सामाजिक लोकतंत्र के लिए नया ‘बंगाल मॉडल’

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पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रचंड चुनावी विजय के बाद जो राजनीतिक और प्रशासनिक संकेत उभरकर सामने आए हैं, वे राज्य में राजनीति और शासन की एक नई व्याकरण के जन्म की ओर इशारा करते हैं। इन संकेतों को जोड़कर देखने पर एक विशिष्ट संरचना दिखाई देती है, जिसे ‘बंगाल मॉडल’ कहा जा सकता है। चुनाव परिणामों के तुरंत बाद प्रधानमंत्री के प्रधान आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने अपने विभिन्न साक्षात्कारों में स्पष्ट रूप से नवउदारवादी आर्थिक दृष्टिकोण का समर्थन किया। उनके अनुसार भारत की वास्तविक आर्थिक खाई उत्तर-दक्षिण के बीच नहीं, बल्कि पूर्व और पश्चिम के बीच है, और इस असमानता के केंद्र में पश्चिम बंगाल स्थित है। उनका तर्क था कि जिस आर्थिक सफलता को गुजरात ने हासिल किया, बंगाल उससे वंचित रह गया। इस प्रकार स्पष्ट संकेत मिलता है कि पश्चिम बंगाल की भावी आर्थिक दिशा के लिए ‘गुजरात मॉडल’ को आदर्श माना जा रहा है। दूसरी ओर, सार्वजनिक मुस्लिम नमाज़ पर प्रतिबंध, पशु वध के लिए कठोर नियम, तथा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को घटाकर 7 प्रतिशत करना और अधिकांश मुस्लिम समुदायों को उससे बाहर करना जैसी नीतियाँ सरकार के अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों, के प्रति दृष्टिकोण को स्पष्ट करती हैं। धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में वर्षों से चल रही गतिविधियों के साथ मिलकर ये सभी तत्व एक विशिष्ट ‘बंगाल मॉडल’ का स्वरूप ग्रहण करते दिखाई देते हैं। यह मॉडल मुख्यतः तीन आधारों पर टिका हुआ है: कट्टर नवउदारवादी अर्थनीति, उग्र जातीय-धार्मिक राष्ट्रवाद तथा अल्पसंख्यक-विरोधी राजनीति।

बंगाल के चुनावी परिवर्तन को कैसे समझें?

प्रश्न उठता है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की विजय को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाए? क्या यह केवल वही प्रवृत्ति नहीं है जो उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में पहले से दिखाई दे रही है? बंगाल की विशिष्टता उन मिथकों और आत्मभ्रमों में निहित है जिन्हें लंबे समय से विश्वविद्यालयों, मीडिया और अभिजात बौद्धिक वर्गों ने पोषित किया।तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की पराजय को सामान्यतः दो कारणों से समझाया जाता है। पहला, पंद्रह वर्षों  के शासन के बाद उत्पन्न सत्ता-विरोधी लहर, प्रशासनिक विफलताएँ और पहचान-आधारित राजनीति। दूसरा, चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताएँ, जिनमें मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने जैसे आरोप शामिल हैं। किन्तु लेखक का मत है कि बंगाल का ‘भगवाकरण’ केवल वर्तमान चुनाव की कहानी नहीं है, बल्कि एक दशक से अधिक समय से चल रही प्रक्रिया है। इसलिए इसे केवल टीएमसी की विफलताओं से नहीं समझा जा सकता।

तृणमूल कांग्रेस और वामपंथ की विरासत

तृणमूल कांग्रेस ने स्वयं को वामपंथी राजनीति के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया था। किन्तु सत्ता में आने के बाद उसके पास न तो दीर्घकालिक विकास की कोई स्पष्ट योजना थी और न ही सामाजिक न्याय को सशक्त बनाने की कोई ठोस रणनीति। कल्याणकारी योजनाओं, अनियमित आरक्षण नीतियों, विकेन्द्रीकृत संरक्षणवाद, व्यापक भ्रष्टाचार और व्यक्तित्व-केन्द्रित नेतृत्व ने लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को कमजोर किया। इसके विपरीत, वाम मोर्चा केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक वैचारिक शक्ति था। भूमि सुधार, किसानों और श्रमिकों के संगठन तथा पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से सत्ता के विकेन्द्रीकरण में उसकी भूमिका ऐतिहासिक रही है। हालांकि समय के साथ उसकी संस्थाएँ भी दलगत नियंत्रण का साधन बन गईं और औद्योगीकरण तथा आर्थिक विकास के प्रश्नों पर वह अनेक आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से जूझता रहा। सोवियत संघ के विघटन के बाद वामपंथ के भीतर भी परिवर्तन आया। बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे नेताओं ने उदारीकरण के प्रति अपेक्षाकृत व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया। लेखक के अनुसार यही परिवर्तन अंततः वामपंथ के राजनीतिक पतन का कारण बना।

जाति प्रश्न और भाजपा का उदय

लेखक का सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि बंगाल की राजनीति में जाति प्रश्न की उपेक्षा ने भाजपा के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। कांग्रेस, वामपंथ और तृणमूल—तीनों ही दलों के नेतृत्व एवं संस्थागत ढाँचे में उच्च जातीय ‘भद्रलोक’ वर्ग का वर्चस्व बना रहा। जाति को सार्वजनिक विमर्श से बाहर रखा गया, जबकि उसके लाभ लगातार अभिजात वर्ग को मिलते रहे। वाम शासन के दौरान लंबे समय तक ओबीसी आरक्षण केवल 7 प्रतिशत रहा, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 27 प्रतिशत था। तृणमूल कांग्रेस ने इसे बढ़ाया, किन्तु सामाजिक न्याय के स्पष्ट मानकों के बिना। भाजपा ने इसी असंतोष को राजनीतिक रूप दिया। उसने पिछड़ी जातियों और दलितों के बीच संगठित अभियान चलाया तथा स्वयं को उनके हितों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया। विडम्बना यह रही कि जिस राजनीतिक धारा को आलोचक सबसे अधिक ब्राह्मणवादी मानते हैं, उसी ने सबसे प्रभावी ढंग से वंचित जातीय समूहों में अपनी वैधता स्थापित कर ली।

उभरता हुआ बंगाल मॉडल

 ‘बंगाल मॉडल’ का पहला स्तंभ नवउदारवादी आर्थिक विकास है। इसमें नागरिकता, लोकतांत्रिक संस्कृति और सामाजिक न्याय की अपेक्षा बाज़ार, उत्पादकता, दक्षता और उद्यमिता को प्राथमिकता दी जाती है। गुजरात मॉडल इसका प्रेरक उदाहरण होगा। ऐसी व्यवस्था में कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा मिलता है, जबकि सामाजिक असमानताएँ और गहरी हो सकती हैं। परिणामस्वरूप भद्रलोक अभिजात वर्ग लाभान्वित होगा, जबकि मुसलमान, दलित और पिछड़ी जातियाँ अपेक्षाकृत हाशिये पर चली जाएँगी। दूसरा स्तंभ उग्र जातीय-धार्मिक राष्ट्रवाद है। बंगाल की समन्वयवादी सांस्कृतिक परम्पराएँ, दुर्गा पूजा और काली पूजा जैसे उत्सव, अब अधिक आक्रामक और राजनीतिक रूप ग्रहण कर सकते हैं। धार्मिक प्रतीकों का उपयोग सांस्कृतिक उत्सव के बजाय राजनीतिक लामबंदी और वैचारिक प्रचार के साधन के रूप में किया जा सकता है। विशेष रूप से ‘श्रीराम’ का प्रतीक, जो हाल के वर्षों में उत्तर भारतीय हिंदुत्व राजनीति का प्रमुख आधार बना है, बंगाल की सांस्कृतिक राजनीति में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। तीसरा स्तंभ अल्पसंख्यक-विरोधी राजनीति है। हर जातीय-धार्मिक परियोजना को एक ‘अन्य’ (Other) की आवश्यकता होती है, और इस भूमिका में मुसलमानों को प्रस्तुत किया जा रहा है। सार्वजनिक धार्मिक गतिविधियों पर नियंत्रण, आरक्षण नीतियों में बदलाव, सीमाई सुरक्षा और ‘पहचानो, हटाओ और निर्वासित करो’ जैसी घोषणाएँ इसी दिशा की ओर संकेत करती हैं।

आगे का रास्ता

बंगाल का दक्षिणपंथी झुकाव केवल स्थानीय घटना नहीं, बल्कि उस व्यापक संकट का हिस्सा है जो भारत और विश्व में सामाजिक लोकतंत्र की विफलताओं से उत्पन्न हुआ है। भाजपा की सफलता स्वतंत्र भारत की उदारवादी और सामाजिक-लोकतांत्रिक परियोजनाओं की कमियों का परिणाम है। भारत को केवल वर्ग-आधारित राजनीति या धार्मिक राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर जाति-आधारित असमानताओं का प्रत्यक्ष सामना करना होगा। उनके अनुसार वर्ग-क्रांति असफल रही है और दक्षिणपंथी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी स्थायी समाधान नहीं है। इसलिए आवश्यकता एक ऐसे ‘नए भारतीय वामपंथ’ की है जो केवल वर्ग प्रश्न तक सीमित न रहे, बल्कि जाति, धर्म, लिंग और अन्य सभी प्रकार के उत्पीड़नों को समान महत्व दे। पुराने नारे ‘दुनिया के मजदूरो, एक हो’ की जगह अब नया नारा होना चाहिए- ‘सभी प्रकार के उत्पीड़ितों, एक हो।’

डा. साजिद अख्तर

असिस्टेंट प्रोफेसर-जामिया हमदर्द नई दिल्ली

sazidequbalakhtar@jamiahamdard.ac.in

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