बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 : कुछ चिंतन

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भारत लोकतंत्र के इतिहास में एक अनूठा उदाहरण है, जहाँ लोगों को नागरिक बनने से पहले मतदाता बना दिया गया। विभाजन की भयावहता, निरक्षरता, लैंगिक असमानता और गहरी गरीबी के संदर्भ में यह कोई आसान कार्य नहीं था। 1951 के पहले भारतीय चुनाव से बहुत पहले ही नौकरशाहों के एक समूह ने चुनावी लोकतंत्र की प्रक्रियाओं की स्थापना शुरू कर दी थी।जबकि आजादी के 75 साल बाद स्थिति विपरीत  होती प्रतीत हो रही । हाल ही में पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है, भारत की विविधता और एकरूपक भारतीय मानक की प्रतिस्पर्धा व्यापक और भयावह दिशा में अग्रसर होती नजर आ रही है। यह केंद्र से विपरीत राज्य में सरकार के खिलाफ एक युद्धभूमि जैसा प्रतीत होता है । वर्ष  2026 के विधानसभा चुनावों के बाद यह प्रश्न फिर से उठ खडा  हुआ है कि क्या भारत में लोकतंत्र वास्तव में सहभागी है या यह धीरे-धीरे एक दांव-पेंच  वाले राजनीतिक खेल में बदलता जा रहा है। बंगाल की पुनर्कल्पना 4 मौतों और पूरे पश्चिम बंगाल में 200 से अधिक एफआईआर के साथ शुरू हुई। यह स्थिति 2021 के चुनावी हिंसा से अलग नहीं है, जब टीएमसी की जीत के बाद हिंसा हुई थी।  लंबे समय से राजनीतिक हिंसा पश्चिम बंगाल की राजनीति की एक विशेषता रही है। दुर्भाग्यवश, चुनावी हिंसा राज्य की राजनीतिक संस्कृति में गहराई से समाहित है, चाहे सत्ता में कोई भी दल हो। इसका कारण विजयी विचारधारा के प्रति प्रतिरोध या चुनाव में विजेता द्वारा एकरूपीकरण का प्रयास हो सकता है। वर्ष 2026 में भाजपा को 45.84 प्रतिशत वोट शेयर मिला और टीएमसी को 40.8 प्रतिशत। 5.04 प्रतिशत वोट का अंतर भाजपा को पश्चिम बंगाल पर शासन करने की वैधता देता है। क्या यह सहभागिता का प्रश्न है या केवल एक खेल?

Source: https://results.eci.gov.in/ResultAcGenMay2026/partywiseresult-S25.htm

यह मात्र संयोग है कि हाल ही में  गार्डियन न्यूजपेपर में पॉली टॉयनबी का एक लेख प्रकाशित हुआ जिसने यूनाइटेड किंगडम के संदर्भ में लोकतंत्र और सहभागिता पर यही मूल प्रश्न उठाया। क्या चुनाव वास्तव में सार्थक सहभागिता सुनिश्चित करते हैं। चिंता इस बात की नहीं है कि कौन जीतता है, बल्कि इस बात की है कि वास्तव में किसका प्रतिनिधित्व होता है। वर्तमान में ये  एक गहरे  लोकतांत्रिक प्रश्न उठाते हैं: क्या केवल चुनावी विजय ही सार्थक प्रतिनिधित्व की गारंटी देती है? बंगाल एक ऐतिहासिक परिवर्तन से गुजर रहा है जिसमें बंगाली पहचान की राजनीति,  मध्यमवर्गीय आकांक्षाएँ, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संस्थागत पुनर्गठन शामिल हैं। एक प्रमुख विषय बंगाल की पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था का पतन या कमजोर होना और एक नए वैचारिक परिदृश्य का उभरना है। अब बंगाल की राजनीतिक संस्कृति निम्नलिखित तत्वों से संचालित नहीं रही है: धर्मनिरपेक्ष-वाम परंपराएँ, बौद्धिक विश्वनागरिकता, भाषाई क्षेत्रवाद। इसके स्थान पर अब निम्नलिखित तत्वों की बढ़ती दृश्यता है: भारतीय जनता पार्टी का  हिंदू प्रतीकवाद, धार्मिक आग्रह, अखिल-भारतीय राष्ट्रवाद। क्या मध्यम वर्ग की निराशा ने सत्ता-विरोधी भावना को तेज किया, या आकांक्षी राजनीति ने पारंपरिक वैचारिक और सांस्कृतिक  प्रतिबद्धताओं को पीछे छोड़ दिया?

 क्या चुनाव गरीब आदमी का खेल नहीं हैं

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 भारत निर्वाचन आयोग को ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव कराने का अधिकार देता है। ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव का पहला भाग ‘स्वतंत्र’ है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह वास्तव में स्वतंत्र है?  आजादी के 75 साल बाद भी चुनाव लड़ना गरीब आदमी का खेल नहीं है; यह सामान्य नागरिक के लिए बनाया ही नहीं गया है। यह एक खेल है क्योंकि इसमें विजेता और पराजित होते हैं। गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों को अब केवल इस खेल के विज्ञापन और प्रतीकात्मक उद्देश्य के लिए चुना जाता है (उदा. रेखा पात्रा, रत्ना देबनाथ, कलिता मांझी)। यद्यपि नामांकन शुल्क नाममात्र का रहता है, लेकिन विधानसभा चुनावों के लिए व्यय सीमा ₹40 लाख तक पहुँचती है। एक ऐसी राशि जो भारत के लगभग 85% लोगों की पहुँच से बाहर है। प्रश्न उठता है कि यह सीमा 40 लाख ही क्यों है, एक या दो लाख क्यों नहीं। प्रथम दृष्टया यह स्वतंत्र नहीं है।लोकतांत्रिक सहभागिता के लिए इतनी विशाल वित्तीय क्षमता की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए? इस ढाँचे में हाशिए के समुदाय राजनीतिक शक्ति में समान भागीदारों के बजाय चुनावी अभियानों में प्रतीक के रूप में अधिक दिखाई देते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया औपचारिक रूप से खुली है, पर संरचनात्मक रूप से असमान बनी हुई है। व्यवहार में चुनावी राजनीति अब अधिकतर धनी उम्मीदवारों, आर्थिक रूप से शक्तिशाली दलों और कॉरपोरेट या संस्थागत नेटवर्क द्वारा समर्थित लोगों के पक्ष में झुकती जा रही है। चुनाव प्रक्रिया का दूसरा भाग ‘निष्पक्ष’ भी प्रश्नों के घेरे में है। उतना ही चिंताजनक सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति बढ़ता अविश्वास है। लगभग हर प्रमुख राजनीतिक दल चुनावी और प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाता है। लोकतंत्र में सार्वजनिक संस्थाओं को केवल निष्पक्ष कार्य ही नहीं करना चाहिए, बल्कि अपनी निष्पक्षता पर जनविश्वास भी उत्पन्न करना चाहिए। जब सार्वजनिक विश्वास कमजोर पड़ता है, तब लोकतांत्रिक वैधता स्वयं संकट में आ जाती है। यदि अधिकांश राजनीतिक दल प्रक्रियात्मक निष्पक्षता पर भरोसे की कमी महसूस करते हैं, तो सार्वजनिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे विश्वास और भरोसा सुनिश्चित करें, न कि सत्ता में बैठी पार्टी की धुन पर नाचें।

भाजपा का चुनावी तंत्र

बंगाल फतह करने के लिये नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा वर्ष 2016 से लगातार प्रयासरत रही है। पश्चिम बंगाल में भारी बहुमत से जीत हासिल करने में उसे 10 वर्ष लगे।  बंगाल में भाजपा द्वारा 10 वर्षों का निवेश 2026 विधानसभा चुनाव में 207 सीटों के रूप में फलित हुआ। भाजपा का उदय अचानक नहीं था। एक दशक के निरंतर राजनीतिक निवेश ने अंततः चुनावी सफलता दिलाई। प्रचार, तकनीक और धन भाजपा की विजय के प्रमुख तत्व रहे हैं । जैसे सौंदर्य प्रसाधन बेचने के लिए कंपनियाँ सौंदर्य को लेकर असुरक्षा की भावना पैदा करती हैं, उसी प्रकार भाजपा ने विकास के नाम पर भय और असुरक्षा की भावना पैदा कर हिंदू वोट बैंक को ध्रुवीकृत और संगठित किया। आज की राजनीतिक संचार प्रणाली कई बार व्यावसायिक विज्ञापन जैसी प्रतीत होती है: पहले असुरक्षा पैदा की जाती है और बाद में समाधान बेचा जाता है।

नीचे द टेलीग्राफ कोलकाता संस्करण में 4 मई 2026 से 11 मई 2026 (6 मई 2026 को छोड़कर) तक बंगाल चुनाव और चुनाव परिणामों से संबंधित प्रकाशित समाचार लेखों का विवरण दिया गया है।

लेख का शीर्षक और तिथिलेखकविषय
Profound Shift  7 मई 2026स्वपन दासगुप्ताभाजपा की चुनावी जीत को संरचनात्मक राजनीतिक परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत किया गया। भाजपा का उदय केवल चुनावी विजय नहीं बल्कि एक सभ्यतागत और वैचारिक बदलाव के रूप में चित्रित है। लेख के अनुसार बंगाल के मतदाताओं ने एक वैकल्पिक विकासवादी आख्यान की तलाश की। यह संकेत देता है कि भाजपा ने आर्थिक गतिशीलता चाहने वाले आकांक्षी मतदाताओं से सफलतापूर्वक संपर्क स्थापित किया।
Ways of Seeing  8 मई 2026यामिनी अय्यरस्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को नौकरशाही निगरानी, एल्गोरिथ्मिक बहिष्करण और व्यवस्थित “अन्यीकरण” के रूप में वर्णित किया गया। नागरिकों को बार-बार अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए मजबूर किया गया। दस्तावेजी त्रुटियों के कारण मताधिकार से वंचित होने की स्थिति उत्पन्न हुई। इसका असमान प्रभाव गरीबों और अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ा।
Subtle Signs       9 मई 2026सुनंदा के. दत्ता-रेतृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पतन को शासन-थकान, भ्रष्टाचार, डराने-धमकाने और मध्यम वर्गीय आकांक्षाओं को संबोधित करने में विफलता से जोड़ा गया। “भारत माता”, भगवा प्रतीक और भक्ति-आधारित प्रतीकों के संदर्भ गहरे राजनीतिक परिवर्तन के संकेत माने गए।
The Artha Shastra             10 मई 2026अमीशबंगाल की सांस्कृतिक समृद्धि और आर्थिक गिरावट के बीच विरोधाभास। तर्क दिया गया कि केवल संस्कृति समृद्धि को बनाए नहीं रख सकती। बौद्धिकता और उद्यमिता के बीच सामंजस्य की आवश्यकता पर बल दिया गया।
Triple Exit 11 मई 2026जयंता सेनगुप्ताक्षेत्रीय राजनीतिक नेताओं और क्षेत्रवाद का पतन। केंद्रीकृत राष्ट्रीय राजनीति का उदय। क्षेत्रीय राजनीतिक मॉडल को अधिक केंद्रीकृत राष्ट्रीय राजनीतिक संरचना में अप्रासंगिक होते हुए दिखाया गया।
A Glaring Gap   4 मई 2026सुकांत चौधुरीमतदाताओं के बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित होने पर बल। उन्होंने लिखा कि “लगभग 27.16 लाख लोगों को तुच्छ आधारों पर मताधिकार से वंचित किया गया”, जिसे उन्होंने व्यवस्था में “एक विशाल छेद” कहा। उनका तर्क था कि यह संख्या “चुनाव परिणाम पलटने के लिए पर्याप्त” है। उन्होंने बंगालियों को “घुसपैठिया” कहे जाने के विरुद्ध भी अप्रत्यक्ष चेतावनी दी।
How the Final Frontier Was Won 5 मई 2026कंचन गुप्ताभाजपा की जीत को व्यापक भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट से जोड़ा। उन्होंने कहा कि नौकरियों की कमी के कारण युवा बंगाली राज्य छोड़ रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति उलटी पड़ी। बांग्लादेश की घटनाओं को हिंदू असंतोष और हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण से जोड़ा गया। भाजपा की जीत को “नए बंगाल” और “दूसरे पुनर्जागरण” की शुरुआत के रूप में प्रस्तुत किया गया।
How the Final Frontier Was Won 5 मई 2026जवाहर सरकारभ्रष्टाचार और बेरोज़गारी को ममता बनर्जी के पतन के दो प्रमुख कारण बताया। उन्होंने विशेष मतदाता सूची संशोधन (SIR) को कुछ मतदाताओं के पक्ष में और दूसरों को हटाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि लोग उद्योग, रोजगार और केंद्र के साथ कार्यशील संबंध देखना चाहते हैं।

लेखकों ने कई बार अपनी राय को तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया है। गुप्ता ने इसे “सरल सत्य” कहा कि  “हिंदी-हिंदू” यूपी-बिहार के लोगों ने टीएमसी को वोट नहीं देगा। जवाहरसरकार ने कहा कि अब भाजपा की हिंदू छवि पर चर्चा करना “निरर्थक” है। टीएमसी को भ्रष्ट, सांप्रदायिक और अप्रभावी बताया गया, जबकि भाजपा को सुधारात्मक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रत्येक लेख में मतदाता असंतोष को वैचारिक विभाजन के बजाय रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे संरचनात्मक मुद्दों से जोड़ा गया। ऐसा विश्लेषण  एक साझा आख्यान का संकेत देती है कि पराजय अपरिहार्य थी और ज़मीनी वास्तविकताओं से उचित ठहराई गई। ये सभी संकेत क्षेत्रीय अस्मिता  की राजनीति से विकास और भारतीय जनता पार्टी के हिंदू राष्ट्रवाद पर केंद्रित राष्ट्रीय वैचारिक राजनीति की ओर संक्रमण को दर्शाते हैं। बंगाली हिंदुओं द्वारा पूर्व वैचारिक प्रतिरोध के बावजूद भाजपा को अपनाने पर चर्चा की गई। धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं को नज़रअंदाज़ करने वाले अभिजात बौद्धिक वर्गों की आलोचना की गई। बंगाल की विशिष्टता के कमजोर होने और व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक आख्यानों में उसके समावेश का उल्लेख किया गया। आर्थिक ठहराव और पलायन को राजनीतिक असंतोष के प्रमुख कारणों के रूप में बार-बार उद्धृत किया गया। बंगाल से बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहरों की ओर मध्यम वर्ग का पलायन, औद्योगिक विकास और रोजगार की कमी पर निराशा, तथा निवेश-आधारित शासन की इच्छा को राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। मतदाता अब वैचारिक निष्ठा की तुलना में विकास को अधिक महत्व देने लगे हैं।

महान शत्रु

सामूहिक पहचान समावेशन और बहिष्करण की प्रक्रियाओं से बनती है, जहाँ “हम” की रचना “वे” के विरोध में की जाती है। इसलिए शत्रु कोई पूर्व-निर्धारित विरोधी नहीं, बल्कि सीमाएँ निर्मित करने वाली प्रक्रियाओं का परिणाम है जो भिन्नता के माध्यम से समूह पहचान को स्थिर करती हैं। राजनीति तब शुरू होती है जब संबंधात्मक भिन्नता संरचित विरोध में बदल जाती है। शत्रु केवल “तुम” या “वे” नहीं हैं; शत्रु “मैं” और “हम” के बीच का विभाजन है। जब पहचान टूटती है, तब हम एक-दूसरे के लिए अजनबी बन जाते हैं। “मैं”, “तुम”, “हम” और “वे” के बीच की रेखा ही शत्रु का निर्माण करती है। एक बार जब हम स्वयं को विरोधी सर्वनामों में बाँट देते हैं, संघर्ष शुरू हो जाता है। शत्रु हमेशा बाहरी नहीं होता; कई बार वह हमारे भीतर होता है। “मैं”, “तुम” और “हम” के बीच की सीमाएँ अक्सर केवल धारणा द्वारा निर्मित भ्रम होती हैं। हम उन्हें शत्रु कहते हैं, पर वास्तव में “मैं” और “हम” का विभाजन ही हमें अलग करता है।

क्या हम एक आदर्श उदाहरण बन सकते हैं?

भारतीयों को संकीर्ण चुनावी प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर लोकतांत्रिक सहभागिता पर पुनर्विचार करना होगा। और भी मूलभूत स्तर पर भारत की प्रथम-पास-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली पर नए सिरे से बहस की आवश्यकता है। बंगाल का राजनीतिक परिवर्तन केवल सरकार परिवर्तन से अधिक हो सकता है। यह आधुनिक लोकतंत्रों के सामने खड़े एक गहरे राष्ट्रीय प्रश्न को दर्शाता है: क्या केवल चुनाव लोकतांत्रिक वैधता बनाए रख सकते हैं, या सहभागिता, समानता और संस्थागत विश्वास भी लोकतांत्रिक परियोजना के केंद्रीय तत्व बनने चाहिए? इसलिए बंगाल पर बहस केवल एक राज्य चुनाव तक सीमित नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के भविष्य से जुड़े बड़े राष्ट्रीय प्रश्न उठाती है: वास्तव में चुनाव कौन लड़ सकता है? राजनीतिक आख्यानों को कौन नियंत्रित करता है? और किसकी सहभागिता वास्तव में मायने रखती है?

कुछ सुझाव

  1. चुनावों के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण।
  2. निर्वाचन आयोग के लिए स्थायी कर्मचारी और तंत्र।
  3. निर्वाचन आयोग द्वारा सभी प्रमुख समाचारपत्रों में शपथपत्र का प्रकाशन।
  4. प्रत्येक बूथ पर सभी उम्मीदवारों के शपथपत्र का प्रकाशन।
  5. सभी शपथपत्रों का चुनाव-पूर्व सत्यापन।
  6. संबंधित रिटर्निंग अधिकारी द्वारा उम्मीदवारों के सभी शपथपत्रों की घोषणा या वाचन।
  7. उम्मीदवारों की संपत्ति और आपराधिक मामलों का सत्यापन।
  8. वर्तमान सरकार के कार्यकाल समाप्त होने से 6 महीने पहले शपथपत्र/नामांकन दाखिल करना।
  9. राजनीतिक विज्ञापनों की विस्तृत लागत का उल्लेख ताकि राजनीतिक दलों के विज्ञापन व्यय का व्यापक प्रसार हो सके।
  10. प्रथम-पास-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली पर पुनर्विचार। यह पुरानी प्रणाली राजनीति में सहभागिता और विश्वास को नष्ट कर रही है। अब भारत में आनुपातिक प्रतिनिधित्व लागू करने का समय आ गया है।
  11. भारत निर्वाचन आयोग का व्यय हर वर्ष संसद द्वारा अनुमोदित किया जाता है, न कि भारत की समेकित निधि पर आरोपित होता है, जिससे उसकी वित्तीय स्वतंत्रता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।

यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी के  हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बढ़ती दृश्यता को उजागर करता है, जो प्रतीकों, धार्मिक पहचान और बदलते राजनीतिक आख्यानों के माध्यम से सामने आती है। यह बंगाल की लंबे समय से चली आ रही धर्मनिरपेक्ष-वाम राजनीतिक संस्कृति के कमजोर होने का संकेत देता है। एक राज्य के रूप में बंगाल एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ पहचान, लोकतंत्र, नागरिकता, राष्ट्रवाद, शासन और आर्थिक आकांक्षाओं के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ते हैं। इस प्रकार 2026 का चुनाव केवल एक राजनीतिक घटना नहीं बल्कि समकालीन भारत में व्यापक सामाजिक मंथन का प्रतीक बन गया है।

डा.  लक्ष्मी प्रसाद

सहायक प्राध्यापक, सवित्री गर्ल्स कॉलेज, कोलकाता

lprasad325@gmail.com

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