चुनावी सुधार या मतदाता वहिस्करण?: 2026 चुनावो कि कानूनी पड़ताल

Date:

भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा, मजबूत,एवं उल्लखनीय लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओ में से एक है, क्योंकि यह अभूतपूर्व स्तर पर कार्य करते हुए भी अत्यंत विविधापूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक,धार्मिक, और भाषाई समुदायों को समाहित करने में सफल रहा है| भारतीय लोकतंत्र कि सबसे बड़ी शक्ति उसकी व्यापक और समावेशी चुनावी प्रक्रिया मानी जाती है| संविधान निर्माताओ नेसार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को स्वीकार कर यह सुनिश्चित किया कि प्रत्येक नागरिक, चाहे उसकी सामाजिक,आर्थिक जो भी हो,  वे लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में सामान रूप भाग ले सके| किन्तु समय के साथ चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और विस्वसनीय बनाने के उदेश्य से अनेक सुधारात्मक उपाय अपनाये गए| मतदाता सूची  का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision- S.I.R), निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का प्रस्ताव तथा चुनावी प्रवंधन में तकनीकी प्रबंधन में हस्ताछेप इन्हीं सुधारो का का हिस्सा है| यद्यपि  इन चुनावों का उद्देश्य चुनावी सुचिता को सुदृढ़ बनाना है ,परन्तु 2026 के विधानसभा चुनावों ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक  प्रश्न को जन्म दिया है – क्या ये सुधार लोकतंत्र को अधिक मजबूत बना रहे है या फिर अनजाने में कुछ वर्गों को राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर कर रहे है ?

हाल में हुए असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में हुए 2026 के विधानसभा चुनाव इस प्रश्न को समझने में एक  महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते है| इन चुनावो के दौरान मतदाता सूची      पुनरीक्षण (S.I.R), परिसीमन (Delimitation), नागरिकता (citizenship) एवं प्रवासन (Migration) सम्बन्धी चिंतायें जैसे मुद्दों ने चुनावी सुधारों और लोकतान्त्रिक समावेशन के बीच संतुलन पर गंभीर बहस को जन्म को दिया है।  विपक्षी दलों ने तर्क दिया  कि चुनावी सुचिता के नाम पर अपनाई जा रही कुछ प्रशासनिक प्रक्रियायें मतदाता वहिस्करण का माध्यम बन रही है | इस पृष्ठभूमि में यह आवश्यक हो जाता है कि चुनावी सुधारों का मूल्यांकन केवल प्रशासनिक दक्षता के आधर पर न हो , बल्कि उन्हें संविधान द्वारा संरक्षित राजनितिक समानता, मताधिकार और प्रतिधिनिक लोकतन्त्र के सिधान्तो के आलोक में भी परखा जाए|

इन चुनावों के दौरान जिन मुद्दों ने विशेष ध्यान आकर्षित किया, उनमें मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनर्निरीक्षण (Special Intensive Revision – S.I.R.) का प्रश्न सबसे प्रमुख रहा। यद्यपि हाल के वर्षों में S.I.R. राष्ट्रीय विवाद का विषय बना, इसकी जड़ें भारतीय चुनावी इतिहास में काफी गहराई तक फैली हुई हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कानूनी आधार संविधान के अनुच्छेद 324 तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में निहित है, जो निर्वाचन आयोग को मतदाता सूचियों के निर्माण और संशोधन की शक्ति प्रदान करते हैं। स्वतंत्रता के बाद के दशकों में फर्जी मतदाताओं, मृत व्यक्तियों के नामों तथा दोहराव वाली प्रविष्टियों को हटाने के उद्देश्य से समय-समय पर व्यापक सत्यापन अभियान चलाए गए। 1990 के दशक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त. टी एन. शेषन के कार्यकाल के दौरान मतदाता सूची की शुद्धता का महत्व विशेष रूप से सामने आया। शेषन ने यह स्पष्ट किया कि विश्वसनीय मतदाता सूची के बिना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की कल्पना नहीं की जा सकती। इसी अवधि में मतदाता पहचान पत्र (EPIC) प्रणाली को बढ़ावा दिया गया तथा सत्यापन प्रक्रियाओं को अधिक कठोर बनाया गया। साल 2000 और 2010 के दशक में मतदाता सूचियों के डिजिटलीकरण ने इस प्रक्रिया को और अधिक तकनीक-आधारित बना दिया, जिससे दोहराव वाली तथा अयोग्य प्रविष्टियों की पहचान करना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया। किंतु इस तकनीकी परिवर्तन के साथ नई समस्याएँ भी उत्पन्न हुईं, जैसे डेटा असंगतियाँ, दस्तावेज़ी त्रुटियाँ और वास्तविक मतदाताओं का अनजाने में सूची से बाहर हो जाना।

S.I.R. से जुड़ा विवाद विशेष रूप से असम और पश्चिम बंगाल में महत्वपूर्ण बन गया, जहाँ प्रवासन, पहचान और नागरिकता के प्रश्न लंबे समय से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहे हैं। असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की प्रक्रिया की स्मृतियाँ तथा अवैध प्रवासन से संबंधित दशकों पुराने विवादों ने मतदाता सत्यापन की किसी भी प्रक्रिया को अत्यंत संवेदनशील बना दिया। ऐसे परिदृश्य में मतदाता सूची का पुनरीक्षण मात्र एक प्रशासनिक कार्यवाही न होकर व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक प्रभावों वाला विषय बन जाता है। आलोचकों का तर्क था कि अत्यधिक दस्तावेज़-आधारित सत्यापन गरीब नागरिकों, प्रवासी मजदूरों तथा उन लोगों को प्रभावित कर सकता है जिनके पास औपचारिक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में भी विपक्षी दलों ने मतदाता पंजीकरण और नाम विलोपन की प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप लगाए तथा यह आशंका व्यक्त की कि वास्तविक मतदाताओं को सूची से बाहर किया जा सकता है। यद्यपि निर्वाचन आयोग ने यह स्पष्ट किया कि सभी पुनरीक्षण वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप किए गए हैं, फिर भी इस विवाद ने एक मूलभूत संवैधानिक प्रश्न को जन्म दिया—राज्य चुनावी शुचिता को बनाए रखते हुए मतदाताओं की लोकतांत्रिक भागीदारी को कैसे सुनिश्चित करे? यह बहस चुनावी निष्पक्षता और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को रेखांकित करती है।

हाल के वर्षों में S.I.R. से संबंधित मुकदमों पर न्यायपालिका की प्रतिक्रिया भी उल्लेखनीय रही है। यद्यपि सबसे चर्चित विवाद बिहार से संबंधित था, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ पूरे देश में चुनावी प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि “मतदाता सूचियाँ स्थिर नहीं रह सकतीं और समय-समय पर उनका पुनरीक्षण आवश्यक है”। साथ ही, न्यायालय ने निर्वाचन आयोग के इस अधिकार को भी मान्यता दी कि वह आवश्यक परिस्थितियों में विशेष पुनरीक्षण कर सकता है। दूसरी ओर, “न्यायालय ने प्रक्रिया की पारदर्शिता, निष्पक्षता और मतदाताओं पर अनावश्यक बोझ न डालने की आवश्यकता पर भी बल दिया”। विशेष रूप से आधार कार्ड को अतिरिक्त दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार करने संबंधी निर्देश ने यह स्पष्ट किया कि सत्यापन प्रक्रिया अत्यधिक कठोर नहीं होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण चुनावी शुचिता और मतदाता समावेशन के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास प्रतीत होता है। तथापि विपक्षी दृष्टिकोण से यह चिंता बनी रहती है कि पर्याप्त सुरक्षा उपायों के अभाव में ऐसी प्रक्रियाएँ लोकतंत्र के सबसे कमजोर वर्गों को ही सबसे अधिक प्रभावित कर सकती हैं।

यदि S.I.R. मतदान करने के अधिकार से संबंधित है, तो परिसीमन (Delimitation) उस मत के मूल्य से संबंधित प्रश्न है। साल 2026 के चुनावों के दौरान जिन संवैधानिक विषयों ने व्यापक राजनीतिक बहस को जन्म दिया, उनमें आगामी परिसीमन प्रक्रिया प्रमुख थी। परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या में परिवर्तन के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण तथा प्रतिनिधित्व का पुनर्वितरण। इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 में निहित है। स्वतंत्रता के बाद भारत में 1952, 1963 और 1973 में परिसीमन आयोगों(Delimitation Commision) द्वारा निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किया गया। किंतु 1970 के दशक में यह चिंता उत्पन्न हुई कि जिन राज्यों ने सफल परिवार नियोजन नीतियाँ अपनाई हैं, वे जनसंख्या वृद्धि कम होने के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पिछड़ सकते हैं। इसी कारण 42वें संविधान संशोधन द्वारा 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण को स्थगित कर दिया गया। बाद के संशोधनों द्वारा यह स्थगन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया गया। जो व्यवस्था प्रारंभ में अस्थायी समझी गई थी, वह आज भारतीय संघवाद के सामने खड़े सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों में से एक बन चुकी है।

आलोचकों का तर्क है कि यदि प्रतिनिधित्व केवल जनसंख्या पर आधारित होगा, तो यह एक संवैधानिक विडंबना होगी। जो राज्य सुशासन और जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे, वही राजनीतिक रूप से नुकसान उठाएँगे। दूसरी ओर, परिसीमन के समर्थकों का कहना है कि लोकतांत्रिक समानता का सिद्धांत यही मांग करता है कि प्रत्येक नागरिक का मत लगभग समान मूल्य रखे और प्रतिनिधित्व वास्तविक जनसंख्या के अनुरूप हो। किंतु विरोधियों का मत है कि भारत का संविधान केवल लोकतांत्रिक ही नहीं बल्कि संघीय भी है, इसलिए राजनीतिक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण कुछ राज्यों में संघीय संतुलन को कमजोर कर सकता है। इस प्रकार परिसीमन का विवाद केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय स्वायत्तता, भाषाई विविधता, वित्तीय संघवाद तथा संघ और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन जैसे व्यापक प्रश्नों से जुड़ा हुआ है।

परिसीमन से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय का न्यायशास्त्र कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश प्रदान करता है। मेघराज कोठारी बनाम परिसीमन आयोग में न्यायालय ने परिसीमन आदेशों की अंतिमता पर बल देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएँ निर्धारित कीं। इसी प्रकार कुलदीप नायर बनाम भारत संघ में न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के अनुरूप प्रतिनिधित्व की संरचना समय के साथ विकसित हो सकती है। तथापि ये निर्णय वर्तमान विवाद के सभी आयामों का समाधान नहीं करते। आज का प्रश्न केवल परिसीमन की वैधानिकता का नहीं, बल्कि उसके संघीय ढाँचे पर पड़ने वाले प्रभाव का भी है। दक्षिणी राज्यों के अनेक राजनीतिक दलों के लिए यह विषय राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के बाद संघवाद से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बहस बन चुका है।

S.I.R. और परिसीमन के अतिरिक्त, 2026 के चुनावों ने राजनीतिक हिंसा तथा मतदाता भयादोहन की समस्या को भी उजागर किया, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में। विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच झड़पों, मतदाताओं को प्रभावित करने के प्रयासों और हिंसक घटनाओं ने एक बार फिर यह प्रश्न उठाया कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ क्या होनी चाहिए। इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना था। इसका अर्थ केवल मतदान की व्यवस्था उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण सुनिश्चित करना भी है जिसमें मतदाता भय, दबाव या हिंसा के बिना अपने राजनीतिक विकल्प का प्रयोग कर सके।

समग्र रूप से देखा जाए तो 2026 के विधानसभा चुनाव यह संकेत देते हैं कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का स्वरूप बदल रहा है। अब प्रमुख विवाद केवल मतपेटियों या मतदान केंद्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मतदाता डेटाबेस, दस्तावेज़ी सत्यापन, जनसांख्यिकीय प्रतिनिधित्व, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संस्थागत विश्वास जैसे प्रश्नों से जुड़े हुए हैं। विपक्षी दृष्टिकोण से ये घटनाएँ राजनीतिक शक्ति के केंद्रीकरण, कमजोर वर्गों के संभावित बहिष्करण तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से चुनावी परिणामों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किए जाने की आशंकाओं को जन्म देती हैं। यद्यपि इन आशंकाओं की वास्तविकता पर मतभेद हो सकते हैं, फिर भी किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में यह आवश्यक है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निरंतर समीक्षा और निगरानी की जाए।

2026 के विधानसभा चुनावो से यह स्पस्ट होता है कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष उपस्तित चुनौतियाँ अब केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है| असल सवाल यह कि चुनावी प्रक्रिया कि हद तक समावेशी, प्रतिनिधिक, और संविधानिक मूल्यों के अनुरूप है| विशेष गहन पुनिरिशन (S.I.R) ने चुनावी शुचिता और मतदाता समावेशन के बीच संतुलन कि चुनौती को उजागर किया है, जबकि परिसीमन कि बहस ने संघवाद और राजनितिक प्रतिधिनित्व के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाय है| सम और बंगाल में मतदाता सत्यापन से जुड़े विवादों ने यह आशंका उत्पन्न हुई है कि प्रशासनिक प्रक्रियायें किस प्रकार गरीब, पिछड़े, प्रवासी मजदूरों अथवा दस्तावेज विहीन लोगों को प्रभावित कर सकती है, वहीँ तमिलनाडु  एवं केरल के परिसीमन सम्बन्धी चिन्ताओ ने यह सवाल खड़ा किया है कि जनसँख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान  उठाना पड़ेगा|

न्यायपालिका  ने समय समय पर स्पष्ट  किया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष  चुनाव संविधान की  मूल संरचना का आधार है| इंदिरा गाँधी बनाम राज नारायण, मोहन सिंह बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त तथा मेघराज कोठारी बनाम परिसीमन आयोग जैसे निर्णय यह दर्शाते है कि चुनावी प्रशासन को समानता और संवेधानिक मानको का पालन करना होगा| चुनावी सुधारों का उदेश्य लोकतंत्र को अधिक मजबूत बनाना चाहिए, न कि नागरिको कि राजनितिक भागीदारी को सीमित करना|

अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को जनता का(Of the people), जनता के द्वारा (By The people), और जनता के लिए शासन (For The People) कहकर परिभाषित किया था, लेकिन आज जब लोकतंत्र कि नीव मानी जाने वाली चुनावी प्रक्रिया में ही जनता कि सहभागिता संकट में हो तो, भारत के लोकतान्त्रिक देश होने में सवाल खड़े होते नज़र आते है|

स्वाति  सिंह

एडवोकेट- दिल्ली हाई  कोर्ट

swatisingh31july@gmail.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

पढ़ते-पढ़ते: मनोज पटेल

1- जैक एग्युरो -युद्ध का चेहरा (सोनेट) युद्ध का चेहरा...

The President’s Cake : इराकी सिनेमा का नायाब तोहफा

इराकी फिल्मकार हसन हादी ने अपनी फिल्म द प्रेसिडेंट’स...

साहित्य, स्मृति और इतिहास की सातवीं दृष्टि

इतिहास और साहित्य के संबंध पर विचार करते हुए...

मेरी माँ मेरी गैंग्स्टर या कुछ और

एक ऐसी अनोखी किताब जिसका अगला पाठ पिछले पाठ...