भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू स्वयं एक लेखक, विचारक और चिंतक थे। पूरे विश्व में उनके इस रूप की मुकम्मल पहचान थी। पूरी दुनिया उनके लेखन की कायल थी और वे एक कोर राजनीतिक व्यक्तित्व की पहचान नहीं रखते थे अपितु उनको एक बुद्धिजीवी राजनीतिक के रूप में देखा और माना जाता था। यही कारण है कि जवाहरलाल नेहरू के बहुआयामी व्यक्तित्व में उनका एक रचनाकार और लेखक का व्यक्तित्व समाहित था। उन्होंने बहुत सारे लेखन कार्य किए हैं, जिनमें‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया‘, ‘ग्लिंपसेस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री‘ जैसी इतिहास की किताबें अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं। उनके द्वारा अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को जो पत्र लिखे गए‘पुत्री के नाम पिता का पत्र‘ लेखन जगत में उसकी एक खास पहचान है। नेहरू के लेखन से उनके लोकतांत्रिक व्यक्तित्व और एक परिपक्व बुद्धिजीवी की वह छवि उभरती है, जो भारत के बारे में आधुनिक और विश्वस्तरीय सोच रखते थे। उन्होंने अपने समय की महाशक्तियों का अंधानुकरण नहीं किया बल्कि अदम्य विश्वास और बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए अपना एक अलग मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने गुटनिरपेक्षता की नींव डाली, जिसका लोहा पूरे विश्व ने माना और भारत महाशक्तियों का पिछलग्गू न बनकर विश्व को नेतृत्व प्रदान करने वाले शांति दूत के रूप में उभरा। नेहरू के लेखन में उनके व्यक्तित्व की छाप समाहित थी। वे सिर्फ आत्मकेंद्रित लेखक नहीं थे। एक चिंतक और विचारक होने के नाते व दुनिया भर के और भारत के लेखकों के प्रति उनका क्या दृष्टिकोण रहा, इस बिंदु पर मुख्य रूप से बात करना मेरा अभीष्ट होगा।
नेहरू देश के स्वतंत्रता संग्राम के एक बहुत बड़े सेनानी थे और वे उस कालखंड के पूंजीवादी, साम्राज्यवादी महाशक्तियों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। इसलिए लोकतांत्रिक मानवीय मूल्यों की महत्व तथा मानवीय हितों के मर्म को जमीनी स्तर पर खूब ठीक तरह से समझते थे। यही कारण है कि वह अन्य लेखक को और विचारों में भी लोकतंत्र और मानव मुक्ति के मूल्य को कुछ ज्यादा ही आदर और सम्मान देते थे। उनके लिए लेखन कार्य कोई शौकिया विलास कर्म नहीं था। अपितु लेखन उनके लिए मानव मुक्ति का एक महान सांस्कृतिक कर्म था। अभी हाल में प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने नेहरू के लेखन का एक संपादन किया है और उस पुस्तक का नाम रखा है ‘कौन है भारत माता’।
इस पुस्तक की भूमिका और इसमें संकलित नेहरू के तमाम लेखन को देखकर स्पष्ट रूप से पता चल जाता है कि एक लेखक चिंतक और विचारक के तौर पर उनकी वरीयताएं और प्राथमिकताएं क्या थीं? नेहरू आधुनिकता, लोकतांत्रिक मानव मूल्य जैसे तमाम प्रकार के शोषण से मुक्त मानवीय जीवन और मानवीय गरिमा के पक्षधर लेखक थे। उनके इस लेखन से एक स्वतंत्र, संप्रभु, आधुनिक और लोकतांत्रिक नये भारत की परिकल्पनाएं भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं। जो लेखक स्वयं आधुनिक और लोकतांत्रिक विचारों का है, जो सांप्रदायिकता विरोधी, धर्मनिरपेक्षता आपसी भाईचारा और सहिष्णुता का पक्षधर रहा हो, वह इन्हीं लेखक को और उनके लेखन को पसंद करता रहा होगा जिसमें उपर्युक्त सभी मूल्य सन्निहित होंगे।
एक और महत्त्वपूर्ण बात ध्यान रखने की आवश्यकता है कि लोकतंत्र का एक सच्चा सिपाही होने के कारण नेहरू ने असहमतियों और विरोधों को बराबर रूप से सम्मान और महत्व प्रदान किया। वे असहमतियों के प्रति दमन का रवैया बिल्कुल नहीं अपनाते थे बल्कि असहमतियां उनके लिए संवाद का मार्ग खोलने वाला माध्यम रही हैं। जिससे आगे के मार्ग खुलते हैं, बंद नहीं हो जाते। सत्ता संरचनाओं की आलोचना करने वाले साहित्य और साहित्यकारों को उस कालखंड में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त थी।
नेहरू के प्रधानमंत्री के रूप में प्रथम कार्यकाल से ही हिंदी के साहित्यकारों को भारतीय संसद में सम्मानपूर्वक स्थान मिला। हिंदी के दो राष्ट्रकवि- श्री मैथिलीशरण गुप्त एवं श्री रामधारी सिंह दिनकर सन् 1952 से ही राज्यसभा के सदस्य बनाए गए। दिनकर नेहरू के कार्यकाल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा बिहार राज्य से चुनकर 3 अप्रैल 1952 से 26 जनवरी 1964 तक लगातार तीन कार्यकालों तक राज्यसभा के सांसद रहे। मैथिलीशरण गुप्त 3 अप्रैल 1952 से 2 अप्रैल 1964 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। हिंदी साहित्य में उपर्युक्त कविद्वय को ‘राष्ट्रकवि’ होने का सम्मान प्राप्त है और नेहरू जी को उन्हें राज्यसभा सदस्य बना कर हिंदी को यथेष्ट रूप से सम्मानित करने का श्रेय प्राप्त है।
जहां तक मैथिलीशरण गुप्त का सवाल है वह मुख्य रूप से आर्य संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं के चितेरे रहे हैं यद्यपि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से उन्होंने ‘साकेत’ और ‘यशोधरा’ प्रभृति काव्य ग्रंथों की रचना की जिसके केंद्र में उपेक्षित नारी चरित्रों को मुख्य धारा में लाना था फिर भी भारतीय संस्कृति की बहुलता को चित्रित करने की दृष्टि से उनकी काव्य रचनाओं का वितान उतना विस्तृत नहीं कहा जा सकता। इस संबंध में नेहरू की सांस्कृतिक दृष्टि अपेक्षाकृत उदार और व्यापक थी। वे भारत की बहुआयामी संस्कृति की धाराओं को भली-भांति समझते थे। इस प्रकार की दृष्टि-भिन्नता के बावजूद उन्होंने कविवर की अभिव्यक्ति प्रक्रिया में कभी बाधा खड़ी की हो, इसका दूर-दूर तक प्रमाण नहीं मिलता।
यह अकारण नहीं रहा होगा कि दिनकर जी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा बिहार राज्य से चुनकर तीन बार राज्यसभा में भेजा गया। दिनकर जी की रचना ‘संस्कृति के चार अध्याय’ को इसके मूल में देखा जा सकता है। इस वृत्ति में भारत की साझी संस्कृति और उसके बहुआयामी विरासत को परवर्ती पश्चिमी आधुनिकता के साथ जिस संश्लिष्ट रूप में चित्रित किया गया है वह नेहरू की वैचारिकता को पुष्ट करने वाली दृष्टि है। स्पष्ट है कि नेहरू का भारत बहुधर्मी, बहुभाषी और बहुसंस्कृति के सह-अस्तित्व का जीता जागता मिसाल रहा है। यह एकरंगी नहीं वरन् बहुरंगी भारत की बेमिसाल खूबसूरती थी, जिसे नेहरू कालीन साहित्यिक लेखन में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ।
ऐसा कतई नहीं था कि नेहरू और उनके परवर्ती कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में सब कुछ ठीक-ठाक और परम संतोषजनक था। हिंदी के अनेक साहित्यकार विशेषकर प्रगतिशील-जनवादी विचारधारा के लेखक, रचनाकार कांग्रेसी राजसत्ता की कार्य कार्यप्रणालियों की कटु आलोचना निरंतर कर रहे थे। कुछ विशेष साहित्यकारों के उदाहरण से तत्कालीन सत्ता संरचनाओं की कटु आलोचनाओं के स्वरूप को समझा जा सकता है।
ऐसे आलोचक साहित्यकारों में सबसे पहले कवि नागार्जुन का नाम सर्वोपरि है। बाबा नागार्जुन ने शासन सत्ता को अंदर तक भेद देने वाली रचनाओं की हैं। उन्होंने इस पर सीधा व्यंग्य किया है-
‘आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी, यही राय हुई है जवाहरलाल की।’
देश के जन प्रतिनिधि जनहित के मुद्दों के प्रति कितने उदासीन थे पर सत्ता की मलाई काटने को कितने तत्पर थे उसे तरह के अवसरवाद और जुगाड़ का नागार्जुन ने बारीकी से पर्दाफाश किया है। इस संदर्भ में उनकी कविता ‘आए दिन बहार के’ को देखा जा सकता है-
“श्वेत श्याम रतनार अँखियाँ निहार के,
सिंडिकेट प्रभुओं की पगधूरी झार के,
लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के,
खिले हैं दाँत ज्यों दाने अनार के,
आए दिन बहार के।”
नागार्जुन की निम्नलिखित पंक्तियों को आज लिखने की परिकल्पना करना कितना दुष्कर है यह कहने की आवश्यकता नहीं है-
“रामराज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है
सूरत शकल वही है भैया बदला केवल ढाँचा है।”
सन् 1945 में प्रकाशित उपन्यास ‘मैला आंचल’ का इस प्रसंग में संज्ञान लिया जाना जरूरी है। इस उपन्यास का महत्वपूर्ण पात्र बावनदास, जो सच्चा गांधीवादी और कांग्रेसी है। स्वतंत्र भारत की सत्ता संरचनाओं और व्यवस्थाओं के बीच किस प्रकार उसके चिथड़े उड़ा दिए जाते हैं। यह परिघटना तत्कालीन शासन व्यवस्था के अंधेरे पक्ष को उखाड़ कर रख देती है। तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद, दुलारचंद कापरा जैसे विचाराधाराहीन, बेईमान, लालची अवसरवादी पर सशक्त लोगों के हाथों में कांग्रेस की कमान आ जाती है।
इसी तरह ‘झूठा-सच’ के पात्र जयदेव पुरी के माध्यम से कांग्रेसी जनप्रतिनिधियों के नैतिक पतन और जनहित के मुद्दों के प्रति उनकी गैर-जिम्मेदार की प्रवृत्तियों की गाथा का अंकन किया गया है।
कवि दिनकर भी इस मामले में पीछे नहीं है उन्होंने भी लिखा-
कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे, भूखा हिंदुस्तान !
(समर शेष है )
“सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है
दिल्ली में रोशनी, शेष भारत में अंधियाला है।”
उपर्युक्त पंक्तियों का रचनाकाल 1964 ई. है, जो स्पष्ट तौर पर नेहरू का काल है। नागार्जुन जैसे सच्चे जनवादी कवि भी व्यंग्य करते हैं- “ बापू के भी ताऊ निकले, तीनों बंदर बापू के!”
नागार्जुन ने तो इंदिरा गांधी पर ही सीधा हमला बोल दिया था-
“इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको?
सत्ता की मस्ती में भूल गईं बाप को!
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!
क्या हुआ आपको।”
आपातकाल के दौरान ऐसी सशक्त पंक्तियां लिखी गई थीं। आज के समय में सत्ता शीर्ष को सीधे संबोधित करके लिखना ख़तरे से खाली नहीं है यद्यपि आपातकाल में जेपी आंदोलन में भागीदारी के लिए नागार्जुन को 11 महीने जेल की सजा हुई थी, पर उनकी अभिव्यक्ति की आजादी खत्म नहीं कर दी गई थी। जेल में भी उन्होंने ‘मंत्र’ जैसी अत्यंत सशक्त काव्य रचना की थी।
इस प्रसंग में हमें जनवादी कवि गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ का भी स्मरण कर लेना चाहिए। उन्होंने ‘भूल गलती’, ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ और ‘अंधेरे में’ जैसी कालजयी रचनाएं कीं। यह रचनाएं तत्कालीन सत्ता और व्यवस्था विरोध की तीव्रतम आवाज़ें हैं। उनकी यह पंक्तियां तो अत्यंत बेधक हैं-
“ओ मेरे आदर्शवादी मन
ओ मेरे सिद्धांतवादी मन
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया?
•••••••
बहुत-बहुत ज्यादा लिया,दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश अरे जीवित रह गए तुम!!
व्यवस्था विरोध और छद्म लोकतंत्र की समीक्षा करने की शासन परंपरा हिंदी में निरंतर बनी रही है। हरिशंकर परसाई, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, सुदामा पांडे ‘धूमिल’, दुष्यंत कुमार जैसे अनेक नाम हैं, उन्होंने प्रतिरोध की, चेतना की मसाला को विषम चुनौतियों के बावजूद जलाए रखा। परसाई की ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’, ‘राजनीति का बंटवारा’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ जैसे अनेक रचनाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता। धूमिल तो अपनी व्यवस्था विरोधी कविताओं के लिए ही प्रसिद्ध हैं जैसे ‘रोटी और संसद’।
अभी इस लेख में सभी बातों का जिक्र करना संभव नहीं, मूल बात यह है कि नेहरू और परवर्ती कांग्रेसी शासनकाल में अभिव्यक्ति पर ताला और उसका विडंबनापूर्ण दमन कभी नहीं किया गया। लोकतंत्र का दीपक मध्यम अवश्य हुआ पर धुंध आते हुए बुझकर अंधेरे का पर्याय नहीं बन गया। कहीं ना कहीं रोशनी के कतरे की गुंजाइश बनी रही।
वर्तमान समय-समाज में जिसे मोदी युग कहा जाता है-लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता/आजादी की परिधि कमजोर होती हुई प्रतीत हो रही है। असगर वजाहत की कहानी ‘मैं हिंदू हूं’ से वर्तमान वातावरण के ताप को और उसकी विचारधारात्मक विरासत की जड़ों को समझा जा सकता है। तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन के उपन्यास ‘माधोरुभागन’ के खिलाफ कट्टरपंथी और जातिवादी समूहों ने ऐसा हिंसक विरोध किया कि जनवरी 2015 में उन्होंने फेसबुक पर घोषणा कर दी कि “लेखक पेरूमल मुरुगन की मृत्यु हो गई है।”
इसी प्रकार झारखंड के युवा लेखक हँसदा सोवेन्द्र शेखर के कहानी संग्रह ‘The Adiwasi Will Not Dance’ को अगस्त 2017 मे प्रतिबंधित करके लेखक को सरकारी नौकरी से निलंबित कर दिया गया था। व्यापक आलोचना और विरोध के कारण अंततः इस प्रतिबंध और निलंबन को वापस लिया गया। एम.एम. कलबुर्गी नरेंद्र दाभोलकर, गौरी लंकेश प्रभृति बुद्धिजीवियों के साथ जो कुछ घटित हुआ वह एक स्वस्थ लोकतांत्रिक चेतना पर बदनुमा दाग है।
किसी स्टैंडिंग कॉमेडियन पर कानूनी कार्यवाही करवाकर उसका मुंह बंद करवाने की कोशिश, लोकतंत्र की मूल भावना असहमति और विरोधी विचारों का सम्मान तथा सह अस्तित्व के सर्वथा के खिलाफ है। सोशल मीडिया के चैनलों को सत्ता के मनोनुकूल बातें न करने पर प्रतिबंधित कर देना, रीढ़ वाले पत्रकार को बाहर का रास्ता दिखा देना, स्वतंत्र विचारकों के फेसबुक पेज आदि पर रोक लगाना-ये सब कुछ अलोकतांत्रिक कार्य आजकल आम बात हो गई है।
अंत में प्रेमचंद को याद करना बहुत आवश्यक है। इन्होंने जोर देकर कहा था- “साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

डॉ. सूरज बहादुर थापा
bhojpuriinagi@gmail.com
सीनियर प्रोफेसर, हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ




