पाँच विधानसभाओ के चुनावों के परिणाम आ चुके हैं। बंगाल में भाजपा की विशाल जीत और केरल में काँग्रेस की वापसी तमिलनाडु में टीवीके (TVK) पार्टी की जीत और जोसेफ विजय के मुख्यमंत्री बनने के सामने फीकी पड़ गई। तमिलनाडु में डीएमके की हार अप्रत्याशित थी क्योंकि इन सभी राज्यों में तमिलनाडु की आर्थिक सामाजिक ग्रोथ अन्य राज्यों से बहुत अधिक थी और दलित पिछड़े के प्रश्नों विशेषकर नीट, आरक्षण आदि पर अगर किसी एक पार्टी की भूमिका सबसे अधिक प्रभावशाली रही है तो वह डीएम के है। यह भी हकीकत है कि डीएम के और सत्तारूढ़ दल में वोट का अंतर बहुत अधिक नहीं है लेकिन मुख्यमंत्री एम के स्टालिन का अपने चुनाव क्षेत्र से हार जाना ये संकेत भी करता है कि कही डीएम के अपनी जीत के प्रति अति आत्मविश्वास तो नहीं थी कि उसने वोटर मैनेजमेंट करने में गलती कर दी हो या हार के अन्य और कारण भी है।
तमिलनाडू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बंगाल जैसे प्रदेश में हालांकि भाजपा की वर्षों की ‘तपस्या’ पूरी हुई है लेकिन सत्ता में दलित पिछड़े आदिवासियों का संदर्भ देखेंगे तो विशेष परिवर्तन नहीं दिखाई देता सिवाय इस बात के कि भाजपा ने दलित पिछड़ो को लुभाने के प्रयास किए क्योंकि न ही वाम पंथियों ने और न ही ममता बनर्जी की तृणमूल काँग्रेस ने दलितों, पिछड़ो और आदिवासियों के संदर्भ में कोई मुहिम चलाई या आवाज उठाई। बंगाल में लगभग 25% मुस्लिम और इतनी ही संख्या में दलितों की जनसंख्या होने के बावजूद भी 35 वर्षों के वाम शासन और 15 वर्षों के ममता के कार्यकाल ने दोनों ही समुदायों को राजनीतिक और प्रशासनिक भागीदारी देने के कोई विशेष प्रयास नहीं किए और इसका परिणाम ये निकला के ये जातिया अपनी भागीदारी और भूमिका की तलाश में भाजपा की और चली गई। इसके अलावा बंगाल में एस आई आर के कारण बड़ी संख्या में लोगों को वोट देने से वंचित रखना लोकतंत्र पर एक गहरे दाग की तरह है। हमारी स्वायत्त संस्थाओ जैसे अदालतों और मीडिया की भूमिका तो उससे भी अधिक दयनीय हो चुकी है कि अब उत्पीड़ित लोग जाएँ तो जाएँ कहा। खैर, ममता बनर्जी के स्थान पर सुवेन्दु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है और इस प्रकार से सत्ता की चाबी बुद्धदेब भट्टाचार्य के बाद से ही ब्राह्मणों के हाथ में कायम है। दल भले ही बदल गये हों लेकिन बंगाल में सत्ता के केंद्र में ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातिया ही हैं। भाजपा ने उसमे केवल दलित आदिवासियों को जोड़ा है लेकिन मुसलमानों को पूरी तरह से सत्ता से विमुख कर दिया है।
बंगाल की तरह ही तमिलनाडु में भी सत्ता परिवर्तन हुआ है। यहाँ 60 वर्षों में पहली बार सत्ता परंपरागत द्रविडियन दलों के हाथ से निकलकर एक नई बनी पार्टी के हाथ में आ गई है जिसके फलस्वरूप बहुत से लोग इसलिए त्योहार मनाने लगे क्योंकि उन्हे लगा कि तमिलनाडु में अब पेरियार और द्रविड आंदोलन का खात्मा हो जाएगा। पेरियार के नाम से ही खौफ खाने वाले लोग बंगाल की जीत को भी भूल गए और उन्हे लगा कि हिन्दुत्व के लिए अब तमिलनाडु की राह जोसेफ विजय के जरिए ही होगी।
जैसे ही तमिलनाडु में जोसेफ विजय की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी होने की ओर बढ़ती गई भाजपा समर्थक पत्रकारों और विशेषज्ञों में खुशी की इतनी बड़ी लहर दौड़ गई कि वे बंगाल में अपनी पार्टी की ‘बड़ी जीत’ को भुला बैठे। टीवी चैनल द्रविड आंदोलन विरोधी पुराने ब्राह्मण विशेषज्ञों को लाते रहे और सबने मिलकर ‘पेरियार’ और ‘द्रविड आंदोलन’ की तमिलनाडु से समाप्ति की घोषणा कर दी। संघ परिवार के चहेते एस गुरुमूर्ति दोबारा से सभी चैनलों पर भारी डिमांड में थे। उनके चेहरे पर आई रौनक से पता चल रहा था कि वे कितने खुश थे। सभी को ये उम्मीद थी कि विजय सरकार बनाने के लिए एआईडीएमके (AIDMK) की सहायता लेंगे और इस बहाने भाजपा को तमिलनाडु में एंट्री करने का मौका मिल जाएगा। भाजपा को 2.97% वोट के साथ एक सीट पर जीत मिली वही काँग्रेस का वोट प्रतिशत 3.5 था और उसको 5 सीटे मिली। वामपंथी पार्टियों का वोट प्रतिशत भी इससे कम था। मतलब यह कि तमिलनाडु ने लगातार राष्ट्रीय पार्टियों से दूरी बनाकर रखी है। टीवीके को 109 सीटों पर जीत मिली जिसमे विजय दो जगह से चुनाव जीते तो अभी के हिसाब से उनके पास केवल 108 सीटे ही हुई इसलिए छोटी पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण थी। लेकिन चुनाव के परिणाम आते ही शाम तक काँग्रेस पार्टी ने टीवीके को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी। इतने वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ कि काँग्रेस ने इतना त्वरित कोई कार्य किया हो लेकिन इसके नतीजे में डीमके के साथ उसने 20 वर्षों पुराना अपना गठबंधन तोड़ दिया। राहुल गांधी और एम के स्टालिन एक दूसरे को अपना भाई कहते थे लेकिन चुनावी हार के बाद राहुल ने डीएम के से बात करना भी उचित नहीं समझा हालांकि काँग्रेस के लोग कहते हैं कि गठबंधन से हटने के विषय में काँग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे ने डीएम के नेताओ को बता दी थी।
काँग्रेस और डीएम के भी मध्य गठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। काँग्रेस के प्रवीण चक्रवर्ती और मणिक्कम टैगोर जैसे लोग चुनाव से पहले ही डीएमके के साथ गठबंधन से हटना चाहते थे क्योंकि उन्हे लगता था कि गठबंधन में उनके लिए कोई विशेष जगह नहीं है। डीएमके की गलती यह ही कि उसने 25 वर्षों के साथ रह रहे अपने सहयोगी दलों को सत्ता में कोई भागीदारी नहीं दी और इसका असर यह हुआ कि लगातार अच्छे कार्यों के बावजूद भी तमिलनाडु में दलितों के भीतर एक सुगबुगाहट थी। अपने तमाम अच्छे कार्यों के बावजूद भी तमिलनाडु में दलित उत्पीड़न की घटनाओ में अपेक्षित कमियां नहीं दिखाई दी और नतीजा ये हुआ कि दलितों के बहुत से नेता और कार्यकर्ता अंदरूनी तौर पर डीएमके से बहुत नाराज दिखाई दिए। उन्मे से बहुत से ऐसे हैं जिन्हे अपनी बातों को रखने का मौका तथाकथित राष्ट्रीय चैनलों पर लगातार दिया गया। अब पेरियार को टारगेट करने के लिए यदि बाबा साहब अंबेडकर का इस्तेमाल करने के प्रयास किए जाएंगे तो ये कुत्सित ही होगा लेकिन अपने को अम्बेडकरवादी कहने वाले बहुत से लोगों ने तो इस धारणा को आगे बढ़ाने में बहुत ‘योगदान’ दिया है। ये वे लोग हैं जो मण्डल आयोग की सिफारिशों के बाद ये कहते नजर आए थे कि इसमे ‘दलितों’ के लिए क्या रखा है ? ऐसे विचारकों ने ‘पेरियार’ को दलित विरोधी और केवल ‘पिछड़ो’ का नेता बताया और उनका वो अभियान अभी भी जारी है हालांकि तमिलनाडु में आज भी सभी प्रगतिशील लोग चाहे अम्बेडकरवादी हो, महिला आंदोलन से जुड़ी हुई हो या मार्क्सवादी, सभी तमिलनाडु के राजनैतिक सामाजिक जनजीवन में पेरियार के योगदान को बहुत सम्मान से देखते हैं जिनके बिना तमिलनाडु के राजनैतिक परिदृश्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और यही कारण कि दिल्ली के बनिया मीडिया के सारे अभियानो के बावजूद तमिलनाडु की नई सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे यह दिखाई दे कि वह पेरियार विरोधी है या उनके योगदान को नहीं मानती क्योंकि ऐसा करने पर वह डीएमके को सीधे सीधे मुद्दा दे देगी और उसके लिए लंबे समय तक काम करना मुश्किल होगा।
वैसे तमिलनाडु में पेरियार आंदोलन के लगातार मजबूत होने और डीएम के वैचारिक प्रश्नों से बहुत सी जातिवादी- ब्राह्मणवादी ताकते लगातार ये अवसर तलाश रही थी कि द्रविड आंदोलन को कैसे कमजोर किया जाए और उनके ये प्रयास पिछले चालीस वर्षों से लगातार जारी थे। जोसेफ विजय की जीत के साथ ही उन्हे ‘क्रांतिकारी’ बताने और सोशल मीडिया पर उन्हे ‘दलित’ बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। किसी ने कहा कि उन्होंने दलितों को सामान्य सीटों टिकट दिया है और वे सभी चुन कर आ गए हैं। असल में तमिलनाडु में स्वतंत्रता के बाद से ही राजनीतिक परिदृश्य में गैर ब्राह्मण आंदोलन एक मजबूत पक्ष रहा है और उसे समझने की आवश्यकता है तभी हमे वहाँ हो रहे राजनैतिक परिवर्तनों को लेकर सांप्रदायिक जातिवादी मीडिया में खुशी की ‘लहर’ को समझना होगा।
स्वतंत्रता के समय आज के तमिलनाडु को मद्रास प्राविन्स के नाम से जाना जाता है। पहले आम चुनावों के बाद काँग्रेस सत्ता में आई और उसने चक्रवर्ती राज गोपालाचारी को मुख्यमंत्री बनाया जो असल में सन 1947 में देश की आजादी के बाद भारत के पहले गवर्नर जनरल थे। सन 1950 के बाद इस पद को समाप्त कर राष्ट्रपति पद को सृजित किया गया था और डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बने। हालांकि वर्ष 1950-1951 तक वह केन्द्रीय मंत्री भी रहे लेकिन इस प्रकार देश के सबसे बड़े पद पर रहने वाले व्यक्ति को राज्य चुनावों के बाद एक राज्य का मुख्य मंत्री बना देना और उनके द्वारा इसे स्वीकार कर दिया जाना बेहद अप्रत्याशित था लेकिन इसके पीछे बहुत ‘लंबी सोच’ थी। महत्वपूर्ण बात यह थी कि राजाजी ने चुनाव भी नहीं लड़ा था। पहले चुनावों में मद्रास राज्य की 375 सीटों पर काँग्रेस को 152 सीटों पर ही जीत मिली और इस प्रकार त्रिशंकु विधानसभा वाला पहला राज्य मद्रास ही बना। दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी थी जिसे 62 सीटे मिली थी और अन्य ऐसी ही पार्टियों को अनेकों स्थानों पर विजय मिली थी। काँग्रेस किसी भी तरीके से पार्टियों को सत्ता में नहीं आने देना चाहती थी और इसलिए राजाजी को आगे कर अन्य दलों का समर्थन ले लिए। पहले चुनावों में डीएमके इसलिए हिस्सा नहीं ले पाई क्योंकि इसकी स्थापना सीएन अन्नादुरई ने अन्य साथियों के साथ मिलकर वर्ष 1949 में की थी और वे पेरियार की डीके (द्रविण कज़गम) से अलग हो गए क्योंकि पेरियार अपनी पार्टी को राजनीति में नहीं लाना चाहते थे वह राजनीति को प्रभावित करना चाहते थे। राजाजी के सत्ता में आने के बाद तमिलनाडु में वर्ष 1953 में गांधी जी की नई तालीम से प्रभावित होकर कुल कल्वीठिटम शिक्षा व्यवस्था लागू की जिसके अनुसार माध्यमिक स्कूलों में दो प्रकार की रेगुलर शिफ्ट होंगी। एक उन बच्चों के लिए जो केवल ‘पढ़ाई’ कर रहे हैं और दूसरे ऐसे बच्चे जिनके माता पिता परंपरागत पेशों में अभी भी है ( जैसे मछुआरे, किसान, लुहार, बढ़ई, नाई, धोबी आदि कामगार जातियाँ) जहां बच्चे अपने माता पिता के साथ काम में जुटते हैं, उनके बच्चे भी स्कूल जाएँ तो उनके लिए सायंकालीन स्कूलों की व्यवस्था की गई थी (वैसे आज की नई शिक्षा नीति भी यही कर रही है)। राजाजी ने तमिलनाडु में व्याप्त भयानक ब्राह्मणवादी व्यवस्था की ‘सुरक्षा’ हेतु ये कार्य किया ताकि दलित पिछड़ो के बच्चे मुख्यधारा में न रहे और काम करने के बाद शाम को ही अपने अपने विशेष स्कूलों में जाएँ। पेरियार ने इस बात को समझा और इसका जमकर विरोध किया। पूरे कानून को पेरियार ने एक आंदोलन में बदल दिया जिसके फलस्वरूप दो वर्षों के कार्यकाल के बाद राजगोपालचारी को त्यागपत्र देना पड़ा और फिर तमिलनाडु ने काँग्रेस पार्टी ने के. कामराज को नेतृत्व दिया। कामराज ने राजगोपालाचारी के परंपरागत शिक्षा के कानून को रद्द कर दिया। कामराज का कार्यकाल बहुत सार्थक माना जाता है वो पिछड़े वर्ग की नाडार जाति से आते थे जिनका परंपरागत कार्य ताड़ी निकालना था। के कामराज 13 अप्रैल 1954 से 2 अक्टूबर 1963 तक पद पर रहे और फिर काँग्रेस की अंदरूनी राजनीति के चलते उन्हे त्यागपत्र देना पड़ा और वो दिल्ली में काँग्रेस के अध्यक्ष बने। के कामराज के बाद काँग्रेस पार्टी तमिलनाडु में बेहद कमजोर हो गई क्योंकि तब तक अन्नादूरराई ने डीएमके को राज्य के हर कोने में पहुंचा दिया था। 6 मार्च 1967 को उन्होंने डीएम के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की और राज्य को पेरियार के रास्ते पर चलाया। 18 जुलाई 1967 को अन्नादूरई ने विधानसभा में मद्रास राज्य के नाम को तमिलनाडु रखने का विधेयक रखा जिसे सर्वसम्मति से पास कर दिया गया और फिर संसद में भी इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद 14 जनवरी 1969 को मद्रास राज्य आधिकारिक तौर तमिलनाडु राज्य बन गया। दुखद बात यह थी कि 3 फरवरी 1969 को अन्नादूरई के निधन के बाद राज्य में एक बार फिर अनिश्चितता की स्थिति आई लेकिन पेरियार के हस्तक्षेप के बाद 10 फरवरी 1969 को एम. करुणानिधि ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की और सन 1976 तक वह इस पद पर रहे। क्योंकि उन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल का विरोध किया इसलिए उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। 1972 में ही करुणानिधि के सहयोगी और डीएम के के कोषाध्यक्ष एमजी रामचंद्रन को अनेकों आरोप को चलते पार्टी से निष्काषित कर दिया गया था जिसके फलस्वरूप उन्होंने अपनी नई पार्टी गठित की जिसका नाम ऑल इंडिया अन्ना डीएमके (AIDMK) रखा। सन 1977 में AIDMK ने काँग्रेस के साथ गठबंधन किया औ भारी बहुमत से सत्ता में आई, एमजी रामचंद्रन पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बने। इस प्रकार एमजीआर 24 दिसंबर 1987 तक जब उनकी मृत्यु हुई, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने रहे। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पार्टी एआईडीएमके में अंदरूनी कलह रही और उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन को मुख्यमंत्री बना दिया गया लेकिन वह पार्टी को संभाल नहीं पाई और फिर 1991 मे हुए चुनावों में वह भारी बहुमत से चुनाव जीत कर एम. करुणानिधि मुख्यमंत्री बने। इस प्रकार तमिलनाडु की राजनीति लगातार एडीएम के और डीएमके के मध्य ही घूमती रही है लेकिन 2016 में जयललिथा के निधन के बाद एआईडीएमके पार्टी की स्थिति बेहद खराब हो गई, पार्टी के पास कोई पोपुलर नेता नहीं अब नहीं था। पार्टी पर द्रविड आंदोलन की धार को कमजोर करने के आरोप लगे क्योंकि जयललिथा स्वयं भी पूरी ब्राह्मणवादी परम्पराओ में विश्वास रखती थी नतीजा यह हुआ कि पार्टी का कोई वैचारिक आधार ही नहीं रहा और उसके पास कोई पोपुलर चेहरा भी नहीं था जिसे आगे कर लोगों को आकर्षित किया जा सके। इसके विपरीत डीएम के पार्टी पेरियार की विरासत पर बनी रही और द्रविड आंदोलन के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों पर हमेशा गौरवान्वित रही। इसलिए अगस्त 2018 में पार्टी के नेता एम करुणानिधि की मृत्यु के बाद पार्टी में ऐसा संकट नहीं आया क्योंकि इसके नेता एम के स्टालिन पार्टी की वैचारिकी की कमान संभाल लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2021 के चुनावों में डीएम के ने भारी बहुमत से विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की और फिर वर्ष 2024 के लोकसभा के चुनावों में भी पार्टी की परफॉरमेंस बहुत अच्छी थी।
एम के स्टालिन द्रवीडियन मॉडेल को लेकर बहुत उत्साहित थे और तमिलनाडु में उन्होंने जैसा कार्य किया वो किसी अन्य राज्य की तुलना में बहुत अच्छा था। लेकिन राजनीतिक तौर पर ऐसा लगता है कि उन्होंने नई पार्टी टी वी के को हल्के में लिया और शायद ये अनुमान लगाया कि यह एआईडीएमके के वोट ही काटेगी क्योंकि दोनों का ब्राहमण वोट बैंक था लेकिन उन्होंने तमिलनाडु में दलितों में हो रहे असंतोष को शायद नहीं भाँपा जिसके फलस्वरूप इतनी बड़ी हार मिली।
अभी तक जोसेफ विजय ने सत्ता संभालते ही एक नए किस्म की राजनीति की शुरुआत की है जो लगता है के सबको साथ लेकर चलने की राजनीति है। शपथ ग्रहण करते ही वह पेरियार की समाधि स्थल ‘पेरियार थिडल’ में गए और अपनी श्रद्धांजलि दी। वही पर उन्होंने पेरियार म्यूजियम में जाकर द्रविड कज़गम के नेता डाक्टर के वीरामनि से मुलाकात की और उन्हे शाल उढ़ाकर सम्मानित किया। अगले दिन विजय ने पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के घर जाकर उनसे बात की और फिर हर एक राजनैतिक दल के कार्यालय जाकर उनको धन्यवाद किया। एमडीएमके के संस्थापक वाइको के घर का तो एक विडिओ सोशल मीडिया पर वाइरल भी हुआ है। जब विजय वाइको के घर से जाने लगे तो उनके घर पर मौजूद काम करने वाली ‘हेल्प’ उनसे मिलने आई और सबने विजय की मंगल आरती उतारी और विजय ने भी वैसे ही किया। विजय द्वारा महिलाओ की भावनाओ का जो सम्मान किया गया उसकी सभी ने सराहना की।
अपनी सरकार के पहले नीतिगत फैसलों में उन्होंने स्कूलों, देवालयों आदि के पास शराब की दुकानों को बंद कर देने के आदेश दिए। युवाओ को किए अपने वादे के अनुसार उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओ में बैठने वाले छात्रों के लिए फ्री कोचिंग की सुविधा की घोषणा की।
कुछ दिनों पहले जोसेफ विजय ने अपनी पार्टी के प्रवक्ता रिकी राधन पंडित जो एक ज्योतिष भी है, को अपना ओ एस डी बनाया। तमिलनाडु की सभी पार्टियों ने इसकी कड़ी निंदा की और आज परिणाम ये निकला के विधान सभा में बहुमत प्राप्त करने के बाद ही मुख्यमंत्री ने अपने पहले आदेश में उनकी नियुक्ति को रद्द कर दिया। तमिलनाडु के सामाजिक राजनीतिक जीवन में अभी पेरियार की विचारधारा का बहुत बड़ा असर दिखाई देता है और मुख्यमंत्री के इस निर्णय से ये जाहिर होता है कि उन्मे अपनी गलतियों को स्वीकार करने की हिम्मत है जो आज के राजनीतिक परिदृश्य में बहुत ही कम है.
ये लिखे जाने तक तमिलनाडु विधानसभा में टीवीके ने विश्वास प्रस्ताव जीत लिया है। टीवीके के पास काँग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टियों, वीसीके और मुस्लिम लीग के अलावा एआईडीएम के 25 सदस्यों का समर्थन साफ तौर पर दिखाई दिया है। विश्वास प्रस्ताव पर सरकार को 144 वोट मिले जबकि 5 सदस्य ने अपने को अलग रखा। डीएमके पहले ही प्रस्ताव पर अपनी बात रख कर वाक आउट कर चुकी थी।
तमिलनाडु के चुनावों से ये बात तो साफ है कि द्रविड राजनीति या सामाजिक न्याय की राजनीति को अति पिछड़ो और दलित वर्गों तक भी पँहुचना होगा। दूसरे यह कि पेरियार तमिलनाडु की राजनीति और सामाजिक परिदृश्य के एक प्रमुख स्तम्भ बने रहेंगे और पेरियार की ऐतिहासिक परंपरा को कोई भी पार्टी यदि इग्नोर करेगी तो वह नुकसान में रहेगी। पेरियार के विषय में जो भ्रामक जानकारी देकर दलित पिछड़ो के मध्य दरार पैदा करने के प्रयास किए जाते हैं इसलिए आवश्यक है कि पेरियार के पूरे आंदोलन को समझा जाए तो इसका लाभ सभी को मिलेगा। तमिलनाडु और केरल में कम से कम अभी भी मुद्दों की राजनीति हो रही है और चाहे पक्ष हो या विपक्ष सभी सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और संविधान को सर्वोपरि मानने वाले लोग है और कम से कम निकट भविष्य में तो वहाँ लोगों के खान-पान या पूजा पद्धति को लेकर कोई मुद्दा बनाने की कोशिश करने वाले लोग या धर्म और जातीय नफरत फैलाने वाले लोग सफल नहीं पाएंगे और यही केरल और तमिलनाडु के इन चुनावों परिणामों की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

विद्या भूषण रावत
अंतर्राष्ट्रीय लेखक प्रख्यात अम्बेडकरवादी ऐक्टिविस्ट
vbrawat@gmail.com




