बाबू जगदेव प्रसाद : राजनैतिक हलवाही के विरूद्ध

Date:

भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे हुए जिनका राजनीतिक जीवन बहुत लंबा नहीं था, लेकिन जिनके विचार अपने समय की राजनीति से कहीं आगे तक जाते हैं। बाबू जगदेव प्रसाद ऐसे ही नेता थे। उन्हें केवल पिछड़े वर्ग के नेता, बिहार के किसी खास क्षेत्र के राजनेता या ‘नब्बे प्रतिशत’ के नारे के जनक के रूप में समझना उनके व्यक्तित्व और विचारों को सीमित कर देना होगा। वे भारतीय समाज की उस बुनियादी संरचना को बदलना चाहते थे जिसमें जन्म के आधार पर मनुष्य की सामाजिक हैसियत तय होती है और जिसमें आर्थिक शोषण के साथ सामाजिक अपमान भी जुड़ा हुआ है।

उनकी राजनीति का केंद्रीय प्रश्न था- आजादी के बाद भी यदि सत्ता, संपत्ति, जमीन, प्रशासन और सामाजिक सम्मान पर वही प्रभावशाली समूह काबिज रहे, तो आम आदमी को वास्तविक आजादी कैसे मिलेगी? इसीलिए उनके लिए संघर्ष केवल नौकरी या राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संघर्ष नहीं था। वह स्वामित्व, हक, सम्मान, मानवीय समानता, सामाजिक सत्ता और आर्थिक अधिकारों का संघर्ष था। वे कहते थे—धन, धरती और राजपाट में नब्बे भाग हमारा है।”

जगदेव प्रसाद का जन्म 2 फरवरी 1922 को तत्कालीन गया जिले के कुर्था क्षेत्र के कुरहारी गाँव में हुआ था। आज कुरहारी अरवल जिले में है। उनका जन्म ऐसे समय हुआ जब भारत के अनेक हिस्सों में किसान आंदोलनों की लहर उठ रही थी। उनके जन्म के दो दिन बाद, 4 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा की घटना हुई। पूर्वी और उत्तरी भारत में किसान असंतोष, जमींदारी शोषण और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की अनेक धाराएँ सक्रिय थीं।  जगदेव प्रसाद जब बड़े हो रहे थे, तब उनके इलाके में किसान आंदोलन की गतिविधियाँ तेज हो रही थीं। स्वामी सहजानंद सरस्वती लगभग 1927 के आसपास जहानाबाद पहुँचे और स्थानीय किसानों तथा कार्यकर्ताओं को संगठित किया। 4 मार्च 1928 को पटना में किसान सभा का विधिवत गठन हुआ। इस पूरे वातावरण ने उस इलाके की सामाजिक चेतना को प्रभावित किया।

जगदेव प्रसाद के राजनीतिक व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके किशोर जीवन की एक घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है। पड़ोसी गाँव पंडुई के जमींदार किसानों से प्रति बीघा पाँच कट्ठे जमीन पर अपने हाथियों के लिए चारा उगवाते थे। फसल तैयार होने पर जमींदार के कारिंदे उन पाँच कट्ठों की फसल जबरन काटकर ले जाते थे। यह व्यवस्था किसानों के लिए केवल आर्थिक शोषण नहीं थी; यह उनके श्रम और जमीन पर सामंती अधिकार का प्रदर्शन भी थी।  किशोर जगदेव प्रसाद ने इसका विरोध किया। उन्होंने अपने हमउम्र किशोरों को संगठित किया। जब जमींदार का महावत हाथी लेकर फसल चराने आया, तो किशोरों ने हाथी को खदेड़ दिया और महावत को चेतावनी दी कि वह फिर गाँव में आया तो उसे भी पीटा जाएगा। जमींदार ने परिस्थिति को भाँपकर पीछे हटना बेहतर समझा। यह जमींदारी व्यवस्था के विरुद्ध जगदेव प्रसाद के संघर्ष की पहली उल्लेखनीय जीत थी। उस समय वे हाई स्कूल के विद्यार्थी थे।

यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है कि जगदेव प्रसाद की राजनीति अचानक पैदा नहीं हुई थी। उसके बीज उनके जीवन के आरंभिक अनुभवों में मौजूद थे। उन्होंने बहुत कम उम्र में देख लिया था कि खेत में मेहनत कौन करता है, उत्पादन कौन करता है और अधिकार किसका रहता है। यही अनुभव आगे चलकर उनके राजनीतिक चिंतन का हिस्सा बना। 1946 में उन्होंने प्रथम श्रेणी से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। पिता उनकी सफलता पर सहभोज करना चाहते थे, लेकिन बीमारी के कारण उनका आकस्मिक निधन हो गया। पिता की मृत्यु के बाद जगदेव प्रसाद ने परंपरागत ब्रह्मभोज के स्थान पर शोकसभा और सहभोज आयोजित किया। उपलब्ध सामग्री के अनुसार उन्होंने घर की देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और तस्वीरें पिता की चिता पर रखकर जला दीं। इस कदम के कारण उन्हें परिवार के विरोध का सामना करना पड़ा।  यह घटना उनके भीतर मौजूद सामाजिक और सांस्कृतिक विद्रोह की ओर संकेत करती है। उनके लिए जाति, कर्मकांड, अंधविश्वास और सामाजिक ऊँच-नीच केवल धार्मिक विषय नहीं थे; वे मनुष्य की सामाजिक गुलामी से जुड़े प्रश्न थे।

1952 में उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.. किया। उसी वर्ष उन्होंने डिप्टी कलेक्टर की लिखित परीक्षा भी पास की, लेकिन उपलब्ध सामग्री के अनुसार साक्षात्कार में पिछड़ी जाति से होने के कारण उन्हें अपमानित किया गया। उन्होंने कुछ समय सचिवालय में नौकरी की, लेकिन वहाँ के भ्रष्टाचार से क्षुब्ध होकर इस्तीफा दे दिया।  सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। वे गया जिले के परैया क्षेत्र में गए। वहाँ उन्होंने देखा कि वंचित समुदायों के बच्चे शिक्षा से दूर हैं। स्थानीय प्रबुद्धजनों और समाजसेवियों की मदद से टेकारी महाराज की कचहरी खरीदी गई और वहाँ विद्यालय शुरू हुआ। इसका नाम अशोक उच्च विद्यालय, परैया रखा गया और जगदेव प्रसाद को विद्यालय संचालन तथा प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी दी गई। वे गाँव-गाँव घूमकर शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करते रहे।

1953 में उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के पत्र ‘जनता’ से पत्रकारिता शुरू की। बाद में अंग्रेजी पत्रिका ‘सिटिजन’ और हिंदी पत्रिका ‘उदय’ का संपादन किया। पत्रकारिता ने उन्हें केवल राजनीतिक विचार व्यक्त करने का माध्यम नहीं दिया, बल्कि समाज को देखने और उसके अंतर्विरोधों को समझने का एक व्यापक मंच भी दिया।  कुछ समय तक जगदेव प्रसाद पर डॉ. राममनोहर लोहिया का प्रभाव रहा। लोहिया की सामाजिक न्याय की राजनीति और पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी की अवधारणा से वे प्रभावित हुए। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें लगा कि केवल पिछड़ा पावे सौ में साठ का सूत्र भारतीय समाज की वास्तविक विषमता को पूरी तरह नहीं पकड़ता। उनके सामने सवाल था कि यदि समाज में शोषितों की संख्या 90 प्रतिशत है तो सत्ता और आर्थिक संसाधनों में उनका हिस्सा 60 प्रतिशत तक क्यों सीमित रहे?

उन्होंने लोहिया के पिछड़ा पावे सौ में साठ को आगे बढ़ाकर कहासौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है।

यहाँ से उनकी राजनीति में एक निर्णायक वैचारिक परिवर्तन दिखाई देता है। वे जाति के प्रश्न को वर्गसंघर्ष से जोड़ने लगे। उनके लिए भारतीय समाज को केवल आर्थिक वर्गों में बाँटकर समझना पर्याप्त नहीं था। भारत में जाति सामाजिक संबंधों, सम्मान, पेशे, जमीन और सत्ता तक पहुँच को प्रभावित करती थी। इसलिए वे मानते थे कि भारत में वर्गीय मुक्ति की लड़ाई जातिगत उत्पीड़न से टकराए बिना पूरी नहीं हो सकती।

यहीं उनकी राजनीति मार्क्स और लेनिन की ओर मुड़ती है। दस्तावेज उन्हें ‘बिहार का लेनिन’ कहता है और उनके विचारों के केंद्र में लेनिनवादी वर्ग-संघर्ष को रखता है। लेकिन जगदेव प्रसाद ने इसे यांत्रिक रूप से नहीं अपनाया। उन्होंने भारतीय सामाजिक यथार्थ के भीतर उसकी व्याख्या की।

उनका तर्क था कि भारत में वर्णवादी व्यवस्था के भीतर निम्न जातियाँ, भूमिहीन किसान, दलित, पिछड़े, आदिवासी और वंचित मुसलमान व्यापक शोषित समाज का हिस्सा हैं। इसलिए भारतीय सर्वहारा की अवधारणा को जाति के प्रश्न से अलग नहीं किया जा सकता। दस्तावेज में उनकी विचारधारा को इसी अर्थ में लेनिनवादी सिद्धांत का भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक रूप बताया गया है।

उनका एक महत्वपूर्ण कथन था-

ऊँची जाति वालों ने हमारे बापदादों से हलवाही करवायी है। मैं उनकी राजनीतिक हलवाही करने के लिए पैदा नहीं हुआ हूँ।

‘हलवाही’ उनके लिए केवल खेत में मजदूरी करने का रूपक नहीं था। यह उस राजनीतिक व्यवस्था का प्रतीक था जिसमें वंचित समाज चुनावों के समय झंडा उठाता है, नारे लगाता है, पोस्टर चिपकाता है और वोट देता है, लेकिन सत्ता के वास्तविक निर्णयों से बाहर रहता है। जगदेव प्रसाद इस राजनीतिक हलवाही को समाप्त करना चाहते थे। वे चाहते थे कि जो लोग समाज में संख्या में अधिक हैं, वे राजनीतिक सत्ता और आर्थिक संसाधनों में भी अपना वास्तविक हिस्सा प्राप्त करें।

1967 के चौथे विधानसभा चुनाव में वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में कुर्था विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए। उसी वर्ष बिहार में पहली गैर-कांग्रेसी संविद सरकार बनी, जिसमें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा, स्थापना 1965 में हुई। यह पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) और सोशलिस्ट पार्टी के विलय के बाद बनी थी। डॉ. राममनोहर लोहिया इस पार्टी के प्रमुख नेताओं में से एक थे।), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जनक्रांति दल और जनसंघ सहित विभिन्न दल शामिल थे। जगदेव प्रसाद भी इस सरकार का हिस्सा बने।  लेकिन सत्ता में पहुँचकर उन्होंने पाया कि केवल सरकार बदलने से सामाजिक सत्ता-संबंध नहीं बदलते। उन्होंने महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में पिछड़ों को अपेक्षित स्थान न मिलने की शिकायत लोहिया से की। जब उन्हें संतोषजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली तो उन्होंने अलग रास्ता चुना।  यहीं से उनका राजनीतिक जीवन अधिक आक्रामक और स्वतंत्र दिशा में बढ़ा।

25 अगस्त 1967 को उन्होंने शोषित दल की स्थापना की। दस्तावेज इसे व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बजाय वैचारिक प्रतिबद्धता का परिणाम मानता है। उसमें यह भी कहा गया है कि जगदेव प्रसाद की दृष्टि तत्काल सत्ता प्राप्त करने की नहीं, बल्कि दीर्घकालीन सामाजिक परिवर्तन की थी।

शोषित दल के माध्यम से उन्होंने दलितों, भूमिहीनों, पिछड़ों, आदिवासियों और मुसलमानों सहित व्यापक वंचित समाज को संगठित करने का प्रयास किया। 1970 के आरंभ तक वे बिहार के विभिन्न शोषित समुदायों को एकजुट करने में काफी आगे बढ़ चुके थे।

उनकी राजनीति का एक चर्चित नारा था—

“अबकी सावन-भादो में, गोरी कलइयाँ कादो में।”

इसका आशय था कि खेतों में केवल गरीब और श्रमजीवी समाज ही क्यों कीचड़ में काम करे? यदि कृषि समाज का आधार है तो सभी सामाजिक वर्गों को श्रम का अनुभव होना चाहिए। यह नारा उस समय के भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत प्रभुत्व वाले ग्रामीण समाज के लिए तीखा राजनीतिक-सांस्कृतिक संदेश था।

जगदेव प्रसाद का यह आग्रह केवल आर्थिक नहीं था। वे श्रम को सम्मान देने और श्रम-विमुख सामाजिक विशेषाधिकार को चुनौती देने की कोशिश कर रहे थे।

मार्च 1967 में ही पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में किसानों ने जमीन पर कब्जे का आंदोलन शुरू किया। नक्सलबाड़ी ने भारतीय राजनीति में किसान संघर्ष की एक नई, उग्र और क्रांतिकारी धारा को जन्म दिया। जगदेव प्रसाद इस आंदोलन से प्रभावित हुए। हालांकि वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं थे, लेकिन नक्सलबाड़ी की जमीन, किसान और वर्ग-संघर्ष की चेतना ने उनकी अपनी समाजवादी सोच को प्रभावित किया।  उनकी विशेषता यह थी कि उन्होंने नक्सलबाड़ी की वर्गीय चेतना को भारतीय जाति-व्यवस्था के प्रश्न के साथ जोड़ा। उनका मानना था कि भारत में जाति के दमन को समाप्त किए बिना वर्ग-संघर्ष अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच सकता। इसलिए उनकी समाजवादी दृष्टि में जाति-दमन मूल प्रश्न बन गया।

यहीं उनका विचार पारंपरिक वामपंथ से भी अलग दिखाई देता है। वे केवल वर्ग की बात नहीं कर रहे थे; वे पूछ रहे थे कि भारतीय समाज में वर्ग की संरचना स्वयं जाति से किस तरह निर्मित होती है। भूमिहीन किसान, खेतिहर मजदूर, दलित और पिछड़े यदि आर्थिक रूप से शोषित हैं तो उनमें से बहुतों का सामाजिक अपमान भी जाति आधारित है। इसलिए दोनों संघर्षों को एक-दूसरे से अलग करना वास्तविक भारतीय परिस्थितियों को अधूरा समझना होगा।

उनके लिए विनोबा भावे का भूदान आंदोलन पर्याप्त नहीं था। भूदान में दान की भावना थी; जगदेव प्रसाद अधिकार की राजनीति चाहते थे। वे चाहते थे कि भूमिहीन किसान को उसका हिस्सा मिले—दान के रूप में नहीं, अधिकार के रूप में।  1970 के प्रारंभ तक उनका आंदोलन बिहार के दलितों, भूमिहीनों, पिछड़ों, मुसलमानों और आदिवासियों को जोड़ने लगा था। इस व्यापक सामाजिक आधार ने उच्च जातीय प्रभुत्व वाले राजनीतिक ढाँचे को चुनौती देना शुरू किया।

इसी दौर में उनका सांस्कृतिक संघर्ष भी अधिक स्पष्ट हुआ। वे मानते थे कि सामाजिक दासता केवल जमीन और सत्ता के संबंधों से पैदा नहीं होती। धार्मिक प्रतीक, कर्मकांड, भाग्यवाद, जाति-आधारित परंपराएँ और सामाजिक श्रेष्ठता की धारणाएँ भी मनुष्य को मानसिक रूप से गुलाम बनाती हैं। इसलिए सामाजिक क्रांति के साथ सांस्कृतिक रूपांतरण आवश्यक है। यहीं जगदेव प्रसाद की विचारधारा को बुद्ध, कबीर, रैदास, ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर और बाद में अर्जक संघ की परंपरा से जोड़कर देखा जा सकता है। चार्वाक से बुद्ध, बुद्ध से कबीर और रैदास, फिर फुले और आंबेडकर तक। इस परंपरा का केंद्रीय सूत्र है कि सामाजिक बराबरी के लिए केवल आर्थिक सुधार पर्याप्त नहीं; मनुष्य की चेतना और सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं में भी परिवर्तन जरूरी है।

बुद्ध ने दुख और उसके कारण को समझकर उससे मुक्ति का रास्ता बताया। कबीर ने जाति, पाखंड और धार्मिक वर्चस्व को चुनौती दी। रैदास ने ‘बेगमपुरा’ की कल्पना की—एक ऐसे समाज की जिसमें दुःख, कर, भय और ऊँच-नीच न हो। फुले ने सत्यशोधक समाज के माध्यम से जातिगत वर्चस्व, पुरोहितवाद और सामाजिक असमानता को चुनौती दी। आंबेडकर ने जाति के उन्मूलन को सामाजिक लोकतंत्र की शर्त माना और अंततः बौद्ध धम्म को अपनाया।  इसी धारा में रामस्वरूप वर्मा का अर्जक संघ आया, 1 जून 1968 को। लखनऊ में इसकी स्‍थापना हुई।  जिसने तर्क, मानवतावाद, श्रम और सामाजिक समानता के आधार पर पुरोहितवाद, अंधविश्वास, भाग्यवाद और जाति-आधारित कर्मकांडों को चुनौती दी। उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार जगदेव प्रसाद भी अर्जक संघ की इस सांस्कृतिक चेतना से प्रभावित हुए।  लेकिन जगदेव प्रसाद का रास्ता केवल सांस्कृतिक सुधार तक सीमित नहीं था। वे सांस्कृतिक परिवर्तन को राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के परिवर्तन से जोड़ते थे। यही कारण है कि उनके लिए सामाजिक क्रांति सबसे महत्वपूर्ण थी।

उनकी राजनीति में धर्म और सांप्रदायिकता का प्रश्न भी इसी दृष्टि से आता है। 19 जनवरी 1970 को उन्होंने जनसंघ की राजनीति पर तीखी टिप्पणी की। उनका मानना था कि मुसलमानों और ईसाइयों को राजनीतिक शत्रु बनाना वास्तविक सामाजिक-आर्थिक संघर्ष से जनता का ध्यान हटाने का तरीका है। उन्होंने जनसंघ की राजनीति को ऊँची जातियों के सामाजिक वर्चस्व से जोड़कर देखा।  उनका कहना था कि भारत में शोषित समाज को धार्मिक प्रतीकों, भाग्यवाद और कर्मकांड के माध्यम से भी नियंत्रित किया गया। वे मानते थे कि यदि शोषितों को अपनी वास्तविक सामाजिक स्थिति समझनी है तो उन्हें इस मानसिक और सांस्कृतिक गुलामी से भी मुक्त होना होगा।

मुसलमानों के प्रश्न पर भी उनका दृष्टिकोण अपने समय की मुख्यधारा की राजनीति से अलग था। वे मुसलमानों को केवल धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में नहीं, बल्कि आजाद भारत की सामाजिक-सत्ता संरचना में शोषित समुदाय के हिस्से के रूप में देखते थे। उनका तर्क था कि आजादी के बाद मुसलमानों की जमीन, संपत्ति और रोजगार के अवसर घटे और उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा व्यवहार झेलना पड़ा।  उनकी दृष्टि में सांप्रदायिक राजनीति की एक चाल यह भी थी कि शोषित हिंदुओं को शोषित मुसलमानों के विरुद्ध खड़ा कर दिया जाए। इस तरह वास्तविक सामाजिक और आर्थिक सत्ता-संबंधों से ध्यान हट जाता है। वे हिंदू-मुसलमान के द्वंद्व से आगे बढ़कर उच्च जाति बनाम शोषित समाज का वर्गीय प्रश्न सामने रखना चाहते थे।  यही उनका राजनीतिक प्रयोग था—धर्म के आधार पर समाज को बाँटने के बजाय उन समुदायों को एक राजनीतिक मंच पर लाना जो आर्थिक और सामाजिक सत्ता से बाहर थे। 20 नवंबर 1970 तक शोषित दल को हिंदुस्तानी शोषित दल के नाम से भी जाना जाने लगा था।

2 अप्रैल 1970 को बिहार विधानसभा में उन्होंने सरकारी, अर्द्धसरकारी और गैर-सरकारी नौकरियों में शोषित वर्गों के लिए 90 प्रतिशत हिस्सेदारी की मांग रखी। यह उनके ‘नब्बे भाग’ के सिद्धांत का संस्थागत रूप था। उनके लिए प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक नहीं था; वह सत्ता-संरचना बदलने का साधन था।  25 अगस्त 1970 को शोषित दल की तीसरी वर्षगाँठ पर उन्होंने कहा कि दल ने ऊँची जाति के एकाधिकार को चुनौती देना और उनके जुल्म के खिलाफ मोर्चाबंदी करना शुरू कर दिया है।

1972 में जगदेव प्रसाद और रामस्वरूप वर्मा की राजनीतिक धाराएँ और निकट आईं। 7 अगस्त 1972 को शोषित दल और समाज दल के विलय से शोषित समाज दल बना। रामस्वरूप वर्मा राष्ट्रीय अध्यक्ष और जगदेव प्रसाद महामंत्री बने।  लेकिन लोहियावादी सोशलिस्ट पार्टी को साथ रखने पर जगदेव प्रसाद सहमत नहीं थे। उनका तर्क था कि यदि नेतृत्व फिर से उच्च जातियों के हाथ में रहा तो शोषितों का स्वतंत्र राजनीतिक संगठन अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकेगा। उनके लिए शोषितों की राजनीतिक स्वतंत्रता कोई समझौता करने योग्य प्रश्न नहीं था।  उनका यह रुख उन्हें तत्कालीन विपक्षी राजनीति की मुख्यधारा से अलग करता था। वे कांग्रेस के विकल्प के नाम पर किसी ऐसे गठबंधन को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे जिसमें शोषक और शोषित दोनों एक साथ खड़े हों। उनका विश्वास था कि सामाजिक क्रांति के लिए राजनीतिक संगठन का सामाजिक चरित्र भी बदलना होगा।

1974 में यह मतभेद और तीखा हुआ। इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ विभिन्न दलों के विलय से भारतीय लोकदल बना। जगदेव प्रसाद ने इसकी आलोचना की। 1 सितंबर 1974 को अपने मित्र प्रो. राम प्यारे सिंह को लिखे पत्र में उन्होंने भारतीय लोकदल के नेतृत्व में शामिल कुछ सामंती और बड़े पूंजीपति तत्वों की आलोचना की और कहा कि ऐसे लोगों के साथ बैठकर समाजवाद लाने में उनका विश्वास नहीं है। उन्होंने इसे लोहिया के सिद्धांतों से विचलन माना। अक्टूबर 1974 में भी वे शोषित समाज दल और बची हुई संसोपा की एकता को कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखते थे, लेकिन शोषक और शोषित के समझौते को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने डीएमके और दलित पैंथर के साथ राजनीतिक निकटता की संभावनाओं का भी उल्लेख किया।  यहीं एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य सामने आता है। यह पत्र उनके जीवन का अंतिम पत्र बताया गया है। उन्होंने लिखा था कि सत्याग्रह के बाद समय मिलते ही वे अपने साथी से मिलने आएँगे। यदि गिरफ्तारी नहीं हुई तो 10 सितंबर तक गया आने की बात कही थी। लेकिन वे 5 सितंबर को ही शहीद हो गए।  उनकी राजनीति 1974 में और अधिक उग्र हो चुकी थी। 23 जुलाई 1974 को भोजपुर के सहार प्रखंड मुख्यालय में उन्होंने आंदोलन को व्यापक बनाने का आह्वान किया और “सारे बिहार को सहार बना देने” की बात कही। सहार उस समय भोजपुर के किसान संघर्ष का महत्वपूर्ण केंद्र था। जगदेव प्रसाद नक्सलबाड़ी से प्रभावित भोजपुर किसान आंदोलन के समर्थक थे। उनका यह आह्वान महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सामाजिक-आर्थिक असमानता के खिलाफ संघर्ष को व्यापक बनाने से जुड़ा था।

और फिर आया 5 सितंबर 1974।

शोषित समाज दल का राज्यव्यापी सत्याग्रह चल रहा था। जगदेव प्रसाद कुर्था पहुँचे। पुलिस ने सत्याग्रहियों को रोकने का प्रयास किया। उन्होंने भाषण जारी रखा। इसी दौरान पुलिस की गोली से उनकी मृत्यु हो गई। यह उनका अंतिम सार्वजनिक संबोधन था।

उनका सबसे प्रसिद्ध अंतिम राजनीतिक उद्घोष था—

दस का शासन नब्बे परनहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है।
धनधरती और राजपाट में नब्बे भाग हमारा है।

इसी सभा में उन्होंने जाति की ऊँच-नीच वाली सामाजिक संरचना को एक कतार के रूपक से समझाया। उनके अनुसार एक ऐसी सामाजिक कतार है जिसमें ब्राह्मण क्षत्रिय को, क्षत्रिय वैश्य को और वैश्य शूद्र को दबाता है। वे इस व्यवस्था को उलटकर एक ऐसी वृत्ताकार व्यवस्था बनाना चाहते थे जिसमें किसी को दूसरे पर जन्म के आधार पर श्रेष्ठता न मिले। उन्होंने कहा कि इसके लिए सबसे पहले शोषितों की एकता जरूरी है और यह लंबी लड़ाई है।  इसके बाद पुलिस की गोली चली और जगदेव प्रसाद की मृत्यु हो गई। उनके राजनीतिक विरोधी और पड़ोसी गाँव पंडुई के स्थानीय जमींदार रामाश्रय प्रसाद सिंह पर हत्या का आरोप भी लगाया गया था।  

उनकी मृत्यु के समय उनकी उम्र केवल 52 वर्ष थी।

जगदेव प्रसाद के जीवन को यदि पीछे मुड़कर देखें तो एक अद्भुत निरंतरता दिखाई देती है। किशोर अवस्था में उन्होंने जमींदार के हाथियों के लिए किसानों से जबरन पाँच कट्ठे की फसल लेने की प्रथा का विरोध किया था। आगे चलकर उन्होंने राजनीतिक ‘हलवाही’ का विरोध किया। अंततः उन्होंने ‘धन, धरती और राजपाट में नब्बे भाग’ की मांग की। यानी उनका संघर्ष शुरुआत से अंत तक श्रम करने वाले मनुष्य के अधिकार का संघर्ष रहा।  उनके विचार में राजनीति का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं था। वे राजनीति को सामाजिक सत्ता के पुनर्वितरण का माध्यम बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि जो लोग सदियों से खेत में श्रम करते आए हैं, वे जमीन के मालिक बनें; जो समाज संख्या में बहुसंख्यक है, वह सत्ता में भी बहुसंख्यक हो; जो समुदाय शिक्षा से वंचित रहे, उसे शिक्षा मिले; जो जातियाँ सामाजिक अपमान झेलती रही हैं, उन्हें सम्मान मिले; और जो धार्मिक या सांस्कृतिक व्यवस्था उन्हें हीन समझती है, उसे चुनौती दी जाए।

इसीलिए उनके संघर्ष का आधार केवल कोई एक जाति नहीं था। दस्तावेज स्पष्ट रूप से कहता है कि उनका संघर्ष किसी स्थानीय या किसी एक जाति-विशेष के लिए नहीं, बल्कि व्यापक और समतावादी आधार पर था।  उनकी दृष्टि में शोषित समाज में भूमिहीन किसान, दलित, पिछड़े, आदिवासी और वंचित मुसलमान शामिल थे। यही कारण था कि वे ‘बहुजन’ की राजनीतिक एकता की ओर बढ़ रहे थे। उनकी राजनीति को समझने का एक महत्वपूर्ण सूत्र है—सामाजिक न्याय और सामाजिक क्रांति के बीच का अंतर।

सामाजिक न्याय का अर्थ हो सकता है कि मौजूदा व्यवस्था में वंचितों को कुछ अधिकार, कुछ प्रतिनिधित्व और कुछ अवसर मिलें। लेकिन जगदेव प्रसाद इससे आगे जाना चाहते थे। वे सत्ता-संबंधों को ही बदलना चाहते थे। उनके लिए सवाल था कि केवल शोषितों को व्यवस्था में कुछ जगह क्यों मिले; व्यवस्था की बुनियाद ही ऐसी क्यों न बदले कि शोषण की संरचना समाप्त हो? यही कारण है कि वे राजनीतिक हलवाही को नकारते थे। वे चाहते थे कि शोषित समाज दूसरों के राजनीतिक एजेंडे का श्रमिक न बने, बल्कि अपनी राजनीति स्वयं तय करे।

उनका सांस्कृतिक विद्रोह भी इसी परियोजना का हिस्सा था। उपलब्ध सामग्री में उनके द्वारा रामायण की प्रतियाँ जलाने-जलवाने और लोगों से जनेऊ तोड़ने का आह्वान करने का उल्लेख है। इसे उनके व्यापक सांस्कृतिक विद्रोह के संदर्भ में समझना चाहिए—वे उन धार्मिक प्रतीकों और कर्मकांडों को चुनौती देना चाहते थे जिन्हें वे जातिगत ऊँच-नीच को वैधता देने वाली व्यवस्था का हिस्सा मानते थे।  यहाँ उन्हें डॉ. आंबेडकर, फुले और अर्जक संघ की परंपरा से जोड़कर देखने का आधार मिलता है। लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि जगदेव प्रसाद की अपनी विशिष्टता थी। आंबेडकर का केंद्रीय आग्रह संवैधानिक लोकतंत्र, सामाजिक समानता और जाति-उन्मूलन था; फुले का जोर सत्यशोधन और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध शिक्षा-सामाजिक सुधार पर था; रामस्वरूप वर्मा का जोर तर्क और सांस्कृतिक परिवर्तन पर था। जगदेव प्रसाद ने इन प्रश्नों को राजनीतिक सत्ता, वर्ग-संघर्ष और संसाधनों के पुनर्वितरण से जोड़ दिया। इस अर्थ में वे केवल सामाजिक सुधारक नहीं थे। वे राजनीतिक क्रांतिकारी थे।

उनके सामने लेनिन का उदाहरण था, लेकिन भारत की अपनी सामाजिक संरचना भी थी। उन्होंने वर्ग-संघर्ष को जाति के प्रश्न के भीतर देखने का प्रयास किया। उनकी दृष्टि में भारत के निम्न वर्गों को केवल मजदूर के रूप में नहीं, बल्कि जातिगत अपमान और आर्थिक शोषण दोनों से मुक्त होने वाले मनुष्य के रूप में देखना जरूरी था। इसलिए उनकी राजनीति में रोटी और सम्मान, जमीन और सत्ता, प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक मुक्ति एक-दूसरे से जुड़े हुए प्रश्न बन गए। उनकी मृत्यु के बाद उनके सपने का सबसे कठिन प्रश्न सामने आया। वे स्वयं कहते थे कि पहली पीढ़ी को बलिदान देना होगा, दूसरी पीढ़ी को जेल जाना होगा और तीसरी पीढ़ी को सत्ता मिलेगी। वे स्वयं पहली पीढ़ी के बलिदान का हिस्सा बने।

लेकिन उनके बाद वैसी वैचारिक निरंतरता नहीं बन सकी जिसकी वे कल्पना कर रहे थे। दस्तावेज की आलोचनात्मक स्थापना है कि बाद की राजनीति में तत्काल राजनीतिक लाभ और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा अधिक महत्वपूर्ण होती गई और वह वैचारिक जमीन तैयार नहीं हो सकी जिस पर दूसरी पीढ़ी व्यापक संघर्ष कर सकती।

यहीं जगदेव प्रसाद की विरासत का सबसे दुखद पक्ष सामने आता है। उनका सपना केवल सत्ता पाने का नहीं था। वे जिस सत्ता की कल्पना कर रहे थे, वह एक समतामूलक समाजवादी राज्य की दिशा में जाने वाली सामाजिक क्रांति का परिणाम होना था। उनके लिए शोषितों की राजनीतिक सत्ता अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि एक नए समाज की स्थापना की दिशा में एक चरण थी।

आज, उनकी शहादत के पाँच दशक से अधिक समय बाद, उनके प्रश्न फिर प्रासंगिक दिखाई देते हैं। जमीन और कृषि संकट, बेरोजगारी, शिक्षा में असमानता, प्रशासन में प्रतिनिधित्व, सामाजिक भेदभाव, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और आर्थिक विषमता—इन सबको अलग-अलग समस्याओं की तरह देखने के बजाय जगदेव प्रसाद इन्हें सत्ता और सामाजिक संरचना के प्रश्न से जोड़ते थे। इसलिए उन्हें केवल ‘बिहार का लेनिन’ कहना भी पर्याप्त नहीं है। यह उपाधि उनके मार्क्सवादी-लेनिनवादी प्रभाव को बताती है, लेकिन उनकी मौलिकता इस बात में थी कि उन्होंने लेनिन के वर्ग-संघर्ष को भारतीय जाति-व्यवस्था की वास्तविकता से जोड़ने का प्रयास किया। उनके लिए जाति कोई ऊपरी सांस्कृतिक परत नहीं थी जिसे आर्थिक परिवर्तन के बाद अपने-आप समाप्त हो जाना था। वह आर्थिक और राजनीतिक सत्ता के पुनरुत्पादन का भी साधन थी। यही कारण है कि वे कहते थे कि पहले जाति के प्रश्न से टकराना होगा; उसके बिना वर्गीय संघर्ष को उसकी मंजिल तक नहीं पहुँचाया जा सकता।

इस दृष्टि से जगदेव प्रसाद भारतीय समाजवादी और वामपंथी चिंतन के बीच एक महत्वपूर्ण पुल दिखाई देते हैं। एक ओर वे लोहिया की सामाजिक न्याय की राजनीति से निकले, दूसरी ओर मार्क्स और लेनिन की वर्गीय दृष्टि की ओर बढ़े; एक ओर वे नक्सलबाड़ी की किसान क्रांतिकारी चेतना से प्रभावित हुए, दूसरी ओर फुले-आंबेडकर-अर्जक परंपरा के सांस्कृतिक संघर्ष से जुड़े; एक ओर वे जमीन और आर्थिक संसाधनों के पुनर्वितरण की बात करते थे, दूसरी ओर सामाजिक सम्मान और सांस्कृतिक मुक्ति को भी उतना ही जरूरी मानते थे।

उनका जीवन इसी वैचारिक संश्लेषण का उदाहरण है।

किशोर जगदेव ने जमींदार के हाथी को गाँव से खदेड़ा।

युवा जगदेव ने नौकरी और सरकारी पद को ठुकराया।

शिक्षक जगदेव ने वंचित बच्चों के लिए स्कूल खड़ा किया।

पत्रकार जगदेव ने सत्ता और समाज के अंतर्विरोधों को शब्द दिए।

राजनेता जगदेव ने ‘नब्बे भाग’ का सिद्धांत सामने रखा।

विचारक जगदेव ने जाति और वर्ग को एक साथ पढ़ा।

आंदोलनकारी जगदेव ने नक्सलबाड़ी और भोजपुर किसान संघर्षों के साथ संवाद बनाया।

और अंततः शहीद जगदेव ने अपनी जान देकर उस संघर्ष को एक प्रतीकात्मक ऊँचाई दी जिसे उन्होंने किशोरावस्था में ही शुरू कर दिया था। उनकी मृत्यु किसी एक व्यक्ति की हत्या भर नहीं थी। वह उस राजनीतिक संघर्ष का निर्णायक क्षण थी जिसमें वे यह स्थापित करना चाहते थे कि लोकतंत्र केवल वोट देने का अधिकार नहीं है; लोकतंत्र का अर्थ सामाजिक और आर्थिक सत्ता में वास्तविक भागीदारी भी है।

उनकी राजनीति का मूल प्रश्न आज भी सामने खड़ा है—

यदि समाज के नब्बे प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में शोषित हैं, तो सत्ता, संपत्ति और निर्णय लेने की शक्ति पर अधिकार कुछ लोगों का ही क्यों रहे? और उनका उत्तर आज भी उतना ही स्पष्ट है—

सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है।

जगदेव प्रसाद की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने शोषित समाज को केवल पीड़ित के रूप में देखने से इनकार किया। उन्होंने उसे इतिहास का निर्माता और सत्ता का दावेदार माना। इसीलिए उन्हें केवल पिछड़ों के नेता के रूप में सीमित करना उनके साथ न्याय नहीं होगा। वे भारतीय सामाजिक क्रांति की उस धारा के नेता थे जो मनुष्य की बराबरी को केवल कानून में नहीं, बल्कि जमीन, धन, सत्ता, सम्मान, संस्कृति और सामाजिक संबंधों में देखना चाहती थी। उनका सपना अधूरा रह गया। लेकिन अधूरा सपना भी इतिहास में महत्वपूर्ण होता है—यदि वह आने वाली पीढ़ियों के सामने ऐसा प्रश्न छोड़ जाए जिसे वे टाल न सकें। जगदेव प्रसाद ने वही प्रश्न छोड़ा है।

धन किसका?
धरती किसकी?
राजपाट किसका?
और सबसे बढ़कर—सम्मान किसका?

उनका उत्तर था—जिस समाज के नब्बे प्रतिशत लोग श्रम करते हैं, अधिकार भी उनका नब्बे प्रतिशत होना चाहिए।

और शायद यही कारण है कि जब भी भारतीय समाज में सामाजिक असमानता, जातिगत वर्चस्व, भूमिहीनता, प्रतिनिधित्व और सत्ता के लोकतंत्रीकरण के प्रश्न फिर उठते हैं, बाबू जगदेव प्रसाद की आवाज फिर सुनाई देती है।

“दस का शासन नब्बे पर—नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।”

(यह लेख लखनऊ में ३० अगस्त को आयोजित मेमोरियल लेक्चर ‘ मुख्यधारा के महानायक- जगदेव बाबू’ पर लेखक द्वारा दिए गए व्याख्यान पर आधारित है।)

Public Intellectual, Columnist, Historian
Subhash Chandra Kushwaha
Subhash Chandra Kushwaha
Public Intellectual and Historian

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

पढ़ते-पढ़ते: मनोज पटेल

1- जैक एग्युरो -युद्ध का चेहरा (सोनेट) युद्ध का चेहरा...

The President’s Cake : इराकी सिनेमा का नायाब तोहफा

इराकी फिल्मकार हसन हादी ने अपनी फिल्म द प्रेसिडेंट’स...

साहित्य, स्मृति और इतिहास की सातवीं दृष्टि

इतिहास और साहित्य के संबंध पर विचार करते हुए...

मेरी माँ मेरी गैंग्स्टर या कुछ और

एक ऐसी अनोखी किताब जिसका अगला पाठ पिछले पाठ...