सत्ता, व्यवस्था और बुद्धिजीवी : फूको के सहारे वर्तमान भारत पर विचार

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कल सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरु का एक वॉल्यूम मिला । कुछ वॉल्यूम कम क़ीमत पर कभी कभी मिल जाते हैं तो मैं ख़रीद लेता हूँ । उसके सौ पृष्ठ पढ़ गया । आज सुबह सुबह मिशेल फूको पर एक बहुत कठिन पोस्ट पढ़ कर उसे सरल भाषा में अपने लिए अनूदित किया । फिर एक बात याद आई कृपलानी की जिसका यशपाल के उपन्यास में इस्तेमाल हुआ है । मुझे लगा कि यह मेरी तेरी उसकी बात उपन्यास में है लेकिन फिर संदेह हुआ तो अपनी किताब निकाल कर चेक किया ।मेरा संदेह सही सिद्ध हुआ । यह झूठा सच का संदर्भ है । फिर कल से आज तक के पढ़े हुए को एक जगह रख रहा हूँ ।

मिशेल फूको को पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि वे हमें तैयार उत्तर देने के बजाय अपने प्रश्नों को बदलने के लिए प्रेरित करते हैं। सामान्यतः राजनीतिक परिवर्तन पर विचार करते समय हमारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित रहता है कि सत्ता किसके हाथ में है, कौन-सा दल शासन कर रहा है, नेता की नीयत कैसी है और उसके विचार सही हैं या गलत। ये प्रश्न महत्त्वहीन नहीं हैं, लेकिन यदि हमारी पूरी बहस इन्हीं तक सीमित रह जाए तो हम उस अधिक बुनियादी प्रश्न तक नहीं पहुँच पाते कि सत्ता वास्तव में काम कैसे करती है। संस्थाएँ किस प्रकार लोगों के व्यवहार को नियंत्रित करती हैं, ज्ञान को कौन तैयार करता है, किस विचार को सत्य का दर्जा मिलता है, किन आवाजों को प्रामाणिक माना जाता है और किन्हें चर्चा से बाहर कर दिया जाता है—फूको हमें इन प्रक्रियाओं की ओर देखने के लिए प्रेरित करते हैं।
फूको के अनुसार बुद्धिजीवी का काम समाज का सर्वज्ञ गुरु, नैतिक न्यायाधीश अथवा लोगों की ओर से बोलने वाला प्रतिनिधि बन जाना नहीं है। उसे यह दावा नहीं करना चाहिए कि सत्य केवल उसके पास है और जनता को उसके बताए हुए रास्ते पर चलना चाहिए। बुद्धिजीवी की भूमिका कहीं अधिक विनम्र, लेकिन साथ ही अधिक कठिन है। उसे उन विचारों, संस्थाओं और तथाकथित सत्यों की आलोचनात्मक जाँच करनी है जिन्हें समाज बिना प्रश्न किए स्वाभाविक, आवश्यक और अपरिवर्तनीय मानने लगा है। उसका काम लोगों को यह बताना नहीं कि उन्हें क्या सोचना चाहिए, बल्कि उनके साथ मिलकर यह देखना है कि क्या किसी परिचित प्रश्न को दूसरे ढंग से भी समझा जा सकता है।
इसलिए बुद्धिजीवी को समाज का मार्गदर्शक कहने की अपेक्षा उसके साथ सोचने वाला व्यक्ति कहना अधिक उचित होगा। वह समाज से बाहर खड़ा कोई ऐसा ज्ञानी नहीं है जो दूसरों को बदलता है और स्वयं अपरिवर्तित बना रहता है। वह भी उसी इतिहास, संस्कृति, भाषा, ज्ञान-व्यवस्था और सत्ता-संरचना का हिस्सा है जिसका वह अध्ययन और परीक्षण करता है। समाज को समझने तथा उसके साथ संवाद करने की प्रक्रिया में उसकी अपनी धारणाएँ भी बदलती हैं। वह समाज के परिवर्तन में भाग लेता है और उसी प्रक्रिया में स्वयं भी परिवर्तित होता जाता है।

फूको ज्ञान को केवल सूचनाओं का संचय नहीं मानते। ज्ञान की सार्थकता इस बात में है कि वह हमें अपनी बनी-बनाई मान्यताओं से बाहर निकलने और स्वयं को नए ढंग से देखने की क्षमता प्रदान करे। यदि बहुत कुछ पढ़ने और जानने के बाद भी हमारे सोचने का ढंग पहले जैसा ही बना रहता है, तो उस ज्ञान की सीमा पर विचार करना चाहिए। वास्तविक चिंतन केवल दूसरों के विचारों की परीक्षा नहीं करता; वह विचार करने वाले व्यक्ति को भी अपनी धारणाओं, सुविधाओं और पूर्वग्रहों की जाँच करने के लिए बाध्य करता है। सोचने का अर्थ केवल संसार को बदलने की योजना बनाना नहीं, बल्कि परिवर्तन की प्रक्रिया में अपने को भी खुला रखना है।

यहाँ एक और सावधानी आवश्यक है। प्रत्येक विचार अपने आप में परिवर्तनकारी नहीं होता। विचार सत्ता को चुनौती दे सकता है, लेकिन वह सत्ता को उचित ठहराने का साधन भी बन सकता है। ज्ञान मनुष्य को मुक्त कर सकता है, लेकिन उसी ज्ञान के आधार पर लोगों का वर्गीकरण, अनुशासन और नियंत्रण भी किया जा सकता है। विश्वविद्यालय, विद्यालय, प्रशासन, कानून, चिकित्सा-व्यवस्था, मीडिया और विशेषज्ञ संस्थाएँ केवल निष्पक्ष ज्ञान देने वाली इकाइयाँ नहीं हैं। इनके भीतर भी यह तय होता है कि किसकी भाषा स्वीकार की जाएगी, किसका अनुभव ज्ञान माना जाएगा और किसकी बात को अविवेकपूर्ण या अवैध घोषित कर दिया जाएगा। इसलिए बुद्धिजीवी का दायित्व केवल अच्छे विचारों का प्रचार करना नहीं है; उसे यह भी समझना होता है कि विचार और ज्ञान संस्थाओं के भीतर किस प्रकार काम करते हैं।
इस दृष्टि से जवाहरलाल नेहरू के भाषणों को पढ़ना विशेष रूप से विचारोत्तेजक है। वर्ष 1961 में भारत अपनी स्वतंत्रता के चौदह वर्ष पूरे कर चुका था। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर देशवासियों को संबोधित करते हुए और जबलपुर में विश्वविद्यालय के युवाओं के बीच बोलते हुए नेहरू बार-बार भारत के सामाजिक पिछड़ेपन की चर्चा करते हैं। वे सांप्रदायिकता को देश की प्रगति और एकता के लिए गंभीर खतरे के रूप में देखते हैं। वे लोगों से आपसी मनमुटाव से ऊपर उठने, भारत की भावनात्मक एकता को मजबूत करने और बनती हुई नई दुनिया में प्रवेश करने के लिए अपने को तैयार करने का आह्वान करते हैं।
सन् 1947 से 1961 के बीच नेहरू ने अनेक अवसरों पर आधुनिक, वैज्ञानिक, प्रगतिशील और समावेशी भारत की आवश्यकता पर बल दिया। उनकी इच्छा और ईमानदारी को अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं है। उनके नेतृत्व में लोकतांत्रिक संस्थाओं को स्थिरता मिली, नियोजित विकास की शुरुआत हुई तथा शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक क्षेत्र की अनेक संस्थाएँ स्थापित की गईं। फिर भी उनके भाषणों और स्वतंत्र भारत की वास्तविक सामाजिक स्थिति के बीच दिखाई देने वाली दूरी पर विचार किया जाना चाहिए। जिस आधुनिकता, सामाजिक प्रगति और भावनात्मक एकता की वे कामना कर रहे थे, उसके लिए सत्ता, प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक सम्बन्धों के भीतर जितने गहरे परिवर्तन आवश्यक थे, वे पूरी तरह नहीं हो सके।
समस्या केवल यह नहीं थी कि नेहरू जो कह रहे थे, उसे वे सचमुच चाहते थे या नहीं। अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उनकी आकांक्षाओं को वास्तविकता में बदलने के लिए व्यवस्था के काम करने के तरीके में कितना परिवर्तन हुआ। सांप्रदायिकता छोड़ने का आह्वान आवश्यक था, लेकिन सांप्रदायिकता को निरन्तर जन्म देने वाली सामाजिक, राजनीतिक और संस्थागत प्रक्रियाओं को बदलना उससे कहीं अधिक कठिन काम था। भावनात्मक एकता की बात करना महत्त्वपूर्ण था, लेकिन जाति, वर्ग, धर्म और क्षेत्र पर आधारित असमानताओं तथा असुरक्षाओं को दूर किए बिना केवल आह्वान से वह एकता स्थापित नहीं हो सकती थी। परिवर्तन की शुरुआत शब्दों और विचारों से हो सकती है, लेकिन वह केवल शब्दों के सहारे पूरा नहीं होता।
यहीं मुझे यशपाल के उपन्यास झूठा सच में आया आचार्य जे. बी. कृपलानी से जुड़ा प्रसंग याद आता है, जिसका उपयोग मैंने आधुनिक भारत का ऐतिहासिक यथार्थ लिखते समय किया था। उस प्रसंग में स्वतंत्रता के बाद हुए वास्तविक परिवर्तन को लेकर एक बेचैनी दिखाई देती है। देश स्वतंत्र हो गया, शासक बदल गए और सत्ता भारतीयों के हाथ में आ गई, लेकिन जिस व्यवस्था को बदलने के लिए स्वतंत्रता-संग्राम किया गया था, उसके अनेक बुनियादी ढाँचे बने रहे। इसलिए प्रश्न उठता है कि यदि व्यवस्था पहले की तरह काम करती रहे तो परिवर्तन कहाँ हुआ और वह क्रांति कहाँ गई जिसकी आशा स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान की गई थी।

यह प्रश्न स्वतंत्रता की उपलब्धि को छोटा नहीं करता। औपनिवेशिक शासन का अन्त अपने आप में एक ऐतिहासिक परिवर्तन था। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता और व्यापक सामाजिक परिवर्तन को एक ही बात नहीं माना जा सकता। सत्ता का हस्तांतरण आवश्यक था, पर उससे समाज और सत्ता के सभी सम्बन्ध स्वतः नहीं बदल सकते थे। औपनिवेशिक प्रशासन की अनेक प्रवृत्तियाँ, नौकरशाही का जनता से सम्बन्ध, सामाजिक पदानुक्रम, ज्ञान पर कुछ वर्गों का अधिकार और संस्थाओं के भीतर असहमति के प्रति संदेह स्वतंत्र भारत में भी अलग-अलग रूपों में बने रहे। लोग बदल गए, राष्ट्रीय प्रतीक और राजनीतिक भाषा बदल गई, लेकिन व्यवस्था के काम करने के अनेक पुराने तरीके जीवित रहे।
फूको की दृष्टि हमें नेहरू को अच्छा या बुरा सिद्ध करने की सीमित बहस से बाहर निकलने में सहायता करती है। प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि नेहरू की नीयत कैसी थी या उनकी विचारधारा सही थी या गलत। अधिक उपयोगी प्रश्न यह है कि उनके समय में निर्मित संस्थाओं ने किस प्रकार काम किया, वे किन सामाजिक सम्बन्धों को बदल सकीं, किन्हें बदलने में विफल रहीं और उनके भीतर सत्ता तथा ज्ञान के कौन-से नए रूप विकसित हुए। इस प्रकार का विश्लेषण नेहरू की उपलब्धियों को अस्वीकार नहीं करता; वह उनकी परियोजना की ऐतिहासिक सीमाओं को समझने में सहायता करता है।
आज के भारत को समझने के लिए भी यही दृष्टि आवश्यक है। हम अक्सर अपनी राजनीतिक ऊर्जा इस बहस में खर्च कर देते हैं कि कौन-सा दल अच्छा है, कौन-सा नेता अधिक ईमानदार है और किसे हटाकर किसे सत्ता में लाना चाहिए। लोकतंत्र में ये प्रश्न स्वाभाविक और आवश्यक हैं। फिर भी एक दल के स्थान पर दूसरे दल का आ जाना अपने आप में व्यवस्था के परिवर्तन की गारंटी नहीं है। यदि निर्णय लेने का तरीका वही रहे, सत्ता का केन्द्रीकरण बना रहे, संस्थाएँ नागरिकों के प्रति उत्तरदायी न हों, ज्ञान कुछ लोगों के नियंत्रण में रहे और असहमति के लिए जगह लगातार कम होती जाए, तो सत्ता में बैठे लोगों का बदलना वास्तविक परिवर्तन नहीं ला सकता।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी दल एक जैसे हैं अथवा नेतृत्व के परिवर्तन से कोई अन्तर नहीं पड़ता। इसका अर्थ केवल यह है कि हमें अपने प्रश्न को अधिक गहरा बनाना चाहिए। हमें देखना होगा कि सत्ता किसके पास है ही नहीं, बल्कि वह संचालित कैसे होती है; संस्थाएँ किन मूल्यों और नियमों से चलती हैं; नागरिक उनके सामने कितने समर्थ या असहाय हैं; ज्ञान का उपयोग समाज को समझने के लिए हो रहा है अथवा उसे नियंत्रित करने के लिए; और आलोचना तथा असहमति को व्यवस्था के आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार किया जा रहा है या शत्रुता के रूप में देखा जा रहा है।
इस पूरी प्रक्रिया में बुद्धिजीवी की भूमिका सकारात्मक और सक्रिय है, लेकिन वह भूमिका किसी मसीहा की नहीं है। बुद्धिजीवी समाज को आदेश नहीं देता कि उसे किस दिशा में जाना चाहिए। वह समाज के साथ मिलकर उसकी वास्तविकता की परतें खोलता है। वह उन प्रक्रियाओं को समझने और स्पष्ट करने की कोशिश करता है जिनके माध्यम से सत्ता काम करती है, सहमति निर्मित होती है, ज्ञान को वैधता मिलती है और असहमति को नियंत्रित किया जाता है। वह लोगों के सामने तैयार निष्कर्ष रखने के बजाय उन्हें अपने अनुभवों को नए ढंग से देखने और प्रश्न करने की बौद्धिक सामर्थ्य प्रदान करता है।
इस काम में बुद्धिजीवी स्वयं भी सुरक्षित नहीं रहता। समाज के साथ विचार करते हुए उसे अपने ज्ञान, अपनी भाषा, अपनी संस्थागत स्थिति और अपने पूर्वग्रहों की भी परीक्षा करनी पड़ती है। वह केवल समाज को बदलने वाला व्यक्ति नहीं है; समाज की बदलती हुई वास्तविकता उसे भी बदलती है। यही कारण है कि चिंतन एकतरफा उपदेश नहीं, बल्कि निरन्तर चलने वाला संवाद है। इसमें बुद्धिजीवी और समाज दोनों एक-दूसरे से सीखते हैं तथा अपने पुराने निष्कर्षों को संशोधित करने के लिए तैयार रहते हैं।
फूको से मिलने वाली सबसे उपयोगी सीख शायद यही है कि परिवर्तन का आरम्भ विचार और शब्द से हो सकता है, लेकिन वह वहीं समाप्त नहीं हो सकता। वास्तविक परिवर्तन के लिए हमें व्यवस्था की उन सूक्ष्म प्रक्रियाओं को समझना और बदलना होगा जिनके माध्यम से सत्ता, ज्ञान और संस्थाएँ हमारे जीवन को आकार देती हैं। बुद्धिजीवी का कर्तव्य लोगों का गुरु बनना नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर इस व्यवस्था को समझना, उसकी परतों को खोलना और परिवर्तन की सम्भावनाओं के लिए जगह बनाना है। इस साझा यात्रा में वह समाज को बदलने की कोशिश करता है और स्वयं भी लगातार बदलता रहता है।

हितेन्द्र पटेल

hitenjee@gmail.com

Senior Historian

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