सिनेमा की राजनीति : नेहरू से मोदी तक

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उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में सिनेमा अपने शैशवा अवस्था में था। अब सवा सौ साल पूरे हो चुके हैं। संख्या, गुणवत्ता और तकनीकि दृष्टियों से बॉलीवुड फ़िल्में समृद्ध हुई हैं। भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल के सिनेमा का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने का एक प्रयास यहाँ करेंगे। राजनीति और सिनेमा के आपसी संबंधों को देखें तो प्रयास कई देशों में उनके शासकों ने सिनेमा को एक वैचारिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। सिनेमा दृश्य-श्रव्य प्रभावी मनोरंजन माध्यम है, जिसका प्रभाव एक साथ बहुत बड़ी जनसंख्या पर पड़ता है। सिनेमा की इस ताकत को शासक वर्ग के लोग बहुत अच्छे से जानते हैं। इसीलिए जर्मनी से लेकर सोवियत संघ तक के शासकों ने सिनेमा की शक्ति को पहचाना और उसका अपने लाभ के लिए उपयोग किया हिटलर से लेकर स्टालिन तक ने सिनेमा को अपने सत्ता की वैचारिकी के प्रचार प्रसार के एक टूल के रूप में उपयोग किया।

भारत देश में देखें तो सिनेमा का उद्भव अंग्रेजी शासन काल में हो गया था और शुरुआती दौर में ज्यादातर फिल्में यहां के मिथकीय-धार्मिक चरित्रों को आधार बनाकर निर्मित की जा रही थीं। तीस और चालीस के दशक में सामाजिक विषयों पर भी फिल्मों का निर्माण आरंभ हो गया था; ब्रिटिश राज से आजादी मिलने के बाद जब जवाहरलाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने। सन् 1947 में जब धार्मिक-साम्प्रदायिक आधार पर देश का विभाजन हुआ, तो उस दौर के सिनेमा ने भारत-पाकिस्तान विभाजन देश की गरीबी बेरोजगारी साधनों की कमी और हिंदू मुस्लिम एकता को ध्यान में रखते हुए कई फिल्मों का निर्माण किया। ऐसे में देश के पुनर्निर्माण के लिए कई संदेश परक महत्त्वपूर्ण फिल्में भी बनाई गयीं, हालांकि आजादी के पहले दो महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व जैसे महात्मा गांधी और सरदार पटेल का दृष्टिकोण सिनेमा के प्रति नकारात्मक था। उनका मानना था कि सिनेमा व्यक्ति को पथभ्रष्ट करता है और वह उचित माध्यम नहीं है। इसके ऊपर प्रतिबंध तक लगाने की बात उन लोगों ने कही।

अंग्रेजों के शासनकाल में सिनेमा की ताकत को देखते हुए उसके ऊपर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए और सेंसरशिप की गयी। इस संबंध में लिखते हुए भौमिक की टिप्पणी है कि “pre independent Indian cinema had to negotiate 3 forces the colonial sensor, the freedom movement and the conservative Outlook up some top nationalist leaders. The British we are worried that the liberal and socialist impact of English American and Russian cinema would influence the Indian mind even the liberal English press thought so”(Bhaumik 1992:178-96). इसी क्रम में अंग्रेजों ने 1921 में रिलीज हुई साइलेंट फिल्म ‘भक्त विदुर’ को प्रतिबंधित कर दिया था। इस फिल्म में विदुर के चरित्र को महात्मा गांधी से समरूपता दिखाते हुए चित्रित किया गया था। जो खादी पहनता है, गांधी टोपी लगाता है और चरखा चलता है। महाभारत के चरित्र विदुर का गांधी से साम्य दिखाने के कारण अंग्रेजों ने इस फिल्म को प्रतिबंधित कर दिया था। सन् 1947 तक पहुंचते-पहुंचते इस देश में हिंदू-मुस्लिम दंगे तथा द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत पर भारत और पाकिस्तान दो हिस्सों में देश के बंटवारे जैसी परिस्थितियों ने दोनों समुदायों के बीच घृणा नफरत और कट्टरता के भाव पैदा कर दिए थे। फिल्मकारों ने इस दौर में सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान किया और दोनों समुदायों के बीच प्यार, मोहब्बत और सह अस्तित्व बढ़ाने के लिए कई फिल्में बनाया। उदाहरणार्थ-शांताराम ने सन् 1941 में ‘पड़ोसी’ शीर्षक फिल्म बनायी, जिसमें हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच सामंजस्य और सद्भाव को बढ़ाने का संदेश मजबूती के साथ प्रस्तुत किया गया था। इस फिल्म में जिन अभिनेताओं ने भूमिकाएं निभायी, उसमें मुस्लिम समुदाय के अभिनेता को हिंदू चरित्र और हिंदू समुदाय के अभिनेता को मुस्लिम चरित्र निभाने को दिया गया था। जो दोनों समुदायों के बीच दूरी कम करने का सराहनीय प्रयास था।

गांधी जी अपनी आत्मकथा में बताते हैं कि ‘बचपन में बायस्कोप में सत्य हरिश्चन्द्र की कथा देखने के बाद वे सच बोलने को प्रेरित हुए।’ लेकिन वे सिनेमा जैसे प्रभावशाली माध्यम के विरोधी रहे। हिंदी सिनेमा के 25 वर्ष पूरे होने पर इंडियन सिनेमैटोग्राफी कमेटी ने जब महात्मा गांधी से फिल्म देखने और उस अवसर पर उनकी उपस्थिति के लिए निवेदन किया तो गांधी जी के सेक्रेटरी महादेव देसाई ने बताया कि गांधी जी की सिनेमा में बहुत ही कम रुचि है। अपने एक इंटरव्यू में गांधी जी ने सिनेमा के बारे में कहा था, “even if I was so minded I should be unfit to answer your questionnaire as I have never been to a cinema but even to an outsider the evil that it has done and is doing is patent it is not surprising that he would refuse to watch even Achhut Kanya (1936) which talked about his most favourite theme the eradication of untouchability. Its producer Himanshu Rai’s several efforts in this regard failed” (Guha,2007:721-38). सरदार वल्लभभाई पटेल जो की नेहरू की सरकार में प्रथम सूचना मंत्री थे (1946-1949), उन्होंने भी सिनेमा के बारे में नकारात्मक टिप्पणियां की। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के प्रोग्राम में तवायफों और मुस्लिम गायकों और संगीतकारों के कार्यक्रमों के प्रसारण पर रोक लगा दी थी (Lelyveld 1994:721-22)। उस दौर के कई नेताओं ने जैसे के. एम. मुंशी, लीलावती मुंशी आदि ने सदन के अंदर और बाहर सिनेमा का विरोध किया। परन्तु जब हम नेहरू और सिनेमा से उनके संबंध और सिनेमा के बारे में उनके विचारों पर चर्चा करते हैं तो पाते हैं कि नेहरू अपने समकालीन नेताओं से इस मामले में अलग थे। उनके कई फिल्म निर्माताओं और नायक-नायिकाओं से अच्छे संबंध थे तथा वे अच्छे संदेशपरक सिनेमा निर्माण के पक्षधर थे। उन्होंने और अपने स्तर से भारतीय सिनेमा को आगे बढाने में सहयोग किया। दिलीप कुमार, देवानंद और राजकपूर के साथ नेहरु जी के करीबी सम्बन्ध थे। नेहरू के दौर में मुख्य रूप से राज कपूर, देवानंद और दिलीप कुमार जैसे नायक अपनी फिल्मों के माध्यम से नेहरूवादी समाजवाद को फिल्मों का केंद्रीय विषय बनाकर देश और समाज को संदेश देने का काम कर रहे थे और साथ ही जनता का मनोरंजन भी कर रहे थे। कहा जाता है कि एक समय विजय आनंन्द ने इन तीनों नायकों को लेकर ‘त्रिमूर्ति’ नाम से फिल्म बनाने की सोची थी लेकिन तीनों में पहला कौन होगा यह तय न होने के कारण फिल्म नहीं बन सकी। दिलीप कुमार के संबंध में मेघनाथ देसाई लिखते हैं, “In Nehru Dilip Kumar that one should look at politics through the prism of cinema (Desai2004 :10).    

नेहरु ने सिनेमा के उभार, विस्तार और विकास में हर संभव प्रयास किया और सन्देश परक फिल्मों का निर्माण करने हेतु निर्माता-निर्देशकों को प्रोत्साहित किया। डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता अरुणा वासुदेव अपनी किताब ‘द न्यू इंडियन सिनेमा’(1986) में लिखती हैं कि “1951 तक सिनेमा को एक अनैतिक उत्पाद समझा जाता रहा।” सन् 1949 में नेहरु ने फिल्म इन्क्वारी कमेटी का गठन किया। जिसने फिल्म उद्योग की वस्तुस्तिथि से अवगत कराते हुए लिखा, “Under Nehru’s leadership, the government laid the foundation for cataclysmic changes in Indian cinema, which included the formation of the Film Finance Corporation (FCC) in 1960 and the establishment of the Film and Television Institute of India (FTII) in 1960.” नेहरु ने सिनेमा को शिक्षा के एक साधन और देश की पहचान स्थापित करने वाले माध्यम के रूप में स्वीकार किया। जनवरी 1952 में प्रथम इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन भाषण में बोलते हुए नेहरु जी ने सिनेमा के क्षेत्र में और अधिक सांस्कृतिक हस्तक्षेप पर जोर दिया था। उनका मानना था कि फिल्मों का लोगों के जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए सही विषयवस्तु आधारित सिनेमा बनाना बहुत जरुरी है। फिल्मों के माध्यम से कला और सौन्दर्यात्मक मूल्यों को बढ़ावा देना चाहिए, “Film has become a powerful influence in people’s lives. It can educate them rightly or wrongly…I mean that they should introduce artistic and aesthetical values in life and encourage the appreciation of beauty in all its aspects. I hope that films which are just sensational or melodramatic or such as make capital out of crime, will not be encouraged. If our film industry keeps this ideal before it, it will encourage good taste and help pave its own way in the building of a new India (Cherian2017).

जवाहर लाल नेहरु के प्रधानमंत्रित्व काल में जो सिनेमा बना उसमें समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिक सद्भाव, एवं अन्य लोकतांत्रिक मुद्दों को प्रोत्साहित करने वाले विषय प्रमुख रहे और ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इन्सान बनेगा’ (धूल का फूल 1951) जैसे गाने द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत पर विभाजित हुए भारत देश के अंदर शांति और सद्भाव का सन्देश देने का काम कर रहे थे। सन् 1950 और 1960 के दशक के सिनेमा में सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी को दूर करने के लिए संघर्ष, आशावाद एवं वंचित समाज के चरित्रों को सिनेमा के माध्यम से चित्रित करने का काम फिल्मकारों ने किया। राजकपूर ने चार्ली चैपलिन के मशहूर खानाबदोश चरित्र ‘ट्रैम्प’ से प्रेरणा लेकर ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ जैसी फ़िल्में बनायी,जिनमें ग्रामीण, गरीबी, कर्ज और पूंजीवादी लालच को मुख्य मुद्दा बनाया गया। बिमल रॉय ने ‘दो बीघा जमीन’ बनाकर किसानों से जमीन छीनकर उन्हें पलायन करने, मजदूर बनने और कर्ज में डूबने की कहानी प्रस्तुत की। उस दौर के प्रमुख पटकथा लेखक के. ए. अब्बास ने पलायन-पुनर्स्थापन, भ्रष्टाचार, गरीबी जैसे गंभीर मुद्दों पर फ़िल्में लिखीं। राजकपूर, दिलीप कुमार और देवानंद उस दौर के सांस्कृतिक दूत थे। दिलीप कुमार नेहरू के सबसे बड़े प्रशंसक थे और उन्होंने गांधीवाद और समाजवाद पर केन्द्रित कई फिल्मों में काम किया। देवानंद ने एक मॉडर्न शहरी नवयुवक की भूमिका को लोकप्रिय बनाया जो संवैधानिक लोकतान्त्रिक मूल्यों को जी रहा था।

नेहरु एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण किताबें लिखीं। उनके जीवन और उनके लिखे साहित्य पर देश-विदेश में फ़िल्में और वृत्तचित्र बनाये गये। नेहरु के विचारों से प्रेरित होकर न केवल फ़िल्में बनायीं गयीं बल्कि देश-विदेश में कई फिल्म और वृत्तचित्रों में उनके चरित्र को परदे पर चित्रित भी किया गया। नेहरु का चरित्र जिन फिल्मों में दिखाया गया है वे कुछ इस प्रकार हैं: गाँधी (हॉलीवुड 1982), नेहरु डाक्यूमेंट्री (1984 श्याम बेनेगल), प्राइम मिनिस्टर नेहरु इन हॉलीवुड (1961), नेहरु (हॉलीवुड 1962), नेहरु (1984-सोवियत यूनियन), नेहरु द ज्वेल ऑफ़ इंडिया (1990), सरदार (1993), स्वातंत्र्य वीर सावरकर (2024). इस तरह कई फिल्मों और टीवी सीरिज में नेहरु के चरित्र को फिल्माया गया है। टीवी सीरिज ‘द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ (श्याम बेनेगल) में रोशन सेठ ने नेहरु की भूमिका की। ‘संविधान’ (2014) भारतीय संविधान के निर्माण पर आधारित इस सीरिज में राजेन्द्र गुप्ता ने नेहरु की भूमिका निभाई।

मोदी काल और सिनेमा-

मेरा मानना है कि प्रत्येक सरकार के अपने वैचारिक समर्थक भी होते हैं और वह राजनीति, साहित्य, विज्ञान और सिनेमा सभी क्षेत्रों में पाये जाते हैं। किसी सत्ता के समर्थक बुद्धिजीवी लोग अपने लेखन, बयानों और फिल्म निर्माण के माध्यम से सरकार, उसकी नीतियों एवं कार्यों का समर्थन करते देखे सुने जाते हैं। कभी-कभी तो वे सीधे राजनीतिक क्षेत्र में उतरकर स्वयं चुनाव भी लड़ते हैं और अपनी लोकप्रियता के सहारे चुनाव जीत भी जाते हैं। सिनेमा के क्षेत्र में भी जैसे नेहरू के समय में दिलीप कुमार, देवानंद और राजकपूर नेहरू और उनके समाजवाद धर्मनिरपेक्षवाद, समानता, बड़े उद्योंगों का समर्थन एवं शांति और वैश्विक भाईचारे की बात फिल्मों में प्रस्तुत करते थे। मोदी सरकार के समय में अक्षय कुमार, अनुपम खेर, कंगना राणावत, आदित्य धर, अजय देवगन, अदा शर्मा, यमी गौतम, पल्लवी जोशी, जॉन अब्राह्म, स्मृति ईरानी, विवेक अग्निहोत्री, रवि किशन, मनोज तिवारी, दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, पवन सिंह  जैसे कुछ कलाकार निरंतर सराकर की विचारधारा और कार्यों को समर्थन देते रहते हैं। ये अपने फिल्मों के माध्यम से ऐसे विषय वस्तु का चित्रण करते हैं, जिससे सरकार, उसकी विचारधारा और उसकी नीतियों का समर्थन हो। उपर्युक्त में से कई कलाकार तो चुनाव लड़कर सांसद-विधायक भी बन चुके हैं। चूँकि कलाकार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक पहचान और प्रभाव रखते हैं, इसलिए उनकी कही हुई बातों का जनमानस के बड़े हिस्से पर असर पड़ता है। प्रख्यात समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने सत्ता के विभिन्न स्वरूपों का विश्लेषण करने के क्रम में प्रभाव (effect) की अवधारणा का वर्णन कवियों, लेखकों, कलाकारों के संदर्भ में किया था। जनता प्रभावशाली लोगों बातों को ध्यान से सुनती है, हालांकि उनके पास कोई लीगल पावर नहीं होता लेकिन प्रभाव होता है और उस प्रभाव से वे जनता के सोचने समझने के तरीके को इनफ्लुएंस करते हैं। सोशल मिडिया के जमाने में ‘सोशल इन्फ़्लुएन्सर’ की नयी श्रेणी अस्तित्व में आई है। प्रायः ऐसा देखा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स से कभी-कभी मिलते हैं, उनसे बात करते हैं और उनके माध्यम से उनके फॉलोअर्स तक अपनी पहुंच सुनिश्चित करते हैं। यदि हम मोदी काल (2014 के बाद) के सिनेमा को देखे तो जो फ़िल्में सरकार की नीतियों और कार्यों को समर्थन देने के लिए बनाई गयीं और जिन फिल्मों को सरकार ने एंडोर्स किया है। उन फिल्मों का टैक्स फ्री भी किया गया तथा शहरों और गाँवों में सरकार के सहयोगी संगठनों ने इन फिल्मों के प्रचार-प्रसार करने का ज़िम्मा अपने ऊपर लेकर दर्शकों से इन फिल्मों को देखने के लिए जिस तरह से अपील की है, वह अभूतपूर्व है। इस दौर में ‘महाराज’ (2024), ‘फुले’ (2025) और ‘सतलुज’ (2026) को अपनी रिलिजिंग के लिए मुकदमे लड़ने पड़े। यद्यपि ये फ़िल्में सच्ची घटनाओं पर आधारित थीं, लेकिन इनके विषय वस्तु से एक जाति विशेष की छवि खराब होने के आरोप लगाये जा रहे थे। मोदी काल में जिन फिल्मों का निर्माण विशेष रूप से किया गया वे हैं –

बाजीराव मस्तानी (2015), अवरोध (2016), पद्मावत (2018), चलो जीते हैं (डाक्यूमेंट्री 2018), मोदी: जर्नी ऑफ़ अ कॉमन मैन (डाक्यूमेंट्री 2019), पानीपत (2019), मणिकर्णिका द क्वीन ऑफ़ झाँसी (2019), मिशन मंगल (2019), उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक (2019), द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर (2019), पीएम नरेन्द्र मोदी (2019), केसरी (2019 एवं 2025), तानाजी (2020), शेरशाह (2021), रामसेतु (2022), द कश्मीर फाइल्स (2022), द केरल स्टोरी (2023), आदि पुरुष (2023), तेजस (2023), ग़दर-2 (2023), द साबरमती रिपोर्ट्स (2024), जहाँगीर नेशनल यूनिवर्सिटी (जेएनयू 2024), फाइटर (2024), ऑपरेशन वैलेंटाइन (2024), आर्टिकल 370 (2024),  डिप्लोमेट (2025), इमरजेंसी (2025), छावा (2025), धुरंधर (2026), हक (2026).  

सन् 2014 के पहले ‘पीके’ (2014) और ‘ओ माय गॉड’ (2012) जैसी तार्किक-सामाजिक फिल्में बॉलीवुड में बन रहीं थीं परन्तु उसके बाद और धार्मिक-पौराणिक कथाओं, स्थलों, राष्ट्रवाद केन्द्रित फ़िल्में ज्यादा संख्या में बनने लगीं। हिंदू-मुसलमान को दो अलग-अलग परस्पर विरोधी समूह के रूप में देखने की प्रवृत्ति के साथ-साथ उनके बीच बढ़ती हुई कटुता और दूरी साफ-साफ नजर आने लगी। सर्जिकल स्ट्राइक जैसी घटनाओं के साथ नए भारत में यह नारा प्रचलित हुआ कि ‘यह नया भारत है घर में घुस के मारता है’। धुरंधर (2026) जैसी फिल्मों ने भारत की इंटेलिजेंस और गुप्तचर सेवाओं में काम करने वाले अधिकारियों के पराक्रम को दिखाने का काम किया। इन फिल्मों में ढेर सारी हिंसा, मारपीट, गाली-गलौज भी दिखाई गई। नौकरशाह, सेना के बड़े अधिकारी और राजनेताओं के सामूहिक निर्णयों से आतंकी समूहों की गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाने जैसे विषयों पर कई फ़िल्में बनाई गयीं। इन सब के बीच कुछ फिल्मकारों ने ऐसी फ़िल्में भी बनायी, जिनमे सांप्रदायिक सौहार्द, भारतीयता, भारतीय संविधान और परंपरागत भारतीय मूल्यों को मुख्य रूप से चित्रित किया गया है। महाराज (2024), फुले (2025) और जून 2026 में रिलीज हुई फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ है, जिसे इम्तियाज अली ने निर्देशित किया है। इसके पूर्व भी बजरंगी भाईजान (2015), हैप्पी भाग जाएगी (2016), फिल्मिस्तान (2012) जैसी फ़िल्में भारत और पाकिस्तान के आम पब्लिक के बीच के सामान्य संबंधों और मानवीय पहलुओं को दिखाने का काम करती है। सन् 2004 में ‘वीर जारा’ भी ऐसी ही फिल्म थी, जिसे यश चोपड़ा साहब ने निर्देशित किया था‌। ‘मैं वापस आऊंगा’ फिल्म के माध्यम से इम्तियाज अली ने 95 साल के एक ऐसे सिख पृष्ठभूमि के सिख की कहानी चित्रित की है, जो भारत-पाकिस्तान बंटवारे का शिकार होकर लाहौर से दिल्ली आकर बस जाते हैं। लेकिन उनके मन में एक याद अटकी हुई है, अपने बचपन की प्रेमिका मल्लिका दिल फरेब की। प्रेम किसी भी सीमा रेखा का मोहताज नहीं होता। जिससे हम जुड़ाव रखते हैं, उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता और लगाव महसूस करते हैं। जिम्मेदारी महसूस करते हैं। उससे बिना अनुमति लिए दो देशों की सीमा रेखा का बंधन तो क्या दुनिया से जाना भी स्वीकार नहीं करते। यह फिल्म 1947 में देश के विभाजन के दौर में हुई भयानक हिंसा और पलायन जैसे निर्णय को कटघरे में खड़ा करती है। यह फिल्म पूरी दुनिया में नस्ल और धार्मिक विद्वेष के आधार हो रहे युद्धों और हिंसा के सामने सवाल खड़ा करती है। यूक्रेन और रूस का युद्ध, ईरान अमेरिका और इजराइल का युद्ध, जहां कहीं भी मानवता के खिलाफ, कमजोर लोगों के खिलाफ युद्ध हो रहे हैं और निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं, विकलांग हो रहे हैं, अपने घरों से पलायन करने को मजबूर हैं वहां ‘कमाल है, कमाल है’ के गाने के बोलों से सवाल खड़ा किया गया है। आज के दौर में ऐसी ढेर सारे फिल्मों और साहसी फिल्मकारों की जरूरत है जो मानवता को समर्पित फिल्मों का निर्माण करते रहें और जनता को परस्पर प्रेम का सन्देश दें, ना की जाति और धार्मिक विद्वेष और हिंसा का। समय की यह मांग है कि लोकतान्त्रिक और साम्प्रदायिक सद्भाव वाली फिल्मों का निर्माण भारत की गंगा जमुनी तहजीब और विविधतापूर्ण विरासत को कमजोर करने का काम किया है.

Reference

V.K. Cherian is the author of ‘India’s Film Society Movement: The Journey and its Impact’, published by Sage in 2017. He is a senior media professional and film society activist.

Cherian, V.K. (2017) Jawaharlal Nehru and the Rise of Indian Cinema, on http://www.sahapedia.org.

Ghosh, Partha S. (2019) Nehruvian Cinema and Politics, India International Centre Quarterly, Autumn 2019, Vol. 46, No. 2, pp.90-99.

Sharma, Rajat (2026) From Mangoes to Missile Strikes: Cinema and the Political Aesthetics of Modi’s India, in Public Humanities, Cambridge University Press, UK.

शिवानी राकेश

फिल्म लिटरेचर

विशेषज्ञ

shivani.nirajnan@gmail.com

शिवानी राकेश की दो चर्चित कृतियाँ ‘सिनेमा को पढ़ते हुये’ और ‘सिनेमा के मुद्दे-मुद्दों का सिनेमा’ प्रकाशित हो चुकी है.                                                    

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