाली जीवनशैलीऔर जिम्मेदार एवं जागरूक उपभोग की आदतें अपनाकर हम कचरे के उत्पादन को कम करने मे सहयोग दे सकते है जो की दीर्घकालिक दृष्टि से सबसे प्रभावी माना जाता है।

रोहित कुशवाहा
शोधाथी (BBAU) लखनऊ

रिचा मिश्रा
शोधाथी (BBAU) लखनऊ
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