मोदी का भारत : क्या यह नेहरूवादी विरासत का परिणाम है?

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    भारत की स्वतंत्रता की पूर्व-संध्या पर अपने ऐतिहासिक भाषण ‘नियति से साक्षात्कार’ (Tryst with Destiny) में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि, ‘स्वतंत्र भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती गरीबी, अशिक्षा, अज्ञान, बीमारी और अवसरों की असमानता का उन्मूलन है।’ यह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की घोषणा नहीं थी, बल्कि एक ऐसे सामाजिक-आर्थिक भारत का स्वप्न था, जहाँ प्रत्येक नागरिक को सम्मान, समान अवसर और न्यायपूर्ण जीवन प्राप्त हो। आज स्वतंत्रता के लगभग आठ दशकों बाद यह प्रश्न पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है कि क्या भारत उस स्वप्न के निकट पहुँचा है? दुर्भाग्य से जिन समस्याओं को नेहरू ने तत्काल समाप्त किए जाने योग्य माना था, वे आज भी हमारे जीवन का हिस्सा हैं। इतना ही नहीं, इनके साथ धार्मिक कट्टरता, सामाजिक घृणा, वैचारिक असहिष्णुता तथा मानवीय संवेदना के क्षरण जैसी नई चुनौतियाँ भी जुड़ गई हैं।

आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास को यदि किसी दो व्यक्तित्वों के बीच विकसित हुई वैचारिक यात्रा के रूप में देखा जाए, तो वे निस्संदेह जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी हैं। स्वतंत्र भारत की राजनीति, शासन और विकास की दो सबसे प्रभावशाली विचारधाराएँ इन्हीं दोनों नेताओं के नेतृत्व में आकार ग्रहण करती हैं। दोनों अलग-अलग युगों, अलग-अलग वैचारिक परंपराओं और अलग-अलग राजनीतिक संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, फिर भी इनके नेतृत्व में एक गहरी समानता दिखाई देती है। वह समानता यह है कि दोनों ही भारत की मूल सामाजिक शक्ति-संरचना और उसकी ऐतिहासिक असमानताओं, जातिगत वर्चस्व, आर्थिक विषमताओं और स्थानीय सत्ता-संबंधों को निर्णायक रूप से बदलने में सफल नहीं हुए। परिणामस्वरूप, आम जनता की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक क्षमताएँ उनके भव्य राजनीतिक नारों, विकास-दृष्टि और राष्ट्रीय अभियानों के अनुरूप विकसित नहीं हो सकीं। भारत में सामाजिक लोकतंत्र जो राजनीतिक लोकतंत्र को स्थायित्व प्रदान करता है, आज भी अधूरा है।

इसके संदर्भ में इस लेख का उद्देश्य नेहरू और मोदी दोनों की विरासत का आलोचनात्मक मूल्यांकन करना है। पहला भाग नेहरू के विरासत की समीक्षा करता है, दूसरा भाग यह विश्लेषित करेगा कि मोदी का राजनीतिक उदय किन ऐतिहासिक परिस्थितियों में संभव हुआ तथा तीसरा भाग भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए कुछ वैकल्पिक दिशाओं का प्रस्ताव करेगा।

नेहरू की अक्षम्य भूलें-

यह स्वीकार करना होगा कि जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माण में बहुत ही महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व थे। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना, धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी राज्य की अवधारणा, योजनाबद्ध आर्थिक विकास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार, उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना तथा गुटनिरपेक्ष विदेश नीति के माध्यम से उन्होंने नवस्वतंत्र भारत को एक स्थिर दिशा प्रदान की। इन उपलब्धियों को नकारना न तो उचित है और न ही इतिहास सम्मत। किन्तु किसी भी ऐतिहासिक व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उनसे हुई चूकों और उनके दीर्घकालिक प्रभावों से भी किया जाता है। इस कसौटी पर देखें तो नेहरू की कुछ बुनियादी भूलों ने भारत के विकास की दिशा को गहराई से प्रभावित किया है।

स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी परियोजना राष्ट्र-निर्माण की थी। राष्ट्र-निर्माण केवल नए उद्योग, बाँध, सड़कें और संस्थान बनाना नहीं था, बल्कि इसका अर्थ उन सामाजिक संरचनाओं को भी बदलना था, जो सदियों से असमानता, वर्चस्व और बहिष्कार जैसी कुरीतियों को बनाए हुए थीं। दूसरे शब्दों में, राष्ट्र-निर्माण जितना निर्माण का कार्य है, उतना ही अन्यायपूर्ण परंपराओं के विघटन का भी कार्य है। यहीं नेहरू की सबसे बड़ी ऐतिहासिक सीमा सामने आती है। एक शिक्षित, अभिजात और सामंती-ब्राह्मण पृष्ठभूमि से आने के कारण वे भारतीय समाज की गहरी संरचनात्मक असमानताओं को पूरी तरह चुनौती नहीं दे सके। विशेष रूप से चार क्षेत्रों में उनकी नीतिगत कमजोरियाँ अत्यंत गंभीर सिद्ध हुईं—

  • कृषि और ग्रामीण भारत की उपेक्षा।
  • प्राथमिक शिक्षा की अनदेखी।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य को पर्याप्त महत्त्व न देना।
  • जाति और भूमि पर आधारित पारंपरिक सामाजिक शक्ति-संरचना को लगभग यथावत रहने देना।

इन चारों कमियों ने आगे चलकर भारत के लोकतांत्रिक विकास को गहराई से प्रभावित किया।

कृषि और ग्रामीण भारत की उपेक्षा-

नेहरू की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल कृषि और ग्रामीण भारत को अपेक्षित प्राथमिकता न देना थी। स्वतंत्रता के समय भारत की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर थी। भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं थी; बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक शक्ति और राजनीतिक प्रभाव का आधार भी थी। यदि व्यापक भूमि सुधार, कृषि निवेश और ग्रामीण उत्पादकता को राष्ट्रीय विकास का केंद्र बनाया जाता, तो इससे गरीबी, खाद्य संकट और ग्रामीण विषमता-तीनों का समाधान संभव होता। इतना ही नहीं, कृषि से उत्पन्न अधिशेष औद्योगीकरण की भी मजबूत आधारशिला बन सकता था। किन्तु नेहरू ने औद्योगीकरण को प्राथमिकता देते हुए कृषि क्षेत्र को अपेक्षाकृत पीछे छोड़ दिया। उन्होंने उद्योगों में समाजवादी हस्तक्षेप की बात की, लेकिन गाँवों की सामंती शक्ति-संरचना को दृढ़ता से चुनौती नहीं दी। इसका एक कारण उनका अभिजात दृष्टिकोण हो सकता है, परंतु उससे भी अधिक कारण तत्कालीन कांग्रेस की चुनावी राजनीति थी, जो बड़े भू-स्वामियों और ग्रामीण प्रभुत्वशाली वर्गों पर निर्भर थी। फलतः भारत का ग्रामीण समाज लंबे समय तक पुरानी असमानताओं और सत्ता-संतुलन के साथ चलता रहा।

प्राथमिक शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य की उपेक्षा

नेहरू ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) तथा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) जैसे विश्वस्तरीय संस्थानों की स्थापना कर आधुनिक भारत की उच्च शिक्षा को मजबूत आधार दिया। यह उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण था। दूसरी ओर, सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। आज विकासशील अर्थशास्त्र का लगभग सर्वसम्मत निष्कर्ष है कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसके स्वस्थ और शिक्षित नागरिक होते हैं। यदि प्राथमिक शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य की मजबूत व्यवस्था प्रारंभिक दशकों में विकसित कर दी जाती, तो भारत की उत्पादकता, सामाजिक गतिशीलता और आर्थिक प्रगति कहीं अधिक व्यापक और समावेशी होती।

सामाजिक लोकतंत्र का अधूरा सपना-

कांग्रेस अपने प्रारंभिक काल से ही वैचारिक रूप से विरोधाभासी संगठन रही। उसमें एक ओर सामाजिक परिवर्तन के समर्थक थे, तो दूसरी ओर गहरे रूढ़िवादी और यथास्थितिवादी तत्व भी मौजूद थे। नेहरू इन दोनों प्रवृत्तियों के बीच निर्णायक संघर्ष का नेतृत्व नहीं कर सके। परिणामस्वरूप स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान किए गए अनेक सामाजिक सुधार अधूरे रह गए और भारत में सामाजिक लोकतंत्र की जड़ें मजबूत नहीं हो सकीं।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में जिस विरोधाभास की ओर संकेत किया था—”राजनीतिक समानता के साथ सामाजिक और आर्थिक असमानता का सह-अस्तित्व”, वह आज भी भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। नेहरू की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विफलता शायद यही थी कि उन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र की संस्थाएँ तो स्थापित कीं, परंतु सामाजिक लोकतंत्र की आधारभूमि को पर्याप्त मजबूती नहीं दे सके। यही अधूरापन आगे चलकर भारतीय राजनीति की नई दिशाओं और नए नेतृत्व के उदय का कारण बना।

मोदी का उदय—क्या यह नेहरूवादी विरासत का परिणाम था ?

यदि भारत की सामाजिक और राजनीतिक संरचना का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि नरेंद्र मोदी का उदय किसी ऐतिहासिक दुर्घटना का परिणाम नहीं था। यह उस राजनीतिक, सामाजिक और संस्थागत विरासत की स्वाभाविक परिणति था, जिसकी नींव स्वतंत्रता के बाद के दशकों में पड़ी थी। जिस भारत को नेहरू ने आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में निर्मित करने का प्रयास किया, उसी भारत की कुछ बुनियादी कमजोरियों ने अंततः मोदी के नेतृत्व के लिए सामाजिक और राजनीतिक आधार तैयार किया।

नेहरू के समय से चली आ रही कई संरचनात्मक समस्याएँ : सामाजिक शक्ति-संतुलन में असमानता, व्यापक अशिक्षा, जातिगत वर्चस्व, सांप्रदायिक पूर्वाग्रह, राज्यों के अधिकारों पर केंद्र का बढ़ता नियंत्रण तथा विकास के लाभों का असमान वितरण धीरे-धीरे भारतीय लोकतंत्र की कमजोरियाँ बन गईं। इन परिस्थितियों में जनता का एक बड़ा वर्ग स्वयं को उस आधुनिक भारत से अलग-थलग महसूस करने लगा, जिसका वादा स्वतंत्रता के समय किया गया था। इसी पृष्ठभूमि में नरेंद्र मोदी ने स्वयं को परिवर्तन, निर्णायक नेतृत्व और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने विकास, राष्ट्रवाद और सशक्त नेतृत्व के सम्मिलित विमर्श के माध्यम से उस जनाकांक्षा को राजनीतिक स्वर दिया, जो लंबे समय से व्यवस्था से असंतुष्ट थी। इस दृष्टि से देखा जाए तो मोदी का राजनीतिक उदय नेहरूवादी परियोजना की कुछ अधूरी और अनसुलझी समस्याओं पर ही आधारित था। किन्तु सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने भी उन मूलभूत संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने का व्यापक प्रयास नहीं किया। इसके विपरीत, कई मामलों में ऐसी नीतियाँ और राजनीतिक प्रवृत्तियाँ उभरीं जिन्होंने पहले से मौजूद सामाजिक विभाजनों को और अधिक तीखा बना दिया।

लेखक का तर्क है कि आज का भारत उस राजनीतिक ढाँचे की ओर बढ़ता दिखाई देता है जिसे राजनीतिक सिद्धांतकार वेंडी ब्राउन ने ‘नवउदारवाद, नव-रूढ़िवाद और लोकतंत्र-विहीनता’ (Neoliberalism–Neoconservatism–De-democratisation) की त्रयी के रूप में व्याख्यायित किया है।

नवउदारवादी अर्थव्यवस्था और बढ़ती असमानता-

मोदी सरकार ने आर्थिक विकास के लिए बाज़ार-उन्मुख नीतियों, निजीकरण तथा बड़े कॉरपोरेट निवेश को प्राथमिकता दी। इन नीतियों से आर्थिक वृद्धि के कुछ संकेत अवश्य मिले, डिजिटल अवसंरचना का विस्तार हुआ और भारत की वैश्विक आर्थिक छवि मजबूत हुई। किन्तु दूसरी ओर, संपत्ति का संकेंद्रण कुछ बड़े औद्योगिक समूहों के हाथों में बढ़ता गया। रोजगार सृजन अपेक्षाकृत धीमा रहा, युवाओं में बेरोज़गारी चिंता का विषय बनी रही और असंगठित क्षेत्र अनेक झटकों से कमजोर हुआ। ग्रामीण भारत तथा कृषि क्षेत्र भी अनेक चुनौतियों से जूझते रहे। यहां लेखक का मत है कि, यदि आर्थिक विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्गों तक न पहुँचे, तो वह लोकतांत्रिक वैधता को कमजोर करने लगता है। विकास का वास्तविक उद्देश्य केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अवसरों का विस्तार भी होना चाहिए।

लोकतांत्रिक संस्कृति का क्षरण-

 लेख में यह भी तर्क दिया गया है कि हिंदू राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभाव ने भारतीय लोकतंत्र की प्रकृति को प्रभावित किया है। लेखक के अनुसार, इससे धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक वर्गों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है और सार्वजनिक जीवन में आलोचना तथा असहमति के लिए उपलब्ध लोकतांत्रिक स्थान अपेक्षाकृत संकुचित हुआ है।

जब किसी लोकतंत्र में सरकार की आलोचना को राष्ट्र-विरोध या सुरक्षा के प्रश्न के रूप में देखा जाने लगे, तब लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता; वह असहमति, बहस, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत जवाबदेही पर भी आधारित होता है। लेखक का मत है कि इन मूल्यों के क्षरण से लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिक तो बना रहता है, किंतु उसकी आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।

उपलब्धियाँ और उनकी सीमाएँ-

लेखक यह स्वीकार करता है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कई महत्त्वपूर्ण सरकारी योजनाएं आरंभ हुईं। इसमें स्वच्छ भारत अभियान, जन धन योजना, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) जैसी योजनाओं ने प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने और वित्तीय समावेशन को मजबूत करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। इन उपलब्धियों को नकारना वस्तुनिष्ठ विश्लेषण नहीं होगा।

फिर भी लेखक का आग्रह है कि किसी राष्ट्र की सफलता का मूल्यांकन केवल योजनाओं और कार्यक्रमों की संख्या से नहीं किया जा सकता। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या उन नीतियों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक उत्तरदायी बनाया? क्या सत्ता के दुरुपयोग को रोकने वाले संस्थागत तंत्र मजबूत हुए? क्या नागरिक के स्वतंत्रता का विस्तार हुआ? क्या समाज अधिक समान, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक लोकतांत्रिक बना? यदि इन प्रश्नों का उत्तर संतोषजनक नहीं है, तो विकास की उपलब्धियाँ भी अधूरी मानी जाएँगी।

सामाजिक लोकतंत्र की अधूरी यात्रा-

लेखक का निष्कर्ष है कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस जिस सामाजिक लोकतंत्र की मजबूत आधारशिला का निर्माण नहीं कर सकी, उसी रिक्तता पर आज नवउदारवादी राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण की प्रवृत्तियाँ मजबूत होती दिखाई देती हैं।

दूसरे शब्दों में, भारत का वर्तमान संकट केवल किसी एक नेता या एक सरकार का परिणाम नहीं है; यह लंबे ऐतिहासिक क्रम में विकसित हुई उन संस्थागत और सामाजिक कमजोरियों का परिणाम है जिन्हें समय रहते दूर नहीं किया गया। नेहरू ने जिन संरचनात्मक प्रश्नों को अधूरा छोड़ा, मोदी भी उनका निर्णायक रूप से हल नहीं दे सके। इसलिए भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ राजनीतिक परिवर्तन से अधिक आवश्यकता सामाजिक और संस्थागत पुनर्निर्माण की है।

निष्कर्ष :

नेहरू और मोदी, दोनों अपने-अपने समय के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्व रहे हैं। दोनों ने भारत की दिशा को गहराई से प्रभावित किया है; दोनों के खाते में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ भी हैं और गंभीर सीमाएँ भी। इतिहास का दायित्व न तो किसी नेता का महिमामंडन करना है और न ही उसका पूर्ण निषेध करना। इतिहास का उद्देश्य यह समझना है कि किन निर्णयों ने राष्ट्र को आगे बढ़ाया और किन चूकों ने उसके विकास को बाधित किया।

भारतीय गणराज्य का भविष्य किसी एक नेता, दल या विचारधारा से अधिक इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या भारत एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का निर्माण कर पाता है, जिसमें सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, संस्थागत उत्तरदायित्व, संवैधानिक नैतिकता और नागरिक स्वतंत्रता केवल आदर्श न रहकर शासन की वास्तविक आधारशिला बन सकें। यदि स्वतंत्रता का अधूरा वादा पूरा करना है, तो भारत को व्यक्तित्व-आधारित राजनीति से आगे बढ़कर संस्थाओं, नागरिक चेतना और सामाजिक लोकतंत्र को केंद्र में रखना होगा। यही वह मार्ग है जो भारतीय गणराज्य को अधिक न्यायपूर्ण, अधिक समावेशी और अधिक टिकाऊ लोकतंत्र की ओर ले जा सकता है।

डॉ. साज़िद इक़बाल अख्तर

sazidequbalakhtar@jamiahamdard.ac.in

असिस्टेंट प्रोफेसर जामिया हमदर्द नई दिल्ली

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