हाल ही में एक वायरल तस्वीर में यह दिखाया गया कि दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 95 भारत में हैं। यह शायद केवल एक मज़ाक नहीं, बल्कि भविष्य की वास्तविकता का संकेत हो सकता है। तीव्र नगरीकरण के कारण दुनिया के शहर वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी गति से गर्म हो रहे हैं। एक ओर हम सभी बदलती जलवायु परिस्थितियों को लेकर चिंितित हैं, वहीं दूसरी ओर लगातार एक व्यवस्थित परिवर्तन हो रहा है जहाँ लोग शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। शहर सभी को समाहित नहीं कर पा रहे, इसलिए वे आसपास के गाँवों तक फैलते जा रहे हैं, उन्हें अधिक कंक्रीटयुक्त, सुविधाजनक और तथाकथित “शहरी मानक” के अनुरूप बना रहे हैं। शहरी विकास अत्यंत तीव्र रहा है और संभवतः आगे और तेजी से बढ़ेगा। साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्र भी इस परिवर्तन से प्रभावित हो रहे हैं। हम अक्सर “अर्बन हीट आइलैंड” (Urban Heat Island) शब्द सुनते हैं। इसका अर्थ है कि शहरों का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में अधिक होता है, विशेषकर रात के समय जब हवा की गति कम होती है और वायु प्रवाह अवरुद्ध रहता है। यह केवल एक कारण से नहीं, बल्कि नगरीकरण की अनेक प्रक्रियाओं के सम्मिलित प्रभाव से उत्पन्न होता है।
हमारे शहरों के गर्म होने का कारण क्या है?
क्या इसका कारण जनसंख्या वृद्धि है, जिसे हम शहरी वृद्धि दर कहते हैं? या फिर यातायात, फैक्ट्रियाँ, भीड़भाड़ या कुछ और? इन कारणों को पाँच प्रमुख समूहों में बाँटा जा सकता है:
(क) सामाजिक-आर्थिक और जनसांख्यिकीय कारक
(ख) भूमि उपयोग और निर्मित पर्यावरण संबंधी कारक
(ग) ऊर्जा और उत्सर्जन संबंधी कारक
(घ) शहरी नियोजन और प्रशासनिक विफलताएँ
(ङ) जलवायु और वायुमंडलीय कारक
इनमें से चार प्रमुख कारणों की यहाँ चर्चा की गई है जिन्हें मापा जा सकता है और जिनका शहरी क्षेत्रों में सबसे अधिक प्रभाव दिखाई देता है।
1. सामाजिक-आर्थिक और जनसांख्यिकीय कारक
शहरों/शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि
शहरों का विस्तार सामान्यतः जनसंख्या वृद्धि (प्राकृतिक वृद्धि या प्रवासन) के कारण होता है और अन्य सभी कारक इसी से जुड़े होते हैं। शहरों में आबादी का प्रवाह अस्थिरता की सीमा तक पहुँच रहा है। लोग बेहतर आजीविका, सेवाओं की उपलब्धता, सुविधाजनक जीवन और बेहतर अवसरों के कारण शहरों की ओर आकर्षित होते हैं। वर्तमान नगरीकरण दर के अनुसार 1950 से 2050 के बीच शहरी जनसंख्या लगभग दस गुना बढ़ जाएगी और विश्व की लगभग दो-तिहाई से तीन-चौथाई आबादी शहरों में रहने लगेगी।
चित्र 1 : वैश्विक शहरी वृद्धि

स्रोत : UN Habitat
जनसंख्या का दबाव स्वतः ऊर्जा की मांग, परिवहन की आवश्यकता, कचरे का उत्पादन, जल की मांग और संसाधनों के अधिक उपयोग को बढ़ाता है। इसके परिणामस्वरूप ऊष्मा उत्सर्जन, अवसंरचनात्मक दबाव, कार्बन-प्रधान शहरी तंत्र और पारिस्थितिक दबाव बढ़ता है। गरीब आबादी अनौपचारिक आवासों की ओर धकेली जाती है, जो प्रायः कम हवादार, हरित क्षेत्र से वंचित और अत्यधिक गर्मी के संपर्क में होते हैं। उपभोक्तावाद और “अर्बन मेटाबॉलिज्म” (Urban Metabolism) आज गंभीर चिंता का विषय हैं। हम लगातार ऐसे शहर बना रहे हैं जो कार्बन-प्रधान हैं।
2. भूमि उपयोग और निर्मित पर्यावरण संबंधी कारक
मानव जाति ने लगातार पृथ्वी के स्वरूप को बदला है। पहले हमने जंगलों, घासभूमियों और आर्द्रभूमियों को बस्तियों के लिए साफ किया, फिर धीरे-धीरे कृषि भूमि को भी शहरी विस्तार के लिए परिवर्तित करना शुरू कर दिया। हमने प्राकृतिक सतहों को डामर, सीमेंट और गहरे रंग की छतों से बदल दिया जिनकी ऊष्मा धारण क्षमता अधिक और परावर्तन क्षमता कम होती है। कृत्रिम तरीकों से आंतरिक स्थान रहने योग्य बनाए गए, लेकिन बाहरी वातावरण अधिक गर्म और शुष्क होता गया। इससे वाष्पोत्सर्जन कम हुआ, सतही तापमान बढ़ा, भूजल पुनर्भरण घटा और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ गया।
Angel et al. (2005) के अनुसार विश्व स्तर पर शहरी विस्तार लगभग 20,000 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष है। इसका अधिकांश हिस्सा कृषि भूमि पर फैल रहा है। अनुमानत: 16,000 वर्ग किमी कृषि भूमि से, 2,000 वर्ग किमी जंगलों से, 2,000 वर्ग किमी घासभूमि/वन क्षेत्र से शहरी विस्तार में परिवर्तित हो रहा है। यह बात भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण लगे, लेकिन अब समय आ गया है कि हम प्राकृतिक भूमि को निर्माण स्थलों में बदलने की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार करें।
3. ऊर्जा और उत्सर्जन संबंधी कारक
ये उत्सर्जन क्या हैं और कहाँ से आते हैं? हम लगातार उन मशीनों, सड़कों और परिवहन प्रणालियों की चर्चा करते हैं जिनका हम उपयोग करते हैं। अनेक अध्ययनों में केवल सामाजिक-आर्थिक कारकों और कार्बन उत्सर्जन के प्रभावों को समझने का प्रयास किया गया है। Zhou et al. (2019) ने यह दिखाया कि नगरीकरण और कार्बन उत्सर्जन के बीच अर्थव्यवस्था, जनसंख्या, स्थानिक विस्तार तथा सामाजिक नगरीकरण जैसे चार प्रमुख कारकों के माध्यम से संबंध स्थापित होता है, जिसे पर्यावरणीय कुज़नेट्स वक्र (Environmental Kuznets Curve) के संदर्भ में समझा गया। Dong et al. ने कार्बन उत्सर्जन और नगरीकरण दर, औद्योगिकीकरण के स्तर, GDP तथा आय स्तरों के बीच संबंधों का अध्ययन किया। ये सभी शहरीकरण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, लेकिन बहुत कम अध्ययनों ने शहरी नियोजन नीतियों और अवसंरचनात्मक पहलुओं की गहराई से जाँच की है। यहीं “अर्बन मेटाबॉलिज्म” (Urban Metabolism) की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। यद्यपि यह अवधारणा नई नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें शिकागो स्कूल के शहरी अध्ययनों तक जाती हैं।
“Haar (2007)” के अनुसार “मेटाबॉलिज्म” शब्द का उपयोग शहरों के विकास को समझाने के लिए किया गया, जहाँ शहरी संगठन और अव्यवस्था की तुलना शरीर में होने वाली उपचयी (anabolic) और अपचयी (catabolic) प्रक्रियाओं से की गई। बाद में Wolman (1965) ने इस अवधारणा को लोकप्रिय बनाया। मार्क्स ने अपनी पुस्तक Capital में “मेटाबॉलिज्म” की अवधारणा का उपयोग समाज और प्रकृति के बीच श्रम के माध्यम से होने वाली अंतःक्रिया को समझाने के लिए किया। उन्होंने कृषि क्षेत्रों से शहरों की ओर पोषक तत्वों के प्रवाह में उत्पन्न “मेटाबॉलिक रिफ्ट” (metabolic rift) की समस्या को भी रेखांकित किया, जिस पर आज भी बहस जारी है। शहरों में ऊर्जा उत्सर्जन के अनेक स्रोत हैं। सबसे पहला और प्रमुख स्रोत है यातायात जाम (Traffic Congestion), जिससे कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और अपशिष्ट ऊष्मा (waste heat) का उत्सर्जन होता है। इसके परिणामस्वरूप स्मॉग का निर्माण, शहरी तापमान में वृद्धि और लोगों में श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। हालाँकि सभी शहर औद्योगिक नहीं होते, लेकिन औद्योगिक शहरों में फैक्ट्रियाँ और ताप विद्युत संयंत्र ग्रीनहाउस गैसें, ऊष्मीय अपशिष्ट तथा विषैले कण उत्सर्जित करते हैं। इससे स्थानीय तापमान बढ़ता है, वायु प्रदूषण गहराता है और अम्लीय वर्षा (acid rain) की संभावना भी बढ़ जाती है। विकसित देशों में एयर कंडीशनिंग और शीतलन प्रणालियों के अत्यधिक उपयोग ने यह सिद्ध किया है कि ये उपकरण बहुत अधिक ऊर्जा की खपत करते हैं और बदले में वातावरण को और गर्म करने वाला “फीडबैक लूप” तैयार करते हैं। शहरी तापमान को बढ़ाने वाली ये सभी प्रक्रियाएँ मिलकर शहर के “मेटाबॉलिज्म” का निर्माण करती हैं। अर्बन मेटाबॉलिज्म को शहर में होने वाली रासायनिक और ऊर्जा संबंधी प्रक्रियाओं के रूप में समझा जा सकता है। Stewart & Kennedy (2017) द्वारा किए गए अध्ययन में शहरों में मानव और पशु आबादी द्वारा उत्पन्न ऊष्मा का विश्लेषण किया गया। उन्होंने विश्व के 26 सबसे बड़े महानगरों में मानवजनित ऊष्मा बजट का अध्ययन किया। अध्ययन के परिणामों से पता चला कि मध्यम अक्षांश वाले शहरों जैसे लंदन, टोक्यो और न्यूयॉर्क में मानव आबादी से निकलने वाली ऊष्मा कुल मानवजनित ऊष्मा का 4–8% है, जबकि उच्च घनत्व वाले उष्णकटिबंधीय शहरों जैसे काहिरा, ढाका और कोलकाता में यह 10–45% तक पहुँच जाती है। पशु आबादी से निकलने वाली ऊष्मा सभी शहरों में 1% से कम पाई गई। मानव और पशु दोनों की संयुक्त ऊष्मा घनत्व मुंबई में सबसे अधिक दर्ज की गई, जो विश्व का सबसे अधिक घनत्व वाला महानगर है। वहाँ यह ऊष्मा घनत्व 6.5 Wm⁻² था, जो इमारतों में बिजली उपयोग (5.8 Wm⁻²) और वाहनों में ईंधन दहन (3.9 Wm⁻²) से भी अधिक था। इन निष्कर्षों और वैश्विक जलवायु मॉडलों के हालिया अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि विश्व के सबसे बड़े और भीड़भाड़ वाले शहरों में केवल मानव शरीर से उत्पन्न ऊष्मा भी क्षेत्रीय स्तर पर औसत वार्षिक तापमान में मापनीय परिवर्तन ला सकती है।
4. उच्च भवन घनत्व और अर्बन कैन्यन
शहरों की इमारतों की योजना और उनके बीच की दूरी “वायु अवरोध” (block air) को कम करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जब ऊँची और सघन इमारतें बहुत पास-पास बनाई जाती हैं, तो वे सौर विकिरण को फँसा लेती हैं, हवा के प्रवाह को कम कर देती हैं और ऊष्मा के बाहर निकलने को सीमित कर देती हैं। परिणामस्वरूप ऐसे क्षेत्रों में खराब वेंटिलेशन, अधिक ऊष्मा संचय और प्रदूषण की अधिकता महसूस की जाती है। Oke (1976) ने “अर्बन कैन्यन” (Urban Canyon) शब्द का उपयोग उन भवन समूहों के लिए किया जिनमें “अर्बन कैनोपी लेयर” (Urban Canopy Layer) शामिल होती है। इसे जमीन से लेकर इमारतों की छतों तक के उस स्थान के रूप में परिभाषित किया जाता है जहाँ विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म वायु-पर्यावरण (microclimates) और स्थानीय विशेषताओं से प्रभावित वायु प्रवाह मौजूद होते हैं। अर्बन कैन्यन सामान्यतः उन शहरों में दिखाई देते हैं जहाँ इमारतें कई ब्लॉकों में व्यवस्थित होती हैं। इन कैन्यनों के भीतर अनेक मानवीय गतिविधियाँ संचालित होती हैं। ये गतिविधियाँ तथा वायुमंडलीय हवा के साथ होने वाला ऊष्मा और ऊर्जा का आदान-प्रदान प्रदूषण उत्पन्न करता है, जिससे कैन्यन की जलवायु की एक विशिष्ट विशेषता विकसित होती है।


डॉ. प्रज्ञा तिवारी गुप्ता
मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय, शारदा विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश
pragya.gupta@sharda.ac.in




