भारत-चीन संबंधों को समझने के लिए केवल ऐतिहासिक संबंधों, वर्तमान समझौतों, व्यापार-डेटा और सीमा-गतिरोध एवं सीमा-विवाद वार्ता की जटिलता से नहीं समझा जा एकता। असली कहानी इन दोनों देशों के राजनीतिक नेताओं के मन में छिपी है, जिन्होंने इन रिश्तों को गढ़ा, कभी जल्दबाजी में, कभी ठहराव के साथ, तो कभी बदलती परिस्थितियों के अनुसार के मद्देनजर। प्रश्न उठता है कि दोनों देशों के कर्णधार क्या अपने सामाजिक और दार्शनिकों विचारो से प्रभावित हुए या केवल बदलती परिस्थितियाँ ने ही उनको अपने गढ़े मानकों से परे रूख लेने को प्रेरित किया।
इन नेताओं के राजनयिक धैर्य और संज्ञानात्मक लचीलापन को समझने के लिए हमें भारत और चीन की दार्शनिक व सांस्कृतिक सोच को समझने की आवश्यकता है। कबीर का प्रसिद्ध दोहा, ‘धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय’ और कन्फ्यूशियस की यह सीख कि ‘जल्दबाजी में बड़े काम सिद्ध नहीं होते’, तो वहीं संत थिरुवल्लुवर का मानना था की ‘अगर अपने सम्मान को धूमिल होने से बचाना चाहते हो, तो धैर्य बनाए रखो’। यह स्वाभाविक रूप से इन दोनों देशों के जनमानस में व्याप्त हैं। स्वाभाविक है नेता भी इन सांस्कृतिक मूल्यों की अवधारणा से परे नहीं होंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सैद्धांतिक ज्ञान वास्तविक कूटनीति में उतर पाया? भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के माओत्से तुंग दोनों नेता रणनीतिक धैर्य के बजाय तीसरी दुनिया के नेतृत्व की महत्वाकांक्षा से प्रेरित थे। वर्तमान समय में यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दौर को देखें, तो कहानी और भी जटिल हो जाती है। जहाँ सीधा नेतृत्व-संवाद तो बढ़ा है पर संरचनात्मक प्रतिस्पर्धा वैसी ही बनी हुई है। बस उसका मंच और शब्दावली बदल गयी है।
नेहरू और माओ : दोस्ती की जल्दबाजी-
आजादी के तुरंत बाद नेहरू ने एशियाई एकजुटता का सपना देखा। उन्होंने सन् 1947 में ही, यानि भारत की औपचारिक स्वतंत्रता से पहले, दिल्ली में एशियाई-सम्बन्ध सम्मेलन बुलाया और अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने कहा था, कि भारत को इस नये एशियाई युग में अपनी स्वाभाविक भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि भारत ही एशिया की कई शक्तियों का ‘केंद्र-बिंदु’ है।
चीन के प्रति नेहरू का रवैया लगभग आत्मीय था। भारत पहला गैर-साम्यवादी देश था, जिसने जनवादी गणराज्य चीन को मान्यता दी। यह फैसला नेहरू की निजी मान्यताओं और मूल्यों से उपजा था। वर्ष 1954 में पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए नेहरू ने तिब्बत पर भारत के औपनिवेशिक विशेषाधिकार स्वेच्छा से त्याग दिए। कई भारतीय विद्वान जैसे अवतार सिंह भसीन और बी.आर. दीपक इसे एकतरफा और नुकसानदेह मानते हैं, क्योंकि इसमें चीन को सब कुछ मिला और भारत को कुछ नहीं। इसके बावजूद चीन ने विशेषकर माओ ने, नेहरू के इस उदार कदम की सराहना करने के बजाय भारत पर औपनिवेशिक विरासत ढोने का आरोप लगाना जारी रखा। दूसरी तरफ, नेहरूवादी विद्वानों की नजर में पंचशील के सिद्धांत गांधी की अहिंसा और विश्व में भारत के स्थान की परिभाषा की भावना को प्रतिबिंबित करते थे।
प्रधानमंत्री नेहरू ने सन् 1955 के ‘बांडुंग सम्मेलन’ में चीन की भागीदारी सुनिश्चित करने में मुख्य भूमिका निभाई, फिर भी इन सब प्रयासों ने चीन में उन्हें न तो सम्मान दिलाया और न ही उनके नेतृत्व को मान्यता। राममनोहर लोहिया जैसे राजनीतिज्ञ, इसे नेहरू की रणनीतिक जल्दबाजी मानते थे, जिसने एशियाई एकजुटता में निवेश तो किया पर भारत के राष्ट्रीय हितों की अनदेखी की। दूसरी ओर माओ की सोच बिल्कुल अलग थी। वे खुद को समाजवादी और बाद में तीसरी दुनिया के स्वाभाविक नेता के रूप में देखते थे। तिब्बत के मामले में माओ ने जल्दबाजी नहीं दिखाई। फरवरी 1949 में माओ ने कहा था कि तिब्बत पर सैन्य कार्रवाई जल्दबाजी में नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि परिवहन की कठिनाइयाँ और जातीय-धार्मिक जटिलताएँ सावधानी की माँग करती हैं। नवंबर 1949 में माओ ने पहली बार तिब्बत पर कब्जे की तारीख तय की- अगले वर्ष के उत्तरार्ध तक। सोवियत संघ की यात्रा के दौरान जनवरी 1950 में उन्होंने फ़ंग दहुई (माओ के रक्षा मंत्री) को भेजे गए तार में लिखा कि तिब्बत की जनसंख्या भले कम हो, पर उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति महत्त्वपूर्ण है, जो उनके सोचे-समझे धैर्य को दिखाता है।

चऊ एनलाई : माओ के भरोसेमंद वार्ताकार-
यहीं पर चऊ एनलाई की भूमिका सामने आती है, जिन्हें माओ ने नेहरू से संवाद और जुड़ाव बनाए रखने का जिम्मा सौंपा था। अक्तूबर 1950 में भारतीय राजदूत के. एम. पणिक्कर और चीनी विदेश मंत्रालय के उप-मंत्री चांग हानफू के बीच हुई बातचीत में यह स्पष्ट संकेत मिला कि चीन संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए इंतजार कर सकता है, लेकिन तिब्बत पर ‘कब्जा’ के लिए नहीं। माओ ने खुद निर्देश दिया था कि ‘सत्रह-सूत्रीय’ समझौते के क्रियान्वयन में देरी नुकसानदेह नहीं, बल्कि फायदेमंद हो सकती है। इस दौरान सड़क निर्माण, व्यापार और चिकित्सा जैसे ‘अच्छे काम’ करके जनता का विश्वास जीता जाये, और जब समय आ जाये तब समझौते की पूरी बात की जाये। यहां तक कि माओ ने प्रचार की भाषा भी बदलवाई। पहले जहाँ तिब्बती विद्रोह को साम्राज्यवाद से जोड़ा जाता था, वहाँ इस मुद्दे पर सीधे भारत और ब्रिटेन पर हस्तक्षेप का आरोप लगाया गया, लेकिन नेहरू पर व्यक्तिगत आलोचना से माओ ने जानबूझकर परहेज करने की सलाह दी, ताकि संबंधों में कुछ गुंजाइश बनी रहे ।
चऊ एनलाई इसी सतर्क कूटनीति के वाहक थे। अक्तूबर 1954 में नेहरू की चीन यात्रा के दौरान नेहरू और चऊ चार बार मिले, लेकिन दोनों ने संवेदनशील सीमा-विवाद को सीधे नहीं छेड़ा। इसे दो तरह से पढ़ा जा सकता है- पहला, दोनों नेता एक-दूसरे को नाराज न करने के लिए समय ले रहे थे; दूसरा, चूंकि दोनों एक-दूसरे की बात मानने को तैयार नहीं थे, इसलिए सीमा-वार्ता में एक तरह की मानसिक कठोरता ही प्रदर्शित हो रही थी।
सन् 1955 के एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन में चऊ एनलाई ने कहा कि शांतिपूर्ण साधन ही एकमात्र रास्ता है और मौजूदा स्थिति तब तक बनाए रखनी चाहिए, जब तक कोई समाधान न मिल जाए। यह बयान परोक्ष रूप से भारत को संकेत था। वर्ष 1958 से 1960 के बीच नेहरू और चऊ एनलाई के बीच हुए पत्राचार को देखें, तो पता चलता है कि दोनों पक्षों ने सीमा-विवाद सुलझाने में रणनीतिक धैर्य से ज्यादा एक तरह की मानसिक कठोरता दिखाई।
यहाँ तक कि अक्तूबर 1962 में युद्ध शुरू होने से ठीक पहले, 24 अक्तूबर को चऊ एनलाई ने नेहरू को पत्र लिखकर सीमा-विवाद को धैर्यपूर्वक सुलझाने और एशियाई-अफ्रीकी एकजुटता को मज़बूत करने की पेशकश की। नेहरू ने 27 अक्तूबर को दुखी मन से जवाब दिया कि चीन के आक्रमण ने उनके वर्षों के मैत्रीपूर्ण प्रयासों को तार-तार कर दिया है। चऊ एनलाई का कूटनीतिक चेहरा माओ की ओर से नेहरू को साधने की कोशिश अंततः युद्ध की विभीषिका में बदल गया और नेहरू की रणनीतिक-सामरिक जल्दबाजी मानसिक कठोरता में तब्दील हो गई।
मोदी और शी: प्रत्यक्ष नेतृत्व-संवाद का नया ढांचा-
नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के दौर में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव दिखता है- नेतृत्व स्तर पर सीधा, बार-बार और व्यक्तिगत संवाद। जहाँ नेहरू-माओ के दौर में चऊ एनलाई एक मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे, वहीं मोदी ने यह सुनिश्चित किया कि वे स्वयं शी जिनपिंग से सीधे संवाद करें। वर्ष 2015 में नरेंद्र मोदी की आधिकारिक चीन यात्रा में संस्कृति से लेकर अंतरिक्ष सहयोग तक 24 द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इसी तरह वर्ष 2014 में शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान 16 समझौते हुए, और संयुक्त बयान में सीमा क्षेत्रों में शांति व स्थिरता को द्विपक्षीय संबंधों की निरंतरता का महत्त्वपूर्ण आधार बताया गया।
वर्ष 2017 के ‘डोकलाम गतिरोध’ के बाद हुई पहली अनौपचारिक ‘वुहान बैठक’ इस नए ढांचे की सबसे बड़ी मिसाल है। मोदी और शी दोनों ने इच्छाशक्ति और व्यावहारिक राजनीति (realpolitic) का परिचय देते हुए संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश की। मोदी ने अपने गृह-राज्य अहमदाबाद में शी की मेजबानी की, तो शी जिनपिंग ने अपने गृह-प्रांत शांशी के शहर शीआन में मोदी की आवभगत की। यानी दोनों नेताओं ने कूटनीति को अपने-अपने गृह-क्षेत्रों तक ले जाकर उसे व्यक्तिगत और सांस्कृतिक रंग दिया। एक ऐसी ‘घरेलू कूटनीति’ जो नेहरू-माओ के औपचारिक दौर में कभी नहीं दिखी थी।
हालाँकि मिलने के स्थान बदले,परंतु सम्बन्धों के बुनियादी धरातल वही पुराना बना हुआ है। शीआन मुलाक़ात के समय चीन डोकलाम में भारत को लेकर संशंकित था, तो ममल्लापुरम में भारत 370 पर चीन की टिप्पणियों को अनुचित हस्तक्षेप बता रहा था। नेतृत्व-स्तरीय व्यक्तिगत जुड़ाव भले ही माहौल को नरम करे, पर संरचनात्मक तनाव कम नहीं होते। गलवान की खूनी झड़प के बाद भारत-चीन संबंध एक बिल्कुल अलग धरातल पर आ गया हैं। भारत के लिए गलवान रणनीतिक धैर्य की सीमा-रेखा थी। अब भारतीय नेतृत्व धैर्य को व्यावहारिक नहीं, बल्कि एक “रणनीतिक फंदा” के रूप में देखता है, जबकि चीनी नेतृत्व अब भी इसे द्विपक्षीय संबंधों के लिए रचनात्मक मानता है।

ग्लोबल साउथ पर नई वैचारिक लड़ाई-
नेहरू-माओ का रिश्ता कभी भी शुद्ध द्विपक्षीय सहयोग की भावना से नहीं, बल्कि तीसरी दुनिया के नेतृत्व की महत्वाकांक्षा से संचालित था। नेहरू खुद को एशिया और नव-स्वतंत्र देशों का स्वाभाविक मार्गदर्शक मानते थे, जबकि माओ खुद को समाजवादी खेमे और बाद में समूचे तीसरी दुनिया का अगुआ समझते थे। यही अंतर्निहित प्रतिस्पर्धा थी, जिसने पंचशील जैसे समझौतों के बावजूद वास्तविक भरोसे को पनपने नहीं दिया।
यह प्रतिस्पर्धा आज भी जारी है, बस इसका नाम और मंच बदल गए हैं। आज फिर से भारत और चीन दोनों ‘ग्लोबल साउथ’ के नेतृत्व की होड़ में हैं। यह वही पुरानी महत्वाकांक्षा है, जो अब नए भू-राजनीतिक शब्दावली में व्यक्त हो रही है। इस प्रतिस्पर्धा को हिमालय की भौतिक सीमा से आगे ले जाकर एक वैचारिक तथा सामरिक नेतृत्व का जामा पहना दिया है। जब भारत ने ‘तीसरी दुनिया’ की पुरानी पहचान को नया रूप देते हुए ‘ग्लोबल साउथ’ की शब्दावली अपनायी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके अधिकारों की पैरवी शुरू की, तो चीन थोड़ा बेचैन हुआ कि उसके नेतृत्व को सीधी चुनौती है। भारतीय दृष्टिकोण ‘दूसरी दुनिया’ के साथ सह-अस्तित्व के मूल्यों को अपनाता है और विविधता में विश्वास रखता है, जबकि चीनी परंपरा विभिन्न ज्ञान-प्रणालियों से सीखकर भी उन्हें व्यापक ‘चीनी’ के दायरे में समाहित करती हैं। हालाँकि दोनों देश पश्चिमी दुनिया के इतर एक ‘एशियाई विश्व’ की संकल्पना में भी समानता नज़र आती हैं, जैसे भारत का ‘वसुधैव-क़ुटुम्बकम’ तो चीन का ‘थियन शिया’ यानी स्वर्ग के नीचे सारा जगत। परंतु जहाँ भारत पूरे विश्व को एक सामाजिक परिवार के रूप में देखता है, तो चीन एक राजनीतिक इकाई के रूप में। दार्शनिक एवं राजनीति भिन्नताएँ साफ़ झलकती हैं।
निष्कर्ष :-
नेहरू और मोदी दोनों के दौर में एक जैसी अंतर्निहित प्रतिस्पर्धा दिखती है, भले ही कूटनीतिक शैली अलग हो। नेहरू के समय चऊ एनलाई एक मध्यस्थ वार्ताकार थे, जिन्हें माओ ने नेहरू को साधने का जिम्मा सौंपा था, और यह संवाद अंततः 1962 के युद्ध में समाप्त हुआ। मोदी के दौर में यह मध्यस्थता खत्म हो गई है। मोदी शी चिनपिंग से सीधे मिलते हैं, अनौपचारिक शिखर वार्ताएं करते हैं। जैसा कि अहमदाबाद-शीआन और वुहान-ममल्लापुरम के आदान-प्रदान से स्पष्ट है। लेकिन प्रत्यक्ष संवाद का यह ढांचा भी गलवान जैसी घटनाओं को नहीं रोक सका, ठीक वैसे ही जैसे नेहरू का व्यक्तिगत लगाव 1962 के युद्ध को नहीं टाल सका।
रणनीतिक धैर्य और मानसिक लचीलापन दोनों ने अतीत में द्विपक्षीय व्यापार को कुछ मिलियन डॉलर से अरबों डॉलर तक पहुँचाने में मदद की, लेकिन साथ ही सीमा पर टकराव को भी नहीं रोक पाये। बल्कि समय के साथ ये टकराव कुछ दिनों से बढ़कर वर्षों तक खिंच गये हैं। नेहरू-माओ और मोदी-शी के दोनों दौर में नेतृत्व की व्यक्तिगत सोच चाहे जितनी भी मजबूत हो, जब तक संरचनात्मक प्रतिस्पर्धा- चाहे वह तीसरी दुनिया का नेतृत्व हो या ग्लोबल साउथ का, बनी रहती है, तब तक स्थायी सामंजस्य कठिन ही बना रहता है।
हाल के समयों में भारत-चीन रिश्ते में कई बदलाव नज़र आए है। क्या यह फिर से सामरिक धैर्य हैं, या ट्रम्प के अप्रत्याशित कूटनीति का नतीजा। अब फिर से दोनों देशों के नेताओं को अपने रिश्तों में संज्ञानात्मक लचीलापन के लिए विवश किया। अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि भारत-चीन संबंधों में रणनीतिक धैर्य और संज्ञानात्मक लचीलापन का अब लूप बन गया है। यानि शांति के समय लचीला रूख रखते हुए संयम पर ज़ोर देते है, तो कठिन दौर में संयम और धैर्य दोनों त्याग कर सामरिक सख़्ती।

डॉ . राजीव रंजन
rrajan1@eas.du.ac.in
एसोसिएट प्रोफेसर, सामाजिक विज्ञान संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली




