नेहरू और मोदी युग की शिक्षा व्यवस्था : एक तुलनात्मक अध्ययन-

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भारत का शैक्षिक इतिहास केवल पाठ्यक्रमों, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उस बौद्धिक यात्रा का इतिहास भी है जिसके माध्यम से एक समाज अपने भविष्य की कल्पना करता है। किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था उसके राजनीतिक दर्शन, आर्थिक प्राथमिकताओं, सांस्कृतिक दृष्टिकोण और सामाजिक आकांक्षाओं का सबसे विश्वसनीय दर्पण होती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे लोकतंत्र की स्थिरता, सामाजिक न्याय, आर्थिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता के निर्माण का आधार बनाया। इसी कारण स्वतंत्र भारत के इतिहास में दो ऐसे कालखंड विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने शिक्षा की दिशा और संरचना पर गहरा प्रभाव डाला।    

    पहला कालखंड प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की प्रारम्भिक दशाओं का है, जब शिक्षा के माध्यम से आधुनिक राष्ट्र की संस्थागत आधारशिला रखी जा रही थी;  दूसरा कालखंड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का है, जिसमें शिक्षा को वैश्विक प्रतिस्पर्धा, डिजिटल प्रौद्योगिकी, कौशल विकास और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्गठित करने का प्रयास किया गया। दोनों युगों के ऐतिहासिक संदर्भ अलग-अलग थे,  इसलिए उनकी शैक्षिक प्राथमिकताएँ भी स्वाभाविक रूप से भिन्न रहीं, किंतु दोनों की मूल चिंता भारत को अधिक सक्षम, आत्मनिर्भर और ज्ञानसम्पन्न राष्ट्र बनाना ही रही।

      स्वतंत्रता के समय भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करना नहीं था, बल्कि सदियों की दासता, व्यापक अशिक्षा, आर्थिक निर्धनता, सामाजिक विषमता और वैज्ञानिक पिछड़ेपन से देश को बाहर निकालना भी था। विभाजन की त्रासदी ने करोड़ों लोगों को विस्थापन, हिंसा और असुरक्षा का अनुभव कराया था। ऐसे समय में शिक्षा को राष्ट्र-निर्माण की सबसे महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखा गया। जवाहरलाल नेहरू का विश्वास था कि लोकतंत्र तभी स्थायी होगा, जब समाज वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किकता और आधुनिक ज्ञान से सम्पन्न होगा। उनके विचार में शिक्षा किसी संकीर्ण परंपरा का संरक्षण मात्र नहीं, बल्कि नए भारत की रचनात्मक चेतना का निर्माण करने वाली शक्ति थी। इसी सोच ने स्वतंत्र भारत की शैक्षिक नीति को आधुनिकता, विज्ञान और अनुसंधान की दिशा प्रदान की।

    नेहरू युग में शिक्षा के माध्यम से ऐसे नागरिक तैयार करने की कल्पना की गई जो आधुनिक उद्योग, विज्ञान, चिकित्सा, प्रशासन और तकनीकी विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकें। इस दृष्टि से उच्च शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों की स्थापना को विशेष महत्व मिला। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा राष्ट्रीय स्तर की अनेक शैक्षिक एवं वैज्ञानिक संस्थाओं की स्थापना इसी व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि का परिणाम थी। इन संस्थानों ने केवल विशेषज्ञ तैयार नहीं किये, बल्कि भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी क्षमता और बौद्धिक नेतृत्व की ऐसी परंपरा विकसित की जिसने आगे चलकर देश को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि स्वतंत्र भारत के औद्योगिक और वैज्ञानिक विकास की जो संरचना आज दिखाई देती है, उसकी आधारशिला इसी काल में रखी गयी। उच्च शिक्षा के साथ-साथ विद्यालयी शिक्षा के विस्तार का भी प्रयास हुआ। संविधान में बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया। विश्वविद्यालयों और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए विभिन्न आयोग गठित किए गए। शिक्षा को राष्ट्रीय विकास की योजनाओं से जोड़ा गया और पंचवर्षीय योजनाओं में इसे विशेष स्थान दिया गया। यद्यपि सीमित संसाधनों और विशाल जनसंख्या के कारण प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण अपेक्षित गति से नहीं हो पाया, फिर भी शिक्षा के क्षेत्र में जो संस्थागत ढाँचा तैयार हुआ, उसने आगे आने वाले दशकों के लिए मजबूत आधार उपलब्ध कराया। इस दौर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि शिक्षा को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की दीर्घकालिक परियोजना के रूप में देखा गया। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि नेहरू युग की शिक्षा व्यवस्था अपनी सीमाओं से मुक्त नहीं थी। ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों की संख्या अपर्याप्त थी, प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव था, बालिका शिक्षा अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सकी और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों की शैक्षिक भागीदारी सीमित रही। अनेक विद्वानों ने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा और प्रतिष्ठित संस्थानों पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया गया,  जबकि प्राथमिक शिक्षा और सार्वभौमिक साक्षरता को उतनी प्राथमिकता नहीं मिल सकी जितनी उसकी आवश्यकता थी। इन आलोचनाओं के बावजूद इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी संस्थाएँ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण इसी काल की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं।

     समय के साथ भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और विश्व व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए। वैश्वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था और ज्ञान-आधारित उद्योगों ने शिक्षा की नई आवश्यकताएँ उत्पन्न कीं। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारत ने ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव की जो केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित न रहे, बल्कि विद्यार्थियों में रचनात्मकता, नवाचार, उद्यमिता, कौशल और जीवनपरक दक्षताओं का विकास भी करे। इसी पृष्ठभूमि में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शिक्षा सुधारों का नया दौर प्रारम्भ हुआ। इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ मानी जाती है। इस नीति ने शिक्षा को समग्र, बहुविषयी, लचीला और कौशल-आधारित बनाने का व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। विद्यालयी शिक्षा की पारंपरिक संरचना में परिवर्तन करते हुए प्रारम्भिक बाल्यावस्था शिक्षा को औपचारिक शिक्षा का हिस्सा बनाया गया। रटकर परीक्षा उत्तीर्ण करने की संस्कृति के स्थान पर अवधारणात्मक समझ, विश्लेषणात्मक क्षमता, समस्या-समाधान, सृजनात्मकता और अनुभवात्मक अधिगम को महत्व दिया गया। विषयों के बीच कृत्रिम विभाजन को कम करने का प्रयास किया गया, ताकि विद्यार्थी अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार विविध विषयों का चयन कर सकें। इस दृष्टिकोण ने शिक्षा को अधिक लचीला और विद्यार्थी-केंद्रित बनाने की दिशा में नया मार्ग प्रशस्त किया।

     इस काल में मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को प्रारम्भिक शिक्षा का प्रभावी माध्यम बनाने पर भी बल दिया गया। इसके पीछे यह विचार था कि बालक अपनी भाषा में अधिक सहजता से अवधारणाओं को समझता है और उसकी बौद्धिक क्षमता का बेहतर विकास होता है। साथ ही डिजिटल प्रौद्योगिकी को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया गया। ऑनलाइन शिक्षण मंचों, डिजिटल सामग्री, आभासी कक्षाओं और मुक्त शैक्षिक संसाधनों का विस्तार विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौरान अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भविष्य की शिक्षा केवल भौतिक कक्षाओं तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि डिजिटल माध्यमों के साथ उसका गहरा संबंध होगा।

     उच्च शिक्षा में भी अनेक परिवर्तन प्रस्तावित किये गये। बहुविषयी विश्वविद्यालयों की अवधारणा, अकादमिक क्रेडिट व्यवस्था, लचीले प्रवेश और निर्गमन, अनुसंधान को प्रोत्साहन, कौशल विकास, उद्यमिता और नवाचार पर विशेष बल दिया गया। नये शिक्षण संस्थानों की स्थापना, चिकित्सा और तकनीकी शिक्षा के विस्तार तथा व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा में लाने के प्रयासों ने शिक्षा को रोजगार और उद्योग की आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास किया। यह परिवर्तन उस वैश्विक परिदृश्य को ध्यान में रखकर किये गये जिसमें ज्ञान, नवाचार और तकनीकी दक्षता आर्थिक प्रगति के प्रमुख आधार बन चुके हैं। इन उपलब्धियों के साथ अनेक चुनौतियाँ भी सामने आयीं। नई शिक्षा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन सभी राज्यों में समान रूप से नहीं हो सका। प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता, विद्यालयों का आधारभूत ढाँचा, डिजिटल संसाधनों की असमान पहुँच, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच तकनीकी अंतर तथा वित्तीय संसाधनों की सीमाएँ आज भी गंभीर प्रश्न बने हुए हैं। शिक्षा में गुणवत्ता और समान अवसर सुनिश्चित करना अभी भी उतना ही कठिन कार्य है, जितना स्वतंत्रता के प्रारम्भिक वर्षों में था।

     मोदी युग में भारतीय शिक्षा व्यवस्था एक ओर ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ जैसे व्यापक सुधारों, डिजिटल शिक्षण, कौशल-आधारित पाठ्यक्रम, मातृभाषा में प्रारम्भिक शिक्षा, उच्च शिक्षण संस्थानों के विस्तार तथा प्रौद्योगिकी-संचालित अधिगम की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन का साक्षी बनी, वहीं दूसरी ओर प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं ने इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न भी खड़े किये। राष्ट्रीय और राज्य स्तर की अनेक भर्ती एवं प्रवेश परीक्षाओं में अनियमितताओं ने लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य, समय और मानसिक संतुलन को प्रभावित किया। इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम हेतु 2024 का कठोर कानून लागू किया। परीक्षा एजेंसियों में सुधार, तकनीकी निगरानी, बायोमेट्रिक सत्यापन तथा जाँच तंत्र को सुदृढ़ करने जैसे कदम भी उठाये गये। फिर भी यह स्पष्ट है कि शिक्षा सुधारों की वास्तविक सफलता केवल नई नीतियों या कठोर कानूनों से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन, निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली, संस्थागत पारदर्शिता तथा सभी विद्यार्थियों के लिए समान और विश्वसनीय अवसर सुनिश्चित करने पर निर्भर करेगी।

      निःसंदेह हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाये। लाखों अभ्यर्थियों को बार-बार परीक्षाएँ स्थगित होने या रद्द होने के कारण मानसिक, आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके उत्तर में परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए कानूनी तथा तकनीकी उपाय किए गए, किंतु यह स्पष्ट है कि केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं। परीक्षा प्रणाली में नैतिकता, प्रशासनिक उत्तरदायित्व और तकनीकी दक्षता का समन्वय ही स्थायी समाधान प्रदान कर सकता है।

     वर्ष 2014 से अब तक के मोदी युग में भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यापक नीतिगत परिवर्तन देखने को मिले हैं, जिनमें एक ओर नए IIT, IIM, AIIMS, केंद्रीय विश्वविद्यालय तथा अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना और विस्तार हुआ, तो दूसरी ओर बड़ी संख्या में सरकारी विद्यालयों का बंद होना, विलय (मर्जर) और युक्तिकरण (स्कूल कंसोलिडेशन) भी समानांतर रूप से जारी रहा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2014–15 से 2024–25 के बीच लगभग 89 हजार से 1 लाख तक सरकारी विद्यालय या तो बंद हुए, समीपवर्ती विद्यालयों में विलय कर दिये गये अथवा पुनर्गठित किये गये, जिनका सबसे अधिक प्रभाव मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और राजस्थान जैसे राज्यों में दिखाई दिया। सरकार ने इसका प्रमुख कारण कम नामांकन, संसाधनों के बेहतर उपयोग, शिक्षकों एवं आधारभूत सुविधाओं के समेकन तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अंतर्गत बड़े और सुविधासंपन्न क्लस्टर या पीएम श्री विद्यालयों के विकास को बताया, जबकि शिक्षा विशेषज्ञों और विपक्ष ने इसे सार्वजनिक शिक्षा के क्षरण, ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों की उपलब्धता घटने, लड़कियों एवं गरीब विद्यार्थियों के ड्रॉपआउट बढ़ने तथा शिक्षा के निजीकरण की दिशा में उठाया गया कदम माना।

      उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सरकारी विश्वविद्यालय बंद नहीं हुए, बल्कि गुणवत्ता नियंत्रण, नियामकीय सुधार और संस्थागत पुनर्गठन पर अधिक बल दिया गया। कम नामांकन, वित्तीय संकट तथा मानकों का पालन न करने वाले अनेक निजी और तकनीकी महाविद्यालय प्रभावित हुए; AICTE के कड़े मानकों के कारण सैकड़ों इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हुए या उन्होंने प्रवेश लेना बंद कर दिया, जबकि UGC ने समय-समय पर फर्जी विश्वविद्यालयों और नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों पर कार्रवाई की। इसी अवधि में उच्च शिक्षा में ग्रेडेड ऑटोनॉमी, सेल्फ-फाइनेंसिंग पाठ्यक्रम, HEFA के माध्यम से ऋण आधारित वित्तपोषण, इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस योजना, विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भारत में परिसर स्थापित करने की अनुमति तथा PPP मॉडल जैसी नीतियों ने निजी क्षेत्र की भागीदारी को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया। निजी विश्वविद्यालयों और निजी विद्यालयों की संख्या तथा उनमें नामांकन लगातार बढ़ा, जबकि सरकारी संस्थानों का अनुपात अपेक्षाकृत घटता गया। समर्थकों का तर्क है कि इन सुधारों से शिक्षा की गुणवत्ता, दक्षता, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, डिजिटल शिक्षा, अनुसंधान और अवसंरचना को बल मिला तथा उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात बढ़ाने की दिशा में प्रगति हुई; वहीं आलोचकों के अनुसार इन नीतियों ने शिक्षा के बाज़ारीकरण, बढ़ती फीस, सामाजिक असमानता तथा सार्वजनिक शिक्षा के कमजोर होने की प्रक्रिया को तेज किया।

     इस प्रकार मोदी काल की शिक्षा नीति का समग्र परिदृश्य दो समानांतर प्रवृत्तियों को दर्शाता है एक ओर संस्थागत विस्तार, गुणवत्ता सुधार और निजी निवेश को प्रोत्साहन, तथा दूसरी ओर सरकारी विद्यालयों के व्यापक समेकन, नियामकीय सख्ती और शिक्षा व्यवस्था में निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका, जिसकी व्याख्या सरकार और आलोचक अपने-अपने दृष्टिकोण से भिन्न रूप में करते हैं।

     यदि दोनों कालखंडों (नेहरू-मोदी युग) का व्यापक दृष्टि से अध्ययन किया जाये तो यह स्पष्ट होता है कि नेहरू युग और मोदी युग परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा विकास की दो अलग-अलग ऐतिहासिक अवस्थाएँ हैं। पहले चरण में राष्ट्र ने संस्थाएँ बनाईं, दूसरे चरण में उन्हीं संस्थाओं को बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप अधिक गतिशील और लचीला बनाने का प्रयास किया गया। एक युग ने वैज्ञानिक चेतना, अनुसंधान और आधुनिक संस्थागत ढाँचे की नींव रखी, जबकि दूसरे युग ने डिजिटल तकनीक, कौशल विकास, नवाचार और बहुविषयी शिक्षा को नई दिशा दी। दोनों कालखंडों की उपलब्धियों और सीमाओं का निष्पक्ष मूल्यांकन ही भारतीय शिक्षा के वास्तविक विकास को समझने का आधार बन सकता है। बहरहाल, यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी शिक्षा व्यवस्था की सफलता केवल नीति निर्माण से नहीं मापी जाती, बल्कि उसके वास्तविक सामाजिक प्रभाव से निर्धारित होती है। यदि शिक्षा व्यक्ति को स्वतंत्र चिंतन, नैतिक संवेदनशीलता, वैज्ञानिक दृष्टि, लोकतांत्रिक चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय मूल्यों से सम्पन्न बनाती है, तभी वह अपने उद्देश्य को प्राप्त करती है। भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह शिक्षा को राजनीतिक बहस का विषय भर न रहने देकर राष्ट्रीय विकास की साझा परियोजना बना सके। जब विद्यालय जिज्ञासा के केंद्र बनेंगे, विश्वविद्यालय अनुसंधान के प्राण केंद्र होंगे, परीक्षाएँ निष्पक्ष होंगी और प्रत्येक बालक को समान अवसर प्राप्त होगा, तभी शिक्षा वास्तव में राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति सिद्ध होगी। यही वह दिशा है जिसमें भारत की शैक्षिक यात्रा निरंतर आगे बढ़ रही है और यही उसकी सबसे बड़ी आशा भी है।

गोलेन्द्र पटेल

corojivi@gmail.com

युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक

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