रामस्वरूप वर्मा का आर्थिक चिन्तन

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डा० बी आर आंबेडकर और रामस्वरूप वर्मा सामाजिक क्रांति के आन्दोलन की दो ऐसी महान विभूतियाँ हैं जिनके सामाजिक, राजनैतिक और दार्शनिक पक्षों पर तो विमर्श हुआ और बहुत कुछ लिखा भी गया पर उनके आर्थिक पक्षों पर खुल कर बात-चीत नहीं हुई। आज जब दुनिया गहरे आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है और बेतहाशा  बढ़ती बेरोजगारी का सवाल हमारे सामने एक दैत्य की तरह मुंह बाये खड़ा है तब इनके आर्थिक पक्ष की विवेचना और विमर्श बहुत जरूरी हो जाता है। डा० अम्बेडकर मूलत: अर्थशास्त्री ही थे और उन्होंने लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में रूपये के अवमूल्यन पर उस समय पी एच डी किया था जब हम अंग्रेजी हुकूमत के गुलाम थे।  उनकी थीसिस से अंग्रेज इतना घबड़ाये  कि उनकी पीएचडी अवार्ड तीन साल तक रोके रखा। सोचता हूँ आज के दौर में उन्होंने भारत में पीएचडी की होती और केंद्र सरकार की आलोचना की होती तो डा० अम्बेडकर गौतम नवलखा, आनन्द तेलतुम्बड़े और वरवर राव की तरह जेल में होते। उन्होंने अपने “स्टेट एंड माइनॉरिटी” नामक ऐतिहासिक  दस्तावेज में जो उन्होंने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की तरफ से उसके अध्यक्ष की हैसियत संविधान सभा में पेश किया था,  में अपने आर्थिक विचार पेश किये हैं जो राजकीय समाजवाद के और उसे ही उन्होंने देश का सच्चा संविधान कहा था।  संविधान सभा ने इस दस्तावेज को स्वीकार लिया होता तो देश आर्थिक गुलामी, सांप्रदायिक कार्पोरेट गठजोड़ का फासीवाद, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, राजनैतिक पतन जैसे घोर निराशा के दिन न देखने पड़ते यानि जबाबदेह, पारदर्शी, उत्पादनपरक, रोजगारपरक आत्मनिर्भर राज्य व्यवस्था।  

   समाजवादी राजनेता रामस्वरूप वर्मा जी 1967 में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली संविद सरकार में वित्तमंत्री थे। उस समय वर्मा जी 40-42 साल के युवा समाजवादी नेता थे और विधानसभा में उनके बेबाक और बेखौफ़ भाषणों की गूँज दिल्ली के राजनैतिक गलियारों तक थी। एक किसान के बेटा यूनिवर्सिटी से निकल कर सीधे राजनीति में अवतरित होता है यह बात डा. लोहिया के दिल को छू गयी।  जबकि वर्माजी ने आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण की और इतिहास विषय में टॉप किया। लेकिन नौकरी तो उनका लक्ष्य ही नही था तो इंटरव्यू ही नही दिया। वर्मा जी ने वित्तमंत्री की हैसियत से 1967 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में 20 करोड़ रुपये फायदे का बजट पेश कर दुनिया के आर्थिक जगत को अचरज में डाल दिया। आर्थिक जगत और सरकारों के वित्तीय खेमों में यह धारणा स्थापित हो चुकी थी कि घाटे में आने के बाद सरकारें फायदे में नहीं आती। हद से हद कुछ घाटा ही कम कर सकती हैं। ऐसा करते हुए उन्होंने किसी विभाग के बजट में कोई कटौती नहीं की बल्कि कृषि, शिक्षा और चिकित्सा विभागों के बजट में अपेक्षाकृत वृद्धि की और सरकारी कर्मचारियों के मंहगाई भत्ते में भी वृद्धि की। उन्होंने एक नयी शुरुआत हिंदी में बजट पेश करने की की। हिंदी राजभाषा के प्रति समाजवादी शुरू से ही प्रतिबद्ध रहे है। सरकार के कर्मचारियों के लेखे-जोखे से संबंधित बजट साहित्य में कोई दस्तावेज नहीं होता था जिसे उन्होंने वॉल्यूम 6 के रूप में जुड़वाया इस बजट की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रेस जगत में व्यापक चर्चा हुई। बीबीसी लन्दन और लन्दन स्कूल  ऑफ़ इकनोमिक्स में इस गम्भीर विमर्श और चर्चा हुईं। वर्माजी के अनेक इंटरव्यू प्रकाशित हुए और बीबीसी ने एक्सक्लूसिव इंटरव्यू ब्रौडकास्ट किया गया।

     आइये वर्मा जी की राजनैतिक शख्शियत और उनके आर्थिक चिन्तन पर नजर डालें और उसे समझें। क्रांति जैसे महत्वपूर्ण शब्द या इसके पूरे विमर्श को वर्मा जी कैसे समझते हैं, उन्होंने क्रांति को परिभाषित करते हुए कहा,“पूर्व निर्धारित अप्रासंगिक सड़े-गले जनविरोधी सामाजिक मूल्यों का व्यापक जनहित में पुनर्निर्धारण का नाम क्रांति है जिसके लिए हिंसा अनिवार्य शर्त नहीं है”।  क्रांति शब्द की परिकल्पना ही हमें जोश और रक्तरंजित संघर्ष के सोच से भर देती है और दुनियां के बड़े बदलावों के लिए घटित हुई क्रांतियों में हिंसा हुई है क्योंकि राज्य सत्ताएँ और सामंती ताकतें आसानी से अपने पक्ष के मूल्यों को भले ही कितने जनविरोधी क्यों न हों आसानी से बदलने या खत्म होते नहीं देखना चाहती हैं। वैसे भी क्रांति एक वैचारिक प्रक्रिया है जिसमें अमूलचूल बदलाव की एक मुकम्मल और स्पष्ट तस्वीर होती है जो पहले मस्तिष्क में फिर धरातल पर अवतरित होती है।

 भगत सिंह भी यही कहते हैं कि क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। वर्माजी आदर्श अर्थव्यवस्था की पहली शर्त मानते है तर्क संगत उपयुक्त नियोजन। नियोजन से उनका आशय है कि देश के संसाधनों का उपयोग जनसाधारण कि मुलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना। वर्मा जी से जब पूछा गया कि आपके हिसाब से एक आदर्श और अच्छे राजनेता में जरूरी गुण क्या होने चाहिए ? उन्होंने कहा पहला गुण संवेदनशीलता, ईमानदारी सादगी के साथ साथ देश के बारे में गहरी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समझ, निस्वार्थ परिता के अतिरिक्त आदर्श राज्य व्यवस्था शासन संचालन की स्पष्ट तस्वीर। वर्मा जी इन सभी गुणों से सम्पन्न थे। वह अकेले राजनेता थे जिन्होंने विधायकों के वेतन बढ़ाये जाने का हमेशा विरोध किया और कभी स्वीकार नही किया।  कथनी करनी का ऐसा अनूठा संगम शायद ही कहीं देखने को मिले।  वह आंकड़ो के बादशाह थे और अपने तथ्यपरक भाषणों से सदन को चकित कर देते थे।  वह बेहद अध्ययनशील और योग्य विधायीकार्य विशेषज्ञ रहे हैं। पुस्तकालय उनकी सबसे प्रिय जगह थी। सिनेमा के भी शौक़ीन थे और खुद खिड़की पर टिकट लेकर शो देखते थे।  उन्होंने आंबेडकर साहित्य को को सरकारी पुस्तकालय में रखने पर लगे प्रतिबन्ध को कोर्ट के आदेश से हटवाया और आंबेडकर जब्ती साहित्य की बहाली की। सबसे अधिक गैर सरकारी बिधेयक सदन में लेन वाले वर्मा जी ही थे।

       वर्माजी कहते थे कि विकल्प की बात टुकड़ों टुकड़ो में होती है कभी वैकल्पिक मीडिया, वैकल्पिक शिक्षा, वैकल्पिक तकनीकी यहाँ तक कि वैकल्पिक राजनीति आदि।  मगर  जरुरत है एक व्यापक और समग्र विकल्प की अवधारणा की। गौरतलब हो कि तमाम व्यवस्थाओं और कार्यप्रणाली के विकल्प अर्थव्यवस्था, समाज व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हैं। विकल्प का मतलब किसी राजनैतिक दल का विकल्प कोई राजनैतिक दल नहीं है जैसे कांग्रेस का विकल्प बीजेप या सपा का विकल्प बीएसपी।  देश के साथ यह बहुत बड़ा धोखा है और विगत सत्तर-बहत्तर सालों यही होता रहा है। देश आज आर्थिक और सामाजिक गुलामी में तब्दील हो गया है।  विकल्प नीतियों का जो आर्थिक सामाजिक लोकतंत्र लासके यानि रेडिकल आल्टरनेटिव। आर्थिक मामलों में उनका स्पष्ट मत था उत्पादनपरक रोजगारपरक अर्थव्यवस्था। राज्य कोई निजी कम्पनी या उद्योग नहीं है जो सिर्फ मुनाफे और फायदे के लिए काम करते है। राज्यव्यवस्था और सरकार का काम देश के नागरिकों के कल्याण, जीवन गुणवत्ता और सार्वभौमिक खुशहाली सुनिश्चित करना है। इसके लिए उनका स्पष्ट मत था पैसा सरकार का उत्पादन जनता का।  जनता अपने कठिन परिश्रम से उत्पादन के जरिये सरकार का पैसा वापस कर कारखाने उद्योग की मालिक बन जाय।  जब जनता का खुद का कारखाना होगा तो उसके उत्पादन, मुनाफ़े और गुणवत्ता की फ़िक्र जनता को होगी।  इस तरह रोजगार भी बढ़ेंगे और अत्मनिर्भरता भी।  हड़तालें और श्रमिक समस्याएँ तब लगभग खत्म जैसी हो जाएँगी क्योंकि मुनाफा कामगारों में बाँट दिया जायेगा इससे उनकी तनख्वाहे बढेंगी जिससे उनका जीवन स्तर भी बढ़ेगा।  इसे समाजीकरण का सिध्दांत कहते हैं जो जापान की आर्थिक विकास का सबसे बड़ा हथियार बना।  आजकल जर्मनी, फ़्रांस और स्केंडनेवियन देशों में इसे विकास की रणनीति के रूप में अपनाया गया है।  शिक्षा, स्वास्थ और जनसुरक्षा की गारन्टी कल्याणकारी और लोकतांत्रिक सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी बने जिससे आज की मौजूदा सरकार भाग रही और सब कुछ निजी हाथों में सौपने पर आमादा है। उत्पादन के वितरण यानि बेचने का काम सरकार का होगा।  उससे जो वाजिब मुनाफ़ा कमाया जाय उसका बड़ा हिस्सा कामगारों को और छोटा हिस्सा सरकार के पास राजकीय कोष में राज्यव्यवस्था के संचालन के लिए।

बाजार को मुक्त नहीं छोड़ा जा सकता और न ही आज की तरह जनता को बाजार के हवाले सौपा जा सकता है। ऐसा करना भारी भूल होगी और फिर बाजार और पूंजीपति ही देश और सरकार चलाने लगेंगे और वह आज घटित हो रहा है। देश का बजट जनता की जरूरतों के मुताबिक बने।  आजकल अडानी अम्बानी की इच्छा के मुताबिक उनके लाभ को द्रष्टि में रख कर बनता है।  बाजार हमारी जरूरत है अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीदने के लिए।  जब मुद्रा का अविष्कार नहीं हुआ था तब यह काम पारस्परिक वस्तुओं की अदला बदली से होता था जैसे अनाज के बदले कपड़ा।  पर आज हमें बाजार की जरूरत बनाया जा रहा है।  हमारी मूलभूत जरूरत की चीजों से ज्यादा विलासता की वस्तुओं से बाजार पटा पड़ा है।  हमारी क्रय शक्ति इतनी है नहीं कि विलासता की चीजें खरीद सकें तो कर्ज लेंगे रिश्वत लेंगे, अपराध बढ़ेंगे भ्रष्टाचार बढेगा और वही घटित होते हम देख रहे हैं। वर्मा जी ने भ्रष्टाचार को परिभाषित किया कि क्रयशक्ति से अधिक वस्तुएं खरीदने की लालसा भ्रष्टाचार की जननी है।  जब जनता बाजार के अधीन होती है तभी बाजारवाद और उपभोक्तावाद पनपता है।  लोग स्वभावत: बचत प्रेमी होते हैं। गाहे -बगाहे गाढे वक्त में यह बचत काम आती है।  गांवों में किसानों की पत्नियाँ छुप छुप के बचाए पैसे से घर परिवार की मदद करती थीं।  बचत एक तरह का आर्थिक अनुशासन भी है।  इसलिए बचत को प्रोत्साहित करना चाहिए। बचत स्वयं में एक विकास है।  जपान दुनियां में सबसे अधिक बचत करने वाला देश है और सबसे इमानदार मेहनती देश भी।  छोटा सा देश जो द्वितीय विश्वयुध्द में नेस्तनाबूद हो गया था आज अपने बलबूते बिना कोई कर्ज लिए दुनियां की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है 16 ट्रिलियन डालर की।  जापान जनसंख्या और क्षेत्रफल की द्रष्टि से उत्तर प्रदेश से भी छोटा है।  भौगोलिक स्थिति इतनी विषम की आये दिन भूकम्प और सुनामी के खतरे मडराते रहते है।  आज टोक्यो दूसरी बार ओलम्पिक आयोजित कर रहा है।  हम हैं कि एशियाई गेम्स दोबारा कराने की हिम्मत नहीं जूटा पा रहे हैं।

        वर्माजी कहते थे कि भारत स्वयं इतना बड़ा बाजार कि हमें बाहर झाँकने की जरुरत ही नहीं।  विदेशी सामान और विदेशी बाजार को अपने देश में न घुसने दें। चीन और जापान इसके ज्वलंत उदहारण हैं। चीन गूगल तक का इस्तेमाल नही करता।  हम देश की जरूरतों के मुताबिक उत्पादन करें लोगों की आय बढ़ा कर उनकी क्रय क्षमता में इजाफा कर अपना बाजार मजबूत करें। वर्माजी डा० अम्बेडकर से पूरी तरह सहमत थे कि देश के प्राकृतिक संसाधनों पर देश का कब्जा हो जैसे जमीन, पानी, खनिज,जंगल आदि। हम अपना कच्चा माल सस्ते में विदेशों को न बेंचे बल्कि खुद उससे पक्का मॉल तैयार कर अपनी माली हालत सुधारें।  हम जमाने से कच्चा लोहा चीन जापान को बेंच कर उनसे पक्का लोहा मंहगी कीमत पर खरीदते रहे हैं।  किसान और गाँव उनकी प्राथमिकता रही और लघु कुटीर उद्योगों के विकास पर उनका जोर रहा है। उनका मानना था कि जमीन किसी की मिल्कियत न हो।   जो उसका उपयोग करना चाहता है करे।  उपयोग न करने पर और किसी जरुरतमन्द को दे दी जाय। उद्योगपतियों को भी जमीन बेंची न जाय। जिस दिन उद्योग बंद जमीन सरकार किसी और जरुरतमन्द को दे।  बहुत से उद्योगपति जमीन और सस्ते में मिले कच्चे मॉल को बेंच कर मालामाल हो गये हैं।   इस तरह और भी बहुत सी बातें हैं जिन्हें इस छोटे से लेख में समेटना सम्भव नहीं है।  वर्माजी के देश की सामाजिक आर्थिक समस्याओं का पूर्ण समाधान था। उन्होंने एक बार अभियान चलाया कि दुनियां का कोई भी व्यक्ति आर्थिक-सामाजिक, राजनैतिक, दार्शनिक समस्याओं से सम्बन्धित सवाल करे वह जबाब देंगे। और उन्होंने ऐसा किया भी। इन सवाल जबाब पर उनकी एक किताब है। उनका लिखा विपुल साहित्य है जो सम्यक प्रकाशन से तीन खंडो में प्रकाशित है। वर्मा जी बहुत जल्दी चले गये। 22 अगस्त 1923 को कानपुर के एक किसान परिवार में जन्मे वर्मा 19 अगस्त 1998 को हमसे जुदा हो गये। सत्तर साल की उम्र इतनी मकबूल शख्शियत की जाने की कोई उम्र होती है क्या।  विधानसभा के गलियारों और उत्तर प्रदेश के कोने कोने में उनकी शराफत के किस्से आज भी गूँजते सुनाई पड़ते हैं। वह अपने चालीस पचास साल के राजनैतिक जीवन में आठ दस बार विधायक चुने गए। डा0 लोहिया के घनिष्ठ और वैचारिक मित्र थे वर्मा जी। मेरठ से सांसद रहे समाजवादी नेता महाराज सिंह भारती और वर्मा जी की जोड़ी मार्क्स-एंजेल की जोड़ी कही जाती थी। घनिष्ठ वैचारिक और राजनैतिक मित्र दोनों किसान प्रष्ठभूमि से थे और सादगी, ईमानदारी, सिध्दांतों मूल्यों की राजनीति की अनुठी मिसाल। वर्मा जी आज जीवित होते तो 97 साल के होते। उनकी स्मृति को सलाम।

भगवानस्वरुप कटियार

bhagwanswaroopktr7@gmail.com

कवि लेखक, सम्पादन – ‘रामस्वरुप वर्मा समग्र’

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