नेहरू से मोदी : भारत की एकदलीय प्रणाली में तीन बदलाव

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आज़ाद भारत में नेहरू से लेकर मोदी के राजनीतिक इतिहास के सफर को समझना असल में दो अलग-अलग आयामों की यात्रा को समझने जैसा है। 1951-52 की सदियों में जब लाखों नागरिक अस्थायी पोलिंग बूथों की ओर गए थे, उसके सात दशक से ज़्यादा समय बाद भारतीय चुनावी राजनीति का बुनियादी तरीका पूरी तरह बदल गया है। लोकतांत्रिक माहौल, जो कभी मिली-जुली और धर्मनिरपेक्ष सहमति पर टिका था, अब एक बहुत अनुशासित, विचारधारा के स्तर पर एकजुट और संगठन के तौर पर मज़बूत विकल्प के इर्द-गिर्द नया रूप ले चुका है।

इस ढांचागत बदलाव को सबसे अच्छे तरीके से ‘पहली एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली’ से ‘दूसरी एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली’ में बदलाव के तौर पर समझा जा सकता है। बीसवीं सदी के मध्य में राजनीतिक वैज्ञानिक रजनी कोठारी ने आज़ादी के बाद के भारत के राजनीतिक माहौल की अनोखी कार्यप्रणाली को ‘कांग्रेस व्यवस्था’ का नाम दिया था। यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें एक बड़ी पार्टी का सत्ता पर लगभग एकाधिकार था, फिर भी वह एकतरफा तानाशाही के तौर पर नहीं, बल्कि एक विशाल ‘छाता’ संगठन के तौर पर काम करती थी। नेहरू के दौर की कांग्रेस अलग-अलग क्षेत्रीय हितों, अंदरूनी गुटों और विरोधी विचारधाराओं की एक बड़ी संगठन थी, जिसमें रूढ़िवादी परंपरावादियों से लेकर कट्टर समाजवादी तक शामिल थे। असहमति को दबाया नहीं जाता था; बल्कि उसे सत्ताधारी पार्टी के अंदर ही समाहित किया जाता था। उस पर बातचीत होती थी और समाधान निकाला जाता था। उस दौर की विपक्षी पार्टियों को सरकार बनाने की उम्मीद नहीं थी; इसके बजाय वे दबाव समूह के तौर पर काम करती थीं, जो कांग्रेस के अंदरूनी गुटों पर असर डालती थीं। जवाहरलाल नेहरू इस व्यवस्था के शिखर पर एक मार्गदर्शक और अभिभावक की तरह थे, जो चुनावों को हाल ही में आज़ाद हुए और ज़्यादातर अनपढ़ मतदाताओं के लिए नागरिक शिक्षा की एक बड़ी प्रक्रिया के तौर पर देखते थे।

     इक्कीसवीं सदी में, इस ढांचे की जगह पूरी तरह से उस व्यवस्था ने ले ली है जिसे जानकार ‘बीजेपी व्यवस्था’ या ‘दूसरी एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली’ कहते हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बना मौजूदा दबदबे का दौर पूरी तरह से अलग राजनीतिक तर्क पर काम करता है। आज की प्रमुख पार्टी व्यवस्था सभी को साथ लेकर चलने वाली या विचारधारा के मामले में लचीली नहीं है। इसके बजाय, यह पूरी तरह से स्पष्ट विचारधारा, सख्त संगठनात्मक अनुशासन और लगातार व बहुत अच्छी तरह से तालमेल बिठाकर चलाए जाने वाले चुनावी अभियान के दम पर अपनी बढ़त बनाए रखती है। जहाँ नेहरू के समय की कांग्रेस राजनीतिक विरोधियों को साथ लाने और उन्हें जगह देने की कोशिश करती थी, वहीं मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) उन्हें चुनावों में पूरी तरह से हराने और विचारधारा के स्तर पर मात देने की कोशिश करती है। असहमति को अब पार्टी के अंदर जगह देकर नहीं संभाला जाता; बल्कि इसे बाहरी मामला बनाकर सांस्कृतिक गौरव, सभ्यता के पुनरुत्थान और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मजबूत नैरेटिव के ज़रिए इसका मुकाबला किया जाता है।

     पहली व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में बदलाव भारत में राजनीतिक कामकाज के नियमों को पूरी तरह से बदलने जैसा है। इसने प्रधानमंत्री के जनता से बातचीत करने के तरीके, सरकार द्वारा विकास के संसाधनों के इस्तेमाल, सामाजिक गठजोड़ बनाने के तरीके और गणतंत्र के संस्थागत ढांचे के केंद्रीय सत्ता के प्रति प्रतिक्रिया देने के तरीके को बदल दिया है।

कैंपेन और कम्युनिकेशन मशीनरी-

बड़े पैमाने पर लोगों को सिखाने-समझाने से लेकर एल्गोरिदम-आधारित प्रचार तक राजनीतिक संचार वह आधार है जिस पर लोकतांत्रिक वैधता की तस्वीर बनती है। बड़े भौगोलिक विस्तार, गहरे सामाजिक बंटवारे और साक्षरता के अलग-अलग स्तरों वाले बड़े लोकतंत्र में, जिन तरीकों से कोई राजनीतिक नेता मतदाताओं तक पहुँचता है, उन्हें अपने पक्ष में करता है और एकजुट करता है, वही सत्ता की असल संरचना तय करते हैं। जवाहरलाल नेहरू के 20वीं सदी के मध्य के कैंपेन से लेकर नरेंद्र मोदी के 21वीं सदी के चुनावी अभियानों तक का बदलाव सिर्फ़ टेक्नोलॉजी में अपग्रेड नहीं है; यह लोकतांत्रिक जुड़ाव की बुनियादी सोच में एक बहुत बड़े बदलाव को दिखाता है।

      नेहरू के कैंपेन मुख्य रूप से लिखित संदेशों, बातचीत और लोगों को समझाने-बुझाने पर आधारित थे। इनका मकसद एक विशाल और हाल ही में वोटिंग का अधिकार पाने वाली आबादी के बीच नागरिक चेतना को धीरे-धीरे विकसित करना था। इसके उलट, मोदी के कैंपेन इमेज (छवि) पर आधारित, बहुत ज़्यादा तालमेल वाले और एल्गोरिदम-आधारित होते हैं। इन्हें भावनाओं को उभारकर और खास तौर पर चुने गए लोगों तक लगातार पहुँच बनाकर, लोगों का ध्यान खींचने की होड़ वाली दुनिया में छा जाने के लिए तैयार किया गया है। इस बदलाव को देखकर हम समझ सकते हैं कि नेता, मीडिया और वोटर के बीच का रिश्ता किस तरह पूरी तरह से बदल गया है।

      कम्युनिकेशन का यह तरीका पूरी तरह से नेता की शारीरिक मौजूदगी पर निर्भर था। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि नेहरू के भाषण आम पब्लिक एड्रेस सिस्टम के ज़रिए दिए जाते थे, जिनमें पुराने ज़माने के बड़े माइक्रोफ़ोन का इस्तेमाल होता था। इसके लिए वक्ता को एक खास जगह पर खड़े रहना पड़ता था। नेहरू ने इन भाषणों का इस्तेमाल ग्रामीण दर्शकों के लिए जटिल सरकारी नीतियों को आसान भाषा में समझाने के लिए किया। वे पंचवर्षीय योजनाओं की ज़रूरत, भाखड़ा-नांगल बांध जैसी बड़ी नदी घाटी परियोजनाओं का मकसद, सांप्रदायिकता के खतरे और भू-राजनीतिक महत्व के बारे में बताते थे। वे अनपढ़ दर्शकों को कमतर नहीं समझते थे; बल्कि, वे उन्हें एक बड़े संवैधानिक प्रयोग में समझदार और बराबर के हिस्सेदार मानते थे।

       इस सिखाने वाले अंदाज़ को उस दौर के बड़े प्रिंट मीडिया नेटवर्क का समर्थन हासिल था। बीसवीं सदी के मध्य में भारतीय प्रेस पर बड़े अखबारों का दबदबा था, जिनका संपादन पढ़े-लिखे राष्ट्रवादी करते थे। वे पत्रकारिता को मुनाफ़ा कमाने वाला धंधा नहीं, बल्कि जनसेवा का एक ज़रिया मानते थे। अखबार अक्सर नेहरू के चुनावी भाषणों का पूरा और बिना काट-छांट वाला टेक्स्ट छापते थे। तब न तो 24 घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल थे, जो तुरंत विज़ुअल हाइलाइट्स मांगते थे, और न ही राजनीतिक भाषा को बिगाड़ने वाले एल्गोरिदम-आधारित ट्रेंड्स थे। संचार की गति धीमी थी, जिससे वोटरों को स्थानीय कम्युनिटी रीडिंग सर्कल और ग्राम पंचायतों के ज़रिए राजनीतिक तर्कों को पढ़ने, उन पर बहस करने और उन्हें समझने का समय मिलता था।

‘बीजेपी सिस्टम’ एक ऐसी ‘अटेंशन इकॉनमी’ (ध्यान खींचने वाली अर्थव्यवस्था) में काम करता है, जो बहुत ज़्यादा बंटी हुई है। यहाँ मुख्य चुनौती वोटर तक पहुँच बढ़ाना नहीं, बल्कि डिजिटल जानकारी के शोर-शराबे के बीच उनका लगातार ध्यान अपनी ओर खींचना है। बीजेपी के आधुनिक चुनावी अभियान ने राजनीतिक रैली के कॉन्सेप्ट को बदल दिया है। हालाँकि मोदी खुद एक ज़बरदस्त वक्ता हैं और भारी भीड़ जुटाते हैं, लेकिन उनके अभियान हर जगह मौजूद रहने (omnipresence) के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं। वर्ष 2014 और 2019 के अहम आम चुनावों के दौरान, बीजेपी ने एडवांस्ड 3D होलोग्राम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया। इसके ज़रिए, ग्रामीण भारत में बने सैकड़ों खास मंचों पर एक ही समय में नरेंद्र मोदी की असली आकार वाली, चलती-फिरती तस्वीर दिखाई गई।

      इस तकनीकी बदलाव ने फिजिकल कैंपेन (आमने-सामने के प्रचार) के तरीके को बदल दिया है। आज के कैंपेन के माहौल में, नेता का खुद वहां मौजूद होना कोई ज़रूरी बात नहीं रह गयी है; उन्हें आर्टिफ़िशियल तरीके से दिखाया जा सकता है। कई जगहों पर एक साथ पेश किया जा सकता है और कहीं भी प्रोजेक्ट किया जा सकता है। इसके अलावा, रैली का स्वरूप भी बदल गया है। अब लोग सिर्फ़ चुपचाप सुनते नहीं हैं, बल्कि सक्रिय रूप से हिस्सा लेते हैं। वोटर अब बस बैठकर सुनते नहीं हैं; वे इस आयोजन का हिस्सा बन जाते हैं। प्लास्टिक के मोदी मास्क पहनते हैं, पार्टी का सामान (जैसे झंडे या बैनर) लहराते हैं और इवेंट को रिकॉर्ड करने के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह, रैली सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए एक ऐसी डिजिटल चीज़ बन जाती है, जो खुद-ब-खुद आगे फैलती रहती है।

     मोदी के दौर के कैंपेन सिस्टम का असली आधार आम लोगों की नज़र से दूर, स्मार्टफोन के डिजिटल नेटवर्क के अंदर काम करता है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, BJP ने एक अभूतपूर्व और कई स्तरों वाला डिजिटल कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया है, जो राष्ट्रीय मुख्यालय से लेकर हर पोलिंग बूथ तक फैला हुआ है। पार्टी हर पोलिंग स्टेशन के लिए बहुत खास डेमोग्राफिक प्रोफ़ाइल बनाने के लिए वोटर रजिस्ट्रेशन डेटा और कंज्यूमर डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल करती है। वोटरों को हज़ारों छोटे-छोटे लोकल WhatsApp ग्रुप में बांटा जाता है, जिन्हें बूथ लेवल के खास कार्यकर्ता (पन्ना प्रमुख) मैनेज करते हैं। ये ग्रुप जानकारी के बंद इकोसिस्टम की तरह काम करते हैं और दिन में कई बार सीधे वोटर के फ़ोन तक खास कंटेंट पहुंचाते हैं। कंटेंट को इस तरह बनाया जाता है कि वह तुरंत लोगों की भावनाओं को जगाए जैसे डर, गर्व, नाराज़गी या उम्मीद। छोटे वर्टिकल वीडियो, मीम और इन्फोग्राफ़िक्स पारंपरिक एडिटोरियल गेटकीपर (जैसे मीडिया हाउस) को दरकिनार कर देते हैं और लोगों के आपसी नेटवर्क के ज़रिए तेज़ी से फैलते हैं।

वोटर जुटाने के बदलते तरीके: नागरिक राष्ट्रवाद बनाम सांस्कृतिक एकजुटता-

किसी भी बड़े लोकतंत्र में, पार्टियाँ सिर्फ़ पहले से मौजूद सामाजिक बँटवारों पर प्रतिक्रिया नहीं देतीं; वे सक्रिय रूप से कुछ खास पहचानों को आकार देती हैं, उन्हें संगठित करती हैं और उनका राजनीतिकरण करती हैं, जबकि दूसरी पहचानों को दबाती हैं। नेहरू के दौर से मोदी के मौजूदा दौर में बदलाव, लोगों को जुटाने के इस तरीके को पूरी तरह से नए सिरे से लिखने जैसा है। पहली एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली ने अपनी चुनावी अपील को नागरिक राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्ष नागरिकता और राज्य के नेतृत्व वाले विकासवाद के ढांचे पर टिकाया था, जो कुलीन वर्ग के नेतृत्व वाले सामाजिक गठबंधनों के ऊर्ध्वाधर (vertical) नेटवर्क के ज़रिए काम करता था। दूसरी एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली ने इस आधार को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सभ्यतागत गर्व और क्षैतिज (horizontal) बहुसंख्यक एकजुटता के ढांचे की ओर मोड़ दिया है और हाशिए पर मौजूद लोगों के हिंदुत्व के नज़रिए से पारंपरिक जातिगत बँटवारों को नए सिरे से तैयार किया है।

     बातचीत के स्तर पर, नेहरू के दौर में लोगों को जुटाने का ध्यान ‘सार्वभौमिक नागरिक’ की श्रेणी पर केंद्रित था। राज्य ने व्यक्ति की लोकतांत्रिक पहचान को धर्म, भाषा और जाति जैसी उनकी जन्मजात पहचानों से अलग करने की कोशिश की। सत्ताधारी पार्टी की वैधता आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की परियोजना से जुड़ी थी। चुनावी अपीलें औद्योगिक आधुनिकीकरण, संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक मुक्ति के साधन के रूप में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के वादों के इर्द-गिर्द तैयार की गई थीं। इस ढांचे में आदर्श वोटर आगे की सोच रखने वाला धर्मनिरपेक्ष राज्य में तर्कसंगत भागीदार था, जहाँ आर्थिक योजना और वैज्ञानिक सोच की ताकतों के तहत सामाजिक विभाजन धीरे-धीरे खत्म हो जाते।

      नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में BJP का मौजूदा चुनावी दबदबा ‘ऊपर से नीचे’ (vertical) वाले एलीट-ब्रोकरेज मॉडल को छोड़ चुका है। इसकी जगह एक बहुत ही सोची-समझी ‘क्षैतिज’ (horizontal) सांस्कृतिक एकजुटता की रणनीति ने ले ली है, जिसका मकसद पारंपरिक जाति और वर्ग की सीमाओं से परे एक एकजुट बहुसंख्यक पहचान बनाना है। दूसरी एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली के तहत, लोगों को एकजुट करने का आधार ‘संवैधानिक नागरिक’ से बदलकर ‘सभ्यतागत पहचान’ हो गया है। आधुनिक राज्य आदर्श मतदाता को सिर्फ़ गणतंत्र के कानूनी नागरिक के तौर पर नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता के उत्तराधिकारी के तौर पर देखता है। चुनावी प्रचार में सांस्कृतिक रूप से औपनिवेशिक सोच से मुक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा और सभ्यतागत गौरव पर ज़ोर दिया जाता है। सत्ताधारी नैरेटिव चुनावी पसंद को अलग-अलग नीतियों के बीच चुनाव के तौर पर नहीं, बल्कि देश को अंदरूनी और बाहरी खतरों से बचाने के ऐतिहासिक कर्तव्य के तौर पर पेश करता है।

चुनाव में कल्याणकारी योजनाओं का महत्व: राष्ट्र-निर्माण बनाम सीधे लाभ पहुँचाना-

एक विकासशील देश का संसाधनों के बंटवारे का ढांचा ही उसकी लोकतांत्रिक वैधता का भौतिक आधार होता है। गहरे आर्थिक अंतर और व्यापक गरीबी वाले समाज में, जन-कल्याण के प्रति सरकार का नज़रिया न सिर्फ़ आर्थिक विकास को आकार देता है, बल्कि यह भी तय करता है कि नागरिक शासन को कैसे देखते हैं और अपनी भौतिक ज़रूरतों को अपने वोट से कैसे जोड़ते हैं।

      नेहरू के दौर से मोदी के दौर तक का बदलाव इस बात में एक बुनियादी बदलाव दिखाता है कि कल्याणकारी योजनाओं का इस्तेमाल चुनाव में कैसे किया जाता है। पहली एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली ने अपनी वैधता को बड़े पैमाने पर कल्याणकारी योजनाओं और लंबे समय तक चलने वाली सार्वजनिक संपत्ति बनाने पर टिकाया था। इसमें विकास को एक विशेष सरकार द्वारा संचालित राष्ट्र-निर्माण की सामूहिक परियोजना के तौर पर पेश किया जाता था। दूसरी एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली ने इस ढांचे को बदलकर ‘माइक्रो-वेलफेयर’ (छोटे स्तर पर कल्याणकारी योजनाओं) का सिस्टम बना दिया है, जिसे अक्सर ‘लाभार्थी’ (बेनिफिशियरी) राजनीति कहा जाता है। यह आधुनिक मॉडल पारंपरिक बिचौलियों को दरकिनार कर डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के ज़रिए सीधे लोगों तक ठोस, निजी इस्तेमाल वाली चीज़ें पहुँचाता है और इन चीज़ों को प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि से मज़बूती से जोड़ता है।

      दूसरी प्रभावशाली पार्टी व्यवस्था के तहत मौजूदा कल्याणकारी व्यवस्था ने संसाधनों के बंटवारे के इस तर्क को पूरी तरह बदल दिया है। मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी ने विकास का मुख्य फोकस लंबे समय तक चलने वाली, अमूर्त बड़ी संपत्तियों से हटाकर सीधे परिवारों तक ठोस निजी चीज़ों को तेज़ी से और बहुत कुशलता से पहुँचाने पर कर दिया है। आधुनिक सरकार ने ‘नए वेलफेयरिज़्म’ की शुरुआत की है, जिसमें ज़रूरी निजी चीज़ों और सेवाओं को आम लोगों तक पहुँचाने को प्राथमिकता दी जाती है। ग्रामीण रोज़गार गारंटी जैसे अमूर्त सामाजिक अधिकारों पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित करने के बजाय, मोदी सरकार ने अपने संसाधनों को स्पष्ट, रोज़मर्रा की ज़रूरतों की ओर लगाया है। यह लक्षित डिलीवरी JAM ट्रिनिटी के नाम से जाना जाने वाले एक उन्नत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से संभव हुई है। इसमें जन धन बैंक खाते, आधार बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली और हर जगह मौजूद मोबाइल कनेक्टिविटी का एकीकरण शामिल है।

     डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) का उपयोग करके, केंद्र सरकार लाभार्थियों के बैंक खातों में सीधे नकद और सब्सिडी भेज सकती है, जिससे पिछले दौर में परेशान करने वाले भ्रष्ट स्थानीय बिचौलियों, गाँव के दलालों और क्षेत्रीय राजनीतिक समूहों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाता है। इस तकनीकी दक्षता ने प्रशासनिक लीकेज को काफ़ी कम कर दिया है और डिलीवरी की गति बढ़ाई है, जिससे आम नागरिक और केंद्र सरकार के बीच गहरा संस्थागत भरोसा बना है।

चर्चा-

 नेहरू से मोदी तक भारतीय लोकतंत्र में एक समानता ‘एक-दलीय प्रणाली’ का आना है। एक-दलीय प्रभुत्व प्रणाली सिर्फ़ विचारधारा की शुद्धता या संचार रणनीति के दम पर नहीं टिक सकती; उसे अपनी सत्ता को एक टिकाऊ भौगोलिक और जनसांख्यिकीय आधार पर जमाना होता है। कई जातियों, भाषाओं और गहरे सामाजिक भेदभाव वाले इस उपमहाद्वीप में चुनाव जीतने वाला गठबंधन बनाने के लिए मुख्य केंद्र और बाहरी इलाकों के बीच लगातार बातचीत और तालमेल की ज़रूरत होती है। नेहरू के दौर के कांग्रेस के दबदबे से मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी व्यवस्था में बदलाव, सत्ताधारी आधार के भौगोलिक फैलाव और सामाजिक बनावट, दोनों में एक पूरी तरह से ढांचागत बदलाव को दिखाता है।

      इन दो प्रधानमंत्रियों के दौर में कई मायनों में मूल्यों, सोच और संस्थानों के काम करने के तरीके में बदलाव दिखता है। लंबे भाषणों और वैचारिक मंथन की जगह अब एल्गोरिदम और डिजिटल मीडिया ने ले ली है। राजनीति अब मतदाताओं के क्षणिक लाभ पर ज्यादा केंद्रित हो गयी है और उन्हें सीधे हाथ में पैसे या सुविधाएँ दी जा रही हैं। अंत में, उन्हें आपस में एक दल के अंदर लाने के लिए अब समावेशी सामाजिक गठजोड़ की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और गर्व ने ले ली है। इन सारे बदलावों के साथ एक बात साफ है कि लोगों के अंदर लोकतांत्रिक मूल्य जिंदा हैं और वे बदलाव की ओर भी देखते हैं। जहाँ मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने 2014 और 2019 में करिश्माई जीत हासिल की, वहीं 2024 में बीजेपी की सीट 250 से कम अंकों तक सिमट गई। इन परिणामों ने बीजेपी व्यवस्था में एक दरार को स्पष्ट कर दिया है। इसको भरने के लिए विशेष रूप से क्षेत्रीय दलों के विधायकों और नेताओं का दल-बदलकर बीजेपी में शामिल होना, लोकतांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता है। चुनावी जीत, संगठन का विस्तार, सत्ता का स्थायित्व किसी भी दल को मजबूत बना सकते हैं, लेकिन यहां पर अवसान दिखाई दे रहा है। उदाहरणतः महाराष्ट्र व बंगाल चुनाव के बाद की स्थितियों से कहा जा सकता है, किस प्रकार से लोग दलीय सीमाओं को तोड़ रहे हैं।

     अंततः भारतीय लोकतंत्र की निरंतरता केवल चुनावी जीत या तकनीकी दक्षता पर निर्भर नहीं करती। एक स्थायी ‘प्रभुत्व प्रणाली’ को बनाए रखने के लिए केवल संगठनात्मक शक्ति ही काफी नहीं है, बल्कि उसके लिए संस्थागत लचीलेपन, राजनीतिक असहमति के प्रति सम्मान और संवाद की संस्कृति को बचाए रखना अनिवार्य है। जैसा कि हालिया चुनावी रुझान संकेत देते हैं, भारतीय लोकतंत्र अपनी जटिलता और विविधता के कारण हमेशा एक ऐसे संतुलन की मांग करता है, जहाँ तकनीक और विकास के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों और विपक्ष की जगह भी सुरक्षित रहे।

डॉ. उज्ज्वल कटियार

Drujjwalkatiyar@gmail.com

मतदान व्यवहार विश्लेषक एवं निर्वाचन भूगोल विशेषज्ञ

शिवम सिंह

shivamanjha101@gmail.com

Ph.D शोधार्थी (इलाहाबाद यूनिवर्सिटी)

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