मध्य-पूर्व के संघर्ष ले चलते तेल संकट का  भारत पर कितना असर

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ऐतिहासिक रूप से मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण अनेक तेल संकट सामने आए हैं, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति में भारी असर डाला, जिसके परिणामस्वरूप कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ मंदी की ओर अग्रसर हुईं. भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इन तेल संकटों के गंभीर प्रभावों का सामना करता रहा है. प्रमुख तेल संकटों में 1973 का तेल संकट, 1990 का तेल मूल्य झटका, 2000 के दशक का ऊर्जा संकट तथा 2022–23 का रूस–यूरोप गैस विवाद विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

सन 1973 का तेल संकट, जिसे प्रथम ऑइल-स्ट्रोक भी कहा जाता है, यह Yom Kippur War के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ था. इस युद्ध में अमेरिका ने इजराइल को मिस्र और सीरिया के विरुद्ध समर्थन और सैन्य सहायता प्रदान की. इसके प्रतिउत्तर में Organization of the Petroleum Exporting Countries (ओपेक) के अरब सदस्य देशों ने अमेरिका, यूरोप और जापान को तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया. सन 1960 में स्थापित OPEC, जिसमें प्रारंभ में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला शामिल थे, ऊर्जा उत्पादन और वितरण को नियंत्रित करने में एक महत्वपूर्ण संस्था रही है. इस संकट के दौरान इराक और सऊदी अरब की पाइपलाइनों के बंद होने से प्रतिदिन लगभग एक मिलियन बैरल तेल आपूर्ति में कमी आई. अरब देशों ने तब तक उत्पादन में कटौती जारी रखने का निर्णय लिया जब तक इज़राइल अपने कब्जे वाले क्षेत्रों से पीछे नहीं हटता. इस संकट का सबसे गंभीर प्रभाव उत्पादन में कमी से तेल की कीमतों में अचानक तेजी आ गयी, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुँचाया. भारत भी इससे अछूता नहीं रहा; 1974 में उसका तेल आयात बिल 414 मिलियन डॉलर से बढ़कर 1 अरब डॉलर हो गया, जिसके परिणामस्वरूप भुगतान संतुलन संकट, व्यापार घाटा, महँगाई, परिवहन लागत में वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट और आर्थिक ठहराव जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं।

वर्ष 1990 का तेल संकट इराक द्वारा कुवैत पर अतिक्रमण के कारण उत्पन्न हुआ जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र द्वारा इराक और कुवैत पर तेल प्रतिबंध लगाए गए. इस संघर्ष के कारण वैश्विक बाजारों में प्रतिदिन लाखों बैरल तेल की आपूर्ति बाधित हुई और तेल की कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं. युद्ध के दौरान सैकड़ों तेल कुओं में आग लगी और विशाल तेल रिसाव हुआ, जिससे पर्यावरण को भी गंभीर क्षति पहुँची. भारत पर इसका प्रभाव अत्यंत गंभीर रहा; उसके तेल आयात बिल में एक वर्ष के भीतर 70 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई, विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घटे और भुगतान संतुलन संकट उत्पन्न हुआ. इसके अतिरिक्त विदेशी निवेश में कमी आई और सरकार को स्वर्ण भंडार बेचने जैसे कठोर कदम उठाने पड़े।

वास्तव मे ऊर्जा संकट सन 2003 से प्रारंभ हुआ और 2008 में तेल की कीमतें 145 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गईं. इस संकट के पीछे इराक युद्ध सहित अनेक भू-राजनीतिक घटनाएँ थीं, जिन्होंने क्षेत्रीय तेल आपूर्ति को बाधित किया. इसके साथ ही चीन और भारत जैसे उभरते देशों की बढ़ती ऊर्जा मांग तथा तेल उत्पादन की सीमाओं को लेकर चिंताओं ने कीमतों में तेज वृद्धि को जन्म दिया. भारत, जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के आयात पर अत्यधिक निर्भर था, इस संकट से आर्थिक रूप से प्रभावित हुआ. इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा क्षेत्र में सुधार, आर्थिक उदारीकरण और ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण की दिशा में नीतिगत परिवर्तन किए गए. वर्ष  2022–23 का रूस–यूरोप गैस विवाद रूस द्वारा यूक्रेन का अतिक्रमण के बाद उत्पन्न हुआ. पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण यूरोप में प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित हुई. रूस ने गैस के लिए रूबल में भुगतान की मांग की, जिससे स्थिति और जटिल हो गई. सितंबर 2022 में Nord Stream pipelines को नुकसान पहुँचने से आपूर्ति और अधिक प्रभावित हुई. इस संकट का एक अप्रत्यक्ष परिणाम यह हुआ कि भारत ने रूसी कच्चे तेल के आयात में उल्लेखनीय वृद्धि की और यूरोप को परिष्कृत तेल का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया, हालांकि उसे अमेरिका से कूटनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा।

वर्तमान संकट अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध-2026 के रूप में उभर रहा है, जिसके पूर्ण प्रभाव अभी सामने नहीं आए हैं. वैश्वीकरण के इस युग में विश्व अर्थव्यवस्था परस्पर जुड़ी हुई है, इसलिए किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष का प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ता है. 28 फरवरी 2026 को प्रारंभ हुए इस युद्ध ने एशिया के अनेक देशों की ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है, और भारत भी इससे अछूता नहीं है. यद्यपि भारत सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर प्रभाव से इंकार किया है, किंतु एलपीजी सिलेंडरों को लेकर सार्वजनिक विरोध और खाद्य प्रतिष्ठानों (होटल इंडस्ट्री) के बंद होने जैसी घटनाएँ इसके विपरीत संकेत देती हैं. भारत की लगभग 70 से 80 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकताएँ खाड़ी देशों से पूरी होती हैं, जो इस संघर्ष से प्रभावित हुए हैं. ईरान यह दावा करता है कि उसके हमले केवल पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर केंद्रित हैं, तथापि ऊर्जा उत्पादन स्थलों को भी गंभीर क्षति पहुँची है, जिससे उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है और इसे पूर्ण रूप से बहाल होने में वर्षों लग सकते हैं।

ऊर्जा क्षेत्र के संदर्भ में इस युद्ध का प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है. संघर्ष के एक सप्ताह के भीतर होरमुज स्ट्रेट, जो खाड़ी देशों से तेल और गैस का प्रमुख मार्ग है, को बंद कर दिया गया, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला गंभीर रूप से बाधित हुई. हालांकि 25 मार्च को ईरान ने इराक, पाकिस्तान, भारत, रूस और चीन जैसे पाँच देशों के लिए इस मार्ग को आंशिक रूप से खोल दिया, जिससे भारत को कुछ राहत मिली. इसके बावजूद, भारत ने फरवरी 2026 में ही इस संकट के प्रभावों को महसूस करना शुरू कर दिया. पेट्रोलियम प्लैनिंग एण्ड अनालीसिस सेल के आँकड़ों के अनुसार, जनवरी की तुलना में फरवरी 2026 में कच्चे तेल के आयात में 7.88 प्रतिशत तथा एलपीजी आयात में 21.52 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. मार्च 2026 के आँकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं, किंतु यह अनुमान लगाया जा रहा है कि स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि तेल संकट केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे व्यापक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव उत्पन्न करते हैं. भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए इन संकटों का प्रभाव अधिक गहरा होता है, जिससे यह आवश्यक हो जाता है कि ऊर्जा सुरक्षा को एक दीर्घकालिक रणनीतिक प्राथमिकता के रूप में देखा जाए।

Source: ppac.gov.in/import-export

भारत के संदर्भ अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विनिर्माण, कृषि और मुद्रास्फीति पर ऊर्जा संकट का प्रभाव

मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष और विशेष रूप से होरमुज स्ट्रेट में उत्पन्न व्यवधानों का प्रभाव केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं और समग्र आर्थिक गतिविधियों को भी गहराई से प्रभावित करता है. भारत का अधिकांश समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है, और यदि जहाजों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगता है, तो इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं. उदाहरण के लिए, औषधि उद्योग में उपयोग होने वाले जरूरी औषधीय घटक (API) उत्पादन का मुख्य आधार हैं. यद्यपि इनका लगभग 75 प्रतिशत आयात चीन से होता है, किंतु लगभग 20 प्रतिशत आपूर्ति यूरोप से आती है. यदि होरमुज़ जलडमरूमध्य बाधित होता है, तो भारत को अटलांटिक मार्ग का सहारा लेना पड़ेगा, जो समय और लागत दोनों दृष्टियों से अधिक महंगा है. इस वैकल्पिक मार्ग के उपयोग से उत्पादन और लेन-देन लागत बढ़ेगी, जिससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में दवाओं की कीमतों में वृद्धि होगी।

विनिर्माण और कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूते नहीं रहेंगे. यदि यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो स्वास्थ्य, फार्मास्यूटिकल्स और उच्च-परिशुद्धता (precision) उत्पादों के निर्माण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. यह केवल तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक औद्योगिक लागतों में वृद्धि के रूप में सामने आएगा. उदाहरणस्वरूप, हीलियम का आयात गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है. हीलियम का उपयोग चिप निर्माण, शीतलन प्रणालियों और उच्च-परिशुद्धता निर्माण प्रक्रियाओं में किया जाता है. कतर विश्व के कुल हीलियम उत्पादन का लगभग एक-तिहाई उत्पादन करता है, जो प्राकृतिक गैस प्रसंस्करण का उप-उत्पाद है. यदि आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, तो इसका अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा. विशेष रूप से यदि फार्मा क्षेत्र प्रभावित होता है, तो भारत के दवा निर्यात पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

कृषि क्षेत्र भी इस संकट से प्रभावित हो सकता है. अमेरिकी-इजराइल और ईरान संघर्ष-2026 के कारण यूरिया की आपूर्ति में व्यवधान और इनपुट लागतों में वृद्धि की संभावना है. इसके अतिरिक्त, नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की कमी और कीटनाशकों की कीमतों में वृद्धि कृषि उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर भी दबाव पड़ सकता है।

मुद्रास्फीति के संदर्भ में भी यह संकट गंभीर प्रभाव उत्पन्न कर सकता है. होरमुज़ स्ट्रेट में व्यवधान के कारण भारत को अटलांटिक मार्ग अपनाना पड़ सकता है, जिससे व्यापार लागत बढ़ेगी और अमेरिकी डॉलर की मांग में वृद्धि होगी. परिणामस्वरूप भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन होने की संभावना है. 28 मार्च 2026 को विनिमय दर लगभग 1 अमेरिकी डॉलर के लिए 94.88 रुपये तक पहुँच चुकी थी, और संघर्ष के बाद से रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है. इसके अतिरिक्त, पिछले कुछ महीनों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का शुद्ध प्रवाह नकारात्मक रहा है, जिससे मुद्रा पर और दबाव पड़ा है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े व्यवसायों को अब अधिक लागत पर डॉलर खरीदने पड़ रहे हैं।

ऊर्जा आपूर्ति में कमी और पेट्रोलियम उत्पादों की सीमित उपलब्धता घरेलू बाजारों में उत्पादन और परिवहन लागत को बढ़ाएगी, जिसका सीधा प्रभाव कीमतों पर पड़ेगा. उच्च लेन-देन लागत और आपूर्ति बाधाओं के कारण मुद्रास्फीति में वृद्धि होना स्वाभाविक है. जहाँ 2025 में मुद्रास्फीति लगभग 2 प्रतिशत के आसपास थी, वहीं वर्तमान परिस्थितियों में इसके लगभग 5.1 प्रतिशत तक पहुँचने का अनुमान है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि ऊर्जा संकट केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार, औद्योगिक उत्पादन, कृषि और समग्र आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करने वाली व्यापक चुनौती है. भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है, जिससे यह आवश्यक हो जाता है कि वह अपनी आर्थिक और ऊर्जा नीतियों को अधिक लचीला, विविधीकृत और संकट-प्रतिरोधी बनाए।

प्रोफेसर कौशलेश लाल

प्रख्यात अर्थशास्त्री

klal.mails@gmail.com

प्रोफेसर शंपा पॉल

सेंटर फॉर इकोनॉमिक एण्ड सोशल रिसर्च

shampa.paul147@gmail.com

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