भारत में ई-कचरा एवं विषैला प्रदूषण : डिजिटल युग की बढ़ती चुनौती

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डिजिटल क्रांति ने भारत को तीव्र गति से बदलते हुए एक ऐसे समाज में परिवर्तित कर दिया है जहाँ स्मार्टफोन, लैपटॉप, सर्वर, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित उपकरण, डेटा सेंटर और विद्युत-इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद आधुनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। “डिजिटल इंडिया”, “स्मार्ट सिटी”, 5G विस्तार, ई-गवर्नेंस तथा ई-कॉमर्स ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खपत में अभूतपूर्व वृद्धि की है। किंतु इस तकनीकी प्रगति का एक गंभीर दुष्परिणाम भी उभरकर सामने आया है—ई-कचरा (E-Waste) और उससे उत्पन्न विषैला प्रदूषण। ई-कचरा उन परित्यक्त विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को कहा जाता है जिनका उपयोग समाप्त हो चुका हो अथवा जो तकनीकी रूप से अप्रचलित हो गए हों। इसमें मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टेलीविजन, बैटरियाँ, प्रिंटर, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, चिप्स, सर्किट बोर्ड आदि शामिल हैं। इन उपकरणों में सीसा (Lead), पारा (Mercury), कैडमियम (Cadmium), क्रोमियम, लिथियम, ब्रोमिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट्स तथा पॉलीक्लोरीनेटेड रसायन जैसे विषैले तत्व पाए जाते हैं, जो मिट्टी, जल और वायु प्रदूषण का कारण बनते हैं।भारत वर्तमान में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ई-कचरा उत्पादक देश बन चुका है। नवीनतम सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2025–26 में भारत में लगभग 14 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ, जिसमें से लगभग 9.79 लाख मीट्रिक टन का पुनर्चक्रण दर्ज किया गया। किंतु विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक उत्पादन इससे कहीं अधिक है, क्योंकि देश में ई-कचरे का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा असंगठित तरीके से संसाधित किया जाता है। इससे विषैले प्रदूषण, श्रमिक स्वास्थ्य संकट तथा पर्यावरणीय असंतुलन तेजी से बढ़ रहे हैं। इस लेख में भारत में ई-कचरे की समस्या, उससे जुड़े विषैले प्रदूषण, नीतिगत चुनौतियाँ, नवीनतम शोध, केस स्टडी, सामाजिक-आर्थिक प्रभाव तथा संभावित समाधान का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

 कचरे की अवधारणा एवं स्वरूप

ई-कचरे की अवधारणा एवं स्वरूपई-कचरा (E-Waste) से आशय उन विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से है, जो अनुपयोगी, खराब या पुराने हो जाने के कारण त्याग दिए जाते हैं। इसे मुख्यतः दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है—सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी उपकरण तथा उपभोक्ता विद्युत उपकरण। पहली श्रेणी में मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर, सर्वर और प्रिंटर जैसे उपकरण आते हैं, जबकि दूसरी श्रेणी में टीवी, फ्रिज, एसी, वॉशिंग मशीन और माइक्रोवेव आदि सम्मिलित हैं। ई-कचरे की विशेषता यह है कि इसमें स्वर्ण, चाँदी, ताँबा और प्लैटिनम जैसी मूल्यवान धातुएँ पाई जाती हैं, जिन्हें पुनर्चक्रण द्वारा पुनः उपयोग में लाया जा सकता है। इसके विपरीत इसमें सीसा, पारा और कैडमियम जैसे विषैले रसायन भी मौजूद होते हैं, जो वैज्ञानिक ढंग से निपटान न होने पर गंभीर पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न करते हैं। वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर 2024 के अनुसार वर्ष 2022 में विश्व में लगभग 62 मिलियन टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ।

 साहित्य समीक्षा

हाल के वर्षों में ई-कचरे पर अनेक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित हुए हैं, जिन्होंने भारत में बढ़ती समस्या को बहुआयामी दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया है।2025 में प्रकाशित एक अध्ययन “E-Waste Challenges in India: Environmental and Human Health Impacts” में बताया गया कि भारत में बढ़ती जनसंख्या, तीव्र शहरीकरण और डिजिटल उपकरणों की मांग के कारण ई-कचरे की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। अध्ययन में विशेष रूप से यह रेखांकित किया गया कि अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा एसिड लीचिंग, खुले में जलाने और हाथ से धातु निष्कर्षण जैसी प्रक्रियाएँ गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न करती हैं।2025 में प्रकाशित दक्षिण एशियाई ई-कचरा पुनर्चक्रण संबंधी शोध में बताया गया कि भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में अनौपचारिक पुनर्चक्रण इकाइयाँ भारी धातुओं और सूक्ष्म विषैले प्रदूषकों के “कॉकटेल” के संपर्क में रहती हैं। अध्ययन ने चेतावनी दी कि यदि अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक तंत्र में सम्मिलित नहीं किया गया तो पर्यावरणीय जोखिम और बढ़ेंगे।2026 के एक अध्ययन “Evaluating Material Recovery Environmental Impacts and Economic Feasibility of E-Waste Management in India” ने संकेत दिया कि वैज्ञानिक पुनर्चक्रण न केवल पर्यावरणीय क्षति कम कर सकता है, बल्कि भारत के लिए “सर्कुलर इकोनॉमी” आधारित आर्थिक अवसर भी उत्पन्न कर सकता है।चंडीगढ़ पर आधारित 2025 के क्षेत्रीय अध्ययन ने दिखाया कि उभरते आईटी शहरों में ई-कचरे की मात्रा तेजी से बढ़ रही है, जबकि संग्रहण और पुनर्चक्रण ढाँचा अभी भी अपर्याप्त है।इन अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि भारत में ई-कचरे की समस्या केवल कचरा प्रबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरणीय न्याय, श्रमिक सुरक्षा, शहरी नियोजन और आर्थिक नीति से जुड़ा व्यापक संकट है।

भारत में ईकचरे की वर्तमान स्थिति

भारत में ई-कचरे की समस्या तेजी से बढ़ती हुई पर्यावरणीय चुनौती बन चुकी है। इसके विस्तार के पीछे स्मार्टफोन और इंटरनेट का तीव्र प्रसार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कम जीवनकाल, “यूज़ एंड थ्रो” उपभोक्तावादी संस्कृति तथा तकनीकी अप्रचलन प्रमुख कारण हैं। साथ ही डेटा सेंटर, डिजिटल अवसंरचना और ऑनलाइन बाजारों में सस्ते इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बढ़ती उपलब्धता ने भी ई-कचरे में वृद्धि की है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार वर्ष 2023–24 में भारत में लगभग 12.54 लाख मीट्रिक टन तथा 2024–25 में लगभग 13.97 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ। हालांकि वास्तविक स्थिति इससे अधिक गंभीर मानी जाती है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों का डेटा अधूरा है, अनौपचारिक कबाड़ी नेटवर्क का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है तथा कई राज्यों में ई-कचरा गणना प्रणाली विकसित नहीं हुई है। वर्ष 2026 में CPCB ने NGT को बताया कि 17 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में पंजीकृत पुनर्चक्रण सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।

कचरे से उत्पन्न विषैला प्रदूषण

  1. वायु प्रदूषण:ई-कचरे से उत्पन्न विषैला प्रदूषण पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। जब पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, तारों और प्लास्टिक को खुले में जलाया जाता है, तब डाइऑक्सिन, फ्यूरान तथा अन्य जहरीली गैसें वातावरण में फैलती हैं। ये गैसें कैंसर, दमा, श्वसन संक्रमण और त्वचा रोग जैसी घातक बीमारियों को जन्म देती हैं।
  2. जल प्रदूषण:असंगठित पुनर्चक्रण इकाइयों में धातुएँ निकालने हेतु अम्लीय रसायनों का उपयोग किया जाता है। इनसे निकलने वाला विषैला अपशिष्ट भूजल, तालाबों और नदियों में पहुँचकर जल स्रोतों को प्रदूषित करता है। कई शोधों में ई-कचरा क्षेत्रों के भूजल में भारी धातुओं की अत्यधिक मात्रा पाई गई है।
  3. मृदा प्रदूषण:सीसा, पारा और कैडमियम जैसे विषैले तत्व मिट्टी में जमा होकर उसकी उर्वरता को नष्ट करते हैं तथा खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करते हैं।
  4. जैविक प्रभाव:ई-कचरे के विषैले तत्व बच्चों में न्यूरोलॉजिकल विकार, गर्भस्थ शिशुओं पर दुष्प्रभाव, हार्मोनल असंतुलन तथा प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करने जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न करते हैं।

अनौपचारिक क्षेत्र की भूमिका

भारत में ई-कचरे के प्रबंधन में अनौपचारिक क्षेत्र की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि लगभग 85–90% ई-कचरे का निस्तारण कबाड़ी, स्क्रैप डीलर, छोटे धातु निष्कर्षण केंद्र तथा घरेलू पुनर्चक्रण इकाइयों द्वारा किया जाता है। यह क्षेत्र कम लागत पर कार्य करता है, किंतु अधिकांश गतिविधियाँ अवैज्ञानिक एवं असुरक्षित होती हैं। श्रमिक बिना सुरक्षा उपकरणों के विषैले धुएँ, अम्लीय रसायनों और जलते प्लास्टिक के संपर्क में कार्य करते हैं, जहाँ बाल श्रम भी व्यापक रूप से पाया जाता है। दिल्ली के सीलमपुर, मोरादाबाद, मेरठ, लुधियाना और चेन्नई जैसे क्षेत्रों में ई-कचरा श्रमिकों में फेफड़ों की बीमारी, त्वचा रोग तथा तंत्रिका संबंधी समस्याएँ अधिक देखी गई हैं।

 प्रकरण अध्ययन1:दिल्लीसीलमपुर ईकचरा क्लस्टर

दिल्ली का सीलमपुर क्षेत्र एशिया के सबसे बड़े अनौपचारिक ई-कचरा बाजारों में से एक माना जाता है, जहाँ प्रतिदिन हजारों टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे का प्रसंस्करण किया जाता है। यहाँ मोबाइल फोन, कंप्यूटर मदरबोर्ड, तार और बैटरियों को छोटे एवं असुरक्षित कमरों में हाथों से तोड़ा जाता है। मूल्यवान धातुएँ निकालने के लिए खुले में तार जलाए जाते हैं तथा अम्लीय रसायनों का उपयोग किया जाता है, जिससे अत्यंत विषैली गैसें वातावरण में फैलती हैं। इस प्रक्रिया में बाल श्रम का व्यापक उपयोग भी गंभीर सामाजिक चिंता का विषय है। वर्ष 2025 की रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली में उत्पन्न लगभग 95% ई-कचरा अब भी अनौपचारिक तरीकों से संसाधित हो रहा है। इसके कारण स्थानीय निवासियों में अस्थमा, आँखों में जलन, त्वचा संक्रमण और फेफड़ों की बीमारियाँ तेजी से बढ़ी हैं। जमिया मिल्लिया इस्लामिया के शोधों में क्षेत्र की मिट्टी और भूजल में भारी धातुओं की खतरनाक मात्रा पाई गई।

 प्रकरण अध्ययन 2: मुरादाबाद – “ब्रास सिटीसे ईकचरा केंद्र तक

उत्तर प्रदेश का मोरादाबाद शहर पारंपरिक रूप से अपने पीतल उद्योग के लिए प्रसिद्ध रहा है, किंतु पिछले कुछ वर्षों में यह ई-कचरे से धातु निष्कर्षण के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरकर सामने आया है। यहाँ कंप्यूटर मदरबोर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से सोना एवं ताँबा निकालने के लिए एसिड बाथ तकनीक का व्यापक उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में निकलने वाले विषैले रसायन और अम्लीय अपशिष्ट सीधे पर्यावरण में पहुँचकर गंभीर प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इसके परिणामस्वरूप रामगंगा नदी का जल प्रदूषित हुआ, आसपास की मिट्टी में भारी धातुओं का स्तर बढ़ गया तथा स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुआ। साथ ही इन इकाइयों में कार्य करने वाले श्रमिकों में त्वचा रोग, श्वसन समस्याएँ और अन्य स्वास्थ्य संबंधी संकट तेजी से बढ़े हैं। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए अपनाई गई अवैज्ञानिक प्रक्रियाएँ दीर्घकालिक पर्यावरणीय और सामाजिक संकट को जन्म देती हैं।

नीतिगत एवं कानूनी ढाँचा

भारत सरकार ने ई-कचरे की बढ़ती समस्या से निपटने हेतु सुदृढ़ नीतिगत एवं कानूनी ढाँचा विकसित किया है। ई-कचरा (प्रबंधन) नियम, 2016 के अंतर्गत विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR), संग्रहण केंद्र, पुनर्चक्रण लक्ष्य तथा उत्पादकों की जिम्मेदारी जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्थाएँ लागू की गईं। इसके बाद ई-कचरा (प्रबंधन) नियम, 2022 को अधिक व्यापक रूप में लागू किया गया, जो 2023 से प्रभावी हुए। इन नियमों में 106 श्रेणियों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को शामिल किया गया तथा ऑनलाइन EPR पोर्टल के माध्यम से निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाया गया। साथ ही निर्माताओं एवं पुनर्चक्रकों के लिए पंजीकरण अनिवार्य किया गया। भारत अब “रिड्यूस–रीयूज़–रीसायकल” आधारित सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल को अपनाकर सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

 नीतिगत चुनौतियाँ

ई-कचरे के प्रबंधन हेतु भारत में कानूनी एवं नीतिगत ढाँचा विकसित होने के बावजूद अनेक गंभीर चुनौतियाँ अब भी बनी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या नियमों के कमजोर प्रवर्तन की है, क्योंकि कई राज्यों में ई-कचरा प्रबंधन नियमों का प्रभावी अनुपालन नहीं हो पा रहा है। इसके अतिरिक्त अनौपचारिक क्षेत्र का अत्यधिक प्रभुत्व औपचारिक पुनर्चक्रण व्यवस्था के विकास में बाधा बन रहा है। अधिकांश लोग जागरूकता के अभाव में पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सामान्य कबाड़ी को बेच देते हैं, जिससे ई-कचरे का असुरक्षित एवं अवैज्ञानिक निपटान बढ़ता है। विकसित देशों से प्रयुक्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अवैध आयात भी भारत में ई-कचरे की समस्या को और गंभीर बनाता है। साथ ही ई-कचरे की वास्तविक मात्रा संबंधी विश्वसनीय डेटा का अभाव नीति निर्माण और प्रभावी प्रबंधन में कठिनाई उत्पन्न करता है। ये चुनौतियाँ स्पष्ट करती हैं कि केवल कानून पर्याप्त नहीं, बल्कि सशक्त क्रियान्वयन और जनभागीदारी भी आवश्यक है।

डिजिटल अर्थव्यवस्था और भविष्य की चुनौती

भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था के तीव्र विस्तार के साथ ई-कचरे की चुनौती भी भविष्य में कई गुना बढ़ने की आशंका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग, स्मार्ट डिवाइस, डेटा सेंटर तथा इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते उपयोग से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खपत तेजी से बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप लिथियम-आयन बैटरियाँ, सौर पैनल कचरा, EV बैटरी अपशिष्ट और सर्वर उपकरण भविष्य के प्रमुख ई-कचरा स्रोत बनेंगे। विशेष चिंता का विषय यह है कि इन उपकरणों में मौजूद विषैले रसायन पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव डाल सकते हैं। यदि इनके सुरक्षित पुनर्चक्रण और वैज्ञानिक निपटान की प्रभावी व्यवस्था विकसित नहीं की गई, तो यह गंभीर पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकता है। इसी संदर्भ में CPCB ने वर्ष 2025 में सौर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल अपशिष्ट प्रबंधन हेतु दिशानिर्देशों का मसौदा जारी किया।

 तकनीकी नवाचार एवं समाधान

  1. AI आधारित कचरा पहचान:ई-कचरे के प्रभावी प्रबंधन हेतु AI और IoT आधारित स्मार्ट संग्रहण प्रणालियाँ विकसित की जा रही हैं। “Green Grid” जैसी अवधारणाएँ ब्लॉकचेन एवं AI आधारित ट्रैकिंग के माध्यम से पारदर्शी और सुरक्षित ई-कचरा प्रबंधन को बढ़ावा देती हैं।
  2. रोबोटिक पुनर्चक्रण:स्वचालित एवं रोबोटिक मशीनों के उपयोग से ई-कचरे के पुनर्चक्रण में मानव श्रमिकों का विषैले रसायनों से संपर्क कम किया जा सकता है, जिससे स्वास्थ्य जोखिम घटेंगे।
  3. सर्कुलर इलेक्ट्रॉनिक्स:मरम्मत योग्य तथा मॉड्यूलर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का विकास संसाधनों के पुनः उपयोग को बढ़ावा देगा और ई-कचरे की मात्रा कम करेगा।
  4. अर्बन माइनिंग:ई-कचरे से स्वर्ण, ताँबा और दुर्लभ धातुओं की पुनर्प्राप्ति न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि यह नए आर्थिक अवसर भी उत्पन्न करती है।

ई-कचरे की समस्या केवल पर्यावरणीय प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक विकास मॉडल की अंतर्विरोधी प्रकृति को भी उजागर करती है। एक ओर “डिजिटल इंडिया” तकनीकी प्रगति, आर्थिक विकास, नवाचार और रोजगार सृजन का प्रतीक बनकर उभरा है, वहीं दूसरी ओर यही डिजिटल विस्तार विषैले प्रदूषण, श्रमिक शोषण और पर्यावरणीय असमानताओं को बढ़ावा दे रहा है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उत्पादन और उपभोग की वर्तमान व्यवस्था “उपभोग आधारित विकास” पर आधारित है, जहाँ कंपनियाँ जानबूझकर उपकरणों का जीवनकाल सीमित रखती हैं ताकि उपभोक्ता लगातार नए उत्पाद खरीदते रहें। इस प्रवृत्ति को “Planned Obsolescence” कहा जाता है, जो ई-कचरे की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है।ई-कचरा संकट पर्यावरणीय न्याय का भी गंभीर प्रश्न है, क्योंकि उच्च आय वर्ग द्वारा उपयोग किए गए उपकरणों का विषैला भार अंततः गरीब और असंगठित श्रमिक वर्ग को उठाना पड़ता है। ये श्रमिक असुरक्षित परिस्थितियों में कार्य करते हुए अनेक स्वास्थ्य जोखिम झेलते हैं। अतः भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह डिजिटल विकास, आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलित एवं सतत विकास मॉडल स्थापित करे।

सुझाव

  1. अनौपचारिक क्षेत्र का औपचारिकीकरण :कबाड़ी एवं स्क्रैप नेटवर्क को प्रशिक्षण, पंजीकरण तथा वित्तीय सहायता प्रदान कर औपचारिक ई-कचरा प्रबंधन प्रणाली से जोड़ा जाना चाहिए।
  2. राइट टू रिपेयरनीति: इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत और पुनः उपयोग को बढ़ावा देकर ई-कचरे की मात्रा कम की जा सकती है।
  3. विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR):निर्माताओं को ई-कचरे के संग्रहण, पुनर्चक्रण और सुरक्षित निपटान की जिम्मेदारी सख्ती से निभानी चाहिए।
  4. वैज्ञानिक पुनर्चक्रण अवसंरचना: प्रत्येक राज्य में आधुनिक एवं पर्यावरण-अनुकूल ई-कचरा प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना आवश्यक है।
  5. जनजागरूकता अभियान: विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से ई-कचरे के दुष्प्रभावों के प्रति व्यापक जागरूकता फैलाई जानी चाहिए।
  6. डेटा एवं ट्रैकिंग प्रणाली:AI आधारित राष्ट्रीय ई-कचरा ट्रैकिंग प्रणाली विकसित कर पारदर्शी निगरानी सुनिश्चित की जाए।
  7. स्वास्थ्य सुरक्षा एवं अनुसंधान: ई-कचरा श्रमिकों को स्वास्थ्य बीमा, सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएँ तथा ग्रीन इलेक्ट्रॉनिक्स एवं विषमुक्त तकनीकों पर अनुसंधान को प्रोत्साहन दिया जाए।

 निष्कर्ष

भारत वर्तमान समय में तीव्र डिजिटल परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जहाँ स्मार्ट तकनीकों, इंटरनेट और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने जीवन को अधिक सुविधाजनक, गतिशील और आधुनिक बनाया है। किंतु इस प्रगति के साथ ई-कचरे और उससे उत्पन्न विषैले प्रदूषण की गंभीर चुनौती भी तेजी से उभर रही है। बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक उपभोग, कम जीवनकाल वाले उपकरणों तथा अवैज्ञानिक पुनर्चक्रण प्रक्रियाओं ने पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया है। यदि समय रहते वैज्ञानिक, नीतिगत और सामाजिक स्तर पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट भविष्य में और अधिक विकराल रूप धारण कर सकता है। भारत के सामने चुनौती केवल ई-कचरे के निपटान की नहीं, बल्कि “सतत डिजिटल विकास” सुनिश्चित करने की है। इसके लिए सरकार, उद्योग, वैज्ञानिक समुदाय और नागरिक समाज को समन्वित प्रयास करते हुए ऐसी सर्कुलर अर्थव्यवस्था विकसित करनी होगी, जहाँ “रिड्यूस–रीयूज़–रीसायकल” की अवधारणा व्यवहारिक रूप से लागू हो। ई-कचरे को केवल समस्या नहीं, बल्कि मूल्यवान संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता है। उचित नीतियों, वैज्ञानिक पुनर्चक्रण, हरित तकनीकों और जन-जागरूकता के माध्यम से भारत इस चुनौती को सतत विकास और हरित अर्थव्यवस्था के अवसर में परिवर्तित कर सकता है।

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