चुनावी राजनीति में दलित नायक-नायिकाएँ और उनसे जुड़े आख्यान इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वे केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं होते, बल्कि दलित समुदाय की सामूहिक स्मृति, पहचान, अस्मिता, सम्मान और राजनीतिक चेतना के प्रतीक बन जाते हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में विभिन्न राजनीतिक दल इन प्रतीकों और आख्यानों के माध्यम से दलित मतदाताओं से जुड़ने, उनकी भावनाओं को संबोधित करने और राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। दलित नायक-नायिकाएँ समुदाय के गौरवशाली अतीत और संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके जीवन से जुड़े आख्यान दलित समाज में आत्मसम्मान और सामूहिक पहचान को मजबूत करते हैं। चुनावी राजनीति में यह पहचान राजनीतिक लामबंदी का आधार बनती है। राजनीतिक दल दलित नायकों की जयंती मनाकर, स्मारक बनवाकर, मूर्तियाँ स्थापित कराकर या उनके नाम पर योजनाएँ चलाकर दलित समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार नायक-नायिकाएँ प्रतीकात्मक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती हैं। दलित नायकों के संघर्ष और प्रतिरोध की कहानियाँ समुदाय को संगठित करने का कार्य करती हैं। ये आख्यान सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों की माँग को वैधता प्रदान करते हैं तथा राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देते हैं। मुख्यधारा के इतिहास में उपेक्षित रहे दलित नायक-नायिकाओं को पुनः स्थापित करके दलित समुदाय अपना वैकल्पिक इतिहास निर्मित करता है। चुनावी राजनीति में यह इतिहास सामाजिक वर्चस्व को चुनौती देने और नए राजनीतिक विमर्श स्थापित करने का माध्यम बनता है।
दलित समुदाय भारत का एक महत्त्वपूर्ण मतदाता समूह है। इसलिए राजनीतिक दल दलित नायकों और उनके आख्यानों को अपनाकर दलित मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। यह चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर, ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, तथा स्थानीय स्तर पर प्रचलित दलित वीर-नायकों के आख्यान सामाजिक न्याय, शिक्षा, समानता और अधिकारों की राजनीति को वैचारिक आधार प्रदान करते हैं। कई क्षेत्रों में स्थानीय दलित नायक, जैसे वीरा पासी, महाराजा बिजली पासी, लाखन पासी, सातन पासी, डल पासी, छीता पासी, चेतराम जाटव, बल्लू मेहतर, मातादीन भंगी, वीरांगना ऊदादेवी पासी, अवंतीबाई लोधी, वीरांगना झलकारीबाई कोरी, महाबीरी देवी वाल्मीकि, मंगू मेहतर, बांके चमार, बुद्धु भगत, रामपति चमार आदि नायक-नायिकाएं समुदाय विशेष की राजनीतिक पहचान के केंद्र बन जाते हैं। उनके सम्मान और स्मृति के प्रश्न चुनावी मुद्दों में परिवर्तित हो सकते हैं। समाजशास्त्री और इतिहासकार यह मानते हैं कि दलित नायकों से जुड़े आख्यान केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि वे वर्तमान में शक्ति, प्रतिनिधित्व और संसाधनों के लिए चल रहे संघर्ष का हिस्सा हैं। ये आख्यान दलित समुदाय को यह विश्वास दिलाते हैं कि वे इतिहास के केवल पीड़ित नहीं, बल्कि परिवर्तन के सक्रिय निर्माता भी रहे हैं। चुनावी राजनीति में दलित नायक-नायिकाएँ और उनसे जुड़े आख्यान इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वे पहचान, अस्मिता, राजनीतिक चेतना, सामाजिक न्याय और वोट-आधारित चुनावी लामबंदी के शक्तिशाली माध्यम हैं। इनके माध्यम से दलित समुदाय अपने इतिहास का पुनर्निर्माण करता है और लोकतांत्रिक राजनीति में अपनी भागीदारी तथा प्रतिनिधित्व को सशक्त बनाता है।
दलित आंदोलन की चेतना में आयी शून्यता को बयां करता उत्तर प्रदेश-
दलित आंदोलन और सामाजिक न्याय कि राजनीति को शुरू से ही उच्च जातीय समर्थक भाजपा और कांग्रेस द्वारा चुनौती मिलती रही है। नब्बे के दशक में चाहे वह पिछड़ी जातियों के आरक्षण लिए लंबे अरसे से लंबित मण्डल कमीशन की सिफ़ारिशों को लागू करने की बात हो या उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़ी जातियों के आरक्षण को लागू करने की बात हो। भाजपा और कांग्रेस ने इन मामलों में विरोध का ही पक्ष लिया है। भाजपा और कांग्रेस द्वारा इस विरोध का कारण उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि रही है। इसके उलट सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले समूह और राजनीतिक दलों की वैचारिक अस्पष्टता अक्सर ही देखने को मिल जाती है। मुझे ठीक से याद है कि उत्तर प्रदेश में 2019 लोकसभा चुनावों से पूर्व जब सपा व बसपा का गठबंधन हुआ, वह गठबंधन केवल चुनावी गठबंधन बन कर रह गया। वह वैचारिक तौर पर जमीन पर नहीं आ सका। क्योंकि उस गठबंधन के बाद आम दलित, पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में वैचारिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक तौर पर चर्चा नहीं हुई और यहाँ तक इसको स्वार्थ का भी गठबंधन कहा गया और यह गठबंधन प्रमुख रूप से दो जातियों का बन कर रह गया। बाद में जब गठबंधन टूटा, तब लोगों को मालूम पड़ा कि वास्तव में इसमें कितना वैचारिक खोखलापन था। दलित आंदोलन के ठहराव व बिखराव का प्रमुख कारण यह है कि यूपी में अनुसूचित जाति वर्ग में जाटव, चमार व ओबीसी वर्ग में यादव समझते हैं कि सामाजिक न्याय के आंदोलन के हितों की रक्षा अकेले सिर्फ वही कर रहे हैं। उनके वर्ग की अन्य जातियों जैसे अनुसूचित जाति वर्ग में पासी, कोरी, धोबी, खटिक, वाल्मीकि आदि व अन्य पिछड़ा वर्ग में कुर्मी, कहार, महार, निषाद, लोधी, मौर्य, शाक्य, सैनी, कुशवाहा, गड़रिया जैसी जातियों को संदेह की नजर से देखा जाता है। इन जातीय समूहों से समुचित संवाद नहीं हो रहा है, जिसका पूरा फायदा गैर सामाजिक न्याय के आधार वाली पार्टियों को हो रहा है। ऐसे ही बनी परिस्थिति से दलित आंदोलन बिखर कर रह गया है। सत्ता के जिम्मेदारों को अब आरक्षित वर्ग के हितों को प्रभावित करने वाले फैसलों को करते समय कोई डर नहीं लग रहा है। उनके चुनावी परिणाम नहीं गड़बड़ा रहे हैं। उनकी सरकारें तो बिल्कुल भी खतरे में नहीं दिखती हैं।
राजनीतिक बिखराव : वैचारिक स्पष्टता का अभाव-
इस तरह दलित और सामाजिक न्याय आंदोलन की रिक्तता और दलितों के बुनियादी सवालों से दूर हो जाने के कारण जिस प्रकार से एक समय में महाराष्ट्र में ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ के बीच से अनेक रिपब्लिकनों का उभार हुआ और रिपब्लिकन कई टुकड़ों में बट गये। उसी तरह से यही स्थिति लगभग आज उत्तर प्रदेश में होती जा रही है। क्योंकि सामाजिक न्याय व दलित-पिछड़ी जातियों के आंदोलन से निकले नेताओं का नया ठिकाना भाजपा व कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी बना है। इनमें मुख्य रूप से कांग्रेस में जाने वाले डॉ. उदित राज, पी. एल. पुनिया, आर. के. चौधरी, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, राजराम पाल, ब्रजलाल खाबरी, अशोक दोहरे, राकेश सचान, सुशील पासी, पूर्व आईआरएस प्रीता हरीत है एवं भाजपा में जाने वाले कौशल किशोर, दीनानाथ भास्कर, स्वामी प्रसाद मौर्य (अब उन्होंने अपनी स्वतन्त्र पार्टी बना ली है), लालजी निर्मल, रीना चौधरी, जुगुल किशोर, डॉ.यशवंत सिंह, भगवती प्रसाद सागर, डॉ.संजय निषाद (निषाद पार्टी), आर.के. पटेल, अशोक रावत, जयप्रकाश रावत आदि नाम प्रमुख है। इनमें से कुछ ने तो अपनी स्वतंत्र राजनीति कि राह को अपनाते हुये अपनी नई राजनीतिक पार्टी या संगठनों का गठन किया है। इस क्रम में बसपा के पूर्व दिग्गज नेता राज बहादुर (कांग्रेस), ओमप्रकाश राजभर (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी), बाबू सिंह कुशवाहा (जन अधिकार मंच), सावित्री बाई फूले (कांशीराम बहुजन समाज पार्टी), दद्दू प्रसाद (सामाजिक परिवर्तन मंच), लालमणी प्रसाद (बहुजन सेवा पार्टी), पूर्व आईएएस राम बहादुर (नागरिक एकता पार्टी), लाखन राज पासी (भारतीय क्रांति रक्षक पार्टी), पूर्व आईपीएस एस.आर.दारापुरी (आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट), जगजीवन प्रसाद (भारतीय संगठित पार्टी), पूर्व आईएएस चंद्रपाल और पूर्व आईएएस हरिश्चंद्र ने राजनीतिक दलों का गठन किया है। जबकि चंद्रशेखर आजाद (भीम आर्मी), भवन नाथ पासवान (डॉ.अंबेडकर राष्ट्रीय एकता मंच), चौधरी लौटन राम निषाद (राष्ट्रीय निषाद संघ), गंगाराम अंबेडकर (मिशन सुरक्षा परिषद), गुरुदयाल यादव (प्रबुद्ध यादव संगम), अवधेश वर्मा (आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति), रामचन्द्र पटेल (छात्रपति साहू जी महाराज स्मृति मंच), कमल किशोर कठेरिया (राष्ट्रीय बहुजन सामाजिक परिसंघ), एस.पी. नन्द, पी.सी. कुरील (राष्ट्रीय भागीदारी आन्दोलन), गोपाल निषाद (फूलन सेना), अमरदीप सिंह (प्रबुद्ध भारत), राम हृदय राम (संत शिरोमणि रविदास महासभा), एच.एल. दुसाध (बहुजन डाइवर्सिटी मिशन), राजेश्वरी देवी (पासी जागृति मण्डल), विजय कनौजिया (गाडगे अंबेडकर महासभा), राम सजीवन निर्मल (संत गाडगे समिति), डॉ. खेमकरन (भारतीय समन्वय संगठन-लक्ष्य), वी.के. रावत (दलित शोषण मुक्ति मंच), डी.के. आनंद (पदम), लक्ष्मी प्रसाद रावत (अखिल भारतीय पासी महासंघ), राम कुमार (डायनेमिक एक्शन ग्रुप), धनीराम पैंथर (भारतीय दलित पैंथर), अनोद रावत (राष्ट्रीय कल्याण मंच), आर.ए. प्रसाद (अखिल भारतीय पासी समाज), पुष्पा बाल्मीकी (स्वच्क्षकार मंच), बब्बन रावत (महादलित परिसंघ), आदि लोगों द्वारा सामाजिक संगठनों का गठन किया गया है। इसी तरह से उत्तर प्रदेश में दलितों व पिछड़ी जातियों के बीच में काम कर रहे सामाजिक न्याय आंदोलन की पृष्ठभूमि वाले जातीय समूहों में बिखराव इतना अधिक बढ़ गया है कि हर दलित जाति के अपने संगठन हैं या संगठन बनने की प्रक्रिया में है। इन सबका नेतृत्व उन लोगों के हाथ में है जो या तो किसी सरकारी नौकरी में है या किसी राजनीतिक पार्टी में नेतृत्व कर चुके है। वर्ष 2007 के बाद बनी बसपा व सपा की सरकारें जो क्रमशः दलित वर्ग व पिछड़े वर्ग की आधार की मानी जाती हैं, उन्होंने भी अपने जातीय समर्थन समूहों को निराश ही किया है।

डॉ. अजय कुमार
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अससिस्टेंट प्रोफेसर-समाजशास्त्र विभाग, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ




