हड़रहिया

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1965-1966 में हमने स्कूल जाना शुरू किया था। उसके बाद इण्टर तक गाँव में रहे। बचपन की स्मृतियों में गाँव का एक दृश्य आज भी बहुत साफ़ दिखाई देता है- ‘हड़रहिया’ का। गाँव में जब कोई जानवर मर जाता था तो उसके शव को इस हेतु नियत एक स्थान ‘हड़रहिया’ ले जाया जाता था (गाँव बड़ौरी, ब्लॉक मलवाँ, जनपद फतेहपुर, उ०प्र०)। हड़रहिया एक ऊँची जगह पर थी, जहाँ नीम, खजूर, आम, बबूल, बेर, शीशम आदि पेड़, झाड़ियाँ और घासें खूब थीं। एक डरावना स्थान था, जहाँ दिन में भी बच्चों ही नहीं, जवान लोग भी अकेले जाने से डरते थे। भूत-प्रेत की न जाने कितनी कहानियाँ और घटनाएँ लोगों ने वहाँ से जोड़ रखी थीं। जैसे ही शव वहाँ पहुँचता, कुछ ही देर में पता नहीं कहाँ-कहाँ से गिद्ध आने लगते और शव की खाल निकाले जाने तक सैकड़ों गिद्धों के आने से हड़रहिया भर जाती थी। लगता था जैसे गिद्धों के पास कोई अदृश्य सूचना-तंत्र हो। चारों दिशाओं से वे उतरते—‘लैण्ड’ करते—और देखते-देखते पूरा हड़रहिया सैकड़ों गिद्धों की उपस्थिति से काला नज़र आने लगता था।

      जीटी रोड के बिलकुल किनारे होने के कारण एकाध गिद्ध यदा-कदा वाहनों की चपेट में आकर घायल हो या मर जाता था। यद्यपि उस समय रोड पर वाहनों की संख्या इतनी कम होती थी कि लोग तालाब से बाल्टी में भरकर पानी लाते और रोड सीमेण्टेड होने के कारण उस पर साबुन लगाकर कपड़े धोते थे। हड़रहिया के पूर्व जीटी रोड के बगल में यह तालाब था। तालाब के दक्षिण में जीटी रोड, पश्चिम में हड़रहिया और पूर्व व उत्तर में आम-महुए के घने बाग थे, जिनमें बंदरों ने अपनी स्थाई रिहाइश बना रखी थी। बंदरों की बस्ती होने के कारण ही उस तालाब के आसपास के क्षेत्र को बँदरहिया कहा जाता था।

       वह दृश्य आज के समय में शायद किसी को अविश्वसनीय लगे। हड़रहिया में जगह-जगह पशुओं की हड्डियाँ, सिर और सींग पड़े रहते थे। साँप, लोमड़ियाँ, सियार, जंगली बिल्लियाँ, बंदर, खरगोश, नेवले, चील, कौवे आदि जीव-जंतु वहाँ रहते थे। गिद्धों का झुंड जब उतरता तो शुरू में वे काफ़ी फुर्तीले दिखाई देते थे। फिर शव पर कुत्तों, कौवों और चीलों के साथ उनकी सामूहिक दावत शुरू होती। इस दौरान दूसरों को भगाकर अधिक से अधिक ख़ुद खा लेने के लिए, या कम-से-कम अपना हिस्सा पा जाने के लिए, उनके बीच ख़ूब वाकयुद्ध और भीषण लड़ाइयाँ होती थीं। जीवन के लिए संघर्ष का वह दृश्य ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) की जीवंत तस्वीर जैसा लगता था—हर जीव अपने अस्तित्व और भोजन के लिए उपलब्ध अवसर का अधिक-से-अधिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहा होता था। थोड़ी देर में जानवर के शव का मांस ग़ायब हो जाता और केवल कंकाल बचता। गिद्धों का पेट इतना भर जाता कि उड़ना तो दूर, चलना भी जैसे भारी पड़ने लगता। भोजन के बाद वे आसपास की झाड़ियों में झुंड बनाकर बैठ जाते और कई दिनों तक ऊँघते रहते।

      हम बच्चों के लिए यह भी एक तमाशा था। कभी शरारत में किसी ऊँघते गिद्ध को डण्डे या लाठी से छेड़ देते, कभी मार भी देते। गिद्ध बेचारा पलटकर हमला नहीं करता था; अपना सिर और मुँह पंखों के भीतर छिपा लेता। हमें यह डरपोकपन लगता था। आज सोचता हूँ तो लगता है, डरपोक वह नहीं था—अनजान हम थे।

      आज हवाई जहाज़ों का उड़कर जाना और उतरकर आना गिद्धों की याद दिलाता है। आज हवाई जहाज़ को रनवे पर दौड़ते हुए टेक-ऑफ करते और उतरने के बाद रनवे पर दौड़ते हुए रुकते देख गिद्धों का दौड़ते-दौड़ते पंख फैलाकर उड़ान भरना और आकाश से उतरकर फिर दौड़ते-दौड़ते रुकना याद आता है। शायद इसी दृश्य-समानता के कारण बचपन में मुझे लगता था कि मनुष्य ने हवाई जहाज़ की उड़ान और उसके टेक-ऑफ तथा लैण्डिंग की कल्पना प्रकृति में गिद्धों जैसे पक्षियों को देखकर की होगी। वैज्ञानिक इतिहास में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि विमान की रचना या उसकी उड़ान की तकनीक गिद्धों से प्रेरित थी; यह केवल प्रकृति को देखकर उपजी मेरी बाल-सुलभ कल्पना थी। फिर भी यह समानता आज भी मुझे रोचक लगती है—प्रकृति में जीव करोड़ों वर्षों से जिन तरीक़ों से उड़ते, उतरते और संतुलन बनाते आए हैं, मनुष्य ने बहुत बाद में उन्हें देखकर और समझकर अपनी उड़ान की तकनीक विकसित की।

     गाँव में गिद्धों को लेकर धारणा भी कुछ ऐसी ही थी। उनके काले-धूसर रंग, नंगी-सी गर्दन, विचित्र आकृति और मृत पशुओं को खाने की आदत के कारण उन्हें अपशकुन माना जाता था। गाँववालों ने उन्हें अपने सौंदर्य-प्रतिमान से कुरूप माना था और उनकी उपयोगिता तथा महत्त्व से लगभग अनजान थे। लगभग चार दशक बाद, 2004 में गिद्धों से मेरी एक और यादगार मुलाकात हुई। उस समय मैं खीरी जनपद में क्षेत्राधिकारी, पलिया के पद पर तैनात था और मेरे क्षेत्र में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान आता था। तब तक गिद्ध लगभग विलुप्तप्राय स्थिति में पहुँच चुके थे। फिर भी दुधवा के आसपास के गाँवों में वे कभी-कभार दिखाई दे जाते थे।

      एक दिन मैं किसी कार्य से पलिया से निघासन जा रहा था। मझगई बाज़ार के बाद अचानक सड़क के बाईं ओर एक स्थान पर गिद्धों का बड़ा जमावड़ा दिखाई दिया। दृश्य इतना असाधारण था कि मैंने पलिया से फोटोग्राफर बुलाकर उस जमावड़े की तस्वीर खिंचवाई। बाद में दुधवा प्रशासन की अपनी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर वही तस्वीर प्रकाशित की गई। मेरे लिए वह तस्वीर केवल एक दुर्लभ दृश्य का दस्तावेज़ नहीं थी; वह मेरे बचपन की हड़रहिया की स्मृति से जुड़ गई। अंतर बस इतना था कि बचपन में सैकड़ों गिद्धों का एक साथ दिखाई देना हमारे लिए सामान्य बात थी, जबकि 2004 तक इतने बड़े जमावड़े का दिखाई देना ही असाधारण घटना बन चुका था। उसके बाद दुधवा के आसपास की सड़कों पर गिद्ध कई बार नज़र आए, लेकिन उस संख्या में फिर कभी नहीं। बचपन में जिन सैकड़ों गिद्धों का नज़र आ जाना रोज़मर्रा के ग्रामीण जीवन का सामान्य दृश्य था, उनके इतने बड़े समूह को फिर कभी न देख पाना अपने आप में उनकी घटती संख्या की एक मार्मिक तस्वीर थी। दुधवा और वहाँ के पशु-पक्षियों तथा वृक्षों के संरक्षण के प्रयासों से जुड़े कार्यों के लिए बाद में ब्रिटेन के एक संगठन की एक महिला प्रतिनिधि दुधवा प्रशासन के वार्षिक कार्यक्रम में आईं और उन्होंने मुझे एक प्रमाण-पत्र प्रदान किया। तब तक मेरा स्थानांतरण हो चुका था और मैं बाराबंकी आ गया था। तत्कालीन उपनिदेशक, दुधवा ने वह प्रमाण-पत्र मुझे बाराबंकी भिजवा दिया। वह प्रमाण-पत्र मेरे लिए केवल एक सम्मान-पत्र नहीं, बल्कि दुधवा और वहाँ के वन्यजीवन से जुड़े उस दौर की एक सुखद स्मृति भी है।

       आज विज्ञान की दृष्टि से उसी हड़रहिया और उस समय के गिद्धों को याद करता हूँ तो वह स्थान किसी साधारण पशु-निस्तारण स्थल से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण दिखाई देता है। वे सैकड़ों गिद्ध प्रकृति की एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा थे, जो बिना किसी मशीन, कर्मचारी या बजट के मृत पशुओं के शवों का निस्तारण कर रही थी। गिद्ध प्रकृति के अत्यंत प्रभावी सफ़ाईकर्मी हैं। वे शवों को तेज़ी से खाकर उन्हें सड़ने-गलने और संभावित रूप से रोगजनक सूक्ष्मजीवों के प्रसार का माध्यम बनने से रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके पाचन तंत्र की विशेष क्षमता और अत्यधिक अम्लीय जठर-रस उन्हें ऐसे शवों को खाने में सक्षम बनाता है, जिनमें अनेक रोगजनक मौजूद हो सकते हैं। लेकिन प्रकृति की इस व्यवस्था को मनुष्य ने स्वयं संकट में डाल दिया। 1990 के दशक में भारत और दक्षिण एशिया में गिद्धों की संख्या अचानक तेज़ी से घटने लगी। इसका सबसे बड़ा कारण पशु-चिकित्सा में इस्तेमाल होनेवाली दर्दनिवारक दवा डिक्लोफेनाक थी। इस दवा से उपचारित मवेशियों की मृत्यु के बाद उनके शव खानेवाले गिद्धों के शरीर में दवा पहुँच जाती थी। परिणामस्वरूप उनके गुर्दे काम करना बंद कर देते थे और बड़े पैमाने पर उनकी मृत्यु होने लगी। कुछ प्रजातियों की आबादी में लगभग 97 से 99 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज़ की गई। भारत में पशु-चिकित्सकीय उपयोग के लिए डिक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन गिद्धों के लिए ख़तरे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। बिजली की तारों से टकराना और करंट लगना, विषैले पदार्थों का सेवन, भोजन की कमी, आवास का विनाश और कुछ अन्य दवाओं का प्रभाव आज भी चिंता का विषय हैं।

      गिद्धों की इसी संकटग्रस्त स्थिति और उनकी पारिस्थितिक भूमिका के प्रति दुनिया को जागरूक करने के लिए हर वर्ष सितंबर के पहले शनिवार को ‘अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस’ (International Vulture Awareness Day) मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 2006 में दक्षिण अफ्रीका में एक राष्ट्रीय पहल के रूप में हुई थी और 2009 में इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप मिला। इस अवसर पर विभिन्न देशों में वन्यजीव संस्थाओं, पक्षी संरक्षण संगठनों, विद्यालयों और स्थानीय समुदायों द्वारा व्याख्यान, प्रदर्शनियाँ, पक्षी-दर्शन, प्रकृति-भ्रमण, पोस्टर एवं चित्रकला प्रतियोगिताएँ तथा जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उद्देश्य केवल गिद्धों के बारे में जानकारी देना नहीं, बल्कि उनके प्रति बनी उस सामाजिक धारणा को बदलना भी है, जिसमें उन्हें अशुभ या घृणित समझा जाता है। भारत में गिद्ध संरक्षण और प्रजनन के लिए विभिन्न केंद्रों पर वैज्ञानिक प्रयास किए जा रहे हैं। पिंजौर सहित कई स्थानों पर संरक्षण एवं प्रजनन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। साथ ही पशु-चिकित्सा में गिद्धों के लिए हानिकारक दवाओं के इस्तेमाल को रोकना, सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराना, बिजली के ढाँचे को पक्षी-अनुकूल बनाना और उनके प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखना आवश्यक है।

       आज जब मैं अपने बचपन के उस हड़रहिया को याद करता हूँ तो सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर होता है कि तब हमने उस दृश्य को कितना सामान्य समझा था। चारों दिशाओं से उतरते सैकड़ों गिद्ध, शवों पर उनका टूट पड़ना, फिर झाड़ियों में पेट भरे हुए झुंड के झुंड ऊँघते रहना और कुछ दिन बाद फिर आसमान में उड़ जाना—यह सब हमारे लिए गाँव के जीवन का सामान्य हिस्सा था। हमें यह पता ही नहीं था कि हम प्रकृति की एक अत्यंत परिष्कृत और उपयोगी व्यवस्था को अपनी आँखों के सामने काम करते देख रहे हैं। समय ने दृश्य बदल दिया। जिन्हें हमने कभी बहुतायत में देखा और लाठी से खदेड़ा, आज उन्हें बचाने के लिए वैज्ञानिकों और संरक्षणकर्मियों को विशेष प्रयास करने पड़ रहे हैं। तब हमारी अज्ञानता गिद्धों को अपशकुन समझती थी; आज विज्ञान उन्हें पारिस्थितिक संतुलन के महत्त्वपूर्ण प्रहरी के रूप में पहचानता है।

        प्रकृति में किसी जीव का महत्त्व उसके रंग, रूप या हमारी सौंदर्य-दृष्टि से तय नहीं होता। गिद्ध इसका शायद सबसे अच्छा उदाहरण हैं। जिसे हम कभी कुरूप समझते रहे, वही प्रकृति का अनमोल सफ़ाईकर्मी निकला। हड़रहिया की मेरी बचपन की वह स्मृति इसलिए अब केवल एक पुराने गाँव की तसवीर नहीं रह गई है; वह मुझे यह भी याद दिलाती है कि प्रकृति की बहुत-सी सेवाएँ इतनी सहज और स्वाभाविक होती हैं कि हम उनका मूल्य तब तक नहीं समझते, जब तक वे हमारे बीच से ग़ायब होने न लगें।

        शायद आनेवाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे कभी खुले आसमान से चारों दिशाओं से उतरते सैकड़ों गिद्धों का वह दृश्य देख पाएँगी, जो मेरे बचपन में गाँव के जीवन का एक सामान्य हिस्सा था। गिद्धों को बचाना इसलिए केवल एक पक्षी को बचाना नहीं, बल्कि प्रकृति की उस अनमोल व्यवस्था को बचाना है, जिसकी कीमत हमें अब समझ में आ रही है। हर वर्ष सितंबर के पहले शनिवार को मनाया जानेवाला ‘अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस’ हमें इसी बात की याद दिलाता है कि किसी जीव की उपयोगिता उसकी सुंदरता से नहीं, बल्कि प्रकृति में उसकी भूमिका से तय होती है। इस वर्ष यह दिवस 5 सितंबर को मनाया गया। गिद्धों को बचाना केवल उनके अस्तित्व को बचाना नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक व्यवस्था को बचाना है, जो कभी हमारी हड़रहिया में बिना किसी शोर के अपना काम किया करती थी।

(लेखक – अशोक कुमार वर्मा, सेवानिवृत्त आईपीएस)

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