नेहरू से मोदी तक : अर्थशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में एक अवलोकन

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प्रस्तुत लेख में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल की तुलना करने का प्रयास किया गया है। एक का शासनकाल देश की स्वतंत्रता के तुरंत बाद प्रारम्भ हुआ, जबकि दूसरे का स्वतंत्रता के लगभग छह दशक बाद। इसलिए इन दो प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल का मूल्यांकन करना कुछ वैसा ही है, जैसे दो बागानों की तुलना करना। इसमें एक ने पौधों को लगाया और दूसरा उनसे तैयार पेड़ों पर लगे फलों का लाभ उठा रहा है। अतः दोनों सरकारों द्वारा किये गये कार्यों और अपनायी गयी नीतियों का विश्लेषण अनेक क्षेत्रों से जुड़ा है-जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र, सुशासन, आर्थिक नीतियाँ, संस्थाओं और लोकतंत्र का सुदृढ़ीकरण, संस्थागत एवं शैक्षिक गुणवत्ता तथा सरकार की अनेकों प्राथमिकता वाले विषय। इस लेख में हम कुछ महत्त्वपूर्ण नीतिगत मुद्दों तथा देश में लोकतंत्र की स्थिरता की तुलनात्मक समीक्षा करेंगे।

तकनीकी संस्थानों और नीति का विकास-

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश अनेक चुनौतियों से जूझ रहा था। साथ ही नागरिकों की अपेक्षाएँ भी अत्यंत ऊँची थीं। वे तीव्र आर्थिक विकास तथा एक समानतापूर्ण समाज की स्थापना देखना चाहते थे। हमारा मानना है कि तत्कालीन सरकार, जिसका नेतृत्व स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू (1947–1964) कर रहे थे, इन चुनौतियों और समस्याओं से पूरी तरह परिचित तथा चिंतित थी। नेहरू सरकार का दृढ़ विश्वास था कि तकनीकी शिक्षा ही वह सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम है, जो देश को तीव्र और टिकाऊ विकास के मार्ग पर ले जा सकती है। यह दृष्टिकोण केवल औद्योगिक विकास या धार्मिक संस्थाओं पर ध्यान केंद्रित करने की तुलना में अधिक प्रभावी माना गया। उस समय देश में आधारभूत अवसंरचना, प्रशिक्षित मानव संसाधन, पूंजी और अन्य आवश्यक संसाधनों का अभाव था। इन पूर्वापेक्षाओं के बिना औद्योगिक विकास पर सीधे ध्यान केंद्रित करना लगभग असंभव था।

     ऐसी परिस्थिति में तत्कालीन सरकार ने देश में तकनीकी एवं प्रबंधन शिक्षा के संस्थानों की स्थापना को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप, प्रधानमंत्री नेहरू के कार्यकाल में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) तथा भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) अस्तित्व में आए। इन पहलों के परिणाम सन् 1980 के दशक में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के उदय के साथ स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे। इन संस्थानों से शिक्षित भारतीय इंजीनियरों और प्रबंधन विशेषज्ञों ने वैश्विक सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अपनी उल्लेखनीय पहचान बनाई। इसी अवधि में इंजीनियरिंग शिक्षा का निजीकरण भी प्रारम्भ हुआ, जिसके परिणामस्वरूप विशेष रूप से दक्षिण भारत में बड़ी संख्या में निजी इंजीनियरिंग महाविद्यालय स्थापित हुए। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की सफलता से प्रेरित होकर सन् 1990 के दशक के प्रारम्भ में कांग्रेस सरकार ने शिक्षा तथा औद्योगिक उत्पादों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया। इसी क्रम में क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (Quality Council of India) तथा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (National Council for Teacher Education-NCTE) की स्थापना की गयी।

    तत्कालीन सरकार ने अनेक स्वायत्त उच्च शिक्षा संस्थानों को डीम्ड-टू-बी विश्वविद्यालय (Deemed-to-be Universities) का दर्जा भी प्रदान किया, जिससे वे उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम तैयार कर सकें तथा डिग्री एवं डिप्लोमा प्रदान कर सकें। इन सभी नीतिगत उपायों ने उच्च शिक्षा को उन विद्यार्थियों के लिए भी सुलभ बनाया, जिन्हें IIT और IIM जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश नहीं मिल पाता था। विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा के प्रति कांग्रेस सरकार की प्रतिबद्धता स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में भी जारी रही। उनके नेतृत्व में भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (Indian Institutes of Science Education and Research-IISERs) की परिकल्पना की गयी। परिणामस्वरूप भोपाल, मोहाली, पुणे, कोलकाता तथा देश के अन्य शहरों में IISER की स्थापना हुई। इस नीतिगत पहल ने न केवल देश में विज्ञान शिक्षा को प्रोत्साहित किया, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान के विभिन्न क्षेत्रों में मौलिक शोध करने के लिए युवा प्रतिभाओं को भी अवसर प्रदान किए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल-

अब बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल की। इन्होंने वर्ष 2014 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सँभाला। भारत के नागरिकों ने उन्हें इस आशा के साथ सत्ता सौंपी कि चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादे पूरे होंगे और देश में ‘अच्छे दिन’ आएँगे। किंतु बहुत शीघ्र यह महसूस होने लगा कि चुनावी नारे वास्तविकता की अपेक्षा अधिक राजनीतिक वक्तृत्व (रिटोरिक) थे। मोदी सरकार के सामने मुख्य चुनौती नए शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य एवं आधारभूत संरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के क्षेत्रों पर तत्काल ध्यान देना था। सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के प्रयास किए। उसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक चिकित्सा शिक्षा का विस्तार करना था।

यद्यपि चिकित्सा शिक्षा का निजीकरण पूर्ववर्ती सरकारों के समय ही प्रारम्भ हो चुका था, फिर भी मोदी सरकार ने सरकारी जिला अस्पतालों को अस्पताल-सह-चिकित्सा महाविद्यालय (Hospital-cum-Medical Colleges) में परिवर्तित करके चिकित्सा शिक्षा का विस्तार करने का प्रयास किया। हालाँकि इस पहल की सफलता का अभी समुचित मूल्यांकन होना शेष है, क्योंकि जिला अस्पतालों को चिकित्सा महाविद्यालयों में बदलने के लिए केवल प्रशासनिक निर्णय पर्याप्त नहीं थे ; शिक्षण अवसंरचना के निर्माण हेतु पर्याप्त निवेश की भी आवश्यकता थी। यह नीतिगत पहल निश्चित रूप से सराहनीय है, किन्तु इसकी वास्तविक सफलता के बारे में अभी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।

स्टार्टअप, कौशल विकास और अवसंरचना निर्माण की चुनौतियाँ-

वर्तमान सरकार (मोदी सरकार) के सामने एक अन्य महत्त्वपूर्ण चुनौती जैसे- आधारभूत संरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) का विस्तार, उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप कुशल कार्यबल तैयार करना तथा स्टार्टअप इकोसिस्टम को विकसित करना था। सत्ता में आने के कुछ वर्षों बाद सरकार ने स्टार्टअप इंडिया (Startup India) तथा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) जैसी अनेक योजनाएँ प्रारम्भ की। स्टार्टअप इंडिया योजना का एक प्रमुख उद्देश्य युवा उद्यमियों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना था, ताकि वे अपने व्यवसाय की मूल गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर सकें। लेखकों के द्वारा वर्ष 2017–18 में स्टार्टअप्स पर एक अध्ययन किया, जिसमें पाया गया कि अधिकांश युवा उद्यमी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से ऋण प्राप्त करने की अत्यंत जटिल और पुरानी प्रक्रियाओं, अत्यधिक नौकरशाही तथा अन्य प्रशासनिक बाधाओं के कारण इस योजना का लाभ लेने के इच्छुक नहीं थे। परिणामस्वरूप, यह योजना अपने निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप सफल नहीं हो सकी।

इसी प्रकार, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) सिद्धांततः एक अच्छी और सराहनीय योजना थी, किंतु व्यवहार में अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकी। इसके पीछे मुख्य कारण विभिन्न हितधारकों के बीच व्याप्त भ्रष्टाचार था। सरकार की भूमिका केवल वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने तक सीमित थी, जबकि योजना के क्रियान्वयन का कार्य निजी संस्थानों को सौंप दिया गया, जिन्हें कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय द्वारा मान्यता दी गई थी। यही इस योजना की सबसे बड़ी कमजोरी सिद्ध हुई।

     अनेक मामलों में क्रियान्वयन एजेंसियों ने फर्जी प्रशिक्षुओं (Fake Trainees) का विवरण प्रस्तुत कर सरकार से धन प्राप्त कर लिया। जब प्रमाणों सहित यह मामला सरकार के संज्ञान में लाया गया, तब कई वरिष्ठ अधिकारियों को या तो उनके मूल विभागों में वापस भेज दिया गया अथवा निलंबित कर दिया गया। परिणामस्वरूप, योजना का मूल उद्देश्य ही विफल हो गया। अतः कहा जा सकता है कि यह योजना मुख्यतः भ्रष्टाचार के कारण सफल नहीं हो सकी। वस्तुतः यह सामाजिक बुराई केवल वर्तमान सरकार तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूर्ववर्ती अनेक सरकारों के समय भी व्यापक रूप से विद्यमान थी।

अवसंरचना विकास और नवीकरणीय ऊर्जा-

मोदी सरकार ने आधारभूत संरचना (Infrastructure Development) के क्षेत्र में भी व्यापक अभियान प्रारम्भ किया। किंतु अन्य योजनाओं की भाँति यह प्रयास भी अपने सभी उद्देश्यों को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सका। इसका सबसे बड़ा कारण अवसंरचना निर्माण की गुणवत्ता से जुड़ी समस्याएँ रहीं। नई सड़कों का निर्माण तो हुआ, किंतु निर्माण सामग्री की निम्न गुणवत्ता के कारण अनेक सड़कें शीघ्र ही खराब होने लगीं। सरकार ने जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels) पर निर्भरता कम करने का भी प्रयास किया। इसी उद्देश्य से नवीकरणीय ऊर्जा, विशेषकर सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई गई। विभिन्न आवश्यकताओं के अनुरूप सौर ऊर्जा प्रणालियों के अनेक मॉडल विकसित किये गये। उदाहरण के लिए, बैटरी सहित सौर ऊर्जा प्रणाली उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी है, जहाँ विद्युत ग्रिड की आपूर्ति अनियमित या सीमित होती है। वहीं, बिना बैटरी वाली सौर प्रणाली उन घरों एवं संस्थानों के लिए अधिक उपयुक्त है जहाँ ग्रिड से नियमित बिजली उपलब्ध रहती है। ऐसी प्रणालियों से उत्पन्न अतिरिक्त बिजली को पुनः ग्रिड में भेजा जा सकता है।

     इस प्रकार, जब तक ग्रिड उपलब्ध रहता है, यह प्रणाली अतिरिक्त विद्युत उत्पादन करने में सक्षम होती है और अतिरिक्त बिजली ग्रिड को वापस उपलब्ध कराती है। सरकार द्वारा उपयुक्त मॉडल विकसित करने तथा सब्सिडी उपलब्ध कराने के कारण इस योजना को अपेक्षाकृत सफल कहा जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विनिमय दर-

भारत का व्यापार संतुलन (Trade Balance) ऐतिहासिक रूप से प्रायः नकारात्मक रहा है। वर्ष 1960 में व्यापार घाटा 877.80 मिलियन अमेरिकी डॉलर था। यह घाटा लगातार बढ़ता गया और वर्ष 2004 में 12.66 अरब डॉलर से बढ़कर वर्ष 2012 में 122.91 अरब डॉलर तक पहुँच गया। इसके बाद इसमें कुछ सुधार हुआ, किंतु वर्ष 2018 में व्यापार घाटा पुनः 101.66 अरब डॉलर रहा। लेखकों के अनुसार, इस अवधि में आई तीव्र गिरावट का एक प्रमुख कारण कोविड-19 महामारी थी। इसके पश्चात् स्थिति में सुधार हुआ और वर्ष 2025 तक व्यापार घाटा घटकर 68.92 अरब डॉलर रह गया। व्यापार संतुलन का आँकड़ा इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय मुद्रा (रुपया) और अमेरिकी डॉलर के बीच विनिमय दर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में से एक है। इसके अतिरिक्त मुद्रास्फीति, प्राकृतिक अथवा मानव-निर्मित आपदाएँ तथा प्रौद्योगिकी में बड़े परिवर्तन भी विनिमय दर को प्रभावित करते हैं।

      विनिमय दर के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 1947 में एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगभग 3.30 रुपये था। इसके बाद रुपये का मूल्य लगातार गिरता गया और वर्ष 2026 तक यह 95 रुपये प्रति डॉलर से अधिक हो गया। इसके विपरीत, चीन का व्यापार संतुलन 1980 के दशक की शुरुआत में थोड़ा सकारात्मक था और उसके बाद लगातार बढ़ता गया। वर्ष 2025 में चीन ने 816.19 अरब अमेरिकी डॉलर का व्यापार अधिशेष (Trade Surplus)दर्ज किया। व्यापार अधिशेष के कारण चीन अपनी मुद्रा की विनिमय दर को अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने की स्थिति में रहा। वर्ष 1981 में एक अमेरिकी डॉलर के बदले 1.61 युआन की विनिमय दर थी, जो 1994 तक बढ़कर 8.72 युआन प्रति डॉलर हो गयी। इसके बाद इसमें लगातार गिरावट आयी और जून 2026 तक यह घटकर 6.78 युआन प्रति डॉलर रह गयी।

आर्थिक विकास और असमानता-

यद्यपि भारत की अर्थव्यवस्था ने कई अन्य विकासशील देशों की तुलना में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (GDP per Capita) के संदर्भ में अपेक्षाकृत संतोषजनक प्रदर्शन नहीं किया है, फिर भी आय असमानता (Income Inequality) में समय के साथ उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। भारत का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद वर्ष 1960 में 84.93 अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2025 में 2,702.48 अमेरिकी डॉलर तक पहुँचा। इसके बावजूद आय असमानता में अपेक्षित वृद्धि नहीं देखी गई। लेखकों के अनुसार, इसका एक कारण यह हो सकता है कि देश की बड़ी आबादी का प्रति व्यक्ति आय स्तर अपेक्षाकृत कम रहा और लंबे समय तक उसमें सीमित वृद्धि हुई। इसके विपरीत, चीन तथा अन्य उच्च-आय वाले देशों में आय असमानता समय के साथ बढ़ी है। वास्तव में, अमेरिका और चीन में आय के बढ़ते स्तर ने प्रसिद्ध कुज़नेट सिद्धांत (Kuznets Theory) को भी चुनौती दी है, जिसके अनुसार आर्थिक विकास के एक चरण के बाद आय असमानता घटने लगती है।

हालाँकि भारतीय संदर्भ में स्वतंत्रता के बाद से आय असमानता में उल्लेखनीय गिरावट या वृद्धि का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। गिनी सूचकांक (Gini Index) के आँकड़े— वर्ष 1977 में 29.7 तथा वर्ष 2022 में 25.5, इस तर्क का समर्थन करते हैं कि भारत में आय असमानता अपेक्षाकृत स्थिर बनी रही है।

नीतिगत प्राथमिकताएँ और लोकतंत्र-

इस विषय में नेहरू युग और मोदी युग के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, मोदी सरकार से पूर्व की सरकारों का मुख्य ध्यान संस्थाओं के निर्माण, उनके सुदृढ़ीकरण तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण पर था। इसके विपरीत, मोदी सरकार की प्राथमिकता उन नीतियों पर अधिक केंद्रित रही, जो विश्लेषकों के अनुसार अपेक्षित स्तर तक सफल नहीं हो सकीं। ऐसी कुछ नीतिगत पहलों तथा उनकी सीमाओं का उल्लेख इस लेख के पूर्ववर्ती भागों में किया जा चुका है। पूर्ण बहुमत प्राप्त होने के बावजूद मोदी सरकार ने पहले से मौजूद संस्थाओं की गुणवत्ता और क्षमता को सुदृढ़ करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत, उनके अनुसार वर्तमान शासन व्यवस्था के दौरान कुछ लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपेक्षाकृत कमजोर हुई हैं। उदाहरणस्वरूप, विश्लेषकों का तर्क है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) के चयन की प्रक्रिया व्यवहारतः सत्तारूढ़ दल के प्रभाव में आ गई है, जबकि इसे अधिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। इसी प्रकार, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) को अधिक विधायी अधिकार दिए जाने से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रवाह में हेरफेर की संभावनाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

     आर्थिक नीतियों को अधिक मजबूत बनाने के स्थान पर किसी एक विशेष धर्म की धार्मिक संस्थाओं को अपेक्षाकृत अधिक महत्व देने से लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित हुआ है। उनके अनुसार, इससे समाज के विभिन्न वर्गों में एक प्रकार का अदृश्य असंतोष उत्पन्न हो सकता है, जो भारतीय लोकतंत्र के लिए दीर्घकाल में हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

अवसर जो चूक गये..

वर्तमान वैश्विक तकनीकी प्रगति का प्रमुख आधार कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence–AI) है। विश्लेषकों के अनुसार, इस क्षेत्र में भारत की वैश्विक उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए वैसी दूरदर्शी और केंद्रित रणनीति दिखायी नहीं देती जैसी 1980 के दशक में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के उदय के समय अपनायी गयी थी। यद्यपि फरवरी 2026 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, फिर भी विश्लेषकों का मानना है कि केवल ऐसे सम्मेलन भारत का स्वयं का AI मॉडल विकसित करने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ तथा अडानी एंटरप्राइजेज जैसी कुछ भारतीय कंपनियों ने देश में डेटा सेंटर स्थापित करने के प्रस्ताव दिए हैं, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने भारत के अपने स्वतंत्र AI मॉडल विकसित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। डेटा सेंटर मुख्यतः उन AI मॉडलों के उपयोग और प्रशिक्षण के लिए आवश्यक हैं, जो अन्य देशों में विकसित किए गए हैं तथा जिन्हें भारतीय आँकड़ों (डेटा) के आधार पर प्रशिक्षित किया जा सकता है। इस क्षेत्र में भी चीन अमेरिका को कड़ी चुनौती दे रहा है। इसके विपरीत, विश्लेषकों के अनुसार अब तक किसी भी भारतीय कंपनी ने वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी स्वदेशी AI मॉडल विकसित नहीं किया है।

     यदि समय रहते इस दिशा में ठोस और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में भारत को विदेशी AI मॉडलों के उपयोग के लिए भारी आर्थिक एवं तकनीकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

कौशलेश लाल
klal.mails@gmail.com

प्रख्यात अर्थशास्त्री

शम्पा पॉल
shampa.paul147@gmail.com

सेंटर फॉर इकोनॉमिक एण्ड सोशल रिसर्च

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