पश्चिम एशिया संघर्ष:  भारत में उर्वरक संकट और खाद्य सुरक्षा

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पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमला करने और ईरान द्वारा जवाबी हमले के कारण पूरे पश्चिम एशिया और उसके अन्य महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्रों जैसे होर्मूज़ जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) और लाल सागर स्थित स्वेज़ कैनाल से होने वाले अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापरमें एक बड़ी रुकावट आयी है. पिछले एक महीने से भी अधिक समय से चल रहे इस युद्ध के कारण दुनिया का हर क्षेत्र और देश खासकर दक्षिण एशिया अत्यधिक रूप से प्रभावित हुए हैं. होर्मुज़ जलडमरूमध्य इरानी तट के साथ स्थित एक संकरा लेकिन राजनीतिक और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जो दुनिया के34 प्रतिशत कच्चे तेल, 25 प्रतिशत रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद, 20 प्रतिशत तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG), 25 प्रतिशत तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG), 30 प्रतिशत वैश्विक यूरिया और 20 प्रतिशत अमोनिया/फोस्फेट और अन्य कच्चे माल जैसे एल्युमीनियम, सल्फर, हीलियम इत्यादि के आवागमन को सरल बनाता है. जैसा कि हम सभी जानते हैं, भारत अपनी उर्जा, उद्योग और कृषिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए उपर्युक्त वर्णित उत्पादों के एक महत्वपूर्ण हिस्से को इसी जलमार्ग द्वारा पश्चिम एशिया के कई देशों से आयात करता है.इस परिप्रेक्ष्य में यह समझना महत्वपूर्ण है कि देश की कृषि और इसकी उत्पादकता के लिए जरुरी तैयार उर्वरकों और इसके कच्चे माल के आयात के लिए इसी क्षेत्र पर मुख्य रूप से निर्भर करता है. इस युद्ध के छिड़ने और इसके लम्बे खिंचने के कारण आगामी खरीफ मौसम के समय खेती के लिए जरुरी उर्वरकों की उपलब्धता पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है जो कि देश में कृषि उत्पादकता में गिरावट, लागत-जनित मुद्रास्फीति, ग्रामीण आय में संकुचन और खाद्य असुरक्षा कि स्थिति पैदा कर सकती है.

उर्वरकों का आयात, उत्पादन और खपत

आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार खेती में परंपरागत रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले रासायनिक उर्वरक यूरिया, डीएपी और पोटाश म्यूरेट हैं. भारत में वर्ष 2024-25 में नाइट्रोजनस उर्वरक (यूरिया) कि कुल खपत 221.5 लाख टन थी जिसमें 169.6 लाख टन यूरिया का उत्पादन देश में किया गया जबकि 37.4 लाख टन यूरिया का आयात किया गया जो कि कुल खपत का लगभग 17 प्रतिशत था. इसी तरह वर्ष 2024-25 में फोस्फेटिक उर्वरक (डीएपी) की कुल खपत 84 लाख टन थी जिसमें देशी उत्पादन सिर्फ 51.1 लाख टन था और 26 लाख टन फोस्फेटिक उर्वरकों का आयत किया गया जो कुल खपत का 31 प्रतिशत था. पोटाश आधारित उर्वरकों की खपत पूरी करने के लिए भारत पूरी तरह आयात पर ही निर्भर है और वर्ष 2024-25 में पोटाश आधारित उर्वरकों की कुल खपत का अधिकतर हिस्सा आयात से ही पूरा किया गया. इस तरह वर्ष 2024-25 में कुल खपत हुए 329.3 लाख टन एनपीके उर्वरकों में से 220.7 लाख टन उर्वरकों का उत्पादन देश में किया गया जबकि 88.4 लाख टन उर्वरकों का आयात किया गया जो कि कुल उर्वरक खपत का लगभग 26.8 प्रतिशत था.

एक अनुमान के अनुसार 2025-26 में उर्वरकों के सभी प्रकारों की कुल खपत 707 लाख टन थी. इनमें यूरिया (388 लाख टन) डीएपी (93 लाख टन) एनपीके –काम्प्लेक्स (142 आख टन), पोटाश (22 लाख टन) और सिंगल सुपर फास्फेट (एसएसपी) (49.3 लाख टन) शामिल हैं. इन उर्वरकों की कुल खपत में से 516 लाख टन उर्वरकों का उत्पादन देश में ही किया गया जबकि 191 लाख टन उर्वरकों का आयात किया गया जो कि कुल खपत का 27.1 प्रतिशत था. भारत द्वारा 2025-26 में खपत की गयी कुल यूरिया का 21 प्रतिशत, डीएपी की कुल खपत का आधा हिस्सा, पोटाश उर्वरक की खपत का पूरा हिस्सा और एनपीके-काम्प्लेक्स का 19 प्रतिशत आयात किया गया. भारत अपने कुल तैयार यूरिया आयात का 75 प्रतिशत और डीएपी आयात का अधिकतर हिस्सा गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी), जिनमें ओमान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (युएई) और क़तर शामिल हैं, से करता है. इसी तरह देश में उर्वरकों के उत्पादन के लिए अधिकतर प्लांट कच्चे माल का आयात पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों से करते हैं. जैसे लिक्विफाईड नेचुरल गैस (एलएनजी) के कुल आयात का 30-40 प्रतिशत हिस्सा देश में यूरिया और अन्य उर्वरकों के उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है जो कि क़तर, युएई, ओमान और सऊदी अरब से आयात किया जाता है. इसीतरह यूरिया और डीएपी के उत्पादन के लिए होने वाले अमोनिया आयात का 80 प्रतिशत हिस्सा सऊदी अरब, क़तर, युएई और ईरान से आता है. डीएपी और एनपीके-काम्प्लेक्स के उत्पादन में प्रयोग होने वाले फोस्फेटिक एसिड का आयात जॉर्डन, सऊदी अरब और मोरक्को से किया जाता है. रॉक फोस्फेट, जो कि सिंगल सुपर फोस्फेट (एसएसपी) और डीएपी के उत्पादन के लिए कच्चे माल के रूप में किया जाता है, का आयात जॉर्डन और मिश्र से होता है. इसी तरह सल्फर, जो कि फोस्फेटिक उर्वरकों के उत्पादन में प्रयोग होता है, के आयात का 70 प्रतिशत युएई, सऊदी अरब और क़तर से आता है. उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि भारत अपनी उर्वरक जरूरतों (चाहे वे तैयार उर्वरक हों या उनके कच्चे माल हों) को पूरा करने के लिए पश्चिम एशिया के कई देशों पर निर्भर है. पश्चिम एशिया में युद्ध के फलस्वरूप होर्मुज़ स्ट्रेट के पूर्ण या आंशिक रूप से बंद होने से इन जरुरी आयातों में कमी आयी है. इसका तात्कालिक परिणाम यह होगा कि आगामी खरीफ फसलों की खेती के लिए जरुरी उर्वरकों कीआपूर्ती में बाधा आएगी क्योंकि इन उर्वरकों और उनके कच्चे माल का अधिकतर आयात इसी जलमार्ग से होता है.

उर्वरक उत्पादन पर प्रभाव

तैयार उर्वरकों और उनके कच्चे माल के आयात में बाधा होने का असर यह भी है कि अमेरिका और इजराइल के हमलों के जवाब में ईरान ने पश्चिम एशिया के तमाम देशों के इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादन इकाइयों पर लगातार हमले किये हैं जिसके कारण सप्लाई चेन में बड़ी रुकावट आयी है. इन हमलों में क़तर के मेसईद और रास लाफान प्लांट पर हमले और इसके फलस्वरूप एलएनजी और उससे संबंधित पदार्थों का उत्पादन बंद हो गया है. लन्दन-आधारित सीआरयू रिसर्च ग्रुप के अनुसार क़तर की इन इकाइयों से भारत 44 प्रतिशत एलएनजी का आयात करता था जो अब लगभग बंद है. इस कारण भारत के सभी 32 अमोनिया-यूरिया प्लांट, जो गैस आधारित इकाइयां है, प्रभावित हुई हैं. सीआरयू रिसर्च ग्रुप के अनुसार गैस की आपूर्ति में आई इस कमी ने भारत में कई उर्वरक उत्पादन इकाइयों को परिचालन संबंधी बदलाव करने के लिए मजबूर किया है. घरेलू उत्पादकों जिनमें इफको (IFFCO) शामिल है, ने अपना परिचालन आंशिक रूप से बंद कर दिया है. अन्य घरेलू उर्वरक निर्माताओं, जैसे चम्बल फर्टिलाईजर्स एंड केमिकल्स, कृभको (KRIBHCO) और गुजरात नर्मदा वैली फर्टिलाईजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड शामिल हैं, ने कथित तौर पर अपने परिचालन में बदलाव किया है या प्लांट आंशिक रूप से बंद किये हैं.उर्वरक बाजार के विश्लेषकों जैसे सीआरयू ग्रुप और आरगस मीडिया के अनुसार यदि आपूर्ति चेन में बाधा जारी रहती है तो भारत के 25 लाख मेट्रिक टन मासिक उत्पादन में तीन से आठ लाख टन की गिरावट आ सकती है. यह युद्ध यदि और खिंचता है, जैसा कि प्रतीत हो रहा है, तो आयात मार्ग की बाधाओं और अपर्याप्त उत्पादन और भण्डारण के कारण उर्वरकों की आपूर्ति में व्यापक व्यवधान आने की संभावना है जिससे कृषि कार्य अभूतपूर्व ढंग से प्रभावित हो सकते हैं.

उर्वरक संकट से निपटने के उपाय

27 मार्च 2026 की सरकारी प्रेस विज्ञप्ति (पीआईबी) के अनुसार उर्वरक संयंत्रों को गैस आपूर्ति बढाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 9 मार्च 2026 को प्राकृतिक गैस (आपूर्ति विनियमन) आदेश, 2026 के तहत उर्वरक संयंत्रों को ‘प्राथमिकता क्षेत्र -2’ में वर्गीकृत किया है. यह आदेश सुनिश्चित करता है कि उर्वरक संयंत्रों को उनके औसत प्राकृतिक गैस उपभोग के कम से कम 65 प्रतिशत गैस मिलती रहे. इसके तहत सरकार ने सभी सरकारी और निजी कंपनियों को निरंतर संयंत्र संचालन बनाये रखने का हर संभव प्रयास करने का निर्देश दिया है. उर्वरक क्षेत्र की आपूर्ति को और बढ़ाने के लिए 18 मार्च 2026 से 31 मार्च 2026 की अवधि के लिए एम्पावर्ड पूल मैनेजमेंट समिति (EPMC) की बोली प्रक्रिया के माध्यम से लगभग 7.31 मिलियन मेट्रिक स्टैण्डर्ड क्यूबिक मीटर (MMSCMD) अतिरिक्त प्राकृतिक गैस खरीदी गयी है. इसके फलस्वरूप, उर्वरक क्षेत्र के लिए कुल गैस की उपलब्धता उनके पिछले छह महीनों की औसत खपत की लगभग 80 प्रतिशत तक बढ़ गयी है.पीआईबी कि विज्ञप्ति के अनुसार 1 मार्च 2026 से 24 मार्च 2026 के दौरान 13.55 लाख मेट्रिक टन स्वदेशी यूरिया, 7.62 लाख मेट्रिक टन डीएपी और 3.06 लाख टन एसएसपी का उत्पादन किया गया. सरकार के अनुसार मार्च 2026 तक देश में उर्वरकों के वर्तमान स्टॉक में 53.08 लाख मेट्रिक टन यूरिया, 21.80 लाख मेट्रिक टन डीएपी, 7.98 लाख मेट्रिक टन पोटाश और 48.38 लाख मेट्रिक टन एनपीके शामिल हैं.

आयातित उर्वरकों और उनके कच्चे माल की कीमतों में वैश्विक वृध्दि

विश्व बैंक द्वारा 2 अप्रैल 2026 को जारी की गयी ‘पिंक शीट’ रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक बाजार पश्चिम एशिया में भू राजनीतिक अस्थिरता और प्रमुख शिपिंग मार्ग (होर्मुज़ जलडमरूमध्य और लाल सागर) बाधित होने के कारण कीमतों में उछाल का सामना कर रहे हैं, जिससे उर्जा की लागत बढ़ गयी है. विश्व बैंक के अनुसार मार्च 2025 की तुलना में मार्च 2026 में यूरिया की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत, डीएपी, मोनो-अमोनियम फोस्फेट, अमोनिया और एलएनजी  की कीमतों में क्रमशः 31 प्रतिशत – 57 प्रतिशत, 11 प्रतिशत – 53 प्रतिशत, 34.4 प्रतिशत और 59.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. कीमतों में यह वृद्धि पश्चिम एशिया संकट के अतिरिक्त, कुछ प्रमुख निर्यातकों जैसे चीन और रूस द्वारा, अपने घरेलू बाजार को प्राथमिकता देने के लिए उर्वरक या उनके कच्चे माल के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाने से इनकी वैश्विक स्तर पर कमी पैदा हो गयी है, जिसने कीमतों को उनके उच्चतम स्तर पर पहुँचा दिया है. इसीतरह जहाजों को उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से दूर, दूसरे रास्तों पर भेजने के कारण माल ढुलाई और बीमा लागत में अनुमानित 25-30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इसने भारत जैसे आयातकों के लिए “सीएफआर” (लागत और माल भाड़ा) कीमतों को अधिक बढ़ा दिया है.

उर्वरक संकट और कीमतों में वृद्धि का खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव

भारत का फसल क्षेत्र कृषिगत जीडीपी में लगभग 54 प्रतिशत योगदान करता है और कुल जीडीपी में 10  प्रतिशत का योगदान करता है. इसी तरह देशी की लगभग 46 प्रतिशत जनसँख्या सीधे तौर पर आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है. अतः पश्चिम एशिया के इस भू-राजनीतिक संघर्ष के कारण देश की कृषि और इस पर निर्भर लोगों पर एक दूरगामी और गंभीर परिणाम होंगे. हरित क्रांति की शुरुआत से लेकर अब तक उर्वरकों के उपयोग में वृद्धि देखी गयी है. कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल क्रॉप्स एंड प्राइसेज (CACP) के अनुसार धान की खेती में 2004-05 में 109 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उर्वरकों का इस्तेमाल होता था जो 2022-23 में बढ़कर 176 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया. इसी तरह कुल उर्वरकों के प्रयोग में भी भारी वृद्धि हुई है. चूँकि देशी उर्वरक उत्पादन के लिए भारत कच्चे माल का आयात और साथ ही तैयार उर्वरक का आयात पश्चिम एशिया के देशों से करता है, अतः इनमें कोई भी व्यवधान होने से कृषि लागतों में भारी वृद्धि होगी जिसका सीधा असर भारत में कृषि उत्पादकता, खाद्य कीमतों और किसानों की आय पर पड़ेगा. भारत का किसान लगातार मौसम में होने वाले परिवर्तनों के कारण घटती पैदावार; उर्जा और मशीनरी की बढती कीमतों के चलते अधिक निवेश करने को मजबूर है और आसन्न रसायनों और उर्वरकों की वर्तमान बढती कीमतें उन्हें और भी गहरे आर्थिक संकट में धकेल सकती हैं. उर्वरकों की बढती कीमतों का असर किसानों पर अधिक न पड़े इसलिए भारत सरकार उर्वरक सब्सिडी प्रदान करती है. वर्ष 2022-23 में जब रूस-युक्रेन युद्ध शुरू हुआ, उस साल बजट में सरकार द्वारा रुपये 2.5 लाख करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी प्रदान की गयी थी जो कुल जीडीपी का 0.93 प्रतिशत थी. वर्ष 2025-26 के बजट में उर्वरक सब्सिडी का संशोधित अनुमान रुपये 1.86 लाख करोड़ था जो कुल जीडीपी का 0.53 प्रतिशत था.वर्ष 2026-27 के बजट प्रावधानों के अनुसार उर्वरक सब्सिडी रूपये 1.71 लाख करोड़ रखी गयी थी जो पश्चिम एशिया में फैले युद्ध के कारण बढ़कर 2.0 लाख करोड़ के ऊपर जा सकती है.

टीएमसी सांसद कीर्ति आज़ाद की अध्यक्षता वाली रसायनों और उर्वरकों पर संसदीय स्थायी समिति ने उच्च आयात निर्भरता के कारण आवश्यक उर्वरकों की कमी की चेतावनी दी है. समिति ने इस बात पर जोर दिया है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव से सप्लाई चेन को खतरा है, जिसके संभावित कमी से निपटने के लिए ‘उर्वरक आपूर्ति सुरक्षा कोष’ बनाने की आवश्यकता है. उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा या कमी सिर्फ औद्योगिग समस्या नहीं है; यह 1.4 अरब लोगों की खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है. अप्रैल से जून महीने के दौरान किसान खरीफ फसलों की खेती की तयारी करते हैं और इस दौरान यदि उर्वरकों कि समयगत आपूर्ति में व्यवधान आता है तो फसलों खासकर चावल की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है जो कि देश के अधिकतर हिस्सों में एक मूल भोजन है. यदि पश्चिम एशिया संकट लम्बा खिंचा, जैसा कि प्रतीत होता है, यह लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति (cost-push inflation) की स्थिति पैदा करेगी जिससे ‘फार्म गेट’ कीमतों में वृद्धि होगी और यदि इसमें परिवहन, पैकेजिंग और विपणन की लागत भी शामिल कर दी जाए तो इससे कीमतों में काफी वृद्धि परिलक्षित होगी जो गरीब और मध्यम वर्ग की मेहनत से कमाए गए पैसों पर भारी पड़ेगी. हालाँकि सरकार सब्सिडी के माध्यम से कीमतों के बढ़ने के अधिकांश हिस्से को खुद वहन करने की बात कर रही है, लेकिन आपूर्ति की अनिश्चितता और अन्य लागतों डीजल बीज और मशीनरी की बढती लागत, इस विश्वव्यापी असर वाले युद्ध के दौरान ग्रामीण आय को प्रभावित कर सकती है.

डॉ संतोष वर्मा

डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट हैं

santosh.econ@gmail.com

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