एक सरल किंतु असहज आंकड़ों पर विचार कीजिए. वर्ष 2024 में भारत का घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन लगभग 29 मिलियन मीट्रिक टन था, जबकि उसका आयात 242 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँचा. यह अंतर, जो पिछले एक दशक से हर वर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है, यही भारत की ऊर्जा स्टोरी का सार है. ऐसे समय में, जब विश्व व्यवस्था ऊर्जा संक्रमण की गति से कहीं अधिक तेजी से भू-राजनीतिक रेखाओं के आधार पर विखंडित हो रही है, यह अंतर केवल एक आर्थिक समस्या नहीं रह जाता बल्कि यह एक गंभीर रणनीतिक चुनौती बन जाता है।
वर्ल्ड एनर्जी काउंसिल -2026 के Issues Monitor ने (जो 100 से अधिक देशों के लगभग 3,000 ऊर्जा विशेषज्ञों के विचारों पर आधारित है), निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि आज वैश्विक ऊर्जा संक्रमण का प्रमुख चालक अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि भू-राजनीति है. भारत इस वास्तविकता को कठिन तरीके से अनुभव कर रहा है. एक ओर रूस के साथ अपने तेल व्यापार पर बढ़ते प्रतिबंधों के दबाव को संभालना पड़ रहा है, दूसरी ओर होरमुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग का सक्रिय संघर्ष क्षेत्र में परिवर्तित होना ऊर्जा सुरक्षा को अस्थिर कर रहा है, और साथ ही यह भी स्पष्ट है कि भारत की हरित ऊर्जा संक्रमण की परियोजनाएँ उन खनिजों पर निर्भर हैं जिनका प्रसंस्करण एक रणनीतिक प्रतिद्वंदी के नियंत्रण में है. इन तीनों दबावों के बीच नई दिल्ली जिस प्रकार संतुलन स्थापित करेगी, वही आगामी दो दशकों तक देश की आर्थिक दिशा को निर्धारित करेगा।
फरवरी 2022 तक रूस भारत के कुल कच्चे तेल आयात का मात्र लगभग 2.5 प्रतिशत ही आपूर्ति करता था. किन्तु वित्तीय वर्ष 2024-25 तक यह हिस्सा बढ़कर लगभग 36 प्रतिशत हो गया, जिससे रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया और इराक और सऊदी अरब को पीछे छोड़ दिया. जब पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण यूरोपीय खरीदार देशों के हटने के बाद रूस द्वारा ब्रेंट मूल्य से भारी छूट पर उपलब्ध कराया गया तेल भारतीय रिफाइनरियों को वह लाभ दे रहा था जो अन्यत्र संभव नहीं था. एक अनुमान के अनुसार, 2022-23 के दौरान छूट के चरम पर भारतीय रिफाइनरियों को प्रति बैरल लगभग 12 डॉलर तक का लाभ हुआ, और इन बचतों ने उन वर्षों में भारत के चालू खाते के घाटे को उल्लेखनीय रूप से कम करने में सहायता की. रॉसनेफ्ट और Lukoil मिलकर भारत के रूसी कच्चे तेल आयात का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित करते हैं. नवंबर 2025 में अमेरिका द्वारा इन दोनों कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारतीय रिफाइनरियों को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में तत्काल कदम उठाने पड़े. रिलायंस इंडस्ट्रीज़ जैसी कंपनियों ने प्रतिबंधित संस्थाओं से अपने ऑर्डर कम किए और सऊदी अरब तथा इराक की ओर रुख किया. दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी दो वर्षों में पहली बार 25 प्रतिशत से नीचे गिर गई. इसी दौरान अमेरिका ने भारत के रूसी तेल आयात के संदर्भ में प्रतिक्रिया स्वरूप भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत तक शुल्क भी लगाए, और डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से आश्वासन दिया है कि भारत रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद कर देगा. नई दिल्ली ने इस दावे का खंडन किया. यह पूरा घटनाक्रम भारत की स्थिति की मूलभूत नाजुकता को उजागर करता है. ऐसी आपूर्ति रणनीति अभी दूसरे देश की भू-राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न अवसर पर आधारित हो तो यह उतनी ही स्थायी होती है जितनी वह अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति जो उसे संभव बनाती है।
भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक और जटिल समस्या आ खड़ी हुई है. देश का रिफाइनिंग क्षेत्र अब रूसी कच्चे तेल पर इस प्रकार निर्भर हो गया है कि उससे तुरंत बाहर निकलना आसान नहीं है. उदाहरण के लिए, नयारा एनर्जी, जो वाडिनार में भारत की दूसरी सबसे बड़ी रिफाइनरी संचालित करती है, का 49 प्रतिशत स्वामित्व रोसनेफ्ट के पास है. जुलाई 2025 में यूरोपीय संघ द्वारा इस कंपनी पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद, विविधीकरण करने के बजाय उसने रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता और बढ़ा दी, क्योंकि अनुपालन के दृष्टिकोण से उसके पास खोने के लिए बहुत कम बचा था. यह उस प्रकार की संस्थागत जकड़न (institutional lock-in) का उदाहरण है, जिसे नीतिगत ढाँचे आसानी से और शीघ्रता से बदल नहीं सकते. व्यापक रूप से देखा जाए तो रूस की ओर झुकाव एक रणनीति नहीं, बल्कि एक सामरिक उपाय था और सामरिक उपाय अल्पकाल में उपयोगी होते हुए भी दीर्घकाल में नई निर्भरताएँ उत्पन्न कर देते हैं।
होर्मुज़ की समस्या भी ऐसी है जो समाप्त होने वाली नहीं है. ईरान संघर्ष से पहले भारत के लगभग आधे कच्चे तेल आयात, प्रतिदिन लगभग 2.5 मिलियन बैरल, से होकर गुजरते थे. यद्यपि यह अनुपात अक्सर चर्चाओं में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है, फिर भी किसी व्यवधान की स्थिति में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है. इससे भी अधिक गंभीर एक ऐसी संवेदनशीलता है, जिस पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है. भारत के लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी आयात भी इसी मार्ग से होकर गुजरते हैं. एलपीजी भारत के करोड़ों घरों के लिए रसोई ईंधन है, इसलिए होर्मुज़ में किसी भी अवरोध का प्रभाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी गहरा होगा. विश्लेषण प्रायः कच्चे तेल पर केंद्रित रहता है, जबकि एलपीजी की निर्भरता अधिक तात्कालिक सामाजिक जोखिम उत्पन्न करती है. संघर्ष के तीव्र होने के बाद भारत ने शीघ्रता से वैकल्पिक मार्गों की ओर रुख किया. सरकार ने घोषणा की कि अब 70 प्रतिशत कच्चा तेल आयात होर्मुज़ के बाहर से प्राप्त किया जा रहा है, जो पहले 55 प्रतिशत था. इसके लिए रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, लैटिन अमेरिका और पश्चिमी अफ्रीका से आपूर्ति सुनिश्चित की गई. यह कदम कूटनीति और लॉजिस्टिक्स की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि था, किंतु इसके साथ लागत भी बढ़ी. अमेरिका जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले जहाजों को 25 से 45 दिन लगते हैं, जबकि खाड़ी से यह समय केवल 5 से 7 दिन होता है. इससे परिवहन और बीमा लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई. साथ ही, 2025-26 के अधिकांश समय तक 62 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच स्थिर रहने वाली भारतीय कच्चे तेल की कीमत मार्च 2026 तक बढ़कर 113 डॉलर प्रति बैरल हो गई. औसत कीमत में प्रत्येक 10 डॉलर की वृद्धि भारत के वार्षिक आयात बिल में लगभग 12 से 13 अरब डॉलर की वृद्धि करती है और चालू खाते के घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 0.3 प्रतिशत तक बढ़ा देती है।
हालांकि आपूर्ति के विविधीकरण के प्रयास संतोषजनक हैं. इराक, कुवैत और क़तर जैसे प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं के पास होर्मुज़ को दरकिनार करने के लिए पाइपलाइन विकल्प उपलब्ध नहीं हैं. सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और संयुक्त अरब अमीरात की अबू धाबी पाइपलाइन मिलकर केवल लगभग 2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन की क्षमता प्रदान करती हैं, जबकि सामान्यतः होर्मुज़ जलमार्ग से लगभग 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल गुजरता है. अतः भारत केवल विविधीकरण के माध्यम से इस निर्भरता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता।
नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं. जनवरी 2025 तक सौर ऊर्जा क्षमता 100 गीगावाट को पार कर गई और नवंबर तक लगभग 133 गीगावाट तक पहुँच गई. मध्य-2025 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता देश की कुल स्थापित क्षमता के 50 प्रतिशत से अधिक हो गई, जो पेरिस समझौते के लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले था. 29 जुलाई 2025 को एक दिन में नवीकरणीय स्रोतों ने देश की 51.5 प्रतिशत बिजली मांग पूरी की. फिर भी इन आँकड़ों के पीछे एक महत्वपूर्ण वास्तविकता छिपी है. सौर ऊर्जा संयंत्र औसतन केवल 20 प्रतिशत क्षमता पर चलते हैं, जबकि कोयला आधारित संयंत्र लगभग 60 प्रतिशत क्षमता पर. परिणामस्वरूप, स्थापित क्षमता में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी होने के बावजूद वास्तविक बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा का योगदान लगभग 25 प्रतिशत ही है, जबकि लगभग 70 प्रतिशत आपूर्ति अब भी कोयले से होती है. यह अंतर केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि भारत के ऊर्जा क्षेत्र की केंद्रीय चुनौती है, जिसे वितरण कंपनियों (DISCOMs) की वित्तीय कमजोरी और भी जटिल बनाती है।
देश की राज्य स्तरीय विद्युत वितरण कंपनियाँ लगातार वित्तीय संकट में हैं. उनका कुल घाटा लगभग 80 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है और उत्पादकों को देय बकाया 6 से 9 अरब डॉलर के बीच रहा है. ऐसी स्थिति में वे बड़े पैमाने पर नई ऊर्जा परियोजनाओं का समर्थन करने में सक्षम नहीं हैं. जब भुगतान क्षमता संदिग्ध होती है, तो निवेशकों का जोखिम बढ़ता है, वित्तपोषण महँगा होता है और परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित होती है. इसी कारण नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने 2026-27 के लिए निविदाओं की गति अस्थायी रूप से धीमी करने का संकेत दिया, क्योंकि उत्पादन क्षमता ग्रिड की वहन क्षमता से अधिक तेजी से बढ़ रही थी. इसका अर्थ यह नहीं कि नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा गलत है, बल्कि यह कि भारत अभी उस संक्रमण के मध्य चरण में है जहाँ उत्पादन क्षमता तो बढ़ गई है, परंतु संचरण, भंडारण और संस्थागत ढाँचा अभी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुआ है. कोयला निकट भविष्य में समाप्त होने वाला नहीं है. वर्ष 2025 में कोयला आधारित उत्पादन में 3 प्रतिशत की गिरावट आई, जो आधी सदी में दूसरी बार हुआ, और यह गिरावट आंशिक रूप से मौसम के कारण थी, न कि संरचनात्मक परिवर्तन के कारण. सरकार आने वाले वर्षों में लगभग 100 गीगावाट नई कोयला क्षमता जोड़ने की योजना बना रही है।
ऊर्जा संक्रमण ने एक नई निर्भरता भी उत्पन्न की है-महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता. पवनचक्की और विद्युत मोटरों के लिए दुर्लभ पृथ्वी चुंबक, बैटरियों के लिए लिथियम और भंडारण प्रणालियों के लिए कोबाल्ट आवश्यक हैं. इन खनिजों के प्रसंस्करण का अधिकांश हिस्सा चीन में केंद्रित है. अप्रैल 2025 में चीन द्वारा दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों का प्रभाव तत्काल दिखाई दिया. मारुति सुजुकी को अपने पहले इलेक्ट्रिक वाहन के उत्पादन लक्ष्य को दो-तिहाई तक घटाना पड़ा, जबकि बजाज ऑटो ने उत्पादन रुकने की चेतावनी दी. इस घटना ने उस आपूर्ति-श्रृंखला की कमजोरी को उजागर किया, जिसे भारत ने सैद्धांतिक रूप से स्वीकार तो किया था, पर व्यावहारिक रूप से पर्याप्त कदम नहीं उठाए थे. एक ओर भारत आयातित हाइड्रोकार्बन पर निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह एक ऐसे विद्युत वाहन क्षेत्र का निर्माण कर रहा है जो लगभग पूरी तरह उन खनिजों पर निर्भर है जिनका नियंत्रण एक रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के पास है. चीन वैश्विक दुर्लभ पृथ्वी प्रसंस्करण का लगभग 90 प्रतिशत नियंत्रित करता है. भारत ने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में आपूर्ति सुनिश्चित करने के प्रयास प्रारंभ किए हैं, किंतु यह प्रक्रिया दीर्घकालिक है और घरेलू प्रसंस्करण क्षमता अभी पर्याप्त नहीं है. 2025 की यह घटना एक अपवाद नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित चुनौतियों का संकेत है।
रणनीतिक स्वायत्तता की रूपरेखा : विखंडित विश्व में भारत की ऊर्जा रणनीति
भारत की आधिकारिक नीति इस पूरे परिदृश्य में “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित है अर्थात् यह अधिकार कि वह अपनी राष्ट्रीय हितों के अनुरूप, जिस देश से चाहे, जिस मूल्य पर चाहे, बिना किसी एक शक्ति-गुट के दबाव में आए ऊर्जा संसाधनों की खरीद कर सके . यह दृष्टिकोण न केवल तार्किक है, बल्कि भारत जैसे विशाल और उभरते राष्ट्र के लिए वैध भी है. किंतु समस्या यह है कि जब विश्व तेजी से प्रतिस्पर्धी शक्ति-गुटों में विभाजित हो रहा हो और प्रत्येक गुट नीतिगत संरेखण (alignment) की अपेक्षा कर रहा हो, तब रणनीतिक स्वायत्तता बिना लागत के संभव नहीं रहती. वास्तविकता मे इस स्वायत्तता की कीमत चुकानी पड़ती है. अमेरिका ने भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद को व्यापार वार्ताओं और शुल्क निर्धारण से जोड़ा, यूरोपीय संघ ने रूसी स्वामित्व के कारण नयारा एनर्जी पर प्रतिबंध लगाए, और अमेरिकी नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद रोकने का आश्वासन दिया है. ये केवल सैद्धांतिक दबाव नहीं हैं, बल्कि इनके ठोस आर्थिक परिणाम सामने आते हैं—भारतीय निर्यात पर उच्च शुल्क, यूरोप के साथ व्यापार करने वाली रिफाइनरियों के लिए अनुपालन जोखिम, तथा रूसी संस्थाओं से जुड़े वित्तीय लेन-देन में बाधाएँ।
भारत इन परिस्थितियों का सामना उल्लेखनीय कुशलता से कर रहा है. उसकी आर्थिक और राजनीतिक क्षमता उसे वह प्रभाव (leverage) प्रदान करती है, जो छोटे देशों के लिए संभव नहीं. इसी प्रभाव का उपयोग करते हुए भारत ने पश्चिमी देशों के पीछे हटने पर रूसी तेल खरीदा, अस्थिर समुद्री मार्गों के बावजूद आपूर्ति सुनिश्चित की, और एक ऐसे गैर-संरेखित खरीदार की छवि बनाई जिसका बाजार वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं के लिए आकर्षक है. परंतु यह समझना आवश्यक है कि प्रभाव और स्थायित्व (resilience) समान नहीं होते. प्रभाव बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर करता है, जबकि स्थायित्व आंतरिक संरचनाओं और क्षमताओं से निर्मित होता है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विश्लेषणों के अनुसार, वैश्विक तेल मांग 2050 तक बढ़ती रहेगी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत के लिए आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कोई अस्थायी समस्या नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक संरचनात्मक वास्तविकता है. जब भारत पहले से ही अपनी लगभग 88 प्रतिशत तेल आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर है, तो इस निर्भरता का प्रबंधन एक स्थायी रणनीतिक चुनौती बन जाता है. विखंडित विश्व में ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ भी बदल गया है. पहले यह माना जाता था कि खुले बाजार, विविध आपूर्तिकर्ता और मूल्य संकेत यह सुनिश्चित करेंगे कि जो देश भुगतान करने में सक्षम है, उसे ऊर्जा मिल जाएगी. अब यह धारणा कमजोर पड़ रही है. प्रतिबंध, द्वितीयक शुल्क, रणनीतिक भंडारण और व्यापार के राजनीतिक उपयोग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल आर्थिक क्षमता पर्याप्त नहीं है; इसके साथ संबंधों, अवसंरचना, भंडारण क्षमता और संस्थागत मजबूती की भी आवश्यकता है।
भारत का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार इस संदर्भ में सीमित है. वर्तमान में यह लगभग 5.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल को विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर स्थित भूमिगत भंडारों में संग्रहित करता है, जो मौजूदा खपत स्तर पर लगभग 9.5 दिनों की आवश्यकता को पूरा करता है. यदि वाणिज्यिक भंडारों को भी शामिल किया जाए, तो कुल कवरेज लगभग 74 दिनों तक पहुँचती है, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों 90 दिनों की अनुशंसित सीमा से कम है. संकट की स्थिति में यही अंतर सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है. यद्यपि भंडारण क्षमता के विस्तार की योजना स्वीकृत हो चुकी है, उसका क्रियान्वयन अभी शेष है. आपूर्ति के स्तर पर विविधीकरण एक उचित रणनीति है-अमेरिका, लैटिन अमेरिका और पश्चिमी अफ्रीका से अधिक आयात, तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग. किंतु सीमांत स्तर पर विविधीकरण और संरचनात्मक स्थायित्व में अंतर है. भारत की रिफाइनरियाँ दशकों से खाड़ी क्षेत्र और हाल के वर्षों में रूस के तेल के अनुरूप विकसित हुई हैं. इस संरचना को बदलना समय, निवेश और दीर्घकालिक अनुबंधों में बदलाव की मांग करता है।
घरेलू उत्पादन की स्थिति भी उत्साहजनक नहीं है. वर्ष 2011 के बाद से भारत का कच्चे तेल का उत्पादन लगातार घटा है और वर्तमान में यह लगभग 29 मिलियन मीट्रिक टन पर स्थिर है, जबकि खपत 230 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक है. सरकार ने 2030 तक उत्पादन को 35 मिलियन मीट्रिक टन तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है, किंतु इस दिशा में प्रगति धीमी है और अतीत के अनुभव यह संकेत देते हैं कि इन लक्ष्यों को प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण होगा।
इस प्रकार यथार्थ यह है कि भारत आने वाले समय में एक बड़ा और संरचनात्मक रूप से आयात-निर्भर ऊर्जा उपभोक्ता बना रहेगा. यह किसी नीति विफलता का परिणाम नहीं, बल्कि एक विकसित होती अर्थव्यवस्था की स्वाभाविक स्थिति है. चुनौती इस निर्भरता को समाप्त करने की नहीं, बल्कि इसे ऐसे विश्व में प्रबंधित करने की है जो लगातार अधिक अनिश्चित और अस्थिर होता जा रहा है. इसके लिए आवश्यक है कि ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च रणनीतिक प्राथमिकता के रूप में देखा जाए, जिसमें तेल व्यापार, विद्युत क्षेत्र, महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाएँ और वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति सभी को एकीकृत रूप से नियोजित किया जाए. इन्हें वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों की ध्यान में रखते हुए एक समन्वित ढाँचे में लाना भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती के रूप मे उपस्थित है।

डॉ. तारिक़ मसूद
असिस्टेंट प्रोफेसर, वेस्ट एशियन एण्ड नॉर्थ अफ्रीकन स्टडीज, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़




