डेनिश भाषा में ‘Den Gamle By’ का शाब्दिक अर्थ है: “द ओल्ड टाउन” या “पुराना शहर”। यह डेनमार्क के Aarhus (आरहूस) शहर में 1914 में स्थापित दुनिया का पहला और सबसे प्रामाणिक मुक्ताकाशी संग्रहालय (Open-Air Museum) है। लेकिन यह कोई आम पुराना शहर नहीं है, यह वह अनोखी जगह है, जहाँ डेनमार्क के विभिन्न हिस्सों से पुरानी इमारतों को पूरी की पूरी लाकर, यथास्थान ईंट-दर-ईंट जोड़कर, एक सजीव इतिहास रचा गया है। यह केवल देखने की जगह नहीं है, बल्कि समय के भीतर प्रवेश करने का एक ऐसा अनुभव है जो मन को छू लेता है; जहाँ इतिहास को पारंपरिक संग्रहालयों की तरह केवल शीशे के भीतर रखी वस्तुओं के माध्यम से नहीं, बल्कि पूरे-के-पूरे शहरी परिवेश को पुनर्निर्मित करके प्रस्तुत किया गया है। जीवंत गलियाँ और मोहल्ले बनाए गए हैं, जिनमें घरों के अंदरूनी हिस्से, कार्यशालाएँ, दुकानें और रहने के स्थान भी उसी तरह प्रस्तुत किए गए हैं जैसे वे कभी वास्तव में हुआ करते थे। इसका परिणाम यह होता है कि आगंतुक किसी खास समय के इतिहास को दूर से नहीं देखते, बल्कि डेनमार्क के अलग-अलग कालखंडों में स्वयं प्रवेश करने का अनुभव करते हैं। यहाँ की सड़कों पर चलते हुए हमें लगता है कि हम किसी दूसरे युग में चले गए हैं, और वह युग हमारे चारों ओर जीवित है-अपनी आवाज़ों, गंधों, रंगों और चेहरों के साथ। यह सब देखकर ऐसा लगता है जैसे इतिहास स्वयं हमें अपने आगोश में भर रहा हो।
यहाँ आगंतुक कई शताब्दियों के दैनिक जीवन को करीब से देख सकते हैं और अलग-अलग पीढ़ियों, जीवन-शैलियों तथा सामाजिक परिस्थितियों को अनुभव कर सकते हैं। हर घर, हर दुकान और हर कार्यशाला उस समय के समाज का एक जीवंत दस्तावेज़ है, जो बताता है कि लोग कैसे रहते थे, क्या खाते थे, किस तरह काम करते थे, किससे प्यार करते थे और किन चीज़ों से डरते थे। यह सब इतनी बारीकी और ईमानदारी से प्रस्तुत किया गया है कि इतिहास केवल जानकारी नहीं रह जाता, बल्कि एक गहरी संवेदना बन जाता है जो हृदय को भिगो देती है।
इस संग्रहालय के निमार्ण के पीछे अवधारणा है कि इतिहास कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव करने, प्रश्न करने और वर्तमान से जोड़ने वाली एक सतत प्रक्रिया है। इसलिए संग्रहालय ऐतिहासिक व्याख्या के साथ-साथ समकालीन सामाजिक मुद्दों पर भी विचार करने का अवसर देता है और आगंतुकों को यह समझने के लिए प्रेरित करता है कि समय के साथ लोगों का जीवन, समुदाय और उनके मूल्य किस प्रकार बदलते रहे हैं। अपनी प्रदर्शनियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से Den Gamle By सतत विकास, समानता, समुदाय और जनभागीदारी जैसे विषयों पर भी लगातार काम करता है।
इसी जून महीने में ‘Den Gamle By’ को यूरोपियन म्यूज़ियम ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड (EMYA) 2026 से सम्मानित किया गया है। यह प्रतिष्ठित सम्मान सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, जनसहभागिता और समकालीन सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में संग्रहालय के उत्कृष्ट योगदान को मान्यता देता है। स्पेन के बिलबाओ में आयोजित पुरस्कार समारोह में यह सम्मान प्रदान किया गया, जिसने इतिहास को वर्तमान समय की चुनौतियों से जोड़ने के संग्रहालय के अभिनव दृष्टिकोण को रेखांकित किया। इस अवसर पर EMYA की निर्णायक समिति ने टिप्पणी की- “a pioneering institution that brings together historical and contemporary urban environments to address urgent contemporary questions, including migration, sustainability and social justice.” अर्थात, एक अग्रणी संस्था, जो ऐतिहासिक और समकालीन शहरी परिवेशों को एक साथ लाकर प्रवासन, सतत विकास और सामाजिक न्याय जैसे महत्वपूर्ण समकालीन प्रश्नों पर विचार का अवसर प्रदान करती है। निर्णायक मंडल ने इसे “a new benchmark for innovation and relevance” बताते हुए संग्रहालय जगत पर इसके व्यापक सार्वजनिक प्रभाव की भी सराहना की।
इस क्रम में संग्रहालय की पर्यावरणीय पहलों को विशेष रूप से सराहा गया, जिनमें पारंपरिक एवं विरासत में मिली पौधों की प्रजातियों का संरक्षण, बागवानी संबंधी प्रशिक्षण तथा वस्तुओं की मरम्मत और पुनः उपयोग को बढ़ावा देने जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं। संग्रहालय के कार्य में स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ लोग अपने ज्ञान, जीवनानुभव और स्थानीय समझ के माध्यम से संग्रहालय की गतिविधियों में योगदान देते हैं, जिससे संग्रहालय एक ऐसा समावेशी और सहभागी वातावरण तैयार करता है जो नागरिक जीवन और स्थानीय समुदाय से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह पुरस्कार डेनमार्क की उस समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को भी रेखांकित करता है जिसमें सांस्कृतिक संस्थाएँ केवल विरासत को संरक्षित करने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि संवाद, चिंतन और लोकतांत्रिक भागीदारी को भी प्रोत्साहित करती हैं। यह सब जानकर सुखद अनुभव होता है।
अब मैं आपको अपनी अविस्मरणीय यात्रा के बारे में बताता हूँ। हम सपरिवार सुबह ग्यारह बजे Den Gamle By पहुँचे। प्रवेश हेतु टिकट की कीमत 205 डेनिश क्रोनर, यानी करीब तीन हजार रुपए थी। राशि थोड़ी अधिक लग सकती है, लेकिन यह जगह जो अनुभव देती है, उसके सामने यह कुछ नहीं है। हमने वहाँ करीब दस घंटे बिताए और फिर भी लग रहा था कि शायद हमने बहुत कुछ छोड़ दिया है।
अंदर जाते ही लगा, मानो किसी टाइम मशीन में बैठकर सैकड़ों साल पीछे चले गए हैं। सामने कोबलस्टोन की संकरी गलियाँ थीं, दोनों ओर लकड़ी और ईंटों से बने पुराने मकान, कहीं-कहीं से आती ताज़ी ब्रेड की खुशबू और दूर कहीं घोड़ागाड़ी की धीमी आवाज़। यह दृश्य किसी परीकथा के चित्रण जैसा था-जैसे हंस क्रिश्चियन एंडरसन की किसी कहानी का पृष्ठ सजीव होकर सामने खड़ा हो।
Den Gamle By में 75 से अधिक ऐतिहासिक इमारतें हैं। इनमें से कई इमारतें सैकड़ों साल पुरानी हैं, और उन्हें सावधानीपूर्वक विभिन्न डेनिश शहरों से लाकर यहाँ पुनर्स्थापित किया गया है। यह कोई कृत्रिम गाँव नहीं है, बल्कि एक सजीव समुदाय है, जिसमें उस दौर की वेशभूषा पहने लोग उस समय की दुकानों में काम करते हुए आगंतुकों को इतिहास से साक्षात्कार कराते हैं। ये लोग केवल अभिनय नहीं करते, बल्कि वास्तव में उन्हीं तकनीकों से काम करते हैं जो उनके पूर्वज सैकड़ों वर्ष पहले करते थे-वे ब्रेड पकाते हैं, घड़ियाँ मरम्मत करते हैं, कपड़े सिलते हैं और लकड़ी का काम करते हैं। उनसे बातचीत करना भी इस यात्रा का एक विशेष आनंद है, क्योंकि वे अपने किरदारों में इतने डूबे होते हैं कि हमें सचमुच लगता है कि हम किसी दूसरे युग के व्यक्ति से बात कर रहे हैं। उनके चेहरों की आत्मीय मुस्कान हमें बार-बार ठहरने को मजबूर कर देती थी।
इस अनोखे अनुभव के बीच, हमें कुछ साल पहले Netflix पर देखी हुई कॉमेडी-ड्रामा फिल्म ‘सरदार का ग्रैंडसन’ याद आ गई, जिसमें अर्जुन कपूर और नीना गुप्ता मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म में अर्जुन कपूर का किरदार अपनी बुज़ुर्ग दादी की आखिरी इच्छा पूरी करना चाहता है। दादी लाहौर में बने अपने पुराने पुश्तैनी घर को एक बार फिर देखना चाहती हैं, लेकिन उन्हें पाकिस्तान का वीज़ा नहीं मिल पाता। तब पोता एक अनोखा और लगभग अविश्वसनीय निर्णय लेता है-वह पूरे के पूरे घर को ही उखाड़कर एक बड़े ट्रक पर लादकर भारत ले आता है। मुझ जैसे भारतीय दर्शक को उस समय यह कहानी जितनी अनोखी और अजीब लगी थी, Den Gamle By में पहुँचकर पूरे-पूरे पुराने घरों को उनके मूल स्थानों से उठाकर एक जीवंत संग्रहालय का हिस्सा बने देखकर लगा कि फिल्म में जिस बात को हमने एक हास्यास्पद और असंभव कल्पना समझकर देखा था, डेनमार्क जैसे देश में उसे लेकर एक गहरी और वास्तविक सांस्कृतिक समझ मौजूद है। फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म में एक घर को सीमा पार लाने की कल्पना थी, जबकि डेनमार्क ने अपने इतिहास और विरासत को बचाने के लिए पूरे-पूरे घर, दुकानें, गलियाँ और पुराने शहरी परिवेश को ही एक जगह पुनर्स्थापित कर दिया है।
यह जगह देखकर अनुभूति हुई कि कभी-कभी इतिहास को बचाने के लिए केवल उसकी तस्वीरें, दस्तावेज़ या वस्तुएँ सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके परिवेश को भी बचाना पड़ता है। एक पुराना घर सिर्फ ईंट, लकड़ी और पत्थर से बनी इमारत नहीं होता; उसके भीतर किसी समय के लोगों का जीवन, उनकी आदतें, उनकी भाषा, उनका श्रम, उनकी खुशियाँ और उनकी पूरी सामाजिक स्मृति बसती है। शायद यही Den Gamle By की सबसे बड़ी सीख है।
संग्रहालय को मुख्य रूप से तीन-चार कालखंडों में बाँटा गया है, जिसका विवरण संग्रहालय के मानचित्र पर स्पष्ट रूप से अंकित है। पहला भाग 1600 से 1900 तक का ‘पुराना बाज़ार नगर’ (The Old Market Town) है, जिसमें 17वीं, 18वीं और 19वीं सदी के डेनमार्क के साथ-साथ 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों तक का शहरी जीवन देखा जा सकता है। दूसरा भाग 1900 से 1927 के दौर का है, जो आधुनिक डेनिश समाज के उदय को दिखाता है, और तीसरा सबसे नया भाग 1950 से 1974 के आसपास के एक आधुनिक मस्तिष्क वाले डेनिश समाज को समर्पित है, जहाँ आप उस समय के घरों के भीतर तक जा सकते हैं। यह तीन-स्तरीय संरचना आगंतुकों को डेनमार्क के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की एक सतत यात्रा कराती है-जैसे आप किसी रिवाइंड बटन को दबाकर धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं और हर कदम पर समाज बदलता नज़र आता है। यह यात्रा हमें अपने ही जीवन और समाज के बदलावों से भी जोड़ गई। इसके बाद 2000 से 2014 तक का भाग ‘हमारा समय’ नाम से है।
हमारी शुरुआत सबसे पुराने हिस्से-1600–1900 के पुराने बाज़ार नगर-से हुई। यह क्षेत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है जो इतिहास, वास्तुकला और पुरानी जीवनशैली में रुचि रखते हैं। यहाँ बाज़ार चौक के चारों ओर मेयर का घर, व्यापारी का आवास, टकसाल अधिकारी का घर, स्कूल, औषधालय, डाकघर और गरीब तबके के रहने के स्थान जैसी इमारतें हैं। यह खंड किसी पुराने डेनिश बाज़ार नगर की तरह है-जहाँ संकरी पक्की गलियों में सामान बेचने-खरीदने की चहल-पहल, कार्यशालाओं की आवाज़ें और पुराने व्यापारिक जीवन की झलक महसूस होती है। यहाँ की इमारतें लकड़ी, मिट्टी और पत्थर से बनी हैं, और कुछ घरों की दीवारों पर बने भित्तिचित्र तथा लकड़ी की नक्काशी अद्भुत है। हर इमारत की अपनी एक अलग कहानी है-कोई कभी किसी व्यापारी का घर था, तो कोई किसी कारीगर की कार्यशाला, कोई किसी धनी परिवार का निवास, तो कोई किसी गरीब मजदूर की झोपड़ी। यह विविधता ही इस संग्रहालय की सबसे बड़ी ताकत है-यह केवल अभिजात्य वर्ग की कहानी नहीं कहता, बल्कि समाज के हर तबके के जीवन को समान महत्व देता है।
घरों के अंदर प्रवेश करते ही ऐसा लगता है मानो उनमें रहने वाले लोग अभी-अभी कहीं बाहर गए हों-चूल्हे पर रखी केतली, मेज़ पर बिछा मेज़पोश, भोजन के दौरान आपस में हँसते-बातें करते लोग, दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें, अभी-अभी प्रयोग किए गए बिस्तर, चलता हुआ रेडियो, टीवी, सोफे पर लेटकर अखबार पढ़ते-पढ़ते सो गए एक बुजुर्ग का पुतला, उसके खर्राटों की आवाज़ें, कमरे में बजता धीमा संगीत और खिड़कियों से आती हल्की रोशनी। साउंड और लाइट के लिए म्यूजियम मैनेजमैंट की ओर से जगह-जगह स्पीकर, स्क्रीन, मोमबत्ती और लालटेन लगाए गए हैं। डॉक्टर का क्लीनिक भी है जिसमें उस समय के सारे उपकरण, दवाएँ और मेडिकल की किताबें रखी हैं। एक घर में एक अकेली, उदास बैठी माँ और उसके सामने खड़ी उसकी छोटी-सी बेटी का दृश्य इतना हृदयस्पर्शी था कि हमारी आँखें भर आईं। यह सब कुछ इतना सजीव था कि कई बार हम भूल जाते थे कि यह सब संग्रहालय का हिस्सा है, वास्तविक जीवन नहीं। हमें लगता था जैसे हम इन घरों के अपने ही सदस्य हों।
एक पुरानी बेकरी की दुकान के सामने हम रुके। वहाँ एक महिला उसी दौर की वेशभूषा में ताज़ी कुकीज़ और रोल बेच रही थीं। उन्होंने बताया कि यह सब उसी पारंपरिक विधि से बनाया जाता है जैसा 19वीं सदी में होता था। उनके हाथों से निकली हर कुकी में उस दौर का स्वाद, मेहनत और परंपरा समाई हुई थी। हमने वहाँ से कुछ चीज़ें खरीदीं और पास ही एक लकड़ी की बेंच पर बैठकर खाईं। स्वाद इतना अच्छा था कि शब्दों में बयान करना मुश्किल है। शायद यही इस जगह का जादू है-यहाँ हम न केवल देखते हैं, बल्कि स्वाद, गंध और स्पर्श से भी इतिहास को महसूस करते हैं। लगा जैसे समय ने हमें गले लगा लिया हो।
आगे बढ़ने पर हमें कई पुरानी दूकानें और वर्कशॉप दिखीं। एक घड़ीसाज़ की दुकान थी जिसमें दीवारों पर दर्जनों पुरानी घड़ियाँ टंगी थीं और हर एक की टिक-टिक अलग-अलग लय में चल रही थी। वहाँ बैठे कारीगर के पुतले के माध्यम से यह दिखाया जा रहा था कि तब कैसे घड़ियाँ बनाई और उनकी मरम्मत की जाती थी। पास ही एक मुद्रणालय था जिसमें उस समय की तकनीक से छपी किताबें और समाचार पत्र थे। बैकग्राउंड में कागज की सरसराहट और प्रेस की आवाज़ आ रही थी। एक अन्य स्थान पर बढ़ई की कार्यशाला थी, जिसमें काम करते कारीगरों के पुतलों को देखकर लगता था कि वे सचमुच पिछली सदी के निवासी हैं। उनकी वेशभूषा, औज़ार, भाषा और रंदा मारने की आवाज़ें-सब कुछ उस काल से मेल खाता था। एक दुकान में रंगशाला भी थी, जहाँ रंग बनाने और चित्रांकन का काम चल रहा था। प्राकृतिक रंगों से बने चित्रों की चमक में एक अलग ही आत्मीयता थी, जो आँखों और मन दोनों को सुकून दे रही थी।
एक मोची की दुकान देखी, 1850 के दौर की, जिसमें एक मोची का पुतला अपनी दुकान में बैठा जूते बना रहा है और बगल में एक कुर्सी पर बैठी उसकी छोटी-सी बेटी पॉलिश कर रही है। जगह-जगह चमड़ा लटका हुआ है, मेज और दीवारों पर औज़ार हैं। यह सब देखकर मुझे अपने गाँव-कस्बों की मोची की दुकानें और उनका माहौल याद आ गया-वही चमड़े की गंध, वही औज़ारों की खड़खड़ाहट, यह अलग बात है कि भारत में मैंने स्त्रियों को चमड़े की दूकानों पर काम करते नहीं देखा। इसी तरह एक निचले आर्थिक तबके के घर में एक बूढ़े का पुतला सो रहा है और पास में एक कुर्सी पर मैले-कुचैले कपड़ों में उसकी छोटी-सी बेटी भूखी बैठी है, सामने खाली प्लेट पड़ी है, पूरा घर फैला पड़ा है। कहना चाहिए इन छोटे-छोटे दृश्यों में ही इस संग्रहालय की सफलता छिपी है-यह केवल सुंदरता नहीं दिखाता, बल्कि गरीबी, संघर्ष और असमानता को भी उतनी ही ईमानदारी से प्रस्तुत करता है।
इसके बाद हम उस हिस्से की ओर बढ़े जहाँ 20वीं सदी के शुरुआती दशकों की इमारतें थीं। यहाँ आते ही दृश्य बदल गया। अब सड़कें चौड़ी थीं, इमारतें ईंटों की बनी हुई थीं और दुकानों में नई वस्तुएँ जैसे साइकिल, रेडियो, सिलाई मशीनें नज़र आने लगीं। औद्योगिक क्रांति का प्रभाव यहाँ स्पष्ट दिखता था-बड़ी खिड़कियाँ, ऊँची छतें और मशीनों की बढ़ती उपस्थिति। एक किराने की दुकान थी जिसमें उस दौर के डिब्बे, बोतलें और विज्ञापन रखे हुए थे। यह सब देखकर ऐसा लग रहा था मानो हम किसी पुरानी डेनिश फिल्म के सेट पर आ गए हों। यही नहीं, वहाँ अंदर ही पोस्टर म्यूज़ियम, आभूषण म्यूज़ियम, बर्तन म्यूज़ियम, घड़ी म्यूज़ियम और मेरीटाइम म्यूज़ियम भी हैं। हमने पोस्टर म्यूज़ियम में दुनिया भर के देशों की तस्वीरें देखीं, जिनमें एक तस्वीर भारत की भी थी-अपने देश को इस रूप में देखकर हमें एक अनोखी अनुभूति हुई, जैसे समय और स्थान की सीमाएँ धुंधली हो गई हों और कहीं दूर से कोई अपना हमें बुला रहा हो।
यहाँ आप एक स्टीम रेल का वास्तविक इंजन, नावें, कारें, घोड़ागाड़ियाँ, साइकिलें, कैमरे, पार्क, पानी, वाद्ययंत्र, घर गर्म रखने के यंत्र, गुसलखाने, बेडरूम, सीढ़ियाँ, पुरानी छतें, दीवारें, खिड़कियाँ और दरवाज़े-सब अपने मूल रूप में देख सकते हैं। यहाँ के घरों में आप अंदर हरेक मंजिल पर जा सकते हैं और टेलीविजन पर उस समय के चलते कार्यक्रम, रसोई में रखी अलमारियाँ, बैठक में उस समय की शैली के सोफे, पर्दे, बिस्तर, किताबें, पत्रिकाएँ और पोशाकें देख सकते हैं। अमीरों, गरीबों, व्यापारियों और नौकरी करने वालों की जीवनचर्या को बहुत करीब से देखा जा सकता है। दीवार के फ़ोटो में, पेंटिगों में, पुतलों के रूप में खुशमिजाज, उदास, व्यस्त और खाली चेहरे मौजूद हैं-हर घर में एक अलग कहानी है, हर परिवार की अपनी स्थिति और संघर्ष है। कुछ घरों में बच्चों के कमरों में तरह-तरह के खिलौने थे—गुड़ियाएँ, गेंदें और लकड़ी के खेल। ऐसा प्रतीत होता था कि परिवार अभी घर में ही है, बस थोड़ी देर के लिए बाहर गया है। कुल मिलाकर यहाँ एक पूरी दुनिया है, जिसमें हम धीरे-धीरे खोते चले गए और समय का बोध ही समाप्त हो गया।
Den Gamle By केवल इमारतों का समूह नहीं है, यह एक ऐतिहासिक समुदाय की आत्मा है। यहाँ का हर कोना, हर वस्तु और हर ध्वनि एक कहानी कहती है। चाहे वह किसी पुराने चर्च की घंटियों की आवाज़ हो या किसी बगीचे में खिले फूलों की खुशबू, सब कुछ एक पूरे युग को जीवंत कर देता है। एक स्थान पर हमें एक पुरानी शराब की दुकान मिली जिसमें उस समय की बोतलें और पीपे रखे हुए थे। वहाँ का वातावरण इतना वास्तविक था कि कुछ क्षण के लिए हम भूल गए कि हम 21वीं सदी में हैं। एक अन्य स्थान पर एक पुरानी बैंक की शाखा थी जिसमें उस समय के सिक्के और नोट प्रदर्शित थे।
इस संग्रहालय में कई सुंदर बाग़ और उद्यान भी हैं। थोड़ी देर टहलने के बाद हम एक पुराने उद्यान में रुके, जहाँ चारों ओर गुलाब और अन्य मौसमी फूल खिले हुए थे। वहाँ बैठकर ऐसा लगा जैसे समय थम गया हो। हमने वहीं पास के एक पारंपरिक कैफे से कॉफी और पेस्ट्री ली। कैफे की आंतरिक सज्जा भी उसी पुराने अंदाज़ में थी-लकड़ी की मेज़ें, मोमबत्तियाँ और दीवारों पर पुरानी पेंटिंग्स। भोजन का अनुभव भी इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। यहाँ के कैफे और बेकरी उस समय की विधियों से ही व्यंजन बनाते हैं। हमने एक पारंपरिक डेनिश बेकरी से जो ब्रेड और कुकीज़ खरीदीं, वे न केवल स्वाद में उत्तम थीं, बल्कि उनके साथ जुड़ी ऐतिहासिकता ने उस स्वाद को और भी गहरा बना दिया। कुछ दुकानों में रेडीमेड खाना भी मिल रहा था, जिसे लेकर पास की बेंचों पर बैठकर खाया जा सकता था। जब हम उन्हीं में से एक बेंच पर बैठकर खा रहे थे जिस पर सैकड़ों साल पहले कोई डेनिश परिवार बैठा होगा, तो भोजन का अनुभव केवल स्वाद का अनुभव नहीं रह गया, बल्कि समय के साथ एक आत्मीय संवाद बन गया।
इस दौरान हमें एक प्यारा और मज़ेदार अनुभव भी हुआ। Den Gamle By में घूमते हुए हम एक कैफ़े के सामने से गुजरे। सामने बैठे लोग कॉफ़ी, ज्यूस, पेस्ट्री आदि का आनंद ले रहे थे। वहीं पास ही एक बुज़ुर्ग दम्पत्ति भी बैठे थे; दोनों के चेहरों पर उस उम्र की सहज मुस्कान और सुकून था। ज्योंही मेरी नज़र उन पर पड़ी, बुज़ुर्ग महिला ने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ़ हाथ हिलाया। एक पल के लिए मैं अचकचा गया। लगा शायद वह मेरे पीछे या आस-पास किसी और को देखकर हाथ हिला रही हैं। पीछे मुड़कर देखा, पर वहाँ कोई नहीं था। मैंने दोबारा उनकी ओर देखा, वह अब भी उसी अपनत्व से मुस्कुरा रही थीं। तो हम उनके पास गए। उन्होंने डेनिश भाषा में कुछ कहा, जो समझ में नहीं आया। मैंने विनम्रता से कहा, “Ma’am, I am afraid I don’t know Danish. Can you please speak in English?” इस पर वह थोड़ा शर्मिंदा होकर हँसीं और अंग्रेज़ी में बोलीं, “Oh, I am so sorry. I thought you were known to me from my workplace. He looks exactly the same as you.” मुझे सुनकर बहुत अच्छा लगा। मैंने हँसते हुए कहा, “What a pleasant surprise! I have never been to Denmark before, but someone looking like me is already here. Wow!!” हमारी यह बात सुनकर वे दोनों खिलखिला उठे। इसके बाद महिला ने अपने इंजीनियर पति से भी परिचय कराया, जो रिटायर हो चुके थे और इन दिनों बीच-बीच में Den Gamle By की रेडियो-सेवा में फ़्री सर्विस देने आ जाया करते थे। फिर हमने साथ में एक तस्वीर भी ली, जो उस यात्रा की सबसे प्यारी यादों में से एक बन गई। उस पल लगा कि दुनिया कितनी छोटी है और अपनापन कितना बड़ा।
Den Gamle By ने हमें यह सिखाया कि इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का क्रम नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन, उनके संघर्षों, उनकी खुशियों और उनकी स्मृतियों का एक सतत प्रवाह है। यह संग्रहालय उस प्रवाह को रोकता नहीं, बल्कि उसे और अधिक स्पष्ट करता है-वर्तमान को अतीत से जोड़ता है और भविष्य के लिए एक दर्पण प्रस्तुत करता है। Den Gamle By आकर हम देख सकते हैं कि समय के साथ परिवारों की संरचना कैसे बदली, घरों का स्वरूप कैसे बदला, दुकानों और व्यापार का तरीका कैसे बदला, काम करने के तरीके कैसे बदले, महिलाओं और पुरुषों की सामाजिक भूमिकाएँ कैसे बदलीं, तकनीक ने दैनिक जीवन को कैसे प्रभावित किया, आधुनिक उपभोक्ता संस्कृति कैसे विकसित हुई। इस दृष्टि से यह संग्रहालय डेनमार्क के बदलते समाज का दृश्य इतिहास प्रस्तुत करता है।
वाकई, अपने इतिहास, संस्कृति और समुदाय के एक जीवंत मिलन-स्थल के रूप में डेनमार्क के संग्रहालय बनाने के ये कदम सचमुच बेहद सराहनीय हैं।

प्रोफेसर जय कौशल
असम विश्वविद्यालय, दीफू परिसर, असम, भारत के हिंदी विभाग में फैकल्टी हैं।
इन्हे हिंदी भाषा, साहित्य एवं अनुवाद के क्षेत्र में अध्यापन और शोध का 17 वर्षों से अधिक का अनुभव है।
फ़िलहाल सोफिया विश्वविद्यालय, बल्गारिया के इंडोलॉजी विभाग में आईसीसीआर चेयर प्रोफ़ेसर हैं
jaikaushalaudc@gmail.com




