संसार का कोई प्राणी जब अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति से कुछ लेता और प्रकृति को कुछ देता हैतो पारिस्थितिक तंत्र की स्वतः नियामक क्रियाविधिद्वारा उस स्थिति को संतुलित कर लिया जाता है। परंतु यदि यह हस्तक्षेप व्यापक को जाए तो उसे संतुलित कर पाना इसके द्वारा सम्भव नहीं हो पाता। अत्यधिक आर्थिक लाभ के लोभ में मनुष्य जब प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक दोहन करने लगता हैतो यह पारिस्थितिक तंत्र की स्वतः नियामक क्रियाविधि की लोचनीयता की सीमा (Elasticity limit) को पार कर जाता, फलतः पारिस्थितिक असंतुलन हो जाता जिसका मानव जीवन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसी स्थिति को पर्यावरण संकट कहा जाता है जो कभी मानव जीवन के लिए ही खतरा बन जाता है। यहां पर गांधी की युक्ति प्रासंगिक हो जाती है कि “पृथ्वी सभी मनुष्यों की जरूरतों को पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है परंतु लालच के लिए नहीं।” पारिस्थितिकीय अंसतुलन प्रकृति में कुछ तत्वों की असामान्य वृद्धि या कमी का द्योतक है। इस रूप में यह एक तथ्यात्मक स्थिति है। पर्यावरण संकट इस असंतुलन के कारण मानव जीवन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव का द्योतक है जो अनुभूति का विषय है। इसलिए दोनों को एक नहीं कहा जा सकता। पर्यावरण संकट के समाधान के क्रम में मानव और प्रकृति के बीच सम्बन्ध के विभिन्न दृष्टिकोण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समाधान कैसा होगा यह प्रकृति के प्रति हमारी दृष्टि पर निर्भर करता है। एक पारंपरिक दृष्टिकोण यह है कि सम्पूर्ण पृथ्वी मनुष्य के उपभोग के लिए है। मानव शेष प्रकृति से श्रेष्ठ है और उसके लिए उपयोगी होने से ही प्रकृति के विभिन्न तत्वों का मूल्य निर्धारित होता है। सारी सार्थकता, उद्देश्य, प्रायोजन का आधार मानव चेतना ही है। इसलिए समस्त नीति और व्यवस्था का केंद्रीय तत्व मानव सुरक्षा और विकास ही होना चाहिए। अरस्तू से लेकर डेकार्ट,लाइबनिज, कांट, मार्क्स, उपयोगितावादी, अर्थक्रियावादी आदि दार्शनिक किसी न किसी रूप में इसी दृष्टि के पोषक हैं। इस दृष्टि की तत्वमीमांसा है कि विश्व छोटे कणों अर्थात परमाणुओं से बना है जो स्वतंत्र रूप से विद्यमान है। इनमें यांत्रिक एकता है,न कि कोई आंतरिक एकता या प्रयोजन। यह दृष्टिकोण मानव केंद्रित(Anthropocentrism) कहलाता है। इसका एकमात्र उद्देश्य पर्यावरण को मानव जीवन के योग्य बनाये रखना है। विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि उपरोक्त दृष्टि में पर्यावरण संकट से निपटने में लक्ष्य मनुष्य को पर्यावरण संकट के नकारात्मक प्रभावों से बचाना है। इस रूप में यदि पारिस्थितिकीय असंतुलन मानव जीवन के लिए खतरा न हो तो वह चिंता का विषय नहीं है। पारिस्थितिकीय तंत्र इस दृष्टि में गौण है। समस्या पर्यावरण संकट है और इसी का समाधान करना है। पर्यावरण संकट आने पर इस दृष्टि से मनुष्य तकनीकी के द्वारा उसके प्रभावों को kam करने का प्रयास करता है। जैसे तापमान वृद्धि से निपटने के लिए वातानुकूलित यंत्रों का अविष्कार, जल प्रदूषण के प्रभाव से बचने के लिए भूगर्भ जल के दोहन की युक्ति विकसित करना, water purifier का प्रयोग, धरती की उर्वरा कम होने पर रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग इत्यादि। इस प्रकार यह दृष्टि समस्या के कारणों पर विचार करने के वजाय उसके प्रभाव से मनुष्य को बचाने का प्रयास करती। इस दृष्टि का विस्तार करें तो आज जो वैश्विक ताप में वृद्धि दुनिया के लिए प्रमुख चिंता बनी हुई है और वैज्ञानिक इससे बचने के समाधान ढूंढ रहे हैं। ऐसी स्थिति में एक कल्पना कीजिये कि वैज्ञानिक यदि ऐसा कोई अविष्कार कर पाएं जिससे कि पूरी पृथ्वी को एक ऐसे यंत्र से ढक दिया जाय जिससे मनचाहा तापमान नियंत्रण सम्भव हो पाए तो क्या वैश्विक ताप में वृद्धि इस दृष्टिकोण से कोई समस्या मानी जायेगी? क्या कोई इस ताप वृद्धि की चिंता करेगा? यह पारंपरिक दृष्टि पर्यावरण की समस्या का स्थायी समाधान दे पाने में सफल नहीं हुई है। यहां एक प्रश्न महत्वपूर्ण है कि मनुष्य शेष प्रकृति द्वारा उस पर पड़ने वाले प्रभावों को तकनीकी के द्वारा किस सीमा तक नियंत्रित कर सकता है और कब तक? मानव और प्रकृति के पारस्परिक सम्बन्ध को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य शेष प्रकृति से श्रेष्ठ है? क्या मनुष्य मानवेत्तर प्रकृति से स्वतंत्र रहकर सहज जीवन जी सकता है? क्या मनुष्य प्रकृति का निंयत्रक है या अन्य जीवों की तरह ही एक जीव, जिनकी नियति साझा है? उपरोक्त प्रश्नों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण दृष्टि यह है कि मानव और मानवेत्तर प्रकृति परस्पर पूरक हैं, पृथक नहीं। संपूर्ण पृथ्वी एक विशाल पारिस्थितिक तंत्र है, जो परस्पर निर्भरता के सिद्धांत पर आधारित है। मनुष्य इसका स्वामी नहीं, बल्कि अन्य जीवों की भाँति इसका एक सदस्य मात्र है। यह प्राकृतिक व्यवस्था अपने आप में मूल्यवान है; इसका मूल्य केवल मानव उपयोगिता पर निर्भर नहीं है। अतः प्रकृति स्वयं में साध्य है, न कि केवल मानव उपभोग का साधन। यही पारिस्थितिक-केंद्रित दृष्टिकोण है, जिसका समर्थन अर्ने नैस, एल्डो लियोपोल्ड और रेचल कार्सन जैसे विचारकों ने किया। उनके अनुसार पर्यावरण संकट का मूल कारण हमारी मूल्य-व्यवस्था और विश्व-दृष्टि में निहित है, जिसे डीप इकोलॉजी आंदोलन ने प्रमुखता से प्रतिपादित किया।
डीप इकोलॉजी मानव और पर्यावरण के संबंध को परस्पर निर्भरता के तंत्र के रूप में देखने की प्रेरणा देती है। इसके विपरीत, मानव-केंद्रित दृष्टिकोण के प्रभाव में अनेक लोग अपने घर को एक पृथक इकाई मानकर केवल उसकी सफाई तक ही जिम्मेदारी सीमित कर लेते हैं तथा कूड़ा सार्वजनिक स्थानों या खाली भूखंडों में फेंक देते हैं। यह व्यवहार दर्शाता है कि पर्यावरणीय परस्परता के प्रति हमारी चेतना अभी सीमित है। वास्तव में, यदि आसपास का वातावरण प्रदूषित हो तो केवल घर की स्वच्छता हमें सुरक्षित नहीं रख सकती। संक्रामक रोग, प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय समस्याएँ सीमाओं को नहीं मानतीं, जैसा कि कोरोना महामारी ने स्पष्ट रूप से दिखाया।
एक चर्चित प्रकरण है कि पंजाब और हरियाणा में गेहूँ की पराली जलाने से उत्पन्न प्रदूषण का प्रभाव दिल्ली तक पहुँचता है। यह उदाहरण दर्शाता है कि किसी क्षेत्र में घटित पर्यावरणीय घटना के परिणाम दूर-दूर तक महसूस किए जा सकते हैं। ऐसे में केवल अपनी चारदीवारी को ही अपना घर मानना पर्याप्त नहीं है. क्योंकि पृथ्वी के किसी भी भाग में होने वाली घटनाएँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हम सभी को प्रभावित करती हैं। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि हमारी जिम्मेदारी केवल व्यक्तिगत आवास तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण पृथ्वी के प्रति है। पृथ्वी हमारा साझा घर है और समस्त जीव-जगत हमारा परिवार। अतः पर्यावरण का संतुलन, स्वच्छता और संरक्षण हम सभी के हित में है। इसके लिए मानव-केंद्रित दृष्टिकोण के स्थान पर पारिस्थितिक-केंद्रित दृष्टि अपनानी होगी, जो सभी जीवन-रूपों के अंतर्निहित मूल्य और जैवमण्डलीय समानतावाद को स्वीकार करती है। यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि पारिस्थितिकी-केंद्रित दृष्टि अथवा डीप इकोलॉजी के सिद्धांतों को व्यवहार में कैसे उतारा जाए। अर्ने नैस इसके लिए ‘स्व’ के विस्तार की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार मानव का ‘स्व’ केवल शरीर या व्यक्तिगत अहं तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति और समस्त जीव-जगत के साथ उसके गहरे संबंधों के माध्यम से विस्तृत होता है। नैस इसे ‘पारिस्थितिक स्व’ (Ecological Self) कहते हैं, जिसमें हवा, पानी, वृक्ष, पशु-पक्षी तथा जीवन को सहारा देने वाले सभी तत्व शामिल हैं। ‘स्व’ का यह विस्तार आत्मबोध की ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को व्यापक पारिस्थितिक तंत्र का अभिन्न अंग अनुभव करता है। तब प्रकृति की रक्षा करना स्वयं की रक्षा करने जैसा प्रतीत होता है और उसे क्षति पहुँचाना आत्म-क्षति के समान समझा जाता है।
अब एक अन्य प्रश्न है कि यह अनुभूति किस प्रकार सुलभ हो सकती है इसके लिए एक नए वैचारिक संस्कृत ढांचे का निर्माण करना होगा जिसके केंद्र में संपूर्ण प्रकृति हो ना कि मनुष्य मूल्य के नए मानक बनाने होंगे जिसके मुख्य तत्व होंगे-
- मानव व मानवेत्तर जीवन का आंतरिक मूल्य है।
- जीवन रूपों की विविधता का स्वत मूल्यवान है।
- प्रकृति में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
- मानव आबादी पारिस्थितिक तंत्र के अनुरूप के स्तर तक सीमित रहनी चाहिए ।
- प्रकृति के अनुरूप मानव जीवन शैली अपनाई जानी चाहिए।
- प्रकृति की व्यवस्था के अनुकूल आर्थिक, तकनीकी और वैचारिक ढांचे का विकास करना होगा।
- गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रकृति के साथ संतुलन में है ना कि प्रभुत्व में।
इन मूल्यों का विश्लेषण करें तो स्पष्ट है कि पारिस्थितिक केंद्रित दृष्टिकोण मानता है की सार्थकता व प्रयोजन पर मानवों का एकाधिकार नहीं है अन्य जीव भी उतने ही महत्वपूर्ण और मूल्यवान हैं।इस प्रकार यह दृष्टिकोण मानव केंद्रवाद के स्थान पर जैव मंडलीय समानतावाद की स्थापना करने का प्रयास करता है। नैस अपनी डीप इकोलॉजी के दर्शन में मानव जीवन के लिए नए मूल्यों का निर्धारण करते हुए एक नवीन जीवन शैली का आह्वान करते हैं जो प्रकृति से भिन्नता में नहीं बल्कि उसके साथ पारिवारिक अनुभूति से युक्त होगी। उक्त जीवन शैली के विचार को नैस इकोसोफी कहते हैं। इकोसोफी में नैस पर्यावरण को मानव जीवन की गहनतम अनुभूतियों से जोड़ते हैं जो मानव व्यवहार में परिवर्तन को उत्प्रेरित कर सकता है। आज जब हमारे पास पर्यावरण प्रदूषण, संसाधन क्षरण या अन्य किसी प्राकृतिक घटना से जुड़ी समस्यायों के कारण, उसकी वैज्ञानिक व्याख्यायों से जुड़े आंकड़े सहित विस्तृत जानकारी उपलब्ध है तो क्यों न इसी से सबको शिक्षित करके लोगों को जागरूक कर, समस्या का निवारण कर लिया जाय? परन्तु यह देखा जाता है कि केवल शिक्षा या जानकारी होने मात्र से पर्यावरण-अनुकूल व्यवहार सुनिश्चित नहीं होता। अनेक शिक्षित लोग भी पॉलीथिन का उपयोग, ऊर्जा का अपव्यय, अत्यधिक उपभोग तथा कूड़ा निस्तारण में लापरवाही जैसे पर्यावरण-विरोधी कार्य करते हैं। इससे स्पष्ट है कि जानकारी होना और उसका बोध, अनुभूति तथा व्यवहार में रूपांतरित होना दो भिन्न अवस्थाएँ हैं। दूसरी ओर, कोई अशिक्षित व्यक्ति भी गहरी पर्यावरणीय चेतना के आधार पर संरक्षणकारी आचरण कर सकता है। जनजातीय समुदायों का जीवन प्रकृति के साथ अधिक निकटता और सामंजस्य का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसी संदर्भ में एल्डो लियोपोल्ड का मत है कि पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान केवल ज्ञान या तकनीक से नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों में मूलभूत परिवर्तन से संभव है। अतः स्थायी समाधान मूल्य-चेतना और नैतिक दृष्टि के विकास में निहित है। एक अन्य प्रश्न है कि क्यों न पर्यावरण को लेकर उसके संरक्षण की दिशा में कठोर कानून बना दिए जाएं तो लोग उनका पालन करेंगे ही। कानूनी उपाय तभी प्रभावी होते हैं जब उनके पीछे निहित उद्देश्य और मूल्य-चेतना को समाज समझे। केवल दंड के भय से कानून का पालन करने वाले लोग उसे बाहरी और बाध्यकारी व्यवस्था मानते हैं। ऐसे में अवसर मिलने पर वे कानून तोड़ने या उससे बचने के उपाय खोजने लगते हैं। उदाहरणतः कोई व्यक्ति कानून के डर से पेड़ न काटे, पर यदि उसकी इच्छा बनी रहे तो वह नियमों से बचने के रास्ते तलाश सकता है। इसलिए कानून तात्कालिक नियंत्रण तो दे सकता है, किंतु स्थायी समाधान मूल्य-आधारित नैतिक चेतना से ही संभव है। जब व्यक्ति वृक्ष को अपने विस्तृत अस्तित्व का अंग मानेगा, तब उसका संरक्षण स्वाभाविक बन जाएगा। कुछ विचारकों के अनुसार पर्यावरण के सम्बंध में नवीन मूल्य स्थापना का डीप इकोलॉजी का सिद्धांत प्रायः अव्यहारिक नज़र आता है। कभी यह रहस्यवादी भी नज़र आता है। इस पर केवल आध्यात्मिक और नैतिक व्याख्या का आरोप भी लगाया जाता है जो वैज्ञानिक तथ्यों और तर्कों की उपेक्षा करती है। तो डीप इकोलॉजी का मूल्य रूपांतरण की यह दृष्टि वास्तव में एक नवीन विश्व दृष्टि है जो पर्यावरण के सम्बंध में नीति नियम बनाते समय हमारा मार्गदर्शन कर सकती है। यह स्वम् में कोई कार्ययोजना प्रस्तावित नहीं करती वरन मूल्य देती है जो नीति निर्माण में मार्गदर्शन हो सकतें हैं। यह विज्ञान विरोधी नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों को नैतिक और दार्शनिक सन्दर्भ में देखती है। यह इकोलॉजी के सिद्धान्तो को ही वृहद दार्शनिक क्षेत्र पर लागू करती है। केवल वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित दृष्टिकोण जैसे तकनीकी समाधान या संसाधन प्रबंधन पर्यावरण संकट को हल करने में असफल रहें हैं क्योंकि वे मानव मूल्यों और नैतिकता को सम्बोधित नहीं करते। डीप इकोलॉजी वैज्ञानिक तथ्यों को मानव मूल्यों से जोड़ने का प्रयास है। इसके मूल्यों के पालन से न केवल पर्यावरण की समस्या का समाधान होगा बल्कि मानव जीवन मे प्रकृति को नई गरिमा भी प्राप्त हो सकेगी। एक बेहतर नैतिक जीवन की अपेक्षा यही है कि प्रकृति की रक्षा केवल मानवीय हितों के कारण नहीं अपितु, प्रकृति के अधिकारों का सम्मान करते हुए की जाय। “आइए प्रयास करें कि जब हम आये थे, तो जैसी पृथ्वी थी उसकी तुलना में उसे एक बेहतर स्थान के रूप में छोड़कर जाएं”।

डॉ हितेश कुमार सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र विभाग मेरठ कॉलेज मेरठ
hiteshsinghgkp@gmail.com




