भारत के आर्थिक विकास में बदलावों की दुविधा : संरचनात्मक परिवर्तन से कैश ट्रान्सफर तक 

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जो स्टडवेल की किताब ‘हाउ एशिया वर्क्स : सक्सेस एंड फेलियर इन द वर्ल्डस मोस्ट डाईनामिक रीजन’ में एशिया में 1950 के बाद हुए आर्थिक विकास की रूपरेखा का वर्णन है। स्टडवेल के अनुसार,‘पूर्वोत्तर एशिया के देशों, जैसे- जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और बाद में चीन का आर्थिक विकास कोई चमत्कार या सांस्कृतिक संयोग नहीं बल्कि राज्य के द्वारा संचालित एक बेहद सुनियोजित, तीन चरणों वाले फॉर्मूले का परिणाम था। ये तीन चरण जो इन देशों के आर्थिक विकास में सहायक हुए वे इस प्रकार हैं–(1) क्रांतिकारी भूमि सुधार : कृषि भूमि को वास्तविक किसानों में वितरित करना जिससे खाद्यान्न की समस्या का समाधान हो और महंगे खाद्य आयात की आवश्यकता समाप्त हो सके ; (2) कृषि आधारित उद्योगों और विनिर्माण क्षेत्र का विकास : कृषि के आत्मनिर्भर हो जाने के बाद राज्य द्वारा सब्सिडी प्राप्त कृषि-आधारित उद्योगों और विनिर्माण उद्योगों का विकास करना और आयातों पर तटकर (टैरिफ) लगाना और निर्यात अनुशासित करना ताकि घरेलू उद्योगों का संरक्षण हो और ; (3) बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र को राज्य के नियंत्रण में रखना जिससे ब्याज दरों को न्यूनतम रखकर कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों का दीर्घकालिक विकास किया जा सके। विकास की यह अवधारणा ऐतिहासिक रूप से पश्चिम की तरह मुक्त बाजारों पर नहीं बल्कि राज्य के सुनियोजित हस्तक्षेप पर निर्भर थी। इस लेख में इन्हीं बिन्दुओं के सापेक्ष विवेचना की गयी है कि क्या भारत आज़ादी के बाद आर्थिक विकास के इन ठोस और बिना किसी तकनीकी जटिलता वाले पथ पर आगे बढ़ सका या नहीं?

उपनिवेश भारत की आर्थिक स्थिति– 

इतिहासकार बिपिन चन्द्रा के अनुसार, “जैसे-जैसे ब्रिटिश राज का नियंत्रण भारत में बढ़ता गया, भारत की कृषि और विनिर्माण उद्योग का विनाश होता गया। एक तरफ से हस्तशिल्प उद्योग ख़त्म होते गये लेकिन उनकी जगह आधुनिक मशीनी उद्योगों की प्रतिस्थापना‌ न हो सकी। परिणाम यह हुआ कि भारत के बनाये हस्तशिल्प उद्योग में निर्मित सामान और कपड़े वैश्विक बाजार से न सिर्फ गायब हुए बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार से भी इनकी मांग कम हो गयी। जबकि भारतीय बाजार ब्रिटेन में बने कपड़ों से भर गया। इस तरह देश में पूँजी के स्रोत कम होते गए और लोगों के सामने आजीविका का भारी संकट उत्पन्न हो गया। साल 1900 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) कुल वैश्विक जीडीपी का लगभग 7 प्रतिशत था, जो साल 1947 में घटकर महज 4.2 प्रतिशत रह गया। अर्थशास्त्री प्रोफेसर उत्सा पटनायक के अनुसार, “वर्ष 1765 से वर्ष 1938 के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज भारत से कुल 45 ट्रिलियन डॉलर कोलोनियल लूट और अंतरण (ट्रान्सफर) के तौर पर ब्रिटेन लेकर गए।” भारत में ब्रिटिश लूट का दायरा सिर्फ इस बात से पता चलता है कि वर्ष 2026 में जब यह लेख लिखा जा रहा है भारत कि कुल जीडीपी 4.15 ट्रिलियन डॉलर ही है.

     इसके साथ ही ब्रिटिश इंडिया सरकार की ‘भू-राजस्व (लगान) नीति’ किसानों की गरीबी के साथ–साथ कृषि के क्षेत्र में पिछड़ेपन की एक प्रमुख कारण बनी। जमींदारी, रैयतवारी और महालवाड़ी व्यवस्था में राज्य का भूमि पर एकाधिकार और भूमि-राजस्व के एक–तरफा निर्धारण की शक्ति ब्रिटिश इंडिया सरकार के पास थी। इन व्यवस्थाओं में किसानों द्वारा दिये गये लगान वास्तविक लगान से कहीं ज्यादा थीं। क्योंकि जमींदारों ने ब्रिटिश-इंडिया सरकार द्वारा थोपे गए अधिकतम दरों से भी अधिक दर पर लगान कृषकों से वसूल किया। इसका परिणाम यह हुआ कि लगान न चुका पाने के कारण बहुत बड़ी संख्या में जमीनें या तो नीलाम हो गयीं या बेच दी गयीं और इस तरह किसानों का एक बड़ा तबका भूमिहीन होता चला गया। इसके साथ ही 19वीं शताब्दी और 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में छोटे–छोटे अंतरालों पर आये अकाल ने कृषक समाज को भूमि गिरवी रखने और बेचने के लिए मजबूर किया, जिसके कारण भारत में गरीबी और भूखमरी बढती चली गयी।

आज़ादी के वक्त भारत–

अंततः 1947 ई. में भारत जब आज़ाद हुआ तब प्रति व्यक्ति जीवन प्रत्याशा सिर्फ 32 साल थी। कुल साक्षरता दर 12-16 प्रतिशत थी, जिनमें महिलाओं कि साक्षरता दर 10 प्रतिशत से भी कम थी। कृषि, जिस पर लगभग 75 प्रतिशत कामगारों की जनसंख्या आजीविका के लिए निर्भर थी, इनका वृद्धि दर 1900-1950 के बीच सिर्फ 0.3 प्रतिशत था। खाद्य सुरक्षा इतनी ख़राब स्थिति में थी कि अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के अनुसार, ‘1940 के दशक की शुरुआत में आए भीषण बंगाल के अकाल  में 20-30 लाख लोग मारे गए।’ बाम्बे प्लान के अनुसार–’वर्ष 1944 में भारत की प्रति व्यक्ति आय रूपये 6.25 (रुपये 75 वार्षिक) थी।’ इसी तरह के कई आंकड़े हैं जो यह बताते हैं कि आज़ादी के समय भारत की कुल आबादी 35 करोड़ थी। जिसमें 25 करोड़ (70 प्रतिशत) लोग गरीब थे।

     आज़ादी के बाद, तत्कालीन सरकार को कोलोनियल लूट के कारण एक जर्जर अर्थव्यवस्था, गरीबी व भूखमरी की शिकार जनता, जर्जर उद्योग तथा अधोसंरचना विहीन एक देश मिला। अतः वर्ष 1951-52 में हुए पहले आमचुनाव के बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पहली चुनी हुई सरकार  गठित हुई।जिसकी प्राथमिकता गरीबी और भुखमरी से निपटना और देश का औद्योगिक विकास करना था। इस क्रम में वर्ष 1952 में प्रथम पंचवर्षीय योजना लागू की गयी। जिसका प्रमुख उद्देश्य देश में खाद्य असुरक्षा की समस्या से निपटना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अगले 5 सालों में कृषि और सिंचाई सेक्टर को कुल बजट का 31 प्रतिशत आवंटित किया गया, जो सबसे अधिक था। 

भूमि सुधार–

    आर्थिक विकास के क्रम में नेहरू सरकार की पहली प्राथमिकता थी भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू करना। इन सुधारों को लागू करने की दिशा में कांग्रेस की जे. सी. कुमारप्पा की अध्यक्षता में बनी कृषि सुधार समिति (1949) की अनुशंसा एक महत्त्वपूर्ण प्रयास था। इस समिति की सबसे प्रमुख अनुशंसा निम्नलिखित थीं। पहला– औपनिवेशिक, सामंती कृषि विरासत को ख़त्म करना (जमींदारी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी प्रणालियों में शोषणकारी बिचौलियों और जमींदारी प्रथा का खात्मा); दूसरा, खंडित जोतों की चकबंदी (consolidation of fragmented landholding); तीसरा, भूमि सीमा (सीलिंग) लागू करना और चौथा काश्तकारी (पट्टा) सुधार और विनियमन (tenency reform and regulation), जिसके तहत लगान का विनियमन, जमींदारों द्वारा किसानों की जबरन बेदखली से सुरक्षा और वास्तविक किसानों को भू-स्वामित्व प्रदान करना। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को वर्ष 1954 में लिखे पत्र में भूमि सुधारों का जिक्र करते हुए लिखा था कि इस नीति का उद्देश्य वास्तविक जोतदारों के बोझ को कम करने के साथ-साथ भूमि से होने वाली आय को किसान वर्ग में अधिक सामान रूप से वितरित करना था, ताकि उन्हें क्रय शक्ति प्रदान की जा सके। उन्होंने चेतावनी देते हुए लिखा था कि लाखों भूमिहीनों की प्रबल इच्छा को पूरी करने में विफलता, ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसक क्रांतियों को जन्म देगी।

    स्वतंत्रता आन्दोलन में किसानों का महत्त्वपूर्ण  योगदान भी भूमि सुधार कार्यक्रम लागू करने की प्रमुख वजह बनी। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में कई किसान आन्दोलन जैसे– बिहार में चंपारण सत्याग्रह, गुजरात में बारदोली और खेड़ा किसान संघर्ष, मालाबार में मोपला किसान विद्रोह, तेलंगाना किसान संघर्ष और बंगाल में तेभागा भूमि आन्दोलन व इसी तरह के कई आंदोलन उठ खड़े हए थे, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के बाद की अवधि में प्रगतिशील भूमि सुधार नीतियों को अपनाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। 

      हालाँकि भूमि सुधार भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची का विषय होने के कारण, राज्य सरकारों को भूमि सुधार से संबंधित कानून बनाने के अधिकार दिए गये थे, जिनमें अधिशेष (surplus) भूमि की पहचान करने, उन अधिशेष भूमियों के सुदृढ़ीकरण (चकबंदी) करने और इन जमीनों को वास्तविक जोतदारों (किसानों) को पुनर्वितरित करने से जुड़े कानून शामिल थे। एक लोकतान्त्रिक और न्यायसंगत भूमि वितरण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कई समितियों का गठन किया गया ; अनगिनत कानूनों का मसौदा तैयार किया गया और उन्हें मंजूरी दी गयी, लेकिन यह भूमि सुधार कुछ राज्यों (केरल, पश्चिम बंगाल और जम्मू कश्मीर) को छोड़कर कागजों पर अधिक और जमीन पर बहुत कम प्रभाव डाल सका। कुल मिलाकर भूमि सुधारों ने भूमि के स्वामित्व को ओल्ड रेंटियर क्लास से लेकर किसानों और खेतिहरों को स्थानांतरित करने में असमर्थ रहा। प्रसिद्धि अर्थशास्त्री वी. एम. दांडेकर ने अपने शोधपत्र (1957) ‘वर्किंग ऑफ़ बॉम्बे टेनेंसी एक्ट, 1948’ में भूमि सुधारों की असफलता पर लिखा कि, ‘इसके लिए सबसे बड़ी बाधा उच्च जाति के ग्रामीण जमींदार, अभिजात वर्ग द्वारा प्राप्त ‘राजनीतिक और सामाजिक शक्ति’ थी (उदाहरण के लिए बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि) जिन्होंने देश के अधिकांश हिस्सों में भूमि सुधारों के कार्यान्यन को रोक दिया या विफल कर दिया। योजना आयोग की ‘टास्क फ़ोर्स ऑन अग्रेरियन रिलेशंस (1973)’ के अनुसार अपेक्षाकृत असफल भूमि सुधार भारत के उन राजनीतिक और प्रशासनिक वर्गों की उदासीनता का परिणाम था जो स्वतंत्रता के शुरूआती वर्षों में शासन की कमान संभाल रहे थे और साथ ही पूरी तरह से जमींदार वर्ग के दर्जे का आनंद भी ले रहे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि देश के अधिकतर राज्यों में भूमि का वितरण असमान ही रहा। अतः भारत में गरीबी और खाद्य असुरक्षा खत्म करने के लिए जमीन पर जिस संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता थी उसे आज़ादी के पहले 20 वर्षों में हासिल नहीं किया जा सका। 

हरित क्रांति और औद्योगीकरण-

      भूमि सुधार कार्यक्रम के अधिकतर राज्यों में असफल होने और इसके फलस्वरूप गरीबी, खाद्य असुरक्षा और ग्रामीण आय के वितरण में असमानता के लक्षित उद्देश्यों को हासिल न कर पाने की स्थिति में नीति निर्माताओं ने तीसरी पंचवर्षीय योजना के बाद (प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद) भूमि सुधार के विचार (वाम शासित राज्यों को छोड़कर) को लगभग त्याग दिया। कृषि में अमूलचूल परिवर्तन की जगह उसके टेक्नोक्रेटिक समाधान के तहत हरित क्रांति जिसके तहत उन्नत बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशक और आधुनिक कृषि मशीनरी का इस्तेमाल कर कृषि उत्पादकता और कुल खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाने का प्रयास किया गया, जो देश के कुछ राज्यों जैसे-पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी सफल रहा। लेकिन देश के दूसरे हिस्से हरित क्रांति के पूर्ण लाभ से वंचित रह गए। 

     हरित क्रांति एक पूँजी-प्रधान (capital-intesive) रणनीति थी, जिसे अत्यधिक असमान कृषि ढांचे पर थोप दिया गया था। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को गरीबी से बाहर निकालने की बजाय, इसने ग्रामीण वर्ग संबंधों (class relations) को इस तरह बदल दिया कि जिससे असमानता और अधिक बढ़ गयी। हरित क्रांति की रणनीति के असफल होने के कई कारण थे। उदहारण के लिए पहला–भूमि सुधार का न होना और इस रणनीति का अत्यधिक पूँजी प्रधान होना; दूसरा–जैसे-जैसे खेती पूँजी प्रधान होती गयी, सीमान्त और छोटे किसानों का खेती में बने रहना मुश्किल होता चला गया और उनके ऊपर कर्ज का बोझ लद गया। इसका परिणाम यह हुआ कि लोग जमीन से बेदखल होते गये और भूमिहीनों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती गयी। इस तरह की स्थिति होने के बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था में सुधार लाने हेतु ग्रामीणों को काम देने के लिए पर्याप्त, स्थिर और औपचारिक मजदूरी जैसे रोजगार पैदा नहीं किया गया। जिससे किसानों का विस्थापन/पलायन हुआ और वे या तो शहरी, असंगठित क्षेत्र में मजदूर बने या ग्रामीण क्षेत्रों में खेतिहर मजदूर बनना पड़ा। हरित क्रांति के बाद के वर्षों में यह कहा गया कि देश में अनाज का उत्पादन जरुरत से अधिक हो रहा है, परंतु सरकार की गोदामों में खाद्यान्न की उपलब्धता होने के बावजूद देश में गरीबी और कुपोषण की समस्या बनी रही।

      भूमि सुधारों की असफलता के बाद नीति नियंताओं ने कृषि में ही पूँजी प्रधान तकनीक के साथ-साथ देश को पूँजी प्रधान भारी उद्योगों की ओर स्थानांतरित कर दिया। कृषि आधारित छोटे उद्योग जो अधिक से अधिक ग्रामीण कामगारों को रोजगार और आय के अवसर दे सकते थे, जिनके विकास पर समुचित ध्यान नहीं दिया। इस तरह से समृद्ध कृषि क्षेत्र द्वारा उपभोक्ता वस्तुओं की मांग पैदा करने वाले क्षेत्र का विकास करने की बजाय, भारत सरकार ने भारी उद्योगों जैसे स्टील, भारी मशीनरी, बाँध और रसायन उद्योगों को प्राथमिकता देना शुरू किया जो टॉप डाउन और ट्रिकल डाउन एप्रोच पर आधारित थे। इसके पीछे यह तर्क था कि इस तरह के औद्योगीकरण आत्मनिर्भर आर्थिक विकास को गति देंगे और ग्रामीण इलाकों के अतिरिक्त श्रम बल को खपा लेंगे पर इस दीर्घकाल में ऐसा नहीं हो सका। उदहारण के लिए योजना आयोग के अनुसार वर्ष 1960 में कुल कामगार जनसंख्या का 9 प्रतिशत विनिर्माण क्षेत्र में काम करता था जो वर्ष 1993-94 में 10.4 प्रतिशत (NSSO के 50वें राउंड की रिपोर्ट) और वर्ष 2023-24 में 11.6 प्रतिशत (वार्षिक PLFS रिपोर्ट- 2023-24) था। 

संरचनात्मक परिवर्तन की बजाय तात्कालिक उपायों पर जोर-

     भूमि सुधारों के असफल होने और कृषि आधारित छोटे उद्योगों को प्राथमिकता न देने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की कमी, आय की असमानता, गरीबी, खाद्य असुरक्षा और कुपोषण की समस्या बड़ी होती गयी। गरीबी और कुपोषण की भयावहता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने 1964-65 में सार्वजानिक वितरण प्रणाली (PDS – जो 1939 से चल रही थी) में व्यापक सुधार किया। सरकार ने फूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया (FCI) और कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कास्ट्स एंड प्राइसेस (CACP) की स्थापना की ताकि न्यूनतम समर्थन मूल्यों पर किसानों से उनके उपज की खरीद की जा सके और उसे संग्रहित किया जा सके। साथ ही जनता को न्यूनतम कीमत पर खाद्यान्न वितरित किया जा सके था सबको खाद्यान्न मिल सके। इसलिए वर्ष 1970 तक सार्वजानिक वितरण प्रणाली को यूनिवर्सल बनाया गया ताकि देश के प्रत्येक व्यक्ति तक सस्ते दर पर खाद्यान्न, चीनी और केरोसिन तेल पहुँचाया जा सके।

     परंतु वर्ष 1991 में पी. वी. नरसिम्हा राव की सरकार द्वारा देश में आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू करने के बाद सरकार की नीतियों में व्यापक परिवर्तन आया। सरकार ने अपना वित्तीय बोझ कम करने के लिए कई घोषणाएं की। इसी दौरान वर्ष 1995 में भारत वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन (WTO) का संस्थापक सदस्य बना, जिसके अंतर्गत विश्वभर में कृषि उत्पादों के मुक्त व्यापार की परिकल्पना की गयी। इसके तहत भारत सरकार द्वारा अनाजों के सार्वजनिक संग्रहण और कृषि उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के प्रावधानों को मुक्त व्यापार में अवरोध माना गया। इस तरह आर्थिक उदारीकरण और WTO भारत की खाद्यान्न नीति के विरोध के कारण सरकार ने जून 1997 में यूनिवर्सल पीडीएस को ख़त्म कर टार्गेटेड पीडीएस (TPDS) शुरू किया। इसके तहत उपभोक्ताओं को दो भागों में बांटा गया– गरीबी रेखा से नीचे (below poverty line – BPL) और गरीबी रेखा से ऊपर (above poverty line – APL)। अब जो परिवार बीपीएल की श्रेणी में आते थे, उन्हें ही अधिक रियायती दर पर राशन वितरण किये जाने का प्रावधान किया गया। इसी तरह वर्ष 2000 में सरकार ने ‘अन्त्योदय अन्न योजना’ की शुरुआत की, जिसके अंतर्गत सबसे अधिक गरीब परिवारों तक राशन वितरण का लक्ष्य रखा गया था। पीडीएस व्यवथा में इन बदलावों का परिणाम यह हुआ कि प्रशासनिक लापरवाही और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों के कारण लाखों गरीब परिवार बीपीएल या अन्त्योदय अन्न योजना से गलत ढंग से बाहर कर दिए गए, जिसके कारण उन्हें सस्ते दर पर मिलने वाले राशन बंद हो गए और उनके समक्ष खाद्य सुरक्षा का संकट उत्पन्न हुआ। सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक पार्टियों के सतत प्रयास से वर्ष 2013 में मनमोहन सिंह की सरकार ने ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ (NFSA) संसद से पारित किया। इसके तहत खाद्य सुरक्षा एक कल्याणकारी योजना से बदलकर एक कानूनी अधिकार बन गयी। इस कानून ने राशन के दायरे का अत्यधिक विस्तार किया, जिसके तहत भारत की लगभग दो तिहाई आबादी को रियायती दरों पर खाद्यान्न की कानूनी गारंटी दी गयी।

      इसी तरह डॉ. मनमोहन सिंह की गठबंधन सरकार ने देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मुहैया कराने के लिए वर्ष 2005 में ‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (MGNREGA) बनाया। इसे कई फेजों में लागू करते हुए पूरे देश में वर्ष 2009 में लागू किया गया, जिसके तहत देश के ग्रामीण इलाकों में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी गयी थी। हालाँकि वर्ष 2009-10 में कुल औसतन 54 दिन का रोजगार प्रति हाउसहोल्ड दिया गया जबकि वर्ष 2024-25 में यह घटकर सिर्फ 44.6 दिन रह गया था। 

     वर्ष 2014 में हुए आम चुनावों के बाद देश में नई चुनी गयी सरकार द्वारा नव उदारीकरण और आर्थिक सुधारों की नीतियों को और गति प्रदान की गयी। हालाँकि इस दौरान कृषि और ग्रामीण विकास के क्षेत्रों में जो भी प्रमुख नीतियाँ लागू की गयीं उनमें प्रमुख हैं– ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि'(PMKSY), जो एक डायरेक्ट कैश बेनिफिट (DBT) स्कीम है, जो ऐसे किसानों को जिनके पास 2 एकड़ या उससे कम जमीन है, उनको प्रति वर्ष 6000 रुपए दिए जा रहे हैं। प्रतिवर्ष करीब 9.44 करोड़ किसानों को PMKSY के तहत आय सहायता प्रदान की जा रही है। इसी तरह प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना, फसल बीमा योजना और प्रधान मंत्री मत्स्य सम्पदा योजना जैसी कुछ प्रमुख योजनाएं हैं, जो वर्तमान सरकार ने लागू की है। हालाँकि ये सभी योजनाएं उन्हीं किसानों के लिए उपयोगी हैं, जिनके पास जमीन है और जो किसान भूमिहीन हैं या बंटाई पर खेती करते हैं उनके लिए ये योजनाएं सहायक नहीं हैं। इस संबंध में यह रेखांकित करना भी महत्त्वपूर्ण है कि पिछले 10 वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने कृषि, उद्योग और ग्रामीण विकास की अनेक योजनाएं लागू की हैं। जिसके अंतर्गत किसानों, श्रमिकों, छोटे उद्यमियों और उपभोक्ताओं को डायरेक्ट कैश बेनिफिट या लोन आधारित सहायता प्रदान की जा रही है।

     वर्तमान सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन के लिए वर्ष 2015 में ‘भूमि अधिग्रहण कानून-2013’ (जिसे एक प्रो-फार्मर कानून की संज्ञा दी गयी थी) को विकास विरोधी कानून कह कर निरस्त कर दिया गया। इसी तरह सरकार ने 2020-21 में एक बड़े नीतिगत कदम के तहत बाजारोन्मुख तीन कृषि कानून पारित किया। इसका उद्देश्य राज्य-विनियमित मंडियों (APMC) के एकाधिकार को समाप्त करना, अनुबंध कृषि (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) को बढ़ावा देना और खाद्य वस्तुओं पर स्टॉक सीमा को हटाना था। परंतु देश के किसानों ने इन कानूनों को खेती में सरकार द्वारा बड़ी पूँजी (कॉर्पोरेट कैपिटल) के हस्तेक्षेप को बढ़ावा देने और न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली के कमजोर होते जाने के तौर पर देखा। इन कानूनों के विरोध में किसान संगठनों द्वारा लगभग एक वर्ष तक दिल्ली के बाहर ऐतिहासिक विरोध किया गया और अंततः सरकार ने इन कानूनों को निरस्त कर दिया। 

     इस प्रकार अजादी के तुरंत बाद देश के ग्रामीण क्षेत्रों में जिस संरचनात्मक परिवर्तन द्वारा ग्रामीण आय असमानता को कम करने, हर हाथ को काम और गरीबी, खाद्य असुरक्षा और कुपोषण को ख़त्म करने की बात देश की प्रथम पंचवर्षीय योजना में की गयी थी, वह पिछले 75 सालों में देश में चुनकर आयीं तमाम सरकारें पूरी नहीं कर सकीं। हालाँकि देश में अत्यधिक गरीबी कम हुई पर साथ ही आय असमानता कई गुना बढ़ी है। रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से निकले युवा शहरी असंगठित क्षेत्र में बहुत कम मजदूरी पर काम करने के लिए विवश हैं। यदि हम आज के भारत की तुलना चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान से करें, जिनकी आधुनिक विकास यात्रा 1950 के आस पास ही शुरू हुई थी, तो पाएंगे कि मानव विकास के प्रत्येक सूचकांक में भारत इन देशों से बहुत पीछे है। ऐसा इसलिए कि उपरोक्त देशों ने आर्थिक विकास की एक सुनियोजित नीति को अपनाया जबकि भारत ऐसा करने में असमर्थ रहा। 

डॉ. संतोष वर्मा

santosh.econ@gmail.com

डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट

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