चन्द्रिका राम का सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह ‘मैं भी हूँ’ समकालीन हिन्दी कविता के परिदृश्य में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यह संग्रह न केवल कवि के पूर्व प्रकाशित संग्रहों की श्रृंखला में एक नया आयाम जोड़ता है, बल्कि स्त्री विमर्श को एक नितांत मौलिक और मानवीय धरातल पर खड़ा करता है। सिमोन द बोउवार के प्रसिद्ध कथन—”स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है”—के इर्द-गिर्द घूमती ये कविताएँ घर की चारदीवारी से लेकर बाजारवाद की क्रूरता तक की यात्रा कराती हैं। यह संग्रह मुख्य रूप से नारी चेतना पर केंद्रित है। कवि ने स्त्री को प्रकृति का साक्षात् स्वरूप और परमात्मा की अनुपम कृति मानते हुए उसके असंख्य रूपों जैसे- माँ, बेटी, पत्नी, सहचरी और समाज द्वारा उपेक्षित पात्रों को शब्दों में पिरोया है। चन्द्रिका राम की कविताएँ कलात्मकता की चकाचौंध पैदा करने के बजाय पाठक के हृदय को झकझोरने और समय की लापरवाही पर उंगली उठाने का साहस करती हैं।

संग्रह में स्त्री जीवन की सच्चाइयों को पुरुष की दृष्टि से देखा गया है, जो एक प्रकार का पश्चाताप भी है और समाज के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश भी। डॉ. कुमारी रोशनी विश्वकर्मा के अनुसार, यह संग्रह उत्तर-आधुनिकता के बाजारवाद में खोते मानवीय मूल्यों और स्त्री की अस्मिता की तलाश का एक विमर्शमूलक वैचारिक मंथन है। अत: हम इस काव्य संग्रह के आवश्यक कुछ बिंदुओं पर चर्चा करते हैं:
‘सामाजिक पाखंड और स्त्री का संघर्ष‘–
कविता ‘उंगली मत उठाओ’ में कवि समाज के उन ठेकेदारों पर प्रहार करते हैं जो स्वयं अपवित्र होकर स्त्री के चरित्र पर सवाल उठाते हैं: “तुम्हारी अपवित्रता को / अपने सर लेती हूँ / तुम्हारे समाज को / तुम ही से बचाती हूँ…”
‘घरेलू हिंसा और बंधक जीवन‘–
‘औरत’ शीर्षक कविता स्त्री की नियति को चाभियों के गुच्छे और रसोई के तवे के बीच पिसते हुए दिखाती है- “चाभी के गुच्छे झूलते हैं / नाभी के थोड़े नीचे दायें भाग में… मालकिन कहलाती है / पर उस ताले की चाभी नहीं / जिसको खोलने से क्षितिज पार / खुले फलक में देख सके।”
‘उपेक्षित वर्गों की व्यथा’-
‘कंचनी पुत्र’ जैसी कविताएँ समाज की उन गलियों की बात करती हैं, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। यह कविता एक पुत्र के माध्यम से वेश्यावृत्ति के दलदल में फँसी स्त्रियों के सामाजिक और न्यायिक अधिकारों पर गंभीर प्रश्न खड़ा करती है।
‘प्रेम, स्मृति और वियोग‘–
संग्रह का उत्तरार्ध व्यक्तिगत स्मृतियों और प्रेम की गहराई से भरा है। ‘सिर्फ तुम’, ‘सिन्होरा’ और ‘तुलसी चौरा’ जैसी कविताएँ पत्नी के प्रति अगाध प्रेम और उनके जाने के बाद उत्पन्न हुए अकेलेपन की मार्मिक अभिव्यक्ति हैं। ‘सिन्होरा’ कविता में कवि लिखते हैं- “आज भी / तेरे श्रृंगार-बॉक्स से गुप्त-गू करता हूँ… तेरी यादों की चादर अभी भी सब्ज है / शीतल है मरहम है, सुरक्षा कवच है।”
‘शिल्प और भाषा-शैली’-
चन्द्रिका राम ने इस संग्रह के लिए मुक्त छंद का चुनाव किया है। उनकी भाषा प्रांजल, सहज और संप्रेषणीय है। यास्क और भरतमुनि के छन्द-सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए संग्रह की प्रस्तावना में स्पष्ट किया गया है कि बिना छन्द के वाणी स्वयं को व्यक्त नहीं कर सकती, और इस संग्रह में यह ‘छन्द’ अक्षर-अक्षर में समाया हुआ है। कवि ने भावों की शुचिता को भाषा की जटिलता से ऊपर रखा है, जिससे कविताएँ सीधे पाठक के संवाद करती हैं।
‘स्त्री: एक पूर्ण समष्टि‘–
संग्रह की सबसे सशक्त कविता ‘स्त्री तुझे नमन है’ स्त्री को केवल एक व्यक्ति (व्यष्टि) न मानकर एक पूर्ण संसार (समष्टि) के रूप में प्रतिष्ठित करती है- “स्त्री / व्यष्ठि नहीं / समष्टि है / नेत्र नहीं दृष्टि है… साहित्य की संवेदना / काव्य की आत्मा है।” यहाँ स्त्री मीरा की पदावली भी है और कबीर की साखी भी; वह प्रकृति का आधार है और संस्कृति का पाँव भी निष्कर्षत: ‘मैं भी हूँ’ केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज है जो पुरुष प्रधान समाज की विसंगतियों पर चोट करता है। चन्द्रिका राम अपनी कविताओं के माध्यम से स्त्री के उस मौन को आवाज़ देते हैं, जिसे सदियों से दबाया गया है। यह संग्रह उन सभी के लिए पठनीय है जो साहित्य में संवेदनशीलता और यथार्थ के संगम को तलाशते हैं। प्रकाशक ‘जानकी प्रकाशन’ ने पुस्तक के मुद्रण और सज्जा में गुणवत्ता का ध्यान रखा है, जो पटना और दिल्ली दोनों केंद्रों से सुलभ है। 2025 ई. का यह प्रकाशन निश्चित रूप से हिन्दी काव्य-जगत में अपनी पहचान बनाने में सफल होगा।
पुस्तक का नाम : मैं भी हूँ (हिन्दी कविता-संग्रह)
रचनाकार : चन्द्रिका राम
प्रकाशक : जानकी प्रकाशन,
मूल्य : ₹299.00 (पेपरबैक), ₹399.00 (हार्डबाउंड)

डॉ. संतोष पटेल
bhojpuriinagi@gmail.com
कवि, आलोचक, भोजपुरी भाषा आंदोलन की प्रमुख आवाज




